पार्थिव शिवलिंग पूजन विधि, प्राण प्रतिष्ठा और विसर्जन का संपूर्ण विधान

Sooraj Krishna Shastri
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पार्थिव शिवलिंग पूजन विधि और प्राण प्रतिष्ठा

सनातन धर्म में भगवान शिव की आराधना के अनेक मार्ग बताए गए हैं, परंतु पार्थिव शिवलिंग पूजन को कलियुग में सबसे शीघ्र फलदायी, पापनाशक और मनोकामना पूर्ण करने वाला माना गया है। शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता के अनुसार, जो भी शिवभक्त सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत, या किसी भी शुभ अवसर पर अपने हाथों से मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा और षोडशोपचार पूजन करता है, उसे दस हजार कल्पों तक स्वर्ग लोक में निवास प्राप्त होता है।

रामेश्वरम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने भी रावण पर विजय प्राप्त करने से पूर्व समुद्र तट की बालू (मिट्टी) से पार्थिव शिवलिंग का ही निर्माण कर उनकी स्तुति की थी। आज भागवत दर्शन के इस विशेष लेख में हम आपको वेदोक्त और पुराणोक्त विधि से पार्थिव शिवलिंग निर्माण, मिट्टी को शुद्ध करने की प्रक्रिया, न्यास विधि, प्राण प्रतिष्ठा मंत्र, और अंत में विसर्जन की संपूर्ण प्रक्रिया विस्तार से बता रहे हैं।


1. पार्थिव शिवलिंग क्या है और इसका शास्त्रों में महत्व?

पार्थिव का अर्थ है 'पृथ्वी से उत्पन्न'। शुद्ध मिट्टी, जल, भस्म, और गाय के गोबर के मिश्रण से जो शिवलिंग तैयार किया जाता है, उसे पार्थिव शिवलिंग कहा जाता है। शिवपुराण में महर्षि सूत जी शौनक आदि ऋषियों को बताते हैं कि सोने, चांदी, या स्फटिक के शिवलिंग की पूजा से जो फल मिलता है, उससे करोड़ों गुना अधिक पुण्य मिट्टी के शिवलिंग की पूजा करने से मिलता है।

यह केवल एक भौतिक स्वरूप नहीं है, बल्कि पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का सीधा समन्वय है। जब हम अपने हाथों से मिट्टी को गूंथते हैं, तो हमारी भावनाएं और ऊर्जा सीधे शिव के उस निराकार स्वरूप से जुड़ जाती हैं।

2. शिवलिंग निर्माण के लिए मिट्टी का चयन और सामग्री

पार्थिव शिवलिंग के लिए मिट्टी का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए कुछ विशेष नियम हैं:

  • मिट्टी का प्रकार: किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा) के तट की मिट्टी, बेल वृक्ष की जड़ के पास की मिट्टी, या किसी शुद्ध स्थान की लाल अथवा काली मिट्टी सर्वोत्तम होती है।
  • क्या न मिलाएं: मिट्टी में कंकड़, पत्थर, या कोई अशुद्ध वस्तु नहीं होनी चाहिए।
  • मिश्रण सामग्री: मिट्टी को गूंथने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल, थोड़ा सा गाय का गोबर (गोमय), भस्म और चंदन का प्रयोग करना चाहिए।
  • पूजन सामग्री: बिल्वपत्र (बेलपत्र), धतूरा, भांग, सफेद पुष्प (आक, मदार), रुद्राक्ष, भस्म, चंदन, गाय का कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत), जनेऊ, वस्त्र, धूप, दीप और नैवेद्य।

3. मिट्टी को अभिमंत्रित और शुद्ध करने की विधि

शिवलिंग बनाने से पहले मिट्टी को मंत्रों द्वारा चैतन्य करना आवश्यक है। एक साफ पात्र में मिट्टी लें और कुशा या दूर्वा से उस पर जल छिड़कते हुए निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करें:

ॐ हराय नमः (इस मंत्र से मिट्टी एकत्र करें)

ॐ महेश्वराय नमः (इस मंत्र से मिट्टी में जल मिलाएं)

ॐ शूलपाणये नमः (इस मंत्र से शिवलिंग को आकार दें)

ॐ पिनाकपाणये नमः (इस मंत्र से शिवलिंग को वेदी/जलहरी पर स्थापित करें)

विशेष ध्यान: शिवलिंग का आकार बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, पूजा करने वाले के अंगूठे के पोर (ऊपरी हिस्से) के बराबर का शिवलिंग उत्तम माना जाता है, या अधिकतम बारह अंगुल तक ऊंचा हो सकता है।


4. पूजा का संकल्प (Sankalpa Vidhi)

सनातन धर्म में बिना संकल्प के किया गया कोई भी कर्म पूर्ण फलदायी नहीं होता। पूजा के आसन पर बैठकर आचमन करें, अपने माथे पर चंदन/भस्म लगाएं, और दाहिने हाथ में जल, अक्षत (साबुत चावल), एक पुष्प और कुछ द्रव्य (सिक्का) लेकर यह संकल्प लें:

"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:। श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे... (अपने स्थान/शहर का नाम लें)... संवत्सरे... (वर्तमान वर्ष)... मासे... (महीने का नाम)... पक्षे... (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)... तिथौ... (तिथि का नाम)... वासरे... (दिन का नाम)...

अहं... (अपना गोत्र बोलें) गोत्रोत्पन्नः... (अपना नाम बोलें) शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं ममात्मनः श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, मम सपरिवारस्य आयुरारोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्ध्यर्थं, अप्राप्त लक्ष्मी प्राप्त्यर्थं, प्राप्त लक्ष्म्याश्चिरकाल संरक्षणार्थं, श्री साम्बसदाशिव प्रीत्यर्थं पार्थिवेश्वर लिंग निर्माणं, प्राणप्रतिष्ठां, षोडशोपचार पूजनं च अहं करिष्ये।"

संकल्प के बाद हाथ में लिया हुआ जल और सामग्री सामने जमीन पर या किसी पात्र में छोड़ दें।

5. विस्तृत न्यास विधि (Nyasa)

न्यास का अर्थ है भगवान के दिव्य स्वरूपों और शक्तियों को अपने भौतिक शरीर और शिवलिंग में स्थापित करना। न्यास करने से साधक शिवमय हो जाता है। "शिवो भूत्वा शिवं यजेत" (शिव होकर ही शिव की पूजा करें)।

ऋष्यादिन्यास (हाथ से अंगों का स्पर्श करें):

  • 👉 ॐ वामदेव ऋषये नमः शिरसि। (दाहिने हाथ की उंगलियों से सिर का स्पर्श करें)
  • 👉 ॐ पंक्ति छन्दसे नमः मुखे। (मुख का स्पर्श करें)
  • 👉 ॐ शिव पञ्चमुख देवतायै नमः हृदि। (हृदय का स्पर्श करें)
  • 👉 ॐ बींजाय नमः गुह्ये। (गुह्य स्थान का स्पर्श करें)
  • 👉 ॐ शक्तये नमः पादयोः। (दोनों पैरों का स्पर्श करें)
  • 👉 ॐ कीलकाय नमः नाभौ। (नाभि का स्पर्श करें)
  • 👉 ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे। (पूरे शरीर का स्पर्श करें)

करन्यास (उंगलियों का स्पर्श):

  • 👉 ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। (तर्जनी से अंगूठे को छुएं)
  • 👉 ॐ तर्जनीभ्यां नमः। (अंगूठे से तर्जनी को छुएं)
  • 👉 ॐ मध्यमाभ्यां नमः। (अंगूठे से मध्यमा को छुएं)
  • 👉 ॐ अनामिकाभ्यां नमः। (अंगूठे से अनामिका को छुएं)
  • 👉 ॐ कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (अंगूठे से सबसे छोटी उंगली को छुएं)
  • 👉 ॐ करतल करपृष्ठाभ्यां नमः। (दोनों हाथों की हथेलियों और पीठ को आपस में रगड़ें)

6. भगवान शिव का ध्यान (Dhyanam)

न्यास के पश्चात् आँखें बंद करें, दोनों हाथ जोड़ें और भगवान शिव के उस परम शांत, त्रिनेत्रधारी, नीलकंठ स्वरूप का ध्यान करें जो कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं।

ध्यान श्लोक:
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं,
विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥

भावार्थ: जो चांदी के पर्वत (कैलाश) के समान श्वेत हैं, जिनके मस्तक पर सुंदर चंद्रमा आभूषण के रूप में सुशोभित है, जिनके अंग रत्नों से उज्ज्वल हैं, जिनके हाथों में परशु, मृग, वर और अभय मुद्रा है, जो प्रसन्नवदन हैं, कमल के आसन पर विराजमान हैं, देवता जिनकी स्तुति करते हैं, जो बाघ की खाल पहने हैं, जो विश्व के आदि कारण हैं, संपूर्ण विश्व के वंदनीय हैं, सभी भयों को हरने वाले हैं, ऐसे पंचमुख और त्रिनेत्र भगवान शिव का मैं नित्य ध्यान करता हूँ।


7. पार्थिव शिवलिंग प्राण प्रतिष्ठा का पूर्ण विधान

ध्यान के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है—प्राण प्रतिष्ठा। मिट्टी के उस आकार में शिव के प्राणों का आवाहन करना ही प्राण प्रतिष्ठा है। दाहिने हाथ में एक बिल्वपत्र, पुष्प और थोड़ा सा जल लें, उसे शिवलिंग से स्पर्श कराएं और इस दिव्य वेद मंत्र का सस्वर उच्चारण करें:

"ॐ अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा: क्षरन्तु च।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥"

"ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु।
विश्वे देवास इह मादयन्तामों३ प्रतिष्ठा।"

आवाहन मंत्र:
आगच्छ भगवन् देव स्थाने चात्र स्थिरो भव। यावत्पूजां करिष्यामि तावत्त्वं सन्निधौ भव॥
(हे भगवान शिव! आप यहाँ पधारें और स्थिर हों। जब तक मैं आपकी पूजा करूँ, तब तक आप इसी लिंग में निवास करें।)

मंत्र पूरा होने पर हाथ में रखा पुष्प और जल शिवलिंग पर अर्पित कर दें। अब वह मिट्टी का स्वरूप साक्षात परब्रह्म शिव का रूप बन चुका है।

8. षोडशोपचार पूजन विधि (16 Steps of Worship)

प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात भगवान शिव की 16 प्रकार की सामग्रियों से पूजा (षोडशोपचार) की जाती है। भागवत दर्शन के पाठकों के लिए यह अत्यंत सरल विधि नीचे दी गई है:

  1. आसन: भगवान को बैठने के लिए अक्षत और पुष्प अर्पित करें। (ॐ नमः शिवाय आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि)
  2. पाद्य: भगवान के चरणों को धोने के भाव से जल अर्पित करें। (ॐ नमः शिवाय पाद्यं समर्पयामि)
  3. अर्घ्य: हाथों को धोने के लिए जल अर्पित करें।
  4. आचमनीय: मुख शुद्ध करने के लिए जल चढ़ाएं।
  5. स्नान (पंचामृत): शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर अर्पित करें। (ॐ पञ्चामृत स्नानेन नमः)
  6. शुद्धोदक स्नान: अंत में शुद्ध गंगाजल या साधारण जल से शिवलिंग को स्नान कराएं।
  7. वस्त्र एवं उपवस्त्र: भगवान को वस्त्र (कलावा या सूत का धागा) अर्पित करें।
  8. यज्ञोपवीत (जनेऊ): शिवजी को जनेऊ पहनाएं।
  9. भस्म एवं चंदन लेपन: शिवलिंग पर त्रिपुंड (तीन रेखाएं) बनाएं। शिवजी को भस्म अति प्रिय है।
  10. पुष्प और बिल्वपत्र: आक, मदार के फूल और 3 पत्तियों वाले अखंडित बेलपत्र अर्पित करें। बेलपत्र चढ़ाते समय चिकना हिस्सा शिवलिंग की तरफ होना चाहिए।
  11. धूप: भगवान को धूप या अगरबत्ती दिखाएं।
  12. दीप: गाय के घी का दीपक प्रज्वलित कर दर्शन कराएं।
  13. नैवेद्य (भोग): मौसमी फल, मिष्ठान्न, खीर या भांग का भोग लगाएं।
  14. तांबूल (पान): लौंग, इलायची, और सुपारी के साथ पान का पत्ता अर्पित करें।
  15. आरती: कर्पूर से भगवान शिव की आरती करें (कर्पूरगौरं करुणावतारं...)
  16. पुष्पांजलि: दोनों हाथों में फूल लेकर क्षमा प्रार्थना करते हुए शिवजी को अर्पित करें।

9. क्षमा प्रार्थना और समर्पण

मनुष्य होने के नाते पूजा में कोई त्रुटि रह जाना स्वाभाविक है। इसलिए पूजा के अंत में यह क्षमा प्रार्थना अवश्य पढ़ें:

"आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥"

10. पार्थिव शिवलिंग विसर्जन विधि

पार्थिव शिवलिंग की पूजा उसी दिन या अगले दिन सुबह विसर्जित कर देनी चाहिए, इसे घर में लंबे समय तक नहीं रखा जाता। विसर्जन से पूर्व शिवलिंग की पुनः संक्षिप्त पूजा (जल, चंदन, पुष्प) करें।

विसर्जन मंत्र:
"गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर। यत्र ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ सदाशिव॥"
(हे परमेश्वर! आप अपने दिव्य धाम को प्रस्थान करें। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता निवास करते हैं, हे सदाशिव आप वहाँ गमन करें।)

यह बोलकर शिवलिंग को वेदी से थोड़ा खिसका दें (इसे 'उत्थापन' कहते हैं)। इसके बाद शिवलिंग को सम्मानपूर्वक किसी पवित्र नदी, सरोवर, या यदि बाहर जाना संभव न हो, तो घर में ही एक गहरे पात्र (बाल्टी/टब) में शुद्ध जल भरकर उसमें विसर्जित कर दें। जब मिट्टी पूरी तरह घुल जाए, तो उस जल को घर के गमलों या किसी पवित्र वृक्ष (जैसे तुलसी छोड़कर अन्य पौधों या बेलपत्र के पेड़) में डाल दें। पैरों में यह जल नहीं आना चाहिए।


पार्थिव शिवलिंग पूजा से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

Q1. क्या स्त्रियां भी पार्थिव शिवलिंग बना सकती हैं और पूजा कर सकती हैं?

उत्तर: जी हाँ। शिवपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने स्वयं पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर कठोर तपस्या की थी। स्त्रियां, कन्याएं और सौभाग्यवती महिलाएं पूर्ण श्रद्धा के साथ मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा और प्राण प्रतिष्ठा कर सकती हैं।

Q2. यदि प्राण प्रतिष्ठा के मंत्र संस्कृत में न बोल पाएं तो क्या करें?

उत्तर: भगवान शिव भाव के भूखे हैं। यदि संस्कृत के कठिन मंत्र बोलने में परेशानी है, तो आप केवल "ॐ नमः शिवाय" या "महामृत्युंजय मंत्र" का निरंतर जाप करते हुए भी मिट्टी ला सकते हैं, शिवलिंग बना सकते हैं और पूजा कर सकते हैं। शिवजी उसे भी पूर्ण रूप से स्वीकार करते हैं।

Q3. शिवलिंग का मुख किस दिशा में होना चाहिए?

उत्तर: पूजा करते समय शिवलिंग की जलहरी (जहाँ से जल बहकर गिरता है) हमेशा उत्तर दिशा (North) की ओर होनी चाहिए। पूजा करने वाला व्यक्ति पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठे।

Q4. क्या तुलसी के पत्ते शिवलिंग पर चढ़ाए जा सकते हैं?

उत्तर: नहीं। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव की पूजा में तुलसी पत्र, केतकी के फूल, और सिंदूर/कुमकुम का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है। शिवजी को बिल्वपत्र अत्यंत प्रिय हैं।

Q5. पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन कितने समय बाद करना चाहिए?

उत्तर: नियमतः पूजा के उपरांत उसी दिन सूर्यास्त से पूर्व या रात्रिकालीन पूजा की है तो अगले दिन प्रातः काल विसर्जन कर देना चाहिए। इसे कई दिनों तक बिना जल अभिषेक के सूखा नहीं रखना चाहिए।


॥ ॐ नमः शिवाय ॥
॥ हर हर महादेव ॥

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