Importance of Kusha Grass: कुशा का महत्त्व, उत्पत्ति और इसके वैज्ञानिक रहस्य

Sooraj Krishna Shastri
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कुशा का महत्त्व: अध्यात्म, विज्ञान और कर्मकांड शास्त्र का महासंगम
सनातन धर्म में प्रकृति के कण-कण में ईश्वर का वास माना गया है। अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली पवित्र वनस्पतियों में 'कुशा' का अत्यंत प्रमुख और सर्वोच्च स्थान है। इसे सामान्य बोलचाल में कुश, दर्भ, अथवा ढाब भी कहते हैं। बाहर से एक साधारण घास जैसी दिखने वाली यह वनस्पति अपने भीतर ब्रह्मांड की अनंत ऊर्जा, अमृत तत्त्व और वैज्ञानिक रहस्यों को समेटे हुए है। जिस प्रकार समुद्र मंथन के दौरान अमृतपान करने के कारण 'केतु' ग्रह को अमरत्व का वरदान प्राप्त हुआ था, ठीक उसी प्रकार कुशा भी साक्षात् अमृत तत्त्व से युक्त है। हमारे वेदों और पुराणों में यह स्पष्ट उल्लेख है कि यह पौधा पृथ्वी लोक का साधारण पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न और दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण माना गया है। आइए, इस महालेख में कुशा की पौराणिक उत्पत्ति, इसके वैज्ञानिक गुणों और कर्मकांड में इसके अनिवार्य महत्त्व का विस्तार से अवलोकन करें।
१. कुशा की पौराणिक उत्पत्ति: तीन अद्भुत कथाएं
कुशा को इतना पवित्र क्यों माना जाता है? इसके पीछे सनातन धर्म के ग्रंथों में तीन अत्यंत मार्मिक और रहस्यमयी पौराणिक कथाएं मिलती हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि कुशा साक्षात् ईश्वर का ही एक अंश है:
प्रथम कथा: माता सीता के पवित्र केश (बाल)
रामायण काल की अत्यंत भावुक मान्यता है कि जब लव-कुश के जन्म के पश्चात माता सीता ने अपनी लीला समाप्त कर पृथ्वी माता (भूमि) में समाने का निर्णय लिया, तब धरती फटने लगी। माता सीता धरती में समाने लगीं। यह दृश्य देखकर भगवान श्रीराम अत्यंत व्याकुल हो गए और उन्होंने जल्दी से दौड़ कर सीता जी को रोकने का प्रयास किया। किन्तु विधाता का विधान निश्चित था; राम जी के हाथ में सीता जी का शरीर नहीं, बल्कि केवल उनके पवित्र केश (बाल) ही आ पाए। पुराणों के अनुसार, माता सीता के वे ही पवित्र केश राशि कालान्तर में पृथ्वी पर 'कुशा' के रूप में परिणत हो गई। यही कारण है कि कुशा में सतीत्व, पवित्रता और दैवीय ऊर्जा का साक्षात् वास है।
द्वितीय कथा: वराह अवतार और भगवान के रोम (बाल)
सृष्टि के आरंभिक काल में जब महान असुर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुराकर अथाह समुद्र के तल (रसातल) में छिपा दिया था, तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा के लिए 'वराह रूप' (Varaha Avatar) धारण किया था। भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को अपने दाँतों पर रखकर समुद्र से बाहर निकले। जल से बाहर आने के पश्चात जब भगवान ने अपने विशाल शरीर को झकझोरा (बालों को फटकारा), तो उस समय उनके शरीर से कुछ रोम (बाल) टूटकर पृथ्वी पर गिरे। भगवान विष्णु के शरीर से गिरे वे ही पवित्र रोम पृथ्वी पर कुश (दर्भ) के रूप में प्रकट हुए। चूँकि यह साक्षात् श्रीहरि के शरीर का अंश है, इसलिए इसके बिना कोई भी यज्ञ या तर्पण पूरा नहीं होता।
तृतीय कथा: गरुड़, सर्प और अमृत कलश की कथा
महाभारत के आदि पर्व में महर्षि कश्यप की दो पत्नियों— कद्रू (नागों की माता) और विनता (गरुड़ की माता) की कथा आती है। दोनों महर्षि कश्यप की खूब सेवा करती थीं। महर्षि ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने एक हजार सर्प पुत्र मांगे, जबकि विनता ने केवल दो प्रतापी पुत्र मांगे। एक बार किसी शर्त को हारने के कारण विनता को अपनी बहन कद्रू की दासी बनना पड़ा।
जब विनता के महाप्रतापी पुत्र गरुड़ जी बड़े हुए, तो उन्होंने अपनी मां की यह दुर्दशा देखी। उन्होंने कद्रू के पुत्रों (नागों) के सामने अपनी माता को दासता से मुक्ति दिलाने का प्रस्ताव रखा। नागों ने शर्त रखी कि यदि गरुड़ उन्हें स्वर्ग से 'अमृत' लाकर दे दें, तो वे विनता को दासता से मुक्त कर देंगे। गरुड़ जी ने भयंकर युद्ध करके स्वर्ग से अमृत कलश प्राप्त किया और उसे लाकर नागों के समक्ष पृथ्वी पर एक 'कुश' नामक घास के आसन पर रख दिया। इसके साथ ही उनकी माता दासता से मुक्त हो गईं।
स्नान करने गए नागों के लौटने से पूर्व ही देवराज इंद्र उस अमृत कलश को पुनः उठा ले गए। जब कद्रू के पुत्र लौटे, तो उन्होंने अमृत कलश को गायब पाया। गरुड़ जी ने उन्हें समझाया कि अब अमृत कलश मिलना तो संभव नहीं है, लेकिन जिस घास (कुश) पर वह कलश रखा था, उस पर अमृत की कुछ बूंदें छलक गई थीं। यदि तुम सब उस घास को अपनी जीभ से चाटो, तो तुम्हें आंशिक लाभ होगा। कद्रू के पुत्र नाग उस कुश को चाटने लगे। कुशा के किनारे इतने तीखे होते हैं कि उसे चाटने के कारण उन सभी सर्पों की जीभें बीच से चिर गईं। इसी कारण आज भी सर्प की जीभ दो भागों वाली चिरी हुई (Forked tongue) दिखाई पड़ती है। 'कुश' घास की महत्ता अमृत कलश रखने और अमृत के स्पर्श के कारण अनंत गुना बढ़ गई और भगवान विष्णु के निर्देशानुसार इसे प्रत्येक पूजा कार्य में प्रयुक्त किया जाने लगा।
२. 'कुशल' शब्द की व्युत्पत्ति और 'कुशाग्र' बुद्धि का रहस्य
संस्कृत भाषा का अत्यंत प्रसिद्ध शब्द है 'कुशल' (Skilled/Expert)। क्या आप जानते हैं कि यह शब्द कुशा घास से ही बना है? कुशा के पत्ते के सिरे अत्यंत तीखे और नुकीले (Sharp) होते हैं। इसे उखाड़ते समय बहुत सावधानी रखनी पड़ती है कि यह जड़ सहित उखड़े और हाथ भी न कटे। पुरातन काल में गुरुकुलों में गुरुजन अपने शिष्यों की परीक्षा लेते समय उन्हें जंगल से कुशा लाने को कहते थे। जो शिष्य बिना अपना हाथ कटवाए, सही विधि से कुशा ले आता था, उसे ही ज्ञान का सद्पात्र और 'कुशल' माना जाता था।
इसी प्रकार, जिस व्यक्ति की बुद्धि बहुत तेज़ होती है, उसे 'कुशाग्र' (Kushagra) कहा जाता है। 'कुश+अग्र' अर्थात् जिसकी बुद्धि कुशा के आगे वाले तीखे भाग के समान तेज़ हो। शास्त्रों में विधान है कि यदि पांच वर्ष की आयु के बच्चे की जिव्हा (जीभ) पर शुभ मुहूर्त (जैसे वसंत पंचमी) में कुशा के अग्र भाग (Kushagra) को शहद में डुबोकर 'सरस्वती मन्त्र' लिख दिया जाए, तो वह बच्चा कुशाग्र बुद्धि वाला और परम ज्ञानी बन जाता है।
३. कुशा का वैज्ञानिक पक्ष और ऊर्जा विज्ञान (Science of Kusha)
हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्म-कांडों में कुश का उपयोग केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे अत्यंत गहरा क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) और ऊर्जा विज्ञान छिपा हुआ है:
ऊर्जा का कुचालक (Bad Conductor of Energy)
वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि कुश विद्युत और ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) का कुचालक (Insulator) है। जब कोई साधक मंत्र जाप या ध्यान करता है, तो उसके शरीर में एक विशेष प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय ऊर्जा (Spiritual Energy/Tapobal) उत्पन्न होती है। यदि वह सीधे नंगी ज़मीन पर बैठकर जाप करे, तो गुरुत्वाकर्षण (Earth's Earthing) के कारण वह सारी ऊर्जा धरती में समा जाती है और साधक को साधना का फल नहीं मिलता। कुश के बने आसन पर बैठकर तप, ध्यान तथा पूजन करने से शरीर और धरती के बीच कुश का आसन एक 'कुचालक' (Insulator) का कार्य करता है, जिससे शरीर की ऊर्जा का क्षय नहीं होता और कामनाओं की अविलंब पूर्ति होती है।
ग्रहण काल (Eclipse) में कुशा का प्रयोग
सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा से अत्यंत हानिकारक पराबैंगनी (UV) और नकारात्मक किरणें पृथ्वी पर आती हैं, जो पके हुए भोजन और जल को दूषित (Toxic) कर देती हैं। हमारे ऋषि-मुनियों को यह वैज्ञानिक ज्ञान था कि कुशा इन हानिकारक विकिरणों (Radiations) को सोखने और परावर्तित (Reflect) करने की क्षमता रखती है। इसीलिए ग्रहण काल से पूर्व ही भोजन, दूध, दही तथा पीने के पानी में कुशा डाल दी जाती है, जिससे ग्रहण के समय आने वाली किरणें कुश से टकराकर परावर्तित हो जाती हैं तथा भोजन व पानी पर उन किरणों का कोई विपरीत असर नहीं पड़ता।
जल शुद्धीकरण और एंटी-बैक्टीरियल गुण
देव पूजन, यज्ञ, हवन और ग्रहशांति पूजन कार्यो में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम उसमें कुशा डालते हैं। कलश में कुशा डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कुशा में प्राकृतिक रूप से एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। कलश में भरा हुआ जल कुशा के प्रभाव से लंबे समय तक जीवाणु (Bacteria) से मुक्त और शुद्ध रहता है। रात्रि में जल में भिगो कर रखी कुशा के जल का प्रयोग देवताओं के अभिषेक, प्राण प्रतिष्ठा, प्रायश्चित कर्म, और दशविध स्नान आदि में किया जाता है। वेदों ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।
एक्यूप्रेशर (Acupressure) और आरोग्य
जो साधक कुशा की जड़ (मूल) से बनी माला से भगवान का जाप करते हैं, उन्हें विशेष स्वास्थ्य लाभ होता है। कुशा मूल की माला से जाप करने से उंगलियों के एक्यूप्रेशर बिंदु (Acupressure Points) निरंतर दबते रहते हैं, जिससे शरीर में रक्त संचार (Blood Circulation) ठीक रहता है और मानसिक तनाव दूर होता है।
४. कुशा की पवित्री (अंगूठी) और आसन का रहस्य
कर्मकांड के दौरान ब्राह्मण और यजमान अपनी अनामिका (Ring Finger) उंगली में कुशा की बनी हुई एक विशेष अंगूठी पहनते हैं, जिसे 'पवित्री' कहा जाता है। इसके पीछे का विज्ञान और अध्यात्म अत्यंत रोचक है:
पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया।।
अर्थात्: पूजा के समय सदैव हाथ में कुश धारण करने वाला ही पवित्र माना जाता है। शिवजी कहते हैं कि कुश के बिना की गई पूजा निष्फल (व्यर्थ) हो जाती है।
कुश की अंगूठी बनाकर अनामिका उंगली में ही क्यों पहना जाता है? इसका कारण यह है कि हाथ द्वारा संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज (Energy flow) दूसरी उंगलियों से बाहर न निकल जाए। अनामिका उंगली के मूल में 'सूर्य' (Sun) का स्थान होता है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश प्राप्त होता है। जब हम पवित्री पहनते हैं, तो वह ऊर्जा शरीर में ही लॉक (Lock) हो जाती है।
दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकना भी है। कर्मकांड या तर्पण के दौरान यदि भूलवश हमारा हाथ भूमि पर लग जाए, तो बीच में कुश का ही स्पर्श होगा, शरीर का नहीं। इसलिए कुश को हाथ में धारण किया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह भी है कि यदि हाथ की ऊर्जा की रक्षा न की जाए, तो इसका दुष्परिणाम हमारे मस्तिष्क और हृदय (Heart) पर पड़ता है।
आसन का महत्त्व: कुश के बने आसन पर बैठकर मंत्र जप करने से सभी मंत्र शीघ्र सिद्ध होते हैं। देवी भागवत पुराण (19/32) में एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक आता है:
नास्य केशान् प्रवपन्ति, नोरसि ताडमानते।
(देवी भागवत 19/32)
अर्थात्: जो व्यक्ति नियमित रूप से कुश के आसन पर बैठकर साधना करता है, उसके सिर के बाल नहीं झड़ते (गंजापन नहीं आता) और उसकी छाती में आघात (यानी दिल का दौरा / Heart Attack) नहीं होता। इस पर बैठकर साधना करने से आरोग्य, लक्ष्मी प्राप्ति, यश और तेज की वृद्घि होती है और साधक की एकाग्रता कभी भंग नहीं होती।
५. नारी सुरक्षा, सतीत्व और कुशा का प्रयोग
कुशा जिसे सामन्य घांस समझा जाता है, वह महिलाओं की सुरक्षा करनें में राम-बाण है। वाल्मीकि रामायण का प्रसंग है कि जब लंका पति रावण माता सीता का हरण करके उन्हें अशोक वाटिका ले गया, उसके बाद वह बार-बार उन्हें प्रलोभित करने और डराने जाता था। तब माता सीता सीधे रावण की ओर नहीं देखती थीं; वे एक "कुशा के तिनके को अपना सुरक्षा कवच बनाकर" हाथ में धारण कर लेती थीं और उसी तिनके को देखकर बात करती थीं। उस कुशा के तिनके में माता सीता के पातिव्रत धर्म की इतनी ज्वाला थी कि रावण कभी सीता जी के निकट पहुँचने का साहस नहीं कर सका।
आज भी यदि मातृ शक्ति अपने पास कुशा रखे, तो अपने सतीत्व की रक्षा सहज रूप से कर सकती है, क्योंकि कुशा में वह अलौकिक शक्ति विद्यमान है जो माँ-बहिनों पर कुदृष्टि रखने वालों की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देती है। जो माताएं या बहनें मासिक विकार (Menstrual problems) से परेशान हैं, उन्हें कुशा के आसन और चटाई का विशेष दिनों में प्रयोग करना चाहिए; इससे शारीरिक ऊर्जा संतुलित रहती है।
६. ज्योतिषीय दृष्टि: केतु ग्रह और कुशा का संबंध
ज्योतिष शास्त्र के नज़रिए से कुश को एक विशेष वनस्पति का दर्जा दिया गया है। नवग्रहों में 'केतु' (Ketu) को अध्यात्म, मोक्ष, वैराग्य और तंत्र का कारक माना गया है। केतु शांति विधानों में कुशा की मुद्रिका (अंगूठी) और हवन में कुशा की आहूतियां विशेष रूप से दी जाती हैं। कुशा का स्वामी केतु है, लिहाज़ा कुश को अगर आप अपने घर में रखेंगे तो केतु के बुरे फलों (जैसे अचानक आने वाले संकट, रोग, और मानसिक भ्रम) से बच सकते हैं। कुशा की पवित्री उन लोगों को जरूर धारण करनी चाहिए, जिनकी राशि पर ग्रहण पड़ रहा हो या जिन पर केतु की महादशा चल रही हो।
७. पितृ पक्ष, तर्पण और श्राद्ध में कुशा की अनिवार्यता
भारत में हिन्दू लोग इसे पूजा, श्राद्ध और तर्पण में मुख्य रूप से काम में लाते हैं। श्राद्ध और तर्पण बिना कुशा के सम्भव ही नहीं हैं। पितरों को जल अर्पित करते समय कुशा के अग्र भाग (मोटक) से ही जल गिराया जाता है, क्योंकि कुशा के स्पर्श से ही वह जल अमृत बनकर पितृ लोक तक पहुँचता है।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम है: देव पूजा में प्रयुक्त कुशा का पुनः उपयोग किया जा सकता है (उसे धोकर), परन्तु पितृ एवं प्रेत कर्म (श्राद्ध/अंत्येष्टि) में प्रयुक्त कुशा तुरंत अपवित्र हो जाती है और उसे दोबारा किसी भी कार्य में उपयोग नहीं किया जा सकता।
जिस भाग्यवान् व्यक्ति ने सोने की अंगूठी (स्वर्ण मुद्रिका) पहन रखी हो, उसे श्राद्ध के समय कुशा की पवित्री पहनने की अनिवार्यता नहीं होती, क्योंकि स्वर्ण भी परम पवित्र धातु है।
८. कुशोत्पाटिनी (कुशाग्रहणी) अमावस्या: कुशा उखाड़ने का महापर्व
कुशा प्रत्येक दिन नई उखाड़नी पड़ती है, क्योंकि बासी कुशा पूजा में वर्जित है। लेकिन हमारे शास्त्रों में एक विशेष दिन का विधान है। भाद्रपद (भादों) कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शास्त्रों में 'कुशाग्रहणी' या 'कुशोत्पाटिनी अमावस्या' कहा जाता है। इस दिन तोड़ी गई कुशा पूरे एक साल तक पवित्र रहती है और पूरे साल काम आती है। (जबकि सामान्य अमावस्या की तोड़ी कुशा पूरे महीने काम दे सकती है)। इसलिए ब्राह्मण और गृहस्थ लोग इस विशेष दिन इसे तोड़ कर वर्ष भर के लिए रख लेते हैं।
कैसे उखाड़ें कुशा? (मंत्र और विधि)
शास्त्रों के अनुसार कुशा को ऐसे ही राह चलते नहीं उखाड़ लेना चाहिए। यह एक जीवंत दैवीय सत्ता है। कुशा उखाड़ने से एक दिन पूर्व (चतुर्दशी को) बड़े ही आदर के साथ उसे अपने घर लाने का निमंत्रण दिया जाता है:
निमंत्रण की विधि: कुशा के पास जाएं और हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक उससे प्रार्थना करें— "हे कुश! कल मैं किसी कारण से आपको आमंत्रित नहीं कर पाया था जिसकी मैं क्षमा चाहता हूं। लेकिन आज आप मेरे निमंत्रण को स्वीकार करें और मेरे कल्याण हेतु मेरे साथ मेरे घर चलें।"
अगले दिन (अमावस्या की सुबह) स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर, उत्तराभिमुख (उत्तर दिशा की ओर मुख) होकर बैठें। कुशा को पकड़कर "ऊँ हुम् फट स्वाहा" मन्त्र का उच्चारण करते हुए एक ही झटके में उसे जड़ सहित उखाड़ लेना चाहिए। ध्यान रहे कि कुशा को लोहे के औजार से न काटें। उसे अपने साथ घर लाना चाहिए; ऐसा करने से घर में साल भर शुभ फल प्राप्त होते हैं।
दस प्रकार के कुश (Ten Types of Kusha)
शास्त्रों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन मिलता है, जिनका उपयोग भिन्न-भिन्न कार्यों में होता है:
कुशा, काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा, सबल्वजा।।
अर्थात्: कुश, काश (कांस), यव (जौ), दूर्वा (दूब), उशीर (खस), कुंद, गोधूम (गेहूं), ब्राह्मी, मूंज और बल्वज— ये दस प्रकार की वनस्पतियां दर्भ (कुश) की श्रेणी में आती हैं। इनमें से कोई भी कुश कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन उखाड़ी जा सकती है और उसका घर में संचय किया जा सकता है।
सावधानी: कुशा उखाड़ते समय यह ध्यान रखें कि वह उपयोग करने योग्य हो। ऐसा कुश ना उखाड़ें जो गन्दे स्थान (श्मशान या नाली के पास) पर हो, जो जला हुआ हो, जो मार्ग में पैरों के नीचे आता हो, या जिसका अग्रभाग (Top point) कटा हो। जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो, जिसमें सात पत्ती हों, कोई भाग कटा न हो, जो पूर्ण हरी हो, वह कुशा देवताओं तथा पितृ दोनों कृत्यों के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
९. अमावस्या और पितृ पक्ष का शुभारंभ
अघोर चतुर्दशी के दिन तर्पण कार्य भी किए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन शिव के गणों, भूत-प्रेत आदि सभी को स्वतंत्रता प्राप्त होती है। कुश अमावस्या के दिन किसी पात्र में जल भर कर कुशा के पास दक्षिण दिशा की ओर अपना मुख करके बैठ जाएं तथा अपने सभी पितरों को कुशा के माध्यम से जल दें, और अपने घर-परिवार, स्वास्थ आदि की शुभता की प्रार्थना करें।
शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी 'पितृदेव' को माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का अत्यंत महत्व है। शास्त्रोक्त विधि के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में चलने वाले पन्द्रह दिनों के 'पितृ पक्ष' (Mahalaya) की मानसिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि इसी भादों मास की 'कुशाग्रहणी अमावस्या' से ही तैयार हो जाती है। भगवान विष्णु की आराधना करते हुए जो व्यक्ति इस दिन व्रत-उपवास करता है, उसे तन, मन और धन के सभी कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।
निष्कर्ष
कुशा केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि सनातन धर्म की वह नाड़ी है जो मनुष्य को सीधे ब्रह्मांडीय चेतना और ईश्वरीय शक्तियों से जोड़ती है। जन्म (उपनयन संस्कार) से लेकर मरण (अंत्येष्टि और तर्पण) तक, कुशा एक हिंदू के जीवन का अभिन्न अंग है। इसका वैज्ञानिक कुचालक गुण हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा की रक्षा करता है, और इसका दैवीय इतिहास हमारे भीतर श्रद्धा का संचार करता है। अतः प्रत्येक गृहस्थ का यह कर्तव्य है कि वह कुशा का सम्मान करे, इसके नियमों का पालन करे और अपने घर में कुशा का संचय कर ईश्वरीय कृपा का भागी बने।

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