Vastu Purush Story: वास्तु पुरुष कौन हैं? उत्पत्ति की कथा और पूजन का महत्व

Sooraj Krishna Shastri
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वास्तु पुरुष: उत्पत्ति, दार्शनिक महत्व एवं पौराणिक कथा

"मत्स्य पुराण पर आधारित वास्तु शास्त्र का मूल रहस्य और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्वरूप"

वास्तु पुरुष कौन हैं?

सनातन धर्म में भवन निर्माण कला को 'वास्तु शास्त्र' के नाम से जाना जाता है। इस संपूर्ण शास्त्र का केंद्र बिंदु 'वास्तु पुरुष' हैं। वास्तु पुरुष को किसी भी भूमि, भवन या भूखंड की 'आत्मा' माना गया है। दार्शनिक दृष्टिकोण से, वे उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) के प्रतीक हैं जो किसी भी सीमित स्थान (Space) के भीतर निवास करती है。

पौराणिक मान्यता के अनुसार, वास्तु पुरुष की उत्पत्ति देवाधिदेव महादेव भगवान शंकर के पसीने से हुई है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, वास्तु पुरुष प्रत्येक भूखंड (Plot) पर औंधे मुँह (अधोमुख) स्थित होते हैं। उनका सिर ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर, पैर नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) की ओर, भुजाएँ पूर्व एवं उत्तर दिशा की ओर तथा टाँगें दक्षिण एवं पश्चिम दिशाओं की ओर फैली हुई हैं। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि वास्तु पुरुष का प्रभुत्व और उनकी ऊर्जा समस्त दिशाओं और कोणों में समान रूप से व्याप्त है। यही कारण है कि घर के किस हिस्से में क्या निर्माण होना चाहिए, यह वास्तु पुरुष के अंगों की स्थिति पर निर्भर करता है।

मत्स्य पुराण के अनुसार वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा

मत्स्य पुराण में वास्तु पुरुष के जन्म और उनके भूमि पर स्थापित होने की अत्यंत रोचक और गूढ़ कथा का उल्लेख मिलता है, जो इस प्रकार है:

शिव और दानवों का भयंकर युद्ध

प्राचीन काल में एक बार भगवान शिव और शक्तिशाली दानवों के बीच एक अत्यंत भयंकर और विनाशकारी युद्ध छिड़ गया। यह संग्राम इतना भयंकर था कि तीनों लोक काँप उठे। युद्ध बहुत लंबे समय तक चलता रहा। दानवों का संहार करते-करते और निरंतर युद्धरत रहने के कारण भगवान शिव अत्यंत श्रमित (थक) हो गए। उस घोर परिश्रम के कारण उनके शरीर से पसीने की बूंदें छलकने लगीं और अत्यंत ज़ोर से पसीना बहना शुरू हो गया।

कहा जाता है कि जब शिव के ललाट से पसीने की एक विशाल बूंद पृथ्वी पर गिरी, तो उस दिव्य जल से एक अत्यंत विशालकाय और भयंकर पुरुष का जन्म हुआ। वह पुरुष देखने में ही बहुत क्रूर, भयानक और शक्तिशाली लग रहा था। शिव जी के पसीने (रुद्र के तेज) से जन्मा यह पुरुष अत्यंत भूखा था। उसकी क्षुधा (भूख) इतनी तीव्र थी कि उसने उत्पन्न होते ही भगवान शिव से आज्ञा ली और उनके स्थान पर युद्ध भूमि में उतर गया। अपनी भयंकर भूख मिटाने के लिए वह देखते ही देखते अनेक दानवों को निगल गया। जो दानव बच गए, वे उसके इस विकराल रूप को देखकर भयभीत होकर रणभूमि से भाग खड़े हुए।

तीनों लोकों को निगलने का वरदान

इस अद्भुत पराक्रम को देखकर भगवान शिव उस नवजात पुरुष पर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और मनचाहा वरदान मांगने को कहा। समस्त दानवों को खाने के बाद भी शिव जी के पसीने से जन्मे उस पुरुष की जठराग्नि (भूख) शांत नहीं हुई थी। उसने भगवान शिव से प्रार्थना की- "हे प्रभु! मेरी भूख अत्यंत तीव्र है। कृपा कर मुझे तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) को खाने की अनुमति प्रदान करें।"

भोलेनाथ, जो आशुतोष हैं और शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, उन्होंने मुस्कुराकर "तथास्तु" कह दिया और उसे वरदान स्वरूप आज्ञा प्रदान कर दी।

देवताओं और राक्षसों का प्रहार

वरदान प्राप्त करते ही उस विशालकाय पुरुष ने तीनों लोकों को अपने अधिकार में ले लिया। सर्वप्रथम, उसने अपनी भूख शांत करने के लिए पृथ्वी लोक को अपना ग्रास बनाने (खाने) के लिए कदम बढ़ाया। यह महाविनाश देखकर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी, स्वयं शिव जी, इंद्र सहित अन्य देवगण और यहाँ तक कि पाताल के राक्षस भी भयभीत हो गए। यदि वह पृथ्वी को खा लेता, तो सृष्टि का संतुलन ही समाप्त हो जाता।

उसे पृथ्वी को खाने से रोकने के लिए 45 देवता और राक्षस एक साथ मिलकर अचानक से उस विशाल पुरुष पर टूट पड़े। देवताओं एवं राक्षसों द्वारा चारों ओर से दिए गए इस भयंकर आघात को वह पुरुष संभाल नहीं पाया और पृथ्वी पर औंधे मुँह (चेहरा नीचे की ओर) जा गिरा। जिस अवस्था में वह धरती पर गिरा, उस समय उसका मुख उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) की ओर और पैर दक्षिण-पश्चिम दिशा (नैर्ऋत्य कोण) की ओर थे।

वास्तु पुरुष मंडल और 45 देवगणों का निवास

जब वह पुरुष गिरा, तो उसे दोबारा उठने से रोकने के लिए पैंतालीस (45) देवगणों और राक्षसगणों ने उसे कसकर दबा लिया। इनमें से बत्तीस (32) देवता बाहरी परिधि (बॉर्डर) पर और तेरह (13) देवता उसके शरीर के भीतरी भागों पर विराजमान हो गए। इन 45 ऊर्जा क्षेत्रों के सम्मिलित रूप को ही "वास्तु पुरुष मंडल" (Vastu Purusha Mandala) कहा जाता है।

वे 45 देवता और ऊर्जा शक्तियां निम्न प्रकार हैं:

अग्नि
पर्जन्य
जयंत
कुलिशायुध
सूर्य
सत्य
वृष
आकाश
वायु
पूषा
वितथ
मृग
यम
गन्धर्व
भृंगराज
इंद्र
पितृगण
दौवारिक
सुग्रीव
पुष्पदंत
वरुण
असुर
शोष (पशु)
पाश
रोग
अहि
मोक्ष (मुख्य)
भल्लाट
सोम
सर्प
अदिति
दिति
आप (अप)
सावित्र
जय
रुद्र
अर्यमा
सविता
विवस्वान्
विबुधाधिप
मित्र
राजपक्ष्मा
पृथ्वीधर
आपवत्स
ब्रह्मा

देवताओं का वास्तु पुरुष के अंगों पर वास

इन देवताओं ने वास्तु पुरुष के शरीर के विभिन्न अंगों को दबाया और वहीं स्थापित हो गए। वास्तु शास्त्र में भवन निर्माण करते समय इन्हीं अंगों का ध्यान रखा जाता है:

  • सिर पर: अग्नि  |  चेहरे पर: अप (जल देवता)
  • छाती (चेस्ट) पर: पृथ्वीधर और अर्यमा  |  हृदय (दिल) पर: आपवत्स और साक्षात ब्रह्मा जी
  • कंधों पर: दिति और इंद्र  |  हाथों पर: सूर्य और सोम
  • बायां हाथ: रुद्र और राजपक्ष्मा  |  दाहिना हाथ: सावित्र और सविता
  • पेट पर: विवस्वान् और मित्र  |  कलाई पर: पूषा और अर्यमा
  • पसलियों (Sides) पर: असुर और शोष (बायीं ओर), वितथ (दायीं ओर)
  • जांघों पर: यम और वायु  |  घुटनों पर: गन्धर्व, पर्जन्य, दौवारिक और मृग
  • पिंडलियों (शंक) पर: सुग्रीव और वृष  |  पैरों पर: जय और सत्य

ब्रह्मा जी का वरदान और वास्तु पुरुष की करुण पुकार

45 देवताओं के भार से दबने के बाद, वह पुरुष धरती से चिपक गया। उसने उठने के भरपूर प्रयास किए, किंतु वह पूरी तरह असफल रहा। अत्यंत भूखा होने और उस भारी दबाव के कारण अंततः वह जोर-जोर से चिल्लाने और रोने लगा। उसने देवताओं से करुण निवेदन करते हुए कहा— "आप लोग कब तक मुझे इस प्रकार से बंधन में रखेंगे? मैं कब तक इस प्रकार सिर नीचे किए पड़ा रहूँगा? मेरी भूख का क्या होगा, मैं क्या खाऊंगा?"

किंतु देवताओं ने उसे बंधन मुक्त करने से मना कर दिया, क्योंकि ऐसा करना सृष्टि के लिए घातक था। तब उस पुरुष ने आर्त भाव से सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी को पुकारा। उसकी करुण पुकार सुनकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने उसे शांत करते हुए एक विशेष व्यवस्था (वरदान) दी:

ब्रह्मा जी ने कहा: "आज भाद्रपद शुक्ल की तृतीया है, शनिवार का दिन है और विशाखा नक्षत्र है। चूँकि तुम देवताओं के भार से दब गए हो, इसलिए तुम सदैव जमीन पर यूँ ही अधोमुख (चेहरा नीचे) होकर पड़े रहोगे। किंतु तुम्हारी सुविधा के लिए, तुम तीन माह में एक बार अपनी स्थिति (करवट) लेटे-लेटे बदल सकोगे।"

वास्तु पुरुष के घूमने की चक्रीय अवस्था (Seasonal Rotation)

ब्रह्मा जी ने वास्तु पुरुष के विश्राम और दिशा परिवर्तन के लिए निम्नलिखित चक्र निर्धारित किया। (ध्यान दें: करवट बदलते समय उन्हें सदैव अपनी बायीं करवट पर ही लेटे रहना होता है):

  • भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक: सिर पूर्व दिशा में एवं पैर पश्चिम दिशा की ओर रहेंगे।
  • मार्गशीर्ष (अगहन), पौष और माघ: सिर पश्चिम दिशा में एवं पैर उत्तर दिशा की ओर रहेंगे।
  • फाल्गुन, चैत्र और वैशाख: सिर पश्चिम दिशा में एवं पैर पूर्व दिशा की ओर रहेंगे।
  • ज्येष्ठ, आषाढ़ और श्रावण: सिर उत्तर दिशा में एवं पैर पश्चिम दिशा की ओर रहेंगे।

वास्तु पुरुष का नामकरण और पूजन का महत्व

देवताओं और राक्षसों द्वारा भूमि पर दबाए जाने और ब्रह्मा जी द्वारा वहां स्थापित किए जाने के कारण, ब्रह्मा जी ने उस शिव भक्त को "वास्तु पुरुष" (वास्तु के देव) का नाम दिया।

ब्रह्मा जी ने वास्तु पुरुष की भूख शांत करने के लिए उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा: "संसार भर में जो भी व्यक्ति घर, भवन, मंदिर, नगर, कुआं या उपवन आदि की नींव रखेगा अथवा निर्माण करवाएगा, उसे तुम्हारा पूजन करना होगा। जो व्यक्ति निर्माण से पूर्व तुम्हारा पूजन नहीं करेगा, उसे तुम परेशान कर सकोगे। तुम्हारी पीठ या सिर जिस दिशा में हो, उस दिशा का विचार किए बिना और तुम्हें भोग लगाए बिना जो कोई नींव रखेगा, ऐसे नास्तिक व्यक्ति को तुम दंडित करने और नष्ट करने के अधिकारी होगे।"

ब्रह्मा जी के मुख से यह व्यवस्था सुनकर वास्तु पुरुष पूरी तरह संतुष्ट हो गए। तभी से संसार में वास्तु-पुरुष का पूजन और उन्हें भोग अर्पित करना अनिवार्य रूप से प्रचलन में आया।

पूजन के विशेष अवसर

वास्तु पुरुष की प्रसन्नता और घर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) के प्रवाह के लिए विभिन्न उपलक्ष्यों पर उनके पूजन का विधान है। मुख्य रूप से निम्नलिखित अवसरों पर वास्तु पुरुष की पूजा (वास्तु शांति) अवश्य करनी चाहिए:

  • भूमि पूजन: भवन निर्माण के लिए नींव खोदते समय।
  • गृह प्रवेश: नए बने हुए घर में पहली बार प्रवेश करते समय।
  • मांगलिक कार्य: घर में पुत्र जन्म, यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार और विवाह के समय।
  • जीर्णोद्धार: पुराने भवन का जीर्णोद्धार (Renovation) करने के बाद।

जो भी मनुष्य इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था का आदर करते हुए वास्तु पुरुष का पूजन करता है, भगवान ब्रह्मा के वरदान स्वरूप वह सदैव उत्तम स्वास्थ्य, सुख, और अपार समृद्धि से संपन्न रहता है। उस भवन में रहने वाले सदस्यों को मानसिक शांति और उन्नति प्राप्त होती है।

।। ॐ वास्तु पुरुषाय नमः ।।

वास्तु शास्त्र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति, दिशाओं और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ मनुष्य के सामंजस्य का विज्ञान है। वास्तु पुरुष इसी संतुलन का जीवंत प्रतीक हैं।

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