आध्यात्मिक जीवन का आधार: व्रत के नियम, रविवार व्रत की महिमा और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का रहस्य

Sooraj Krishna Shastri
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आध्यात्मिक जीवन का आधार: व्रत के नियम, रविवार व्रत की महिमा और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का रहस्य
सनातन धर्म केवल कर्मकाण्डों का समूह नहीं है, अपितु यह मनुष्य के भीतर छिपे अज्ञान को मिटाकर उसे परमसत्य की ओर ले जाने का एक विज्ञान है। मानव जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष उसके अपने 'स्वभाव' से होता है। हमारे ग्रंथ, उपदेश और व्रत-विधान मनुष्य को उसी मूल स्वभाव में वापस लौटने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आइए, इस विस्तृत लेख में हम मानव स्वभाव की वास्तविकता, पुराणों में वर्णित व्रत के कठोर किंतु कल्याणकारी नियम, भगवान सूर्य को समर्पित रविवार व्रत की अपार महिमा और ज्योतिष शास्त्र के 11वें नक्षत्र 'पूर्वा फाल्गुनी' के गूढ़ रहस्यों को विस्तार से समझें।
मनुष्य का मूल स्वभाव और उपदेश का प्रभाव
संसार में हम प्रायः देखते हैं कि लोग दूसरों को सुधारने का बहुत प्रयास करते हैं। बड़े-बड़े उपदेश दिए जाते हैं, ग्रंथों का पाठ सुनाया जाता है, परंतु फिर भी मनुष्य का मूल स्वभाव (Basic Instinct) आसानी से नहीं बदलता। इस मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को हमारे नीति-शास्त्रों में एक अत्यंत सुंदर श्लोक के माध्यम से समझाया गया है:
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा !
सुतप्तमपि जलयं पुनर्गच्छति शीतलताम् !!
विस्तृत भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
हिन्दी अर्थ: "किसी व्यक्ति को आप चाहे जितनी ही अच्छी सलाह या उपदेश दे दें, वरन् उसका जो मूल स्वभाव है, वह सरलता से नहीं बदलता। ठीक उसी तरह जैसे अत्यंत ठंडे पानी को अग्नि पर रखने से वह खौलने लगता है (गर्म हो जाता है), परन्तु जैसे ही अग्नि का प्रभाव हटता है, वह पानी कुछ समय बाद पुनः अपनी स्वाभाविक शीतलता को प्राप्त कर लेता है।"
इस श्लोक में एक अत्यंत गहरा वेदांतिक रहस्य छिपा है। जल का मूल स्वभाव 'शीतलता' है। क्रोध रूपी अग्नि उसे कुछ समय के लिए उबाल तो सकती है, परन्तु वह उसे हमेशा के लिए बदल नहीं सकती। इसी प्रकार, मनुष्य का जो जन्मजात संस्कार या स्वभाव है, वह क्षणिक उपदेशों से नहीं बदलता। उसे बदलने के लिए केवल बाहरी उपदेश पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उसके लिए 'तप', 'साधना' और 'व्रत' की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य भीतर से संकल्प लेता है, तभी वह अपनी वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
व्रत की आवश्यकता और उसका महत्व
वेद अत्यंत गहन और दार्शनिक हैं। एक सामान्य मनुष्य के लिए वेदों में बताए गए बड़े-बड़े अनुष्ठान, यज्ञ और जटिल प्रक्रियाएं करना अत्यंत कठिन है। कलयुग में मनुष्य की आयु, सामर्थ्य और साधन सीमित हैं। इस कठिनाई को दूर करने के लिए महर्षि वेदव्यास जी और अन्य ऋषियों ने 'पुराणों' की रचना की। पुराणों में वैदिक ज्ञान को कथाओं के रूप में पिरोया गया है और आत्म-शुद्धि के लिए 'व्रतों' का उल्लेख किया गया है, जिनका पालन करना आम गृहस्थ के लिए बहुत आसान और कल्याणकारी है। व्रत का अर्थ भूखा रहना नहीं है, बल्कि 'व्रत' का अर्थ है— 'संकल्प' (Vow)। बुराइयों को छोड़ने का संकल्प और ईश्वर की ओर मुड़ने का संकल्प ही सच्चा व्रत है।
व्रत करने वालों द्वारा पालन किये जाने वाले अनिवार्य नियम
शास्त्रों के अनुसार, कोई भी व्रत तभी अपना पूर्ण फल प्रदान करता है, जब वह सही नियमों, निष्ठा और पवित्रता के साथ किया जाए। मनमाने ढंग से किया गया व्रत फलदायी नहीं होता। व्रत के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य नियम निम्नलिखित हैं:
१. कठोर अनुपालन और दृढ़ संकल्प
किसी भी व्रत का पालन अत्यंत सावधानीपूर्वक और पूरी श्रद्धा के साथ करना चाहिए। एक बार व्रत का संकल्प लेने के बाद, चाहे शरीर में कष्ट हो, भूख लगे या प्यास सताए, हमें व्रत करते समय आने वाली कठिनाइयों के बारे में नहीं सोचना चाहिए। भगवान केवल भूखे पेट को नहीं देखते, वे हमारी निष्ठा (Commitment) की परीक्षा लेते हैं।
२. व्रत पूरा करना अत्यंत ज़रूरी है
यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष कार्य या कामना के लिए व्रत (जैसे 16 सोमवार, या 11 रविवार) शुरू करता है, तो उसे बीच में नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि संकल्प लेकर बीच में ही उसे छोड़ देना विनाशकारी हो सकता है और इष्ट देव का अपमान माना जाता है। शास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया है कि यदि व्रत में जानबूझकर या गलती से कोई रुकावट (सूतक, बीमारी या यात्रा) आती है, तो उसका 'प्रायश्चित' करना चाहिए और छूटे हुए व्रत को पुनः पूर्ण करना चाहिए।
व्रत के दिन की दिनचर्या (शास्त्रोक्त नियम)
• ब्रह्म मुहूर्त में जागरण: व्रत वाले दिन व्रती को सूर्योदय से कम से कम डेढ़ से दो घंटे पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) उठ जाना चाहिए। यह समय देवताओं का समय होता है, जब वातावरण में ओजोन गैस (प्राणवायु) की प्रचुरता होती है और मन स्वतः ही सात्विक रहता है।
• दैनिक स्नान और स्वच्छता: मल-मूत्र त्याग उचित समय पर कर लेना चाहिए। प्रतिदिन, विशेषकर व्रत के दिन, स्वच्छ जल से स्नान अवश्य करना चाहिए। बाहरी शुद्धि आंतरिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।
• वस्त्र और आभूषण: व्रत करते समय मलिन या गंदे वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। व्रती को गंध (चंदन, इत्र), ताजे फूल, माला और व्रत के देवता के अनुरूप (जैसे रविवार को लाल, बृहस्पतिवार को पीले) स्वच्छ वस्त्र और आभूषण धारण करने चाहिए। इससे मन में उत्साह और देवत्व का भाव जागृत होता है।
• देवता की पूजा और कीर्तन: जिस इष्ट देवता के निमित्त व्रत किया गया है, पूरे दिन मन ही मन उनका स्मरण करना चाहिए। देवता का नामजप करना, उनके स्वरूप का ध्यान करना, उनकी पावन कथाएं सुनना, षोडशोपचार पूजा करना और कीर्तन करना (भक्ति गीतों के साथ भगवान की महिमा का गान) व्रत का मुख्य अंग है। खाली समय में धार्मिक ग्रंथों (जैसे गीता, रामायण, भागवत) का पाठ करना चाहिए।
• आहार और भोजन के नियम: व्रत के दिन सीमित मात्रा में ही सात्विक आहार (फलाहार) ग्रहण करना चाहिए। व्रत में अधिक खाने से आलस्य आता है जो साधन में बाधक है। साधारण नमक (समुद्री नमक), नमकीन बाज़ारी खाद्य पदार्थ, शहद और किसी भी प्रकार का मांसाहार पूर्णतः वर्जित है। (सेंधा नमक का प्रयोग किया जा सकता है)।
प्रतिबंध: व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
व्रत की सफलता के लिए व्रती को निम्नलिखित कार्यों से सर्वथा बचना चाहिए:
  • शरीर और सिर पर तेल लगाना, या अभ्यंग स्नान (Oil Massage) करना वर्जित है, क्योंकि यह विलासिता का प्रतीक है।
  • पान खाना या मुँह में किसी प्रकार का व्यसन रखना।
  • शरीर पर अत्यधिक भौतिक सुगंधित पदार्थों (Deodorants) का प्रयोग।
  • धूम्रपान, मद्यपान या किसी भी प्रकार का नशा।
  • दिन के समय सोना (दिवास्वप्न)। दिन में सोने से शरीर में तमोगुण बढ़ता है और व्रत का पुण्य क्षीण होता है।
  • चोरी करना, झूठ बोलना, या किसी की चुगली (निंदा) करना।
  • शारीरिक संबंध (संभोग)। व्रत के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है, क्योंकि इससे शरीर का ओज सुरक्षित रहता है जो आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलता है।
  • मानसिक शक्ति को कम करने वाले कार्य जैसे— अत्यधिक क्रोध करना, लोभ (लालच) करना, मोह और आलस्य से दूर रहना चाहिए।
सद्गुणों का विकास और दान-पुण्य
• क्षमा और सत्य: व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है। इस दिन व्रती को क्षमा, सत्य, करुणा, दया और उदारता आदि दैवीय गुणों का सावधानीपूर्वक अपने भीतर विकास करना चाहिए। यदि कोई क्रोध दिलाये तो भी शांत रहना चाहिए।
• गुरु और देव-सम्मान: अपने गुरु, माता-पिता, और देवताओं की पूजा करनी चाहिए और उनका हृदय से सम्मान करना चाहिए।
• भोजन कराना: व्रत खोलने से पूर्व या व्रत के दिन ब्राह्मणों, गुरुजनों, विवाहित स्त्रियों, कन्याओं तथा अतिथियों को भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायी है। यदि संभव हो तो अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, निराश्रितों तथा गरीब भूखे लोगों को भोजन कराएं। 'अन्न दान' व्रत का सबसे बड़ा फल है।
• दान (Charity): अपनी क्षमता के अनुसार पशु (गाय), धन, आभूषण, वस्त्र या फल आदि का दान करना चाहिए। दान से धन की शुद्धि होती है।
नोट (स्त्रियों के लिए): यदि व्रत के अनुष्ठान के दौरान किसी महिला को मासिक धर्म (Periods) आ जाए, तो भी व्रत पूरा करने में कोई मानसिक बाधा नहीं आती। वे शारीरिक पूजा या स्पर्श न करें, परन्तु मानसिक रूप से इष्ट का ध्यान, जप और व्रत के नियमों का पालन जारी रखें, उनका व्रत पूर्ण माना जाता है।
संकल्प: व्रत की नींव
किसी भी व्रत को शुरू करते समय और समाप्त (उद्यापन) करते समय 'संकल्प' लेना अत्यंत आवश्यक है। यदि बिना संकल्प के व्रत किया जाता है, तो वह दिशाहीन हो जाता है और सफल नहीं होता। संकल्प की विधि: उत्तर दिशा की ओर मुख करके खड़े हों (आध्यात्मिक उन्नति और ऊर्जा के लिए उत्तर दिशा सबसे अनुकूल है, क्योंकि यह कुबेर और शिव की दिशा है)। दाहिने हाथ में जल से भरा तांबे का बर्तन या हथेली में थोड़ा जल, अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर अपने नाम, गोत्र और व्रत के उद्देश्य का उच्चारण करते हुए जल को धरती पर छोड़ देना चाहिए। यही संकल्प है।

रविवार का व्रत: प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की उपासना
सप्ताह के सात दिनों में रविवार (Sunday) का दिन प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य (Surya Narayan) को समर्पित है। भगवान सूर्य आकाशीय पिंड के सभी नवग्रहों के राजा (स्वामी) हैं और सबसे शक्तिशाली हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं और वेदों के अनुसार, भगवान सूर्य को "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" अर्थात् ब्रह्मांड की आत्मा (Soul of the Universe) माना जाता है। वे ही इस सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार हैं।
ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा, पिता, और सफलता का कारक माना गया है। भगवान सूर्य की उपासना करने वाले व्यक्ति को ज्ञान, दिव्यता, कार्यक्षमता (Performance), शक्ति, उच्च पद, समाज में अधिकार, महिमा, नाम, प्रतिष्ठा और बल की प्राप्ति होती है। सूर्य देव की कृपा व्यक्ति को एक शासक (Leader) या राजसी व्यक्ति बनाती है।
सूर्य देव से जीवन-प्रबंधन (Management) की सीख
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में हम सभी समय की इतनी कमी से जूझ रहे हैं कि हमारे पास स्वयं अपने बारे में सोचने का समय ही नहीं है। ऐसे में हम सूर्य देव से बहुत कुछ सीख सकते हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, अत्यंत समन्वयशील हैं और अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करते हैं। सूर्य देव कभी अवकाश (Holiday) नहीं लेते। वे हमेशा जागृत रहते हैं, समय पर उदय होते हैं और समय पर अस्त होते हैं। वे अपने अधीन सभी जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और जल को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं और इस ग्रह पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति (चाहे वह राजा हो या रंक) को समान रूप से तेज धूप और ऊर्जा प्रदान करते हैं।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ: सूर्य की किरणें कई असाध्य बीमारियों को ठीक करती हैं (इसे आधुनिक विज्ञान में Heliotherapy कहा जाता है)। विशेषकर आंखों की रौशनी और त्वचा (Skin) से जुड़ी बीमारियों (जैसे कुष्ठ रोग, सोरायसिस) में सूर्य की प्रातःकालीन किरणें अमृत के समान हैं। यह शरीर में विटामिन डी का निर्माण कर रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाती है। सूर्य हम जो भी काम करते हैं, उसमें ऊर्जा प्रदान करता है। चाहे वह सौर ऊर्जा हो या ऊष्मा ऊर्जा, यह दुनिया को रहने के लिए एक स्वच्छ और बेहतर जगह बनाता है। यदि सूर्य न होते तो धरती पर प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) नहीं होता और दुनिया में कोई भोजन नहीं होता। सूर्य ही साक्षात् जीवनदाता हैं।
ऐसा कहा जाता है कि हर सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, लाल चंदन और थोड़ा गुड़ डालकर “ओम सूर्याय नमः” का जाप करते हुए सूर्य देव को अर्घ्य (जल अर्पित करना) देने से हमें अपनी सभी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक समस्याओं से छुटकारा पाने में मदद मिलती है।
रविवार व्रत के अनुष्ठान और विधि
रविवार का व्रत अत्यंत फलदायी है। इसकी विधि इस प्रकार है:
  • रविवार की सुबह सूर्योदय से पूर्व स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ लाल या सफेद वस्त्र धारण करें।
  • घर और आस-पास की सफाई करें। पूजा स्थल पर भगवान सूर्य की प्रतिमा या यंत्र स्थापित करें।
  • भक्तों को भगवान सूर्य को लाल रंग के फूल (जैसे गुड़हल या कनेर), कुमकुम और लाल चंदन चढ़ाना चाहिए।
  • स्वयं अपने माथे पर भी लाल चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
  • पूरे दिन उपवास रखें। सूर्यास्त से ठीक पहले केवल एक बार भोजन (फलाहार या मीठा भोजन) ग्रहण करें।
  • इस व्रत में नमक, तेल और तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित है। यदि संभव हो तो गेहूं की रोटी और गुड़ का सेवन करना चाहिए।
रविवार का व्रत व्यक्ति की सभी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाओं को पूरा करने, शत्रुओं पर विजय दिलाने, आंखों की ज्योति बढ़ाने और सभी प्रकार के चर्म रोगों (Skin diseases) को ठीक करने में रामबाण सिद्ध होता है।
सूर्य देव के अचूक मंत्र
सूर्य देव को प्रसन्न करने और रोगों के निवारण के लिए पुराणों में अत्यंत शक्तिशाली मंत्र दिए गए हैं:
“नमः सूर्याय शान्ताय सर्वरोग निवारणे !
आयु रारोग्य मैस्वैर्यं देहि देवः जगत्पते !!”
भावार्थ:
"हे शांत स्वरूप, सभी रोगों का निवारण करने वाले भगवान सूर्य! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देव! हे जगत् के स्वामी (जगत्पते)! आप मुझे लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) और ऐश्वर्य प्रदान करें।"
इसके अतिरिक्त, रामायण काल में जब भगवान श्रीराम रावण के साथ युद्ध करते हुए थक गए थे, तब महर्षि अगस्त्य ने उन्हें भगवान सूर्य का अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र 'आदित्य हृदय स्तोत्र' सुनाया था, जिसके पाठ से राम जी ने रावण का वध किया। उसका एक मुख्य मंत्र यहाँ प्रस्तुत है:
“आदित्य हृदय पुण्यं सर्व शत्रु विनाशनम् !
जयावहं जपेन्नित्यं अक्षय्यं परमं शिवम् !!”
भावार्थ:
"यह आदित्य हृदय स्तोत्र परम पवित्र है, यह सभी प्रकार के शत्रुओं का पूर्णतः विनाश करने वाला है। यह विजय दिलाने वाला (जयावहं), कभी नष्ट न होने वाला (अक्षय) और परम कल्याणकारी (परमं शिवम्) है। इसका नित्य जप करना चाहिए।"

11वाँ नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी (Purva Phalguni Nakshatra) का जीवन में महत्व
वैदिक ज्योतिष (Astrology) में ब्रह्मांड को 27 नक्षत्रों (Constellations) में बांटा गया है। जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, व्यक्ति का स्वभाव, गुण और जीवन उसी से प्रभावित होता है। 27 नक्षत्रों के चक्र में 11वाँ नक्षत्र 'पूर्वा फाल्गुनी' है। यह सिंह राशि (Leo) के अंतर्गत आता है। इसे 'विश्राम', 'प्रजनन' और 'आनंद' का नक्षत्र माना जाता है।
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र का वैदिक परिचय:
  • नक्षत्र का नाम: पूर्वा फाल्गुनी
  • नक्षत्र देवता: 'भग' (यह 12 आदित्यों में से एक हैं, जो धन, समृद्धि और वैवाहिक सुख के देवता माने जाते हैं)।
  • नक्षत्र स्वामी (Lord): शुक्र (Venus) - जो सौंदर्य, कला, और विलासिता का ग्रह है।
  • नक्षत्र आराध्य वृक्ष: पलाश / टेसू (Palash)। पलाश के फूल अत्यंत सुंदर और लाल होते हैं। यह वृक्ष वसंत ऋतु और ऊर्जा का प्रतीक है।
  • नक्षत्र पर्याय वृक्ष: बेल (बिल्व वृक्ष)।
  • नक्षत्र चरणाक्षर (नाम के अक्षर): मो (Mo), टा (Ta), टी (Ti), टु (Tu)।
  • नक्षत्र प्राणी (Yoni/Animal Symbol): चूहा (Rat/Mouse)।
  • नक्षत्र तत्व: क्रूर (अग्रगामी और साहसी कार्य करने में सक्षम)।
  • नक्षत्र स्वभाव: सत्व (सकारात्मक और रचनात्मक)।
  • नक्षत्र गण: मनुष्य गण (अर्थात् इनका स्वभाव बहुत अधिक प्रैक्टिकल, सामाजिक और सांसारिक होता है)।
पूर्वा फाल्गुनी में जन्मे जातकों का जन्मफल और स्वभाव
चूंकि इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र (कला का ग्रह) है और यह सूर्य की राशि (सिंह) में पड़ता है, इसलिए इस नक्षत्र में जन्मे लोगों के व्यक्तित्व में राजसी ठाठ-बाट और कलात्मकता का अद्भुत संगम होता है।

1. सदा प्रिय वचन बोलने वाला: शुक्र के प्रभाव से इनकी वाणी में गजब का आकर्षण और मिठास होती है। ये वाद-विवाद से बचते हैं और शांति पसंद करते हैं।
2. दान-धर्म करने वाला: देवता 'भग' की कृपा से ये अत्यंत भाग्यशाली होते हैं। इनके पास संपत्ति आती है और ये खुले हाथों से दान भी करते हैं।
3. आकर्षक व्यक्तित्व (Charismatic Personality): इनमें गजब की चुंबकत्व (Magnetism) शक्ति होती है। लोग इनकी ओर सहज ही आकर्षित हो जाते हैं। ये साफ-सुथरे रहने और सजने-संवरने के शौकीन होते हैं।
4. यात्रा प्रेमी: इन्हें नई-नई जगहें घूमना, प्रकृति को निहारना और आरामदायक यात्राएं करना बहुत पसंद होता है।
5. राज सेवक / अधिकारी: सिंह राशि के कारण ये उच्च पदों पर, सरकारी अधिकारी या समाज में एक सम्मानित पद (राज सेवक) प्राप्त करते हैं। ये किसी के अधीन रहकर काम करने से ज्यादा नेतृत्व (Leadership) करना पसंद करते हैं।
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र से जुड़ी वृत्तियाँ (करियर/Professions)
इस नक्षत्र के लोग उन क्षेत्रों में अत्यधिक सफल होते हैं जहाँ रचनात्मकता, सौंदर्य, और लोगों से सीधा संपर्क हो। इनके लिए उपयुक्त व्यवसाय हैं:
कार्यकारी (Executives), सरकारी अधिकारी (Govt. Officers), मनोरंजन जगत (Entertainment), मेकअप कलाकार (Makeup Artists), मॉडल (Modeling), फोटोग्राफर (Photography), चित्रकार (Painters), कला संग्रहालय या गैलरी (Art Galleries), संगीतकार (Musicians), शिक्षक (Teachers), रत्न व्यापारी (Gemstone Traders), शारीरिक फिटनेस ट्रेनर (Fitness Trainers), सर्किट डेकोरेटर, महिलाओं के सौंदर्य उत्पादों (Women's cosmetics/products) के साथ काम करने वाले। इसके अतिरिक्त, गुप्त-चिकित्सक (Occult healers), नींद चिकित्सक (Sleep Therapists), जीवविज्ञानी (Biologists), पर्यटन (Tourism), और कपास तथा रेशम उद्योग (Cotton & Silk Industry) में भी ये बहुत नाम और धन कमाते हैं।
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के शांति एवं आराध्य मंत्र
पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र के नकारात्मक प्रभावों (यदि कुंडली में हो) को दूर करने और इसके देवता 'भग' का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में मंत्र दिए गए हैं:
पौराणिक मंत्र :
भगं रथवारारुढं व्यदिभुंज शंखचक्रकम l
फाल्गुनी देवतां ध्यायेत् भक्ताभीष्ट वरप्रदम् ll
नक्षत्र देवता नाम मंत्र:
ॐ पूर्व फाल्गुनीभ्यां नमः
नक्षत्र पीड़ा परिहार (अश्विनी कुमार) मंत्र:
रोगों और अनिष्ट से मुक्ति के लिए देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का यह परिहार मंत्र भी अत्यंत लाभकारी है:
अश्विनौ वैद्य देवौ विद्भुजौ शुक्लवर्णको l
सर्वारिष्ट विनाशाय अश्विभ्यांवै नमो नमः !!
भावार्थ:
"जो देवताओं के वैद्य हैं, जो श्वेत (शुक्ल) वर्ण वाले और अपनी भुजाओं में विद्या धारण करने वाले हैं, उन अश्विनी कुमारों को सभी अरिष्टों (संकटों और रोगों) के विनाश के लिए मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।"
निष्कर्ष
मनुष्य का जीवन केवल खाना, पीना और सो जाना नहीं है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) से जुड़ा हुआ एक पवित्र अनुष्ठान है। उपदेश सुनकर स्वभाव बदलना कठिन है, परन्तु 'व्रत' के नियमों का पालन करके, भगवान सूर्य जैसे प्रत्यक्ष देव की उपासना करके, और अपने जन्म-नक्षत्र (पूर्वा फाल्गुनी आदि) की ऊर्जा को सही दिशा देकर मनुष्य अपने जीवन की सभी बाधाओं को पार कर सकता है। धर्म का यह मार्ग ही व्यक्ति को सच्ची सफलता और परम शांति की ओर ले जाता है।

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