॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥
वेदोक्त एवं तन्त्रोक्त रात्रिसूक्तम्
॥ रात्रिसूक्त का महत्त्व ॥
दुर्गा सप्तशती के पाठ-क्रम में नवार्ण मन्त्र के जप के पश्चात् माता को जाग्रत करने के लिए रात्रिसूक्त का पाठ किया जाता है। 'वेदोक्त रात्रिसूक्त' ऋग्वेद (१०.१२७) से लिया गया है, जबकि 'तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त' सप्तशती के प्रथम अध्याय में ब्रह्मा जी द्वारा योगनिद्रा की स्तुति है।
॥ वेदोक्तं रात्रिसूक्तम् ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ रात्रीति सूक्तस्य कुशिको ऋषिः, रात्रिर्देवता, गायत्री छन्दः, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः ।
विश्वा अधि श्रियोऽधित ॥१॥
विश्वा अधि श्रियोऽधित ॥१॥
अर्थ: ॐ. यह सामने आती हुई रात्रिरूपी देवी अपने अनेक नेत्रों (तारों) से सब ओर देख रही हैं। उन्होंने सभी शोभाओं (सुंदरताओं) को धारण कर लिया है।
ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्युद्वतः ।
ज्योतिषा बाधते तमः ॥२॥
ज्योतिषा बाधते तमः ॥२॥
अर्थ: यह मरणरहित देवी नीचे और ऊपर के (आकाश और पृथ्वी के) सभी स्थानों को भर देती हैं। और अपने प्रकाश (तारों की चमक) से अंधकार को नष्ट कर देती हैं।
निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती ।
अपादु हासते तमः ॥३॥
अपादु हासते तमः ॥३॥
अर्थ: यह आती हुई देवी अपनी बहन उषा (प्रातःकाल) को प्रकट कर देती हैं, जिससे अंधकार अपने-आप नष्ट होकर भाग जाता है।
सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि ।
वृक्षे न वसतिं वयः ॥४॥
वृक्षे न वसतिं वयः ॥४॥
अर्थ: वे ही रात्रि देवी आज हम पर प्रसन्न हों, जिनके आने पर हम सब लोग अपने घरों में उसी प्रकार सुख से सो जाते हैं, जैसे पक्षी पेड़ों पर बने अपने घोंसलों में सो जाते हैं।
नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वन्तो नि पक्षिणः ।
नि श्येनासो चिदर्थिनः ॥५॥
नि श्येनासो चिदर्थिनः ॥५॥
अर्थ: इस रात्रि के आने पर गाँव के सब लोग, पैरों से चलने वाले सभी जीव, सभी पक्षी और यहाँ तक कि अपने शिकार की खोज में उड़ने वाले बाज (चील) भी सो जाते हैं।
यावया वृक्यं वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये ।
अथा नः सुतरा भव ॥६॥
अथा नः सुतरा भव ॥६॥
अर्थ: हे रात्रि देवि! तुम भेड़िये (वृक) और भेड़की (वृकी) को हमसे दूर रखो और चोरों को भी हमसे दूर रखो। इस प्रकार तुम हमारे लिए सुख से पार होने योग्य (कल्याणकारी) बन जाओ।
उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित ।
उष ऋणं न यातय ॥७॥
उष ऋणं न यातय ॥७॥
अर्थ: हे उषा देवि (प्रातःकाल)! जो यह मुझे सजाने (या घेरने) वाला काला और स्पष्ट अंधकार मेरे पास आ गया है, उसे तुम उसी तरह दूर कर दो, जैसे कोई ऋण (कर्ज) चुका दिया जाता है।
उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः ।
रात्रि स्तोमं न जिग्युषे ॥८॥
रात्रि स्तोमं न जिग्युषे ॥८॥
अर्थ: हे आकाश की पुत्री रात्रि देवि! मैंने तुम्हारे लिए यह स्तोत्र उसी प्रकार अर्पित किया है जैसे कोई गायें (धन) अर्पित करता है। तुम इस स्तुति को विजय दिलाने वाली स्तुति के समान स्वीकार करो।
॥ तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीरात्रिसूक्तस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥१॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥१॥
अर्थ: विश्व की ईश्वरी, जगत् को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज के स्वामी भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति भगवती योगनिद्रा की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।
ब्रह्मोवाच ॥
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥२॥
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥२॥
अर्थ: ब्रह्मा जी बोले - "हे देवि! तुम ही स्वाहा (देवताओं को दी जाने वाली आहुति), तुम ही स्वधा (पितरों को दी जाने वाली आहुति) और तुम ही वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारा ही स्वरूप हैं। तुम ही जीवनदायिनी सुधा (अमृत) हो। हे नित्य अक्षर (ॐ) रूपिणी! तुम अकार, उकार और मकार— इन तीन मात्राओं के रूप में स्थित हो।"
अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः ।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥३॥
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥३॥
अर्थ: "तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो 'अर्धमात्रा' (बिंदु) है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह नित्य अर्धमात्रा भी तुम ही हो। हे देवि! तुम ही संध्या, तुम ही सावित्री (गायत्री) और तुम ही परमसत्ता (सबकी जननी) हो।"
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत् ।
त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥४॥
त्वयैतत् पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥४॥
अर्थ: "हे देवि! तुम्हारे ही द्वारा इस विश्व को धारण किया जाता है, तुम्हारे ही द्वारा इस जगत् की रचना की जाती है, तुम्हारे ही द्वारा इसका पालन किया जाता है और अंत (प्रलय) में तुम ही सदा सबको ग्रस (नष्ट कर) लेती हो।"
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ।
तथा संहृतिरूपांन्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥५॥
तथा संहृतिरूपांन्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥५॥
अर्थ: "हे जगन्मयी देवि! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन के समय स्थितिरूपा हो और प्रलय के समय संहाररूपा हो जाती हो।"
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥६॥
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥६॥
अर्थ: "तुम ही महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहा (अज्ञान), महादेवी और महासुरी हो।"
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥७॥
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥७॥
अर्थ: "तुम ही सत्त्व, रज और तम— इन तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी मूल प्रकृति हो। तुम ही भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि हो।"
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥८॥
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥८॥
अर्थ: "तुम ही श्री (लक्ष्मी), तुम ही ईश्वरी, तुम ही ह्री (लज्जा) और तुम ही बोधस्वरूपा बुद्धि हो। तुम ही लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शांति और क्षमा हो।"
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥९॥
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा ॥९॥
अर्थ: "तुम हाथों में खड्ग (तलवार), शूल (त्रिशूल), गदा और चक्र धारण करने वाली भयंकर रूपा हो। शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ— ये सभी तुम्हारे अस्त्र-शस्त्र हैं।"
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥१०॥
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥१०॥
अर्थ: "तुम सौम्य हो, बल्कि संसार में जितनी भी सौम्य (सुंदर) वस्तुएं हैं, उन सबसे भी अधिक सौम्य और अत्यंत सुंदर हो। पर (श्रेष्ठ) और अपर (स्थूल) सब वस्तुओं से श्रेष्ठ तुम ही परमेश्वरी हो।"
यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके ।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥११॥
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा ॥११॥
अर्थ: "हे अखिलात्मिके (सबकी आत्मा)! संसार में कहीं भी सत् या असत् जो कुछ भी वस्तु है, उन सबकी जो 'शक्ति' है, वह तुम ही हो। तो फिर तुम्हारी स्तुति कैसे की जा सकती है?"
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ।
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वामस्तोतुमीश्वरः ॥१२॥
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वामस्तोतुमीश्वरः ॥१२॥
अर्थ: "जिसने इस जगत् की रचना की है, जो इसका पालन करता है और जो इसका संहार करता है (अर्थात भगवान विष्णु), जब उन प्रभु को भी तुमने निद्रा के वश में कर दिया है, तो फिर तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है?"
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ।
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥१३॥
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥१३॥
अर्थ: "चूंकि भगवान विष्णु को, मुझे (ब्रह्मा को) और भगवान शंकर को भी शरीर धारण कराने वाली तुम ही हो, इसलिए तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें हो सकती है?"
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ॥१४॥
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ॥१४॥
अर्थ: "हे देवि! तुम तो अपने इन उदार (महान) प्रभावों से ही स्तुति के योग्य हो। तुम इन दोनों दुर्धर्ष (कठोर) असुरों— मधु और कैटभ को मोह में डाल दो।"
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥१५॥
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥१५॥
अर्थ: "और जगत् के स्वामी अच्युत (भगवान विष्णु) को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही, इन दोनों महादैत्यों को मारने के लिए इनकी बुद्धि (विष्णु जी की) को जाग्रत कर दो।"
