गुस्से को नियंत्रित करने का एक सुंदर उदाहरण: क्षमा और त्याग की एक सत्यकथा
सनातन धर्म में क्रोध को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— 'क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः' (क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है और सम्मोह से स्मृति नष्ट हो जाती है)। परन्तु यदि इसी क्रोध को सही दिशा दे दी जाए, तो वह व्यक्ति के उत्थान का मार्ग बन सकता है। एक वकील द्वारा सुनाया गया यह हृदयस्पर्शी किस्सा इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे प्रतिशोध की ज्वाला को त्याग और क्षमा में बदलकर एक मनुष्य न केवल अपना घर टूटने से बचा सकता है, अपितु अपने जीवन को सार्थक भी बना सकता है।
वकील के कक्ष में एक क्रुद्ध व्यक्ति का प्रवेश
दोपहर का समय था। मैं अपने चेंबर में बैठा हुआ कुछ पुराने मुकदमों की फाइलें देख रहा था। अचानक, दरवाजे को धकेलता हुआ एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा। उसकी शारीरिक वेशभूषा चीख-चीख कर उसकी कहानी बयां कर रही थी। हाथ में पुराने कागज़ो का एक मोटा बंडल था, कड़ी धूप और खेतों में काम करने के कारण उसका चेहरा काला पड़ चुका था। गालों पर बढ़ी हुई बेतरतीब दाढ़ी थी। उसने सफेद कपड़े पहने हुए थे, जिनकी सिलवटें और पांयचों (पैंट के निचले हिस्से) पर लगी हुई सूखी मिट्टी यह बता रही थी कि वह मीलों पैदल चलकर या किसी पुरानी बस में धक्के खाकर सीधा मेरे पास आया है।
उसका चेहरा लाल था और आँखों में एक ऐसी आग थी जो किसी भी चीज़ को भस्म कर देने के लिए आतुर थी। वह सीधा मेरे मेज़ के सामने आकर खड़ा हो गया और बिना कोई अभिवादन किए लगभग चिल्लाते हुए बोला,
"उसके पूरे फ्लैट पर स्टे (Stay Order) लगाना है! बताइए, क्या-क्या कागज और चाहिए... क्या लगेगा खर्चा? मुझे बस उसे सबक सिखाना है।"
कानूनी पेशे में हम रोज़ ऐसे अनेक लोगों से मिलते हैं जिनका क्रोध सातवें आसमान पर होता है। मैं समझ गया कि इसके भीतर ज्वालामुखी उबल रहा है। मैंने उसे शांत करने के लिए बैठने का इशारा किया।
"रग्घू, ज़रा पानी दे इधर," मैंने अपने मुंशी को आवाज़ लगाई। वह व्यक्ति कुर्सी पर धम्म से बैठ गया, मानो उसके पैरों ने जवाब दे दिया हो। मैंने उसके हाथ से कागज़ों का बंडल लिया और एक-एक करके उन्हें पढ़ना शुरू किया। वे ज़मीन के कागज़ात, कुछ बैंक के लोन के कागज़ और किसी शहर के नए फ्लैट की रजिस्ट्री की फोटोकॉपी थी।
मैंने उससे उसके परिवार, ज़मीन और उसके भाई के बारे में सारी जानकारी ली। आधा-पौना घंटा गुजर गया। सारी बातें सुनने के बाद मैंने कागज़ों को एक तरफ रखा और शांति से कहा, "मैं इन कागज़ो को अच्छी तरह देख लेता हूँ। आपकी केस पर विचार करेंगे। आप ऐसा कीजिए, बाबा, शनिवार को मिलिए मुझसे।"
चार दिन बाद: सच्चाई का आईना
शनिवार का दिन आया। वह व्यक्ति फिर से मेरे चेंबर में दाखिल हुआ। कपड़े वैसे ही मटमैले थे, और चेहरे पर वही क्रोध और हताशा (Desperation) थी। वह अपने छोटे भाई पर बहुत गुस्सा था। मैंने उसे बैठने को कहा। वह बैठा। ऑफिस में एक अजीब सी खामोशी गूंज रही थी; एक ऐसी खामोशी जो किसी बड़े तूफ़ान के आने से पहले होती है।
मैंने खामोशी तोड़ी और उसकी पूरी जीवन-गाथा को एक कहानी की तरह उसके सामने रखना शुरू किया:
"बाबा, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए हैं। आपकी कहानी केवल कागज़ों में नहीं, आपके चेहरे की झुर्रियों में लिखी है। आप दोनों भाई और एक बहन हैं। आपके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए थे। घर की पूरी ज़िम्मेदारी आप पर आ गई। तुम केवल नौवीं पास हो, लेकिन तुम्हारा छोटा भाई आज एक बड़ा इंजीनियर है। तुमने मुझे बताया था कि अपने छोटे भाई की पढ़ाई के लिए तुमने स्कूल छोड़ दिया। तुमने लोगों के खेतों में दिहाड़ी पर मज़दूरी की। तुम्हें कभी अपने शरीर को ढंकने के लिए पूरा कपड़ा और पेटभर खाना नहीं मिला, पर तुमने अपने भाई की पढ़ाई के लिए कभी पैसे कम नहीं होने दिए।"
मैं रुका, उसकी आँखें मेरी तरफ टकटकी लगाए देख रही थीं। मैंने आगे कहा:
"एक बार जब तुम दोनों खेल रहे थे, तो तुम्हारे भाई के पेट में किसी बैल ने सींग घुसा दिए थे। वह लहूलुहान होकर ज़मीन पर गिर पड़ा था। तुमने अपनी परवाह किए बिना उसे कंधे पर उठाया और 5 किलोमीटर दूर दौड़ते हुए अस्पताल ले गए। सही देखा जाए तो उस समय तुम्हारी उम्र भी इतनी नहीं थी कि तुम ज़िम्मेदारी का बोझ समझ सको, पर उस छोटे भाई में तुम्हारी जान बसती थी। 'माँ-बाप के बाद मै ही इनका माँ-बाप हूँ'… यह पवित्र भावना तुम्हारे मन में गहराई तक बसी थी।"
त्याग की पराकाष्ठा: एक भाई का सर्वस्व अर्पण
"फिर वह दिन आया जब तुम्हारे भाई को इंजीनियरिंग के एक अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल गया। तुम्हारा दिल उस दिन खुशी से फूला नहीं समाया। तुम्हें लगा कि तुम्हारी सारी मेहनत सफल हो गई। तुमने मरे दम तक मेहनत की। उसकी 80,000 रुपये की सालाना फीस भरने के लिए तुमने रात-दिन एक कर दिया। अपनी बीवी के गहने गिरवी रख दिए, कभी साहूकारों से कर्ज़ा लिया, पर तुमने उसकी हर ज़रूरत पूरी की। तुमने उसे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह एक अनाथ है।"
वह व्यक्ति अब अपनी नज़रें नीचे झुका चुका था। उसकी उँगलियाँ आपस में उलझ रही थीं। मैं बोलता रहा:
"फिर अचानक एक दिन उसे किडनी की तकलीफ शुरू हो गई। दवाखाने के चक्कर काटे, देव-भगवान के सामने माथा टेका। डॉक्टर ने कहा कि एक किडनी निकालनी पड़ेगी और दूसरी ट्रांसप्लांट करनी पड़ेगी। तुम ने एक सेकंड भी नहीं सोचा और अगले मिनट में ही अपनी किडनी उसे देने का फैसला कर लिया! तुमने कहा—'कल तुझे बड़ा अफसर बनना है, नौकरी करनी है, तू कहाँ-कहाँ घूमेगा यह बीमार शरीर लेकर? मुझे तो जीवन भर गाँव में ही रहना है, खेती करनी है, मेरे लिए एक किडनी भी बहुत है।' यह कहकर तुमने अपने शरीर का एक हिस्सा उसे दे दिया।"
"तुमने उसे केवल शिक्षा नहीं दी, तुमने उसे जीवनदान दिया। तुमने अपना भविष्य उसके वर्तमान पर न्योछावर कर दिया।"
"फिर तुम्हारा भाई मास्टर्स (Post-graduation) के लिए हॉस्टल पर रहने गया। घर में कोई भी अच्छी चीज़ बनती, जैसे लड्डू बने, तो तुम उसे देने 25 किलोमीटर दूर साइकिल चलाकर जाते। खेत में मकई तैयार हुई, तो सबसे पहले भाई को देने जाते। कोई तीज-त्यौहार हो, तो खुद फटे कपड़े पहनते पर भाई के लिए नए कपड़े भिजवाते। घर से हॉस्टल 25 किलोमीटर दूर था, पर तुम उसे डिब्बा देने चिलचिलाती धूप में साइकिल पर जाते। तुम्हारे हाथों का निवाला पहले तुम्हारे भाई के मुँह में जाता था।"
सफलता और कृतघ्नता (Ingratitude) का दंश
"फिर वह मास्टर्स पास हुआ। तुम्हारी खुशी का ठिकाना नहीं था, तुमने पूरे गाँव को खाना खिलाया। फिर उसने अपनी मर्जी से शादी कर ली। तुमने कोई विरोध नहीं किया, तुम सिर्फ सही समय पर वहाँ गए और आशीर्वाद दिया। वह उसी के कॉलेज की लड़की थी, जो दिखने में एकदम सुंदर थी।"
"तुम्हारे भाई को एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई। 3 साल पहले उसकी शादी हुई। तुम्हें लगा कि अब तुम्हारे बुढ़ापे का सहारा मिल गया है और तुम्हारा बोझ हल्का होने वाला है। पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। किसी की बुरी नज़र लग गई तुम्हारे इस निस्वार्थ प्यार को।"
"शादी के बाद भाई ने गाँव आना बंद कर दिया। तुमने पूछा तो कहता है—'मैंने बीवी को वचन दिया है कि मैं गाँव नहीं जाऊंगा।' घर के खर्च के लिए पैसा नहीं देता। तुमने पूछा तो कहता है—'मुझ पर बहुत कर्ज़ा है।' पिछले साल उसने शहर में एक बड़ा फ्लैट खरीदा है। तुमने पूछा कि पैसे कहाँ से आए, तो कहता है—'बैंक से लोन लिया है।' जब तुमने उसे समझाने की कोशिश की, तो वह तुम्हें धिक्कारते हुए बोला—'भाई, तुझे दुनियादारी का कुछ नहीं मालूम, तू तो निरा गँवार ही रह गया।'"
मैं एक क्षण के लिए रुका और उसके चेहरे के भावों को पढ़ा। उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं, बल्कि एक गहरा, असहनीय दर्द था।
"और अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। तुम्हारा भाई अब चाहता है कि गाँव की जो आधी खेती है, उसे बेचकर उसका पैसा उसे दे दिया जाए। इसी बात पर तुम्हें गुस्सा आया है।"
वकील की सलाह: प्रतिशोध या क्षमा?
इतना कहकर मैं रुका। रग्घू ने चाय की प्याली मेज़ पर रख दी थी। मैंने प्याली को मुँह से लगाया और सीधा उसकी आँखों में देखते हुए पूछा:
"तो अब तुम यह चाहते हो कि भाई ने जो माँगा है वह उसे न देकर, उल्टा उसी के उस नए फ्लैट पर कोर्ट से स्टे (Stay) लगा दिया जाए? उसे कोर्ट-कचहरी के चक्कर कटवाए जाएँ? क्या यही चाहते हो तुम?"
वह तुरंत, बिना पलक झपकाए बोला, "हाँ! मैं उसे बर्बाद कर दूँगा।"
मैंने चाय की प्याली नीचे रखी और अत्यंत शांत, किंतु दृढ़ स्वर में कहा:
"देखो बाबा, मैं एक वकील हूँ। कानून मेरा हथियार है। हम बिलकुल उसके फ्लैट पर स्टे ले सकते हैं। हम उस पर मुक़दमा ठोक सकते हैं और तुम्हारी पुश्तैनी प्रॉपर्टी में से पूरा हिस्सा भी मांग सकते हैं। कानून तुम्हें तुम्हारा हक़ दिला देगा। पर..."
"पर एक बात सोचो बाबा। तुमने उसके लिए जो खून-पसीना एक किया है, क्या कोई अदालत वो तुम्हें वापस दिला सकती है? तुमने जो अपनी किडनी उसे दान में दी है, क्या कोई जज आदेश देकर वो किडनी तुम्हारे शरीर में वापस फिट करवा सकता है? तुमने उसके लिए अपनी जवानी, अपने सपने और जो पूरी ज़िंदगी खर्च की है, क्या वो वापस मिलेगी?"
वह अवाक होकर मुझे सुन रहा था।
"मुझे लगता है कि इन सब अनमोल चीज़ों के सामने उस ईंट-पत्थर के फ्लैट की कीमत शून्य है। भाई की नीयत फिर गई, वो स्वार्थी हो गया और अपने रास्ते चला गया। अब तुम भी उसी कृतघ्न (अहसान फरामोश) सड़क पर मत जाना।"
दिलदार बनो, भिखारी नहीं
मैंने उसे जीवन का सबसे बड़ा फलसफा समझाते हुए कहा:
"सुनो बाबा! तुम्हारा भाई भिखारी निकला, जो इतना सब पाने के बाद भी ज़मीन के टुकड़ों के लिए भीख मांग रहा है। पर तुम तो दिलदार थे। तुमने तो हमेशा दिया ही है। तो दिलदार ही रहो... तुम्हारा हाथ हमेशा देने के लिए ऊपर था, उसे ऊपर ही रखो। उसे नीचे गिराकर भीख मांगने की स्थिति में मत लाओ।"
"इस फालतू कोर्ट-कचहरी और मुकदमों में अपना पैसा, समय और मानसिक शांति बर्बाद करने की बजाय, उसी ऊर्जा और पैसे को अपने बच्चों की पढ़ाई पर लगाओ। उन्हें पढ़ाओ-लिखाओ। तुम सोच रहे होगे कि पढ़ाई करके तुम्हारा भाई बिगड़ गया, तो बच्चे भी ऐसा ही करेंगे। पर ऐसा नहीं होता! हर इंसान की फितरत अलग होती है। अच्छे संस्कार दोगे तो बच्चे तुम्हारा नाम रोशन करेंगे।"
वह मेरे मुँह को एकटक ताकने लगा। कुछ पलों के लिए पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। मैं देख सकता था कि उसके भीतर जो प्रतिशोध का ज्वालामुखी था, वह मेरे इन शब्दों के जल से शांत हो रहा था।
वह चुपचाप अपनी जगह से उठा। उसने मेज़ से सारे काग़ज़ात समेटे और अपनी आँखें पोछते हुए भारी आवाज़ में कहा, "चलता हूँ वकील साहब।" उसकी रुलाई फूट रही थी, वह बुरी तरह रोना चाहता था, पर एक मर्द होने के नाते वह कोशिश कर रहा था कि मुझे उसके आँसू न दिखें। वह दरवाज़ा खोलकर चला गया। मैंने भी उसे रोका नहीं, क्योंकि मैं जानता था कि उसने सही रास्ता चुन लिया है।
बरसों बाद: जब क्रोध को सही दिशा मिली
इस बात को एक अरसा गुजर गया। समय अपनी गति से चलता रहा और मैं अपने रोज़मर्रा के केसों में उलझ गया।
कल दोपहर की बात है। वह व्यक्ति अचानक मेरे ऑफिस में आया। समय ने उसके चेहरे पर और गहरी लकीरें खींच दी थीं। उसकी कलमो (बालों) में सफेदी झांक रही थी। पर आज उसके चेहरे पर वो क्रोध और हताशा नहीं थी। आज उसका चेहरा एक अजीब सी शांति और संतुष्टि से दमक रहा था।
उसके साथ एक पढ़ा-लिखा, अत्यंत शालीन नौजवान भी था। उसके हाथ में एक थैली थी।
मैंने उसे तुरंत पहचान लिया और मुस्कुराते हुए कहा, "आओ बाबा, बैठो।"
उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, "आज मैं यहाँ बैठने या कोई केस लड़ने नहीं आया हूँ वकील साहब, आज तो मैं आपको मिठाई खिलाने आया हूँ!"
उसने साथ खड़े नौजवान की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यह मेरा बेटा है। इसने खूब पढ़ाई की और अब यह बैंगलोर में एक बहुत बड़ी कंपनी में इंजीनियर है। कल ही गाँव आया है। अब हमने गाँव में तीन मंजिला पक्का मकान बना लिया है। धीरे-धीरे करके, अपनी मेहनत की कमाई से मैंने 10–12 एकड़ खेती भी खरीद ली है।"
मैं उसके चेहरे से टपकती हुई उस सच्ची खुशी और गर्व को महसूस कर रहा था जो एक सफल पिता के चेहरे पर होती है।
उसने आगे कहा, "वकील साहब, उस दिन आपने मुझे जो कहा था कि 'कोर्ट-कचहरी के चक्कर में मत लगो, दिलदार बने रहो', वो बात मेरे दिल में उतर गई थी। गाँव में सब लोग मुझे भाई के खिलाफ भड़का रहे थे। उकसा रहे थे कि केस कर दो, उसे छोड़ो मत। पर मैंने उनकी नहीं, आपकी बात सुन ली। मैंने अपने उस पूरे गुस्से को, उस अपमान को पी लिया और उसे अपनी ताक़त बनाया।"
"मैंने उस छोटे भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी और अपनी मानसिक शांति बर्बाद नहीं होने दी। मैंने अपनी पूरी शक्ति अपने बच्चों को सही रास्ते पर लाने में लगा दी। और आज देखिए, भगवान ने मुझे सब कुछ दे दिया।"
क्षमा का चमत्कार और पश्चाताप की अग्नि
उसकी बात अभी खत्म नहीं हुई थी। उसने थैली से पेड़े का डिब्बा निकाला और मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला:
"और पता है वकील साहब, कल क्या हुआ? कल मेरा वो छोटा भाई मेरे घर आया था। उसकी हालत बहुत खराब थी। वह मेरे पैरों में गिर कर रोने लगा। उसने मेरे पाँव छुए और कहा—'मुझे माफ़ कर दे बड़े भाई, मैंने तेरे साथ बहुत बुरा किया। मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया है।' मैंने उसे गले लगा लिया और माफ़ कर दिया।"
मेरे हाथ में पकड़ा हुआ पेड़ा मेरे हाथ में ही रह गया। मैं अवाक रह गया। मेरे अपने आँसू टपक ही गए। एक ऐसा व्यक्ति जिसने जीवन भर केवल दिया था, आज भी उसने क्षमा ही दी थी।
निष्कर्ष: क्रोध का रूपांतरण
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जब हम किसी के द्वारा दिए गए धोखे या अपमान के कारण क्रोधित होते हैं, तो हमारा पहला विचार उसे बर्बाद करने का होता है। पर उस बर्बादी के खेल में हम स्वयं भी बर्बाद हो जाते हैं। कोर्ट-कचहरी, दुश्मनी और बदले की भावना इंसान को अंदर से खोखला कर देती है।
यदि इस 'गुस्से' और 'अपमान' को योग्य दिशा में मोड़ा जाए, यदि उस क्रोध की अग्नि का उपयोग स्वयं को और अपने परिवार को बेहतर बनाने में किया जाए, तो भविष्य में कभी पछताने की ज़रूरत नहीं पड़ती। क्षमा करने वाला हमेशा प्रतिशोध लेने वाले से बड़ा होता है। जिसने तुम्हें रुलाया है, उसे समय स्वयं उत्तर देता है। तुम्हारा काम केवल अपने कर्तव्य के पथ पर चलते रहना है।
यह विचार बहुत ही उत्तम है, पर कोई इसे गहराई से समझे और अपने जीवन में अमल करे, तभी उसका जीवन सफल हो सकता है... मन... 🙏

