कंस वध, उग्रसेन का राज्याभिषेक और सांदीपनि आश्रम में विद्या-ग्रहण | Kamsa Vadh Aur Ugrasena Rajyabhishek bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

कंस वध, उग्रसेन का राज्याभिषेक और सांदीपनि आश्रम में विद्या-ग्रहण

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 43, 44 और 45)

मथुरा में प्रवेश करने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने 'धनुष यज्ञ' के मण्डप में रखे शिवजी के कठोर धनुष को खेल-खेल में तोड़ डाला। अगले दिन, कंस ने रंगभूमि (अखाड़े) के द्वार पर कुवलयापीड नामक एक मतवाले और भयंकर हाथी को खड़ा कर दिया ताकि वह कृष्ण-बलराम को कुचल दे। परंतु परब्रह्म ने उस हाथी का भी वध कर दिया और उसके दांत उखाड़कर, उन्हें ही हथियार बनाकर रंगभूमि में प्रवेश किया। रंगभूमि में प्रवेश करते ही वहां उपस्थित हर व्यक्ति को भगवान का रूप अपनी-अपनी भावना (रसों) के अनुसार दिखाई दिया। यह सम्पूर्ण भागवत के सबसे ओजस्वी और दार्शनिक प्रसंगों में से एक है।

1. रंगभूमि में भगवान का अद्भुत दर्शन (जाकी रही भावना जैसी)

जब हाथी का रक्त शरीर पर लपेटे हुए कृष्ण और बलराम ने रंगभूमि में प्रवेश किया, तो वहां बैठे सभी लोगों को भगवान अलग-अलग रूपों में दिखाई दिए। महर्षि वेदव्यास जी ने इस एक श्लोक में 10 विभिन्न रसों और भावों का वर्णन कर दिया है:

॥ जाकी रही भावना जैसी... ॥
मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः ।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रङ्गं गतः साग्रजः ॥
(10.43.17)
अर्थ: बड़े भाई बलराम जी के साथ रंगभूमि में प्रवेश करते हुए श्रीकृष्ण— पहलवानों (मल्लों) को वज्र (बिजली) के समान, साधारण मनुष्यों को सर्वश्रेष्ठ नर के रूप में, स्त्रियों को मूर्तिमान कामदेव के रूप में, गोपों को अपने स्वजन (सखा) के रूप में, दुष्ट राजाओं को कठोर शासक के रूप में, माता-पिता (वसुदेव-देवकी) को शिशु के रूप में, कंस (भोजपति) को साक्षात मृत्यु के रूप में, अज्ञानियों को विराट रूप में, योगियों को परम तत्त्व (ब्रह्म) के रूप में और वृष्णिवंशियों (यादवों) को अपने परम इष्टदेव के रूप में दिखाई दिए।
आध्यात्मिक रहस्य: भगवान का अपना कोई एक रूप नहीं है। वे दर्पण के समान हैं। जीव अपने हृदय में जो भावना (डर, प्रेम, वात्सल्य, काम या ज्ञान) लेकर भगवान की ओर देखता है, भगवान उसे उसी रूप में दर्शन देते हैं।
2. चाणूर की ललकार: "तुम साधारण बालक नहीं हो"

भगवान को देखकर कंस के सबसे बलवान पहलवान 'चाणूर' ने उन्हें मल्लयुद्ध (कुश्ती) के लिए ललकारा। उसने यह स्पष्ट कर दिया कि जो बालक कुवलयापीड जैसे हाथी को मार सकता है, वह 'बच्चा' नहीं हो सकता, इसलिए हमारा तुम्हारे साथ युद्ध लड़ना कोई अन्याय नहीं है:

॥ चाणूर की ललकार ॥
न बालो न किशोरस्त्वं बलश्च बलिनां वरः ।
लीलयेभो हतो येन सहस्रद्विपसत्त्वभृत् ॥
तस्माद्भवद्भ्यां बलिभिर्योद्धव्यं नानयोऽत्र वै ।
मयि विक्रम वार्ष्णेय बलेन सह मुष्टिकः ॥
(10.43.39-40)
अर्थ: (चाणूर ने कहा)— "हे कृष्ण! तुम न तो बालक हो और न ही किशोर हो, और ये बलराम भी बलवानों में श्रेष्ठ हैं। तुमने खेल-खेल में ही उस कुवलयापीड हाथी को मार डाला, जिसमें एक हजार हाथियों का बल था। इसलिए तुम दोनों का हम बलवानों के साथ युद्ध करना कोई अन्याय (अनीति) नहीं है। हे वृष्णिनंदन! तुम मेरे साथ अपना पराक्रम दिखाओ, और मुष्टिक बलराम के साथ लड़ेगा।"
3. मल्लयुद्ध और चाणूर-मुष्टिक का वध

भगवान श्रीकृष्ण ने चाणूर के साथ और बलराम जी ने मुष्टिक के साथ भयंकर मल्लयुद्ध आरम्भ किया। यह युद्ध कोई साधारण कुश्ती नहीं थी। कुछ ही क्षणों में भगवान ने खेल-खेल में चाणूर का अंत कर दिया।

॥ चाणूर वध ॥
बाह्वोर्निगृह्य बहुशो भ्रामयित्वा विमर्दनः ।
आपोथयद्धरापृष्ठे त्यक्तजीवितमच्युतः ॥
(10.44.25)
अर्थ: दुष्टों का मर्दन करने वाले भगवान अच्युत (श्रीकृष्ण) ने उस चाणूर को उसकी दोनों भुजाओं (बाह्वो) से पकड़ लिया, उसे हवा में कई बार घुमाया (जिससे उसके प्राण निकल गए) और फिर मृत अवस्था में उसे पृथ्वी (धरापृष्ठ) पर पटक दिया।

बलराम जी ने भी मुष्टिक का वध कर दिया। उनके मरते ही कंस के बाकी सभी पहलवान (कूट, शल और तोशल) भी मारे गए और जो बचे वे डरकर भाग खड़े हुए।

4. कंस का क्रोध और क्रूर आदेश

अपने सबसे बलवान पहवानों को मरा हुआ देखकर, ऊँचे मंच पर बैठा हुआ कंस क्रोध और मृत्यु के भय से पागल हो गया। उसने अपने सैनिकों को एक अत्यंत क्रूर आदेश दिया:

॥ कंस का आदेश ॥
निःसारयत भो गोपान् दुर्मतीन् वसुदेवजौ ।
निगूहयत गाः क्षिप्रं वसुदेवं च हन्यताम् ॥
(10.44.32)
अर्थ: कंस चिल्लाया— "अरे सैनिकों! इन गोपों (नन्दबाबा आदि) को बाहर निकाल दो, इन दोनों वसुदेव के पुत्रों को मार डालो, इनकी गायों और धन को तुरंत छीन (छिपा) लो और उस वसुदेव तथा उग्रसेन का भी वध कर दो!"
5. भगवान का प्रहार और कंस वध

कंस की यह दुष्टता देखकर सर्वांतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण एक ही छलांग में उस ऊँचे मंच (सिंहासन) पर जा चढ़े। कंस तलवार लेकर खड़ा हो गया, परंतु भगवान ने उसे बाज की तरह दबोच लिया।

॥ कंस वध का ओजस्वी दृश्य ॥
प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीटं
निपात्य रङ्गोपरि तुङ्गमञ्चात् ।
तस्योपरिष्टात् स्वयमब्जनाभः
पपात विश्वाश्रयतीर्थशृङ्गः ॥
(10.44.37)
अर्थ: जिनके नाभि-कमल से संपूर्ण विश्व की उत्पत्ति हुई है (अब्जनाभ) और जो समस्त तीर्थों के आश्रय हैं, उन भगवान ने कंस के बालों को पकड़ लिया जिससे उसका मुकुट गिर गया। भगवान ने उसे उस ऊँचे मंच से नीचे रंगभूमि में पटक दिया और स्वयं उसके ऊपर कूद पड़े (जिसके भार से कंस के प्राण पखेरू उड़ गए)।
6. कंस की 'सायुज्य मुक्ति' का परम रहस्य

कंस जीवन भर भगवान से द्वेष करता था। परंतु भगवान की करुणा देखिए कि उन्होंने उस क्रूर कंस को भी वह परम गति (मोक्ष) प्रदान की जो बड़े-बड़े योगियों को भी दुर्लभ है।

॥ कंस का मोक्ष ॥
स नित्यमुद्विग्नधिया तमीश्वरं
पिबन् वदन् वा विचरन् स्वपन् श्वसन् ।
ददर्श चक्रायुधमग्रतो यतस्-
तदेव रूपं दुरवापमाप ॥
(10.44.39)
अर्थ: वह कंस अत्यंत भयभीत मन से खाते-पीते, बोलते, चलते, सोते और श्वास लेते हुए निरंतर अपने सामने हाथ में चक्र लिए हुए भगवान (मृत्यु) को ही देखता रहता था। इस निरंतर स्मरण (भय-भक्ति) के कारण उसे मृत्यु के पश्चात वही परम दुर्लभ भगवान का 'सारूप्य/सायुज्य' रूप प्राप्त हो गया।
7. उग्रसेन का राज्याभिषेक और धर्म की स्थापना

कंस को मारने के पश्चात श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता (वसुदेव-देवकी) को कारागार से मुक्त किया। यहाँ से 45वाँ अध्याय आरम्भ होता है। भगवान ने स्वयं राजा बनने के बजाय, कंस के पिता (जिन्हें कंस ने बंदी बना रखा था) उग्रसेन जी को मथुरा का राजा घोषित किया।

॥ उग्रसेन को सिंहासन ॥
आज्ञापय महाराज वयमेव प्रजास्तव ।
ययातिशापाद् यदुभिर्नासितव्यं नृपासने ॥
(10.45.12)
अर्थ: भगवान ने कहा— "हे महाराज उग्रसेन! आप आज्ञा दीजिए, हम तो आपकी प्रजा (सेवक) हैं। महाराज ययाति के शाप के कारण हम यदुवंशियों को सिंहासन पर नहीं बैठना चाहिए (अतः आप ही राजा बनें)।"
8. सांदीपनि आश्रम में प्रवेश और वेदों का ज्ञान

इसके पश्चात भगवान ने अत्यंत व्याकुल नन्दबाबा को सांत्वना देकर ब्रज वापस भेजा। यदुवंश की परंपरा के अनुसार, माता-पिता ने श्रीकृष्ण और बलराम का यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार करवाया। तत्पश्चात, जो स्वयं पूर्ण-ज्ञान हैं, वे 'मनुष्य-लीला' करते हुए शिक्षा ग्रहण करने के लिए अवंतिका (उज्जैन) में गुरु सांदीपनि के आश्रम गए।

॥ गुरु सांदीपनि से वेदों का ज्ञान ॥
तयोर्द्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः ।
प्रोवाच वेदानखिलान् साङ्गोपनिषदो गुरुः ॥
(10.45.33)
अर्थ: उन दोनों भाइयों की अत्यंत शुद्ध भाव से की गई सेवा से प्रसन्न होकर, उन श्रेष्ठ ब्राह्मण गुरु (महर्षि सांदीपनि) ने उन्हें वेदांगों और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान प्रदान किया।
9. केवल 64 दिनों में 64 कलाओं का ज्ञान

भगवान की मेधा (बुद्धि) का वर्णन करते हुए महर्षि वेदव्यास जी बताते हैं कि उन दोनों भाइयों ने आश्रम में कितनी तीव्र गति से विद्या ग्रहण की:

॥ 64 कलाओं की प्राप्ति ॥
अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या संयत्तौ तावतीः कलाः ।
गुरुदक्षिणयाचार्यं छन्दयामासतुर्नृप ॥
(10.45.36)
अर्थ: हे राजन्! उन दोनों भाइयों ने केवल चौंसठ (64) दिन-रात में ही चौंसठों कलाओं को पूर्ण रूप से सीख लिया। तत्पश्चात उन्होंने अपने आचार्य (गुरु) को 'गुरु-दक्षिणा' मांगने के लिए प्रसन्न किया। (गुरु ने अपने मृत पुत्र को दक्षिणा में माँगा, जिसे भगवान यमलोक से वापस ले आए)।

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