मथुरा में देवकी-वसुदेव को मुक्त करने और गुरु सांदीपनि से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात, द्वारकाधीश श्रीकृष्ण को अपने माता-पिता (नन्द-यशोदा) और गोकुल की गोपियों की अत्यंत याद सताने लगी। वे जानते थे कि ब्रजवासी उनके वियोग में अपने प्राण त्यागने को उद्यत हैं। भगवान ने अपने परम ज्ञानी सखा 'उद्धव जी' को अपना दूत बनाकर ब्रज भेजा। यह यात्रा केवल एक सन्देश पहुँचाने की नहीं थी, बल्कि ज्ञान-मार्ग के पथिक उद्धव जी को 'भक्ति-मार्ग' (प्रेम) का अमृत पिलाने की भगवान की एक गुप्त योजना थी। आइए, श्रीमद्भागवत के इस परम ज्ञानमयी प्रसंग का 10 मूल श्लोकों के साथ दर्शन करें।
1. उद्धव जी का परिचय और ब्रज प्रस्थान
उद्धव जी कोई साधारण दूत नहीं थे, वे स्वयं साक्षात बृहस्पति के शिष्य और महान ज्ञानी थे।
॥ उद्धव जी का परिचय ॥
वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा ।
शिष्यो बृहस्पतेः साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तमः ॥
(10.46.1)
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— वृष्णिवंशियों (यादवों) में सबसे श्रेष्ठ, भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत प्रिय सखा और मंत्री, साक्षात देवगुरु बृहस्पति के शिष्य तथा बुद्धिमानों में सर्वोत्तम 'उद्धव जी' थे।
भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव जी का हाथ अपने हाथ में लेकर उन्हें गोकुल जाने का आदेश दिया।
॥ भगवान का आदेश ॥
गच्छोद्धव व्रजं सौम्य पित्रोर्नौ प्रीतिमावह ।
गोपीनां मद्वियोगाधिं मत्सन्देशैर्विमोचय ॥
(10.46.3)
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे सौम्य उद्धव! तुम ब्रज में जाओ और हमारे माता-पिता (नन्द-यशोदा) को मेरे समाचार देकर प्रसन्न करो। और मेरे वियोग की पीड़ा से दुःखी गोपियों को मेरा सन्देश सुनाकर उनका दुःख दूर करो।"
2. गोपियों के प्रेम का भगवान द्वारा वर्णन
मथुरा में बैठे-बैठे भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के उस अनन्य प्रेम का वर्णन करते हैं, जिसने उद्धव जी के ज्ञान को हिलाकर रख दिया।
॥ गोपी-प्रेम की महिमा ॥
ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः ।
मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः ॥
(10.46.4)
अर्थ: "हे उद्धव! उन गोपियों का मन केवल मुझमें लगा है, उनके प्राण मेरे ही लिए हैं और उन्होंने मेरे लिए अपने शरीर (लोक-लाज) को भी त्याग दिया है। मुझे ही अपना परम प्रियतम और अपनी आत्मा मानकर वे मन से केवल मुझमें ही रम गई हैं।"
3. नन्दबाबा और माता यशोदा का महा-विरह
उद्धव जी रथ पर सवार होकर सूर्यास्त के समय नन्द-गोकुल पहुँचे। जब उन्होंने नन्दबाबा से भेंट की, तो नन्दबाबा रात भर रोते हुए कन्हैया की बचपन की लीलाओं का स्मरण करते रहे।
॥ नन्दबाबा की दशा ॥
स्मरतां कृष्णवीर्याणि लीलापाङ्गनिरीक्षितम् ।
हसितं भाषितं चाङ्ग सर्वा नः शिथिलाः क्रियाः ॥
(10.46.21)
अर्थ: (नन्दबाबा कहते हैं)— "हे उद्धव! श्रीकृष्ण के पराक्रमों, उनकी बाल-लीलाओं, तिरछी चितवन से उनका देखना, उनका हँसना और उनकी तोतली बातें— इन सबको याद करते-करते हमारे शरीर की सारी क्रियाएं (कामकाज) शिथिल (जड़) हो गई हैं।"
4. प्रातःकाल गोपियों का उद्धव जी से दर्शन और 'भ्रमरगीत' का आरम्भ
यहाँ से 47वाँ अध्याय आरम्भ होता है। सुबह जब गोपियों ने नन्दभवन के द्वार पर सोने का रथ देखा, तो उन्हें लगा कि शायद कन्हैया लौट आया है। परंतु जब उन्होंने पीताम्बर पहने, कन्हैया जैसी ही वेशभूषा वाले उद्धव जी को देखा, तो वे उन्हें घेरकर खड़ी हो गईं।
उसी समय एक भँवरा (भ्रमर/मधुप) उड़ता हुआ वहाँ आ गया और एक गोपी के चरणों के पास गुंजार करने लगा। गोपी ने उस भँवरे को ही श्रीकृष्ण का दूत मानकर, उसी के बहाने कन्हैया (और उद्धव) को जो उलाहना दिया, वही 'भ्रमरगीत' है।
॥ भ्रमरगीत: भँवरे को उलाहना ॥
मधुप कितवबन्धो मा स्पृशाङ्घ्रिं सपत्न्याः
कुचविलुलितमालाकुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः ।
वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं
यदुसदसि विडम्बं यस्य दूतस्त्वमीदृक् ॥
(10.47.11)
अर्थ: (गोपी कहती है)— "अरे भँवरे! तू उस कपटी (श्रीकृष्ण) का मित्र है, इसलिए तू हमारे चरणों को मत छू। तेरी मूँछों पर हमारी सौतों (मथुरा की स्त्रियों) के वक्षस्थलों पर लगी हुई माला का कुमकुम लगा है। मधुराज (श्रीकृष्ण) उन मानिनी स्त्रियों को ही प्रसन्न करें। यदुवंशियों की सभा में उनका दूत बनकर आने वाले तेरे जैसे छली की क्या आवश्यकता है! (यह हमारे लिए विडम्बना है)।"
आध्यात्मिक रहस्य: 'भ्रमर' काले रंग का होता है, कन्हैया भी काले हैं और उद्धव जी भी। भँवरे का स्वभाव है फूल का रस चूसकर उड़ जाना। गोपियां ताना मारती हैं कि जैसे यह भँवरा रस लेकर उड़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्ण भी हमारा प्रेमरस लेकर मथुरा चले गए और अब लौटकर नहीं आए।
5. कन्हैया की याद में गोपी का क्रंदन
गोपियां उद्धव जी से पूछती हैं कि क्या वे कभी हमें याद भी करते हैं या पूरी तरह भूल गए हैं?
॥ विरह-वेदना का प्रश्न ॥
अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते
स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान् ।
क्वचिदपि स कथा नः किङ्करीणां गृणीते
भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध्यधास्यत् कदा नु ॥
(10.47.21)
अर्थ: "अहो! क्या आर्यपुत्र श्रीकृष्ण अब मथुरा (मधुपुरी) में ही रहते हैं? हे सौम्य! क्या वे कभी अपने पिता के घर (नन्दभवन) और सखा गोपों को याद करते हैं? क्या वे कभी हम दासियों (किंकरी) की भी चर्चा करते हैं? वे अपने अगुरु-सुगन्धित हाथ को हमारे सिर पर कब रखेंगे?"
6. उद्धव जी द्वारा भगवान का 'ज्ञान-सन्देश' देना
गोपियों का यह करुण विलाप सुनकर उद्धव जी का सारा ज्ञान पिघलने लगा। उन्होंने गोपियों को सांत्वना देते हुए भगवान का वह निर्गुण-सगुण संदेश सुनाया:
॥ भगवान का संदेश ॥
भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्वचित् ।
यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्निर्जलं मही ॥
(10.47.29)
अर्थ: (श्रीकृष्ण का सन्देश)— "हे गोपियों! तुम्हारा मुझसे सर्वात्मना (किसी भी प्रकार से) कभी वियोग नहीं हो सकता। जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— ये पांचों तत्त्व सभी भौतिक प्राणियों में हमेशा विद्यमान रहते हैं, वैसे ही मैं भी सर्वात्मा रूप में सबमें व्याप्त हूँ।"
भगवान ने आगे यह भी बताया कि मैं जानबूझकर तुमसे दूर हूँ, क्योंकि दूरी में ध्यान अधिक प्रगाढ़ होता है।
॥ ध्यान की प्रगाढ़ता ॥
यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते ।
स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्निकृष्टेऽक्षिगोचरे ॥
(10.47.34)
अर्थ: "जैसे प्रियतम के बहुत दूर चले जाने पर स्त्रियों का मन पूरी तरह उसी के ध्यान में डूब जाता है, वैसा ध्यान प्रियतम के पास (आँखों के सामने) रहने पर नहीं होता।"
7. उद्धव जी का ज्ञान-गर्व टूटना और गोपियों की वंदना
उद्धव जी 'ज्ञान-मार्गी' थे और निराकार ब्रह्म को मानते थे। परंतु गोपियों के इस सगुण प्रेम और विरह को देखकर उनका ज्ञान-गर्व चूर-चूर हो गया। उन्हें लगा कि मेरा ज्ञान इन गोपियों के प्रेम के सामने अत्यंत तुच्छ है।
॥ ज्ञान पर भक्ति की विजय ॥
एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो
गोविन्द एवमखिलात्मनि रूढभावाः ।
वाञ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वयं च
किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य ॥
(10.47.58)
अर्थ: (उद्धव जी विचार करते हैं)— "इस पृथ्वी पर शरीर धारण करना केवल इन ब्रजांगनाओं (गोपियों) का ही सफल है, क्योंकि इनका सर्वात्मा गोविन्द में ऐसा परम प्रेम (रूढ़-भाव) हो गया है, जिसकी वाञ्छा जन्म-मरण से डरने वाले मुनि और हम भक्त भी करते हैं। जिन्हें भगवान की कथा का रस मिल गया, उनके लिए ब्राह्मण (ज्ञानी) के जन्म से भी क्या प्रयोजन?"
अंत में उद्धव जी ने वही इच्छा प्रकट की, जो आज भी हर वैष्णव भक्त करता है— "हे प्रभु! मुझे अगले जन्म में ब्रह्मा का पद नहीं चाहिए, मुझे तो केवल इस वृन्दावन की एक छोटी सी लता या झाड़ी बना देना।"
॥ गोपी-चरणों की वंदना (अंतिम प्रणाम) ॥
वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः ।
यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥
(10.47.63)
अर्थ: "मैं नन्दबाबा के ब्रज की इन गोपियों के चरणों की धूलि (पादरेणु) की बारंबार वंदना करता हूँ, जिनके द्वारा गाया गया हरिकथा का यह गीत (भ्रमरगीत) तीनों लोकों को पवित्र कर रहा है।"
कई महीनों तक ब्रज में रहकर और गोपियों से प्रेम की शिक्षा लेकर, ज्ञानी उद्धव जी एक सच्चे भक्त बनकर मथुरा लौट गए। उन्होंने श्रीकृष्ण को ब्रजवासियों का सारा वृत्तांत सुनाया।