॥ जय श्री राम प्रभु भक्तों ॥
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥
जो माया को, ईश्वर को और अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता (जो अज्ञान में है), उसे 'जीव' कहते हैं। और जो कर्मों के अनुसार बंधन और मोक्ष देने वाला है, जो सबसे परे (सर्वोच्च) है और जो माया का भी प्रेरक (नियंता) है, उसे 'ईश्वर' (सीव/शिव) कहा जाता है।
जीव अज्ञान (माया) से घिरा होता है। वह स्वयं को शरीर मान बैठता है और यह भूल जाता है कि उसका असली स्वरूप क्या है। इसी अज्ञान के कारण वह संसार के बंधनों में उलझता है। ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और माया के अधीन नहीं, बल्कि माया के स्वामी हैं। वे ही जीवों को उनके कर्मों के अनुसार फल (बंधन या मोक्ष) देने वाले परमेश्वर हैं।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्॥
यह श्लोक अद्वैत और विशिष्टाद्वैत दोनों ही दर्शनों में ईश्वर की महिमा को स्पष्ट करता है। इसके अनुसार, यह संसार केवल एक भ्रम या जादू (माया) नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमेश्वर की ही एक रचनात्मक शक्ति (प्रकृति) का खेल है। परमेश्वर ही इस माया के रचयिता और नियंत्रक हैं, और उन्हीं की सत्ता से यह संपूर्ण सृष्टि संचालित हो रही है।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
हम मनुष्य अज्ञान और अंधकार के भीतर जी रहे हैं, और अहंकारवश स्वयं को बुद्धिमान् और ज्ञानी (विद्वान) मानते हैं। हम मूर्ख लोग सांसारिक कष्टों से बार-बार आहत होते हुए और ठोकरें खाते हुए भटकते रहते हैं। ठीक उसी प्रकार, जैसे किसी अंधे व्यक्ति को कोई दूसरा अंधा रास्ता दिखा रहा हो और दोनों अंततः गड्ढे में गिर जाते हैं।
सूरदास जी कहते हैं कि:
जैसे स्वान काँच-मंदिर मैं, भ्रमि-भ्रमि भूकि परयौ।
हम मनुष्य स्वयं को (अपने असली स्वरूप को) भूल गया है और माया के वश में हो गया है। ठीक वैसे ही, जैसे एक कुत्ता शीशों (कांच) के महल में फंस जाए। चारों तरफ अपनी ही परछाइयों को देखकर वह भ्रमित हो जाता है और उन्हें दूसरे कुत्ते समझकर उन पर भौंक-भौंक कर व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा नष्ट करता और परेशान होता है।
देखा जाए तो यह दृष्टांत अज्ञान, भ्रम और माया को दर्शाता है। जिस प्रकार कुत्ते को यह समझ नहीं आता कि शीशे में दिखने वाला कोई और नहीं बल्कि वह स्वयं है, उसी प्रकार मनुष्य सांसारिक मोह-माया, ईर्ष्या और अज्ञान में भटकता रहता है। वह यह भूल जाता है कि जिस आनंद और शांति की वह बाहर तलाश कर रहा है, वह असल में उसके अपने ही भीतर (आत्मा) मौजूद है।
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि:
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
संसार को भ्रमित करने वाली यह प्रकृति-जनित माया इतनी शक्तिशाली है कि साधारण मनुष्य इससे पार नहीं पा सकता। इस माया से बचने का एकमात्र उपाय ईश्वर (श्रीकृष्ण) के प्रति पूर्ण समर्पण और शरणागति है।
संत तुकाराम महाराज जी का अभंग:
ते ती मायिकें दुःखाची जनिती | नाही आदिअंती अवसान ॥
अविनाश करी आपुलिया ऐसे | लावी मना पिसे विठोबाची ॥
तुका म्हणे ऐसे जाणावे निधान | पांडुरंग चरण धरी दृढ ॥
मनुष्य को चाहिए कि वह ईश्वर (परमात्मा) को अपना निजी और आत्मीय बना ले, सच्चे ईश्वर को अपनाए बिना इस आत्मा या जीव को कभी वास्तविक सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। ईश्वर को छोड़कर बाकी संसार और सांसारिक मोह-माया केवल दुखों की जननी (उत्पन्न करने वाली) है, इस माया का न आदि (शुरुआत) है और न ही कोई अंत (नाश) है।
जो उस अविनाशी प्रभु को अपना बना लेता है, प्रभु उसे भी अपने जैसा अमर, दिव्य बना देते हैं। वह ईश्वर ही उस भक्त के मन को 'विट्ठल (विठोबा) के प्रेम की मस्ती' में पागल या मग्न कर देता है। संत तुकाराम महाराज कहते हैं कि, संसार के खजाने को छोड़ो और प्रभु पांडुरंग (विट्ठल) के चरणों को ही सबसे बड़ा खजाना समझो। उन्हीं के चरणों को मजबूती से पकड़ कर रखो, उसी में परम कल्याण है।
श्री मद्भागवत महापुराण में एक बहुत ही अच्छा वर्णन मिलता है, गोपियां भगवान श्री कृष्ण से कहती हैं:
तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् ।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं
कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥
आज उपर्युक्त श्लोक का अर्थ खुद गोपी बनकर विरह वेदना, प्रेम एवं अध्यात्मिक दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं। हे मेरे कृष्ण! हमारा हृदय आपके वियोग में दग्ध हो रहा है, आपके जिन चरणों ने शरणागतों के पाप नष्ट किए, जो वृन्दावन की धूल में बछड़ों के पीछे-पीछे चले, जो कालिय नाग के फणों पर नृत्य कर चुके हैं, वही चरण आज हमसे दूर क्यों हैं?
कभी-कभी विरह में स्मृति ही आश्रय बन जाती है। इसलिए गोपियाँ अर्थात हम कृष्ण के रूप का नहीं, उनके चरणों का स्मरण कर रहे हैं। प्रेम में जब मिलन नहीं होता, तब प्रिय की प्रत्येक वस्तु, उसके चरण, उसकी चाल, उसकी वंशी, उसकी मुस्कान, सब कुछ हृदय में जीवित हो उठता है।
कृणु कुचेषु नः - हे मेरे नाथ हमारे वक्ष पर अपने चरण रख दो। यह केवल शारीरिक निकटता की कामना नहीं है, यह उस अग्नि को शांत करने की पुकार है जो वियोग ने हमारे भीतर जला रखी है। प्रेम का स्वभाव है कि वह प्रिय के सुख को अपने सुख से ऊपर रखता है। हम इसलिए चिंतित हैं कि वन के कठोर मार्गों पर चलते हुए कृष्ण के कोमल चरणों को कहीं पीड़ा न हो गई हो। यहाँ प्रेम अधिकार नहीं माँगता है, केवल समर्पण माँगता है।
अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो हृच्छयम् शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल लौकिक कामना नहीं है, बल्कि हृदय की समस्त वासनाएँ, अहंता, ममता और परमात्मा से पृथक होने की पीड़ा भी है। गोपियाँ कहती हैं, "हे कृष्ण, अपने चरण हमारे हृदय पर रख दो और हमारे हृदय की समस्त इच्छाओं को नष्ट कर दो। अर्थात् हमारे भीतर केवल तुम रहो, हम न रहें।"
इस श्लोक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गोपियाँ कृष्ण के चरणों का तीन भिन्न उपमानों द्वारा महिमामंडन करती हैं:
१. प्रणतदेहिनां पापकर्शनम् - शरणागतों के पाप हरने वाले कृष्ण।
२. तृणचरानुगम् - बछड़ों के पीछे चलने वाले सरल ग्वालबाल कृष्ण के चरण।
३. फणिफणार्पितम् - कालिय नाग के फणों पर प्रतिष्ठित दिव्य चरण।
जब श्रीकृष्णजी ने उद्धव जी को वृन्दावन भेजा, तो वे ज्ञानयोग समझाना चाहते थे, किंतु गोपियों का प्रेम देखकर विस्मित रह गए:
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
"अहो, मैं तो वृन्दावन की उन गोपियों के चरणों की धूल पाने के लिए कोई झाड़ी, लता या औषधि बन जाऊँ।" उद्धव जी भी अंततः प्रेम-भक्ति को सर्वोच्च मानते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं:
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥
संसार के सभी शरीरों (क्षेत्र) में जो चेतना या आत्मा (क्षेत्रज्ञ) निवास कर रही है, उसका वास्तविक मूल रूप परमात्मा ही है।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
यह श्लोक अद्वैत दर्शन को स्पष्ट करता है। जीव अज्ञानवश संसार के भोगों में लिप्त रहता है, लेकिन जब वह अपने भीतर शांत रूप से बैठे दूसरे पक्षी (परमात्मा) को देखता है और उसकी महिमा को समझता है, तो उसके सारे दुःख और बंधन समाप्त हो जाते हैं।
संत तुकारामजी महाराज लिखते हैं कि:
तुळसी हार गळां कांसे पीताम्बर । आवडे निरंतर तेंचि रूप ॥
मकरकुंडलें तळपती श्रवणीं । कंठीं कौस्तुभमणि विराजित ॥
तुका ह्मणे माझें हेंचि सर्व सुख । पाहीन श्रीमुख आवडींने ॥
जहाँ भगवान विठ्ठल विट (ईंट) पर खड़े हैं और दोनों हाथ कमर पर रखे हुए हैं। यह वही विठोबा स्वरूप है जो भक्त पुंडलिक जी की भक्ति से प्रसन्न होकर पंढरपुर में ईंट पर खड़े रहे। भगवान के गले में तुलसी की माला है, शरीर पर पीताम्बर सुशोभित है। संत तुकारामजी कहते हैं, मुझे निरंतर वही रूप प्रिय लगता है।
भगवान के कानों में मकराकार कुण्डल चमक रहे हैं, और कंठ में कौस्तुभ मणि शोभायमान है। संत तुकारामजी महाराज कहते हैं, मेरा सारा सुख इसी में है कि मैं प्रेमपूर्वक प्रभु के श्रीमुख का दर्शन करता रहूँ। यहाँ भक्ति की पराकाष्ठा है, न मोक्ष की इच्छा, न सिद्धियों की, केवल भगवान के रूप-दर्शन में ही पूर्ण आनंद।
अंत में:
ललितानि यदीयानि लक्ष्माणि व्रजवीथिषु ।।
मैं उन विभु भगवान् श्रीकृष्ण के उन चरणारविन्द को प्रणाम करता हूँ जो मणिमय नूपुरों से वाचाल हैं अथवा मणि तथा नूपुरों की द्रुतगति से मुखर हैं और जिनके ललित चिह्न ब्रज की वीथियों में अंकित हैं।

