Why Radha Name is Not in Bhagwat Puran: भागवत में श्री राधा का वर्णन क्यों नहीं है?

Sooraj Krishna Shastri
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श्रीमद्भागवत में श्री राधा का प्रत्यक्ष नाम क्यों नहीं है? एक गूढ़ दार्शनिक और रसिक विवेचन
सनातन धर्म के वांग्मय में श्रीमद्भागवत महापुराण को परम हंसों की संहिता और वेदों का परिपक्व फल माना गया है। यह वह ग्रंथ है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण की मधुर और ऐश्वर्यमयी लीलाओं का ऐसा विशद वर्णन है, जो तीनों लोकों में दुर्लभ है। परन्तु, अक्सर कुछ भोले-भाले जिज्ञासु या वे लोग जिन्हें किसी वास्तविक रसिक संत का सान्निध्य प्राप्त नहीं है, एक शंका व्यक्त करते हैं— "यदि श्रीमद्भागवत सर्वश्रेष्ठ महापुराण है और इसमें श्रीकृष्ण की लीलाओं का विशेष निरूपण है, तो फिर इसमें श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति, उनकी प्राणाधिका 'श्री राधारानी' का नाम स्पष्ट रूप से क्यों नहीं लिखा गया?" आइए, उपनिषदों, पुराणों, रसिक वाणियों और अलंकार शास्त्र के प्रकाश में इस महान रहस्य का पर्दाफाश करें।
१. श्रीमद्भागवत की सर्वोच्चता और राधा तत्त्व
श्रीमद्भागवत कोई साधारण पुस्तक नहीं है; यह समस्त वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों का निचोड़ (सार) है। पद्म पुराण में भागवत की महिमा का गान करते हुए कहा गया है:
सर्वोपनिषदां साराज्जाता भागवती कथा ।
निम्नगानां यथा गंगा देवानामच्युतो यथा ॥
वैष्णवानां यथा शम्भुः पुराणानामिदं तथा ॥
(श्रीमद्भागवत 12.13.16)
भावार्थ:
"यह भागवती कथा सभी उपनिषदों के सार से उत्पन्न हुई है। जैसे नदियों में श्री गंगाजी सर्वश्रेष्ठ हैं, देवताओं में भगवान अच्युत (विष्णु) श्रेष्ठ हैं, और वैष्णवों में जैसे भगवान शिव (शम्भु) सर्वश्रेष्ठ हैं, ठीक उसी प्रकार समस्त अठारह पुराणों में यह 'श्रीमद्भागवत' सर्वश्रेष्ठ है।"
जब यह ग्रंथ इतना परिपूर्ण है, उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र का साक्षात् भाष्य (Commentary) है, तो इसमें 'राधा तत्त्व' का वर्णन न हो, यह सर्वथा असंभव है। सत्य यह है कि श्रीमद्भागवत में श्री राधा का नाम और उनका तत्त्व सर्वत्र भरा पड़ा है, बस उसे देखने के लिए चर्म-चक्षु (साधारण आँखें) नहीं, बल्कि प्रेम-चक्षु (भक्ति की आँखें) चाहिए।
२. अनन्त नाम और श्री राधा के पर्यायवाची शब्द
जिस प्रकार परब्रह्म परमात्मा के अनंत नाम हैं, उसी प्रकार उनकी आह्लादिनी शक्ति (Bliss Potency) श्री राधारानी के भी अनन्त नाम हैं। यह अनिवार्य नहीं है कि सर्वत्र 'राधा' नाम से ही राधा तत्त्व का निरूपण किया जाए।
राधा जी के विभिन्न शास्त्रीय नाम:
  • राधोपनिषद् में श्री राधा के २८ विशेष नाम गिनाये गए हैं। उनमें एक नाम 'श्री' है, एक नाम 'रमा' है, और एक नाम 'गोपी' है।
  • ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड में श्री राधा के १६ प्रमुख नाम बताये गए हैं, जिनमें एक नाम 'वृंदा' और एक नाम 'योगमाया' इत्यादि है।
भागवत में शुकदेव जी ने इन्ही पर्यायवाची नामों का प्रयोग करके पग-पग पर श्री राधारानी को प्रणाम किया है। जैसे जल को हम वारि, नीर, सलिल या पानी कहते हैं, अर्थ एक ही रहता है, वैसे ही भागवत में श्री राधा के पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग हुआ है।
३. श्रीमद्भागवत में श्री राधा के प्रत्यक्ष प्रमाण (श्लोक विवेचन)
आइए, श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध (जिसमें रासलीला का वर्णन है) से कुछ ऐसे श्लोकों का दर्शन करें, जहाँ श्री राधा तत्त्व पूरी भव्यता के साथ विराजमान है:
प्रमाण १: योगमाया का आश्रय
भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमल्लिका: ।
वीक्ष्यरन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.29.1)
विवेचन: यहाँ कहा गया है कि 'भगवान' ने उन शरद पूर्णिमा की रात्रियों को देखकर रमण (रास) करने का मन बनाया, परन्तु कैसे? 'योगमायामुपाश्रितः' (योगमाया का आश्रय लेकर)।
भगवान कौन हैं? जो षडैश्वर्य परिपूर्ण हों— "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥" ऐसे भगवान जो सदा आनंदमय हैं, वेद कहते हैं— "पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते" (पूर्ण से पूर्ण निकालो तब भी पूर्ण ही बचता है)। ऐसे आत्माराम और पूर्णकाम भगवान को रमण करने के लिए किसी 'आश्रय' की क्या आवश्यकता पड़ गई?
वास्तव में, यहाँ 'योगमाया' ही श्री राधा हैं। श्रीकृष्ण स्वयं शक्तिमान हैं और राधा उनकी शक्ति हैं। शक्ति के बिना शक्तिमान लीला नहीं कर सकता। इसलिए रास रचाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी ही आह्लादिनी शक्ति 'श्री राधा' (योगमाया) का आश्रय लिया।
प्रमाण २: 'आराधना' शब्द से 'राधा' की उत्पत्ति
जब महारास के बीच में श्रीकृष्ण अचानक अंतर्धान (गायब) हो गए, तो गोपियाँ उन्हें खोजते हुए वन में भटकने लगीं। तब उन्हें दो लोगों के पदचिह्न (पैरों के निशान) एक साथ दिखाई दिए— एक श्रीकृष्ण के और दूसरे किसी विशेष गोपी के। तब उन गोपियों ने जो कहा, वह भागवत का सबसे बड़ा प्रमाण है:
अनया आराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः ।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.30.28)
विवेचन: गोपियाँ कहती हैं— "निश्चय ही इस गोपी ने भगवान श्रीहरि की आराधना (आराधितो) सबसे उत्तम प्रकार से की है, इसीलिए गोविन्द हम सबको छोड़कर केवल इसी पर प्रसन्न होकर इसे एकांत में अपने साथ ले गए हैं।"
संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'आराधितो' शब्द से ही 'राधा' शब्द की उत्पत्ति हुई है (अनया आराधितो इति राधा)। शुकदेव जी ने इसी श्लोक में अत्यंत चतुराई से 'राधा' नाम को पिरो दिया। आगे भागवत (10.30.36) में शुकदेव जी उसी गोपी (राधा) का संकेत करते हुए कहते हैं— "यां गोपीमनयत्कृष्णो विहायान्याः स्त्रियो वने" (जिस गोपी को लेकर श्रीकृष्ण वन में चले गए थे)। यहाँ यह 'गोपी' शब्द राधा का ही साक्षात् पर्यायवाची है।
प्रमाण ३: रसेश्वर और रमेश
रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिः यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः ।
(श्रीमद्भागवत 10.33.17)
विवेचन: रासलीला के समापन पर शुकदेव जी कहते हैं— "श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ उसी प्रकार रमण किया जैसे कोई बच्चा अपनी परछाई से खेलता है।" यहाँ श्रीकृष्ण के लिए 'रमेश' शब्द का प्रयोग किया गया है।
रमेश का अर्थ है 'रमा के ईश' (रमा के स्वामी)। यदि सामान्य अर्थ लें तो रमा का मतलब 'लक्ष्मी' होता है। परन्तु वैकुण्ठ के अधिपति विष्णु तो ब्रज की गोपियों के साथ रासलीला करने नहीं आए थे। यहाँ 'रमा' का अर्थ है श्री राधा, और रमेश का अर्थ है राधा के ईश (श्रीकृष्ण)। जैसे हम जल, वारि, या नीर कुछ भी कहें, प्यास उसी से बुझती है। इसी प्रकार शुकदेव जी ने पर्यायवाची शब्दों के माध्यम से अपनी इष्ट देवी का आवाह्न किया।
४. अलंकार शास्त्र का रहस्य: अभिधा और व्यंजना
साहित्य और काव्य शास्त्र में किसी भी पात्र या विषय का वर्णन दो प्रकार से होता है— अभिधा (Direct Meaning) और व्यंजना (Suggestive/Hidden Meaning)। साहित्य के मर्मज्ञ जानते हैं कि अभिधा की अपेक्षा 'व्यंजना' को काव्य में उत्कृष्ट और श्रेष्ठ माना गया है। जो बात सीधे-सीधे कह दी जाए, उसमें वह रस नहीं होता, जो बात इशारों या संकेतों में कही जाए।
यथा प्रियंगु पत्रेषु गूढ़मारुण्यमिष्यते ।
श्रीमद्भागवतेशास्त्रे राधिका तत्त्वमीदृशम् ॥
भावार्थ (मेंहदी का दृष्टांत):
"जिस प्रकार मेंहदी (प्रियंगु) का पत्ता बाहर से देखने पर बिल्कुल हरा दिखाई पड़ता है, परन्तु उसे पीसकर हाथों पर लगाने से उसमें छिपा हुआ अत्यंत गहरा लाल रंग प्रकट हो जाता है; वह लाल रंग पत्ते में बाहर से दिखाई नहीं पड़ता। ठीक इसी प्रकार, श्रीमद्भागवत शास्त्र में 'राधिका तत्त्व' अत्यंत गूढ़ रूप से छिपा हुआ है।"
जो व्यक्ति भागवत को केवल ऊपर-ऊपर से (अभिधा वृत्ति से) पढ़ता है, उसे केवल हरी मेंहदी दिखती है, परन्तु जो रसिक संत इसे प्रेम और भक्ति की सिलबट्टे पर पीसकर अपने हृदय में धारण करता है, उसे पग-पग पर श्री राधारानी के लाल रंग (प्रेम रंग) के दर्शन होते हैं। शुकदेव परमहंस ने जानबूझकर व्यंजना (संकेतों) द्वारा इस परम तत्त्व का निरूपण किया।
५. शुकदेव जी की ६ महीने की समाधि का रहस्य (रसिकों का मत)
श्रीमद्भागवत के वक्ता महर्षि शुकदेव जी (Shukadeva Paramahansa) जन्म से ही ब्रह्मज्ञानी और श्री राधारानी के निज परिकर (उनके तोते/शुक) माने जाते हैं। रसिक संतों ने भागवत में राधा नाम न होने का एक अत्यंत भावुक और अलौकिक कारण भी बताया है:
श्रीराधानाममात्रेण मूर्च्छा षाण्मासिकी भवेत् ।
भावार्थ: शुकदेव जी को 'राधा' नाम इतना अधिक प्रिय था कि यदि वे भूल से भी एक बार 'राधा' शब्द का उच्चारण कर लेते, तो प्रेम के अतिरेक में उन्हें ६ महीने की समाधि (मूर्च्छा/Trance) लग जाती थी।
यहाँ परिस्थिति को समझिए— राजा परीक्षित को तक्षक नाग के डसने का शाप मिला था, और उनके पास जीवन के केवल ७ दिन शेष थे। यदि शुकदेव जी कथा सुनाते समय 'राधा' नाम ले लेते, तो वे ६ महीने के लिए समाधिस्थ हो जाते, और इधर ७ दिन बीतते ही राजा परीक्षित की मृत्यु हो जाती। परीक्षित का उद्धार रुक जाता।
इसलिए, शुकदेव जी ने राजा परीक्षित के कल्याण हेतु, अपने इष्ट के नाम (राधा) को अपनी जीभ पर आने से रोक लिया। उन्होंने उस प्रेम-रस को अपने भीतर ही पिया और बाहर से केवल 'गोपी', 'काचित्' (कोई एक गोपी) या 'रमा' शब्दों का प्रयोग करके व्यंजना के माध्यम से कथा को ७ दिनों में पूर्ण किया। इसी भाव को जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने अपने पदों में बहुत ही सुंदरता से व्यक्त किया है:
"छुपायो शुक सार भागवत राधा।"
(शुकदेव जी ने भागवत के सार तत्त्व 'राधा' को जानबूझकर छुपा लिया।)
६. वेदों में राधा तत्त्व: एकांत की स्तुति
श्री राधारानी साधारण गोपी नहीं हैं; वे समस्त श्रुतियों (वेदों) का सार तत्त्व हैं। जगद्गुरु कृपालु जी महाराज स्पष्ट करते हैं— "श्रुतिन को सार तत्त्व हैं राधा।" वेद भी जिस सत्ता का पार नहीं पा सके, वह राधा तत्त्व इतना निगूढ़ (Top Secret) है कि वेदों को भी उनके नाम का सरेआम उच्चारण करने में संकोच होता है।
विविक्ते वेदा: स्तुवन्ति ।
(वेद)
भावार्थ: "वेद भी एकांत (विविक्त) में जाकर ही श्री राधा तत्त्व का चिंतन और उनकी स्तुति करते हैं।"
जो चीज़ जितनी अधिक मूल्यवान होती है, उसे उतना ही अधिक छिपा कर (तिजोरी में) रखा जाता है। राधा तत्त्व इस ब्रह्मांड का सबसे मूल्यवान परम-धन है। इसे चौराहे पर प्रदर्शित करने के लिए नहीं, बल्कि रसिकों के हृदय की तिजोरी में सुरक्षित रखने के लिए वेदों और पुराणों ने इसे गुप्त रखा। फिर भी, ऋग्वेद के परिशिष्ट, अथर्ववेद के राधिकोपनिषद, और अन्य पुराणों में राधा तत्त्व का वर्णन कहीं अभिधा से, कहीं व्यंजना से, कहीं कम और कहीं अधिक किया गया है।
निष्कर्ष (Conclusion)
श्रीमद्भागवत भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् वांग्मय (शब्द-रूपी) स्वरूप है, और जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ राधा का न होना वैसा ही है जैसे सूर्य हो और उसकी धूप न हो, या फूल हो और उसकी सुगंध न हो।
भागवत में राधा नाम का न होना कोई त्रुटि या अज्ञानता नहीं है, बल्कि यह शुकदेव जी की परमहंस अवस्था, परीक्षित के उद्धार की विवशता, और अलंकार शास्त्र की सर्वोच्च 'व्यंजना वृत्ति' का साक्षात् चमत्कार है। इसलिए, किसी भी श्रद्धालु या जिज्ञासु को भागवत में राधा तत्त्व के न होने की शंका कदापि नहीं करनी चाहिए। भागवत का प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक अध्याय और प्रत्येक लीला श्री राधा के प्रेम के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती।
॥ जय जय श्री राधे ॥

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