भक्ति और वैराग्य का महासंगम: सूरदास का प्रेम और आदि शंकराचार्य का 'भज गोविन्दम्'
सनातन धर्म के आध्यात्मिक गगन में दो धाराएँ अत्यंत प्रमुख हैं— एक है 'भक्ति' (प्रेम और समर्पण का मार्ग), और दूसरी है 'ज्ञान' (विवेक और वैराग्य का मार्ग)। जहाँ भक्तशिरोमणि सूरदास जी का जीवन भगवान् के सगुण साकार रूप के प्रति अनन्य प्रेम और आत्मीयता का साक्षात् प्रमाण है, वहीं जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी का महाकाव्य 'भज गोविन्दम्' मनुष्य को संसार की नश्वरता का बोध कराकर उसे मोह-निद्रा से जगाने वाला अद्वैत ज्ञान का सिंहनाद है। आइए, इस विशेषांक में पहले संत सूरदास जी और भगवान् श्रीकृष्ण के अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग का दर्शन करें, और तत्पश्चात् आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित वैराग्य-शतक 'भज गोविन्दम्' के अमूल्य श्लोकों का अत्यंत सूक्ष्म एवं दार्शनिक विवेचन प्राप्त करें।
१. भक्त और भगवान की अलौकिक लीला: सूरदास और कन्हैया
एक बार भक्तशिरोमणि संत सूरदास जी को किसी ने अपने घर भजन-कीर्तन के लिए आमंत्रित किया। भजन कार्यक्रम अत्यंत आनंदपूर्वक संपन्न हुआ। परंतु कार्यक्रम के बाद, उस आयोजक व्यक्ति को सूरदास जी को उनके गंतव्य (घर) तक पहुँचाने का ध्यान ही नहीं रहा, और वह अन्य अतिथियों की सेवा-सत्कार में व्यस्त हो गया।
सूरदास जी तो जन्म से ही विरक्त और संत स्वभाव के थे। उन्होंने भी यजमान को कोई तकलीफ देना उचित नहीं समझा। वे खुद अपनी लाठी टेकते हुए, मुख से निरंतर "गोविंद–गोविंद" का मानसिक और वाचिक जप करते हुए, उस गहन अंधेरी रात में पैदल ही अपने घर की ओर निकल पड़े। सूरदास जी के नेत्रों में बाहरी दृष्टि नहीं थी, किन्तु उनके भीतर हरि-नाम का अखंड प्रकाश प्रज्वलित था।
कुएं का संकट और अदृश्य रक्षक
जिस कच्चे मार्ग से सूरदास जी जा रहे थे, रास्ते में एक गहरा कुआं पड़ता था। वे अपनी लाठी से रास्ता टटोलते–टटोलते और भगवान का नाम लेते हुए आगे बढ़ रहे थे। अचानक एक ऐसा क्षण आया कि उनके पाँव और उस अथाह कुएं के बीच मात्र कुछ इंच की दूरी रह गई थी; एक कदम और, और वे सीधे कुएं में गिर जाते। तभी..... उन्हें लगा कि किसी ने अत्यंत कोमलता से उनकी लाठी का दूसरा सिरा पकड़ लिया है!
सूरदास जी चौंके। उस एकांत और अंधकार में कौन हो सकता है? उन्होंने पूछा - "तुम कौन हो भाई?"
सामने से अत्यंत मधुर, बाल-सुलभ और मन को मोह लेने वाली ध्वनि में उत्तर मिला – "बाबा! मैं एक बालक हूँ। मैं भी आपका सुंदर भजन सुन कर लौट रहा था। मैंने देखा कि आप गलत रास्ते जा रहे हैं और आगे कुआं है, इसलिए मैं दौड़कर इधर आ गया। चलिये, लाठी का यह सिरा मुझे दीजिये, मैं आपको घर तक छोड़ दूँ...!"
भगवान की पहचान और प्रेम की लुकाछिपी
सूरदास जी उस स्वर को सुनकर भीतर तक रोमांचित हो उठे। ऐसा स्वर संसार के किसी साधारण बालक का नहीं हो सकता। उन्होंने स्नेह से पूछा- "तुम्हारा नाम क्या है बेटा?"
बालक ने चंचलता से कहा- "बाबा, अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।"
सूरदास जी हँसे- "तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ?"
"कोई भी नाम चलेगा बाबा...! जो आपको अच्छा लगे, उसी नाम से पुकार लो।"
सूरदास जी ने रास्ते में और भी कई रहस्यमयी सवाल पूछे। उनके हृदय के तारों ने झंकार कर बता दिया कि हो न हो, यह मेरा कन्हैया (श्यामसुंदर) ही है! वे समझ गए कि आज तीनों लोकों का नाथ, मेरा गोपाल खुद मेरी उंगली पकड़ने मेरे पास आया है। उनके मन में विचार आया— 'क्यों नहीं मैं इस लाठी के बहाने आगे बढ़कर साक्षात् अपने प्रभु का हाथ ही पकड़ लूँ?' यह सोचकर वे अपना हाथ उस लकड़ी पर धीरे-धीरे कृष्ण की ओर बढ़ाने लगे।
परंतु, भगवान श्रीकृष्ण तो अंतर्यामी हैं। वे अपने भक्त की यह चाल समझ गए। वे भला इतनी आसानी से कहाँ पकड़ में आने वाले थे! सूरदास जी का हाथ लाठी पर सरकता हुआ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था। जब बालक के हाथ और सूरदास के हाथ में केवल चार अंगुल का अंतर रह गया, तब लीलाधर श्रीकृष्ण झटके से लाठी को छोड़कर दूर चले गए।
हृदय का वह अमर घोष
जैसे ही श्रीकृष्ण ने लाठी छोड़ी, सूरदास जी विह्वल हो गए। उनकी बंद आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी। यह वियोग का नहीं, पूर्ण अधिकार और प्रेम का रुदन था। वे उसी ठौर खड़े होकर, ब्रह्मांड के स्वामी को चुनौती देते हुए बोले - "मैं तो जन्म का अंधा हूँ! ऐसे अंधे और असहाय की लाठी छोड़ कर भाग जाना, क्या यही तुम्हारी बहादुरी है कन्हैया?"
और उसी क्षण.. उनके श्रीमुख से वेदना, अधिकार और अगाध प्रेम से सना हुआ यह अमर स्वर निकल पड़ा:
हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय ।
हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।
हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।
भावार्थ एवं दार्शनिक रहस्य:
"हे प्रभु! मुझे शारीरिक रूप से अंधा और निर्बल जानकर मेरा हाथ छुड़ा कर जा रहे हो, यह तुम्हारी कोई बड़ी विजय नहीं है। पर यदि तुममें सचमुच सामर्थ्य है, तो मेरे हृदय के सिंहासन से निकलकर दिखाओ! जिस दिन तुम मेरे हृदय से निकल जाओगे, उस दिन मैं तुम्हें सच्चा मर्द (सबल) मानूँगा।"
यह कोई सामान्य वाक्य नहीं है; यह 'भक्ति की चरम पराकाष्ठा' (The Climax of Devotion) है। भक्त भगवान को शरीर से नहीं, भाव से बाँधता है। भगवान कृष्ण, जो बड़े-बड़े योगियों की तपस्या से भी नहीं मिलते, सूरदास की इस प्रेम-भरी झिड़की (डांट) को सुनकर द्रवीभूत हो गए। भगवान ने कहा, "बाबा! अगर मैं तुम जैसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं, तो फिर मेरा अस्तित्व ही क्या रहेगा? मैं कहाँ रहूँगा? मेरा तो निवास ही मेरे भक्तों का हृदय है!"
२. মোহमुद्गर (भज गोविन्दम्): आदि शंकराचार्य का वैराग्य-नाद
एक ओर जहाँ सूरदास जी का जीवन 'भगवान् को पा लेने' की कथा है, वहीं जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी का 'भज गोविन्दम्' (जिसे 'मोहमुद्गर' भी कहा जाता है) जीव को 'संसार के मोह को छोड़ने' की चेतावनी देता है।
कथा प्रसंग: एक बार आदि शंकराचार्य जी अपने शिष्यों के साथ काशी (वाराणसी) में भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति, जो मृत्यु के सन्निकट था, वह भगवान् का स्मरण करने के बजाय संस्कृत व्याकरण के एक कठिन सूत्र 'डुकृञ् करणे' को रटने में अपना समय व्यर्थ कर रहा था। उस वृद्ध की अज्ञानता और मृत्यु के समय भी सांसारिक विद्या के प्रति उसकी आसक्ति को देखकर आचार्य शंकर के हृदय से करुणावश जो ज्ञान और वैराग्य का निर्झर फूटा, वह 'भज गोविन्दम्' कहलाया।
आइए, इन अद्वितीय श्लोकों का उनके गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थों के साथ विस्तृत अध्ययन करें:
१. व्याकरण (सांसारिक ज्ञान) की निरर्थकता
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
संप्राप्ते सन्निहिते काले, नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥
संप्राप्ते सन्निहिते काले, नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
हे मूढ़ मते! (मोह से ग्रसित और अज्ञान में डूबी हुई बुद्धि वाले मनुष्य), गोविंद को भजो, गोविंद का स्मरण करो! क्योंकि जब मृत्यु का समय निकट आ जाएगा (संप्राप्ते सन्निहिते काले), तब यह व्याकरण का सूत्र (डुकृङ्करणे) या तुम्हारी कोई भी सांसारिक विद्या (डिग्रियां, पद, धन) तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएगी। मृत्यु के समय केवल परमात्मा का नाम और तुम्हारा आत्मबल ही काम आएगा। इसलिए समय रहते उस परम तत्त्व को जान लो।
२. धन का लोभ और कर्मयोग
मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्, वित्तं तेन विनोदय चित्तं ॥
यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्, वित्तं तेन विनोदय चित्तं ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
हे मूर्ख प्राणी! धन एकत्रित करने की अंधी तृष्णा (प्यास) का तत्काल त्याग कर दे। अपने मन को वासनाओं और कामनाओं से रहित (वितृष्ण) कर और सद्बुद्धि धारण कर। अपने स्वयं के ईमानदार परिश्रम (निजकर्मोपात्तम्) से तुझे जो भी धन या फल प्राप्त हो जाए, उसी से अपने चित्त को प्रसन्न (विनोदय) रख। यह श्लोक मनुष्य को संतोष का महान पाठ पढ़ाता है। तृष्णा कभी नहीं बुझती; जो मिला है, उसी में भगवान् का प्रसाद मानकर आनंदित रहना ही वास्तविक सुख है।
३. शारीरिक आकर्षण (काम-वासना) की वास्तविकता
नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम् ।
एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥
एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
स्त्री (या पुरुष) के अंगों के सौंदर्य को देखकर मोहावेश (आसक्ति/काम-वासना) में मत फँसो। अपने मन में बार-बार इस सत्य का विचार करो (मनसि विचिन्तय वारं वारम्) कि यह शरीर ऊपर से कितना भी सुंदर क्यों न दिखे, भीतर से यह केवल मांस, वसा (चर्बी), रक्त और अस्थियों का ही एक विकार (रूपांतरण) है। सौंदर्य देह में नहीं, आत्मा में है। जब मनुष्य देह की नश्वरता और मलिनता को समझ लेता है, तो उसकी काम-वासना स्वतः ही वैराग्य में बदल जाती है।
४. जीवन की क्षणभंगुरता (कमल-पत्र का दृष्टांत)
नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
जिस प्रकार कमल के पत्ते (नलिनी-दल) पर पड़ी हुई पानी की बूँद अत्यंत अस्थिर और चंचल (तरल) होती है— हवा के एक हलके से झोंके से गिर जाती है— ठीक उसी प्रकार यह मानव जीवन भी अत्यंत चंचल और क्षणभंगुर है। यह जान लो कि यह सम्पूर्ण संसार व्याधि (बीमारियों), अभिमान (अहंकार) और शोक (दुःख) से ग्रस्त है। इस नश्वर संसार में स्थायी सुख ढूँढना रेगिस्तान में जल ढूँढने के समान है।
५. परिवार और धन का खोखला संबंध
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः ।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
शंकराचार्य जी समाज की सबसे कड़वी सच्चाई को उजागर करते हैं। जब तक मनुष्य धन कमाने में समर्थ है (यावद्वित्तोपार्जनसक्त:), तब तक ही उसके परिवार के लोग (स्त्री, पुत्र, सगे-संबंधी) उसके प्रति स्नेह (रक्तः) प्रदर्शित करते हैं। परन्तु, जब बुढ़ापे में उसका शरीर जर्जर (रोगी और अक्षम) हो जाता है, तब उसी के अपने घर (गेहे) में कोई उससे सामान्य बातचीत (वार्तां) तक करना पसंद नहीं करता। यह श्लोक बताता है कि संसार के सारे रिश्ते स्वार्थ और उपयोगिता पर टिके हैं; केवल भगवान् ही निस्वार्थ बंधु हैं।
६. मृत्यु का सत्य: प्राण छूटते ही परायापन
यावत्पवनो निवसति देहे, तावत् पृच्छति कुशलं गेहे ।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
जब तक इस शरीर में प्राण-वायु (पवन) का निवास है, तब तक ही घर के लोग आकर आपका कुशल-मंगल पूछते हैं। परन्तु, प्राण-वायु के शरीर से निकलते ही (देहापाये), जिस देह से लोग प्रेम करते थे, उसी मृत शरीर (काये) से स्वयं उसकी पत्नी (भार्या) और बच्चे भी डरने लगते हैं और कहते हैं कि इसे जल्दी बाहर निकालो। जिस देह का इतना तिरस्कार होना है, उस पर अहंकार कैसा?
७. आयु का व्यर्थ बीतना
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः ।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
व्यक्ति बाल्यावस्था में खेल-कूद में आसक्त (क्रीडासक्तः) होकर समय नष्ट कर देता है। युवावस्था आती है, तो वह स्त्रियों और भोग-विलास (तरुणीसक्तः) में फँस जाता है। जब वृद्धावस्था आती है, तो वह अपनी बीमारियों और परिवार की चिंताओं (चिन्तासक्तः) से घिर जाता है। इस प्रकार पूरा जीवन व्यर्थ बीत जाता है, लेकिन परब्रह्म परमात्मा (परे ब्रह्मणि) में किसी की कोई आसक्ति या रुचि नहीं होती। मनुष्य हर चीज़ के लिए समय निकालता है, केवल उस ईश्वर के लिए नहीं जिसने यह जीवन दिया है।
८. आत्म-अन्वेषण (Self-Inquiry): मैं कौन हूँ?
का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः ।
कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥
कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
कौन तुम्हारी पत्नी है, और कौन तुम्हारा पुत्र है? यह संसार का चक्र और इसके रिश्ते अत्यंत विचित्र हैं (जो आज पत्नी है, पूर्व जन्म में वह कौन थी? मृत्यु के बाद कौन होगी?)। हे भाई (भ्रातः)! तुम स्वयं कौन हो? तुम कहाँ से आये हो (कुत अयातः)? और तुम किसके हो? इस मूल तत्त्व पर विचार (चिन्तय) करो। यह श्लोक वेदांत के सबसे बड़े प्रश्न 'कोऽहम्?' (मैं कौन हूँ?) की ओर इशारा करता है। शरीर रिश्ते बनाता है, आत्मा का परमात्मा के सिवा कोई रिश्तेदार नहीं है।
९. सत्संग से मोक्ष तक की सीढ़ी (The Ladder of Liberation)
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
यह श्लोक अद्वैत वेदांत का पूरा मार्ग एक सूत्र में पिरो देता है। जब व्यक्ति को सत्संग (अच्छे संतों का संग) प्राप्त होता है, तो उसके भीतर संसार के प्रति निस्संगत्व (अनासक्ति/वैराग्य) आता है। जब वैराग्य आता है, तो मन से निर्मोहत्व (मोह और भ्रम की समाप्ति) हो जाता है। मोह नष्ट होने पर निश्चलतत्त्व (स्थिर तत्त्वज्ञान/ब्रह्मज्ञान) की प्राप्ति होती है। और जब तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब व्यक्ति इसी शरीर में रहते हुए जीवन्मुक्ति (जन्म-मरण के चक्र से स्थायी मुक्ति) को प्राप्त कर लेता है।
१०. समय बीतने पर पश्चाताप
वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः ।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥
क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
आयु बीत जाने (वृद्ध होने) के बाद काम-वासना का क्या अर्थ है? (जब शरीर में सामर्थ्य ही नहीं)। पानी सूख जाने पर उस गड्ढे को तालाब (कासारः) कौन कहेगा? धन नष्ट हो जाने पर परिवार और रिश्तेदार कहाँ रहते हैं? ठीक उसी प्रकार, जब ब्रह्म-तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, तब इस संसार रूपी प्रपंच (जन्म-मरण के चक्र) का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। अज्ञान ही संसार का जनक है; ज्ञान आते ही संसार विलीन हो जाता है।
११. काल (समय) की सर्वभक्षी शक्ति
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं ।
मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा ॥
मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
हे जीव! अपने धन, अपने जन (मित्र, परिवार, समर्थक) और अपने यौवन (जवानी) पर कभी गर्व (अहंकार) मत कर। क्योंकि महाकाल (Time) इन सबको पलक झपकते ही (निमेषात्) हर लेता है, नष्ट कर देता है। इस संपूर्ण चराचर जगत को माया से घिरा हुआ (मायामयम्) और नश्वर जानकर, तुम इसे मन से त्याग दो (हित्वा) और उस शाश्वत परमब्रह्म के पद में प्रवेश करो (उसे जान लो)।
१२. ऋतुओं का चक्र और इच्छाओं की अमरता
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः,शिशिरवसन्तौ पुनरायातः ।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः, तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः, तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
दिन और रात (दिनयामिन्यौ), शाम और सुबह, सर्दी (शिशिर) और बसंत ऋतुएँ बार-बार आती और जाती रहती हैं। महाकाल इस प्रकार निरंतर हमारे जीवन के साथ क्रीडा (खेल) कर रहा है, और हमारी आयु धीरे-धीरे गलती (नष्ट होती) जा रही है। मनुष्य मौत के करीब जा रहा है, यह जानते हुए भी, उसके भीतर की 'आशा-रूपी वायु' (इच्छाओं का तूफ़ान) कभी उसे नहीं छोड़ती। बाल सफेद हो जाते हैं, पर वासना कभी बूढ़ी नहीं होती।
१३. चिंताओं का त्याग और सत्संग की नौका
काते कान्ता धन गतचिन्ता, वातुल किं तव नास्ति नियन्ता ।
त्रिजगति सज्जनसंगतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका ॥
त्रिजगति सज्जनसंगतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
हे मूर्ख (वातुल)! तुम्हें अपनी पत्नी और अपने धन की इतनी चिंता क्यों सता रही है? क्या तुम्हारा कोई नियन्ता (ईश्वर) नहीं है? जिसने तुम्हें जन्म दिया है, क्या वह तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का पालन नहीं करेगा? इस चिंता को छोड़ो और जान लो कि तीनों लोकों (त्रिजगति) में केवल सज्जनों (संतों) की संगति ही एकमात्र ऐसी नौका है जो तुम्हें इस भयंकर भवसागर (संसार के जन्म-मरण के चक्र) से पार लगा सकती है।
१४. धर्म के नाम पर पाखंड (बाह्य वेशभूषा)
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः ।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
आदि शंकराचार्य जी धर्म के नाम पर चलने वाले पाखंड पर कठोर प्रहार करते हुए कहते हैं: बड़ी-बड़ी जटाएं धारण करना (जटिलो), सिर मुंडा लेना (मुण्डी), बालों को नोंच लेना (लुञ्छितकेशः), और भांति-भांति के काषाय (भगवा) वस्त्र धारण करना (बहुकृतवेषः)— अरे मोहित मनुष्य! तुम इसे देखकर भी क्यों नहीं देख पाते हो? ज्ञान और वैराग्य के बिना, यह सारे वेश और आडंबर केवल 'उदरनिमित्तं' (अपना पेट भरने के लिए) ही बनाए गए हैं। वास्तविक संन्यास वस्त्रों का नहीं, मन के विकारों का होता है।
१५. उपसंहार (द्वादशमंजरिका)
द्वादशमंजरिकाभिरशेषः, कथितो वैयाकरणस्यैषः ।
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः ॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
संप्राप्ते सन्निहिते काले, नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः ॥
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दं भज मूढ़मते ।
संप्राप्ते सन्निहिते काले, नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥
भावार्थ:
बारह श्लोकों (गीतों) की यह मंजरी (पुष्पहार), सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री आदि शंकराचार्य जी द्वारा उस वैयाकरण (व्याकरण रटने वाले वृद्ध) के माध्यम से समस्त मानवता को एक उपदेश के रूप में प्रदान की गई। अंत में पुनः वही चेतावनी है— हे मूढ़ मते! केवल गोविंद का भजन कर, क्योंकि अंत समय में तुम्हारी सांसारिक विद्या तुम्हारी कोई रक्षा नहीं कर पाएगी।
निष्कर्ष: ज्ञान और भक्ति की पूर्णता
जब हम सूरदास जी के प्रेम और आदि शंकराचार्य जी के ज्ञान को एक साथ देखते हैं, तो पाते हैं कि दोनों का लक्ष्य एक ही है— जीव को अहंकार (मैं और मेरा) के बंधन से मुक्त कर परमात्मा से जोड़ना। सूरदास जी का "हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय" यह अगाध विश्वास है कि ईश्वर एक बार पकड़ में आ जाए, तो संसार स्वतः छूट जाता है। और शंकराचार्य जी का "भज गोविन्दम्" यह बताता है कि संसार की नश्वरता को समझकर ही जीव शुद्ध मन से 'गोविंद' के चरणों में प्रीति कर सकता है। ज्ञान के बिना भक्ति अंधी हो सकती है, और भक्ति के बिना ज्ञान शुष्क हो सकता है। इसलिए, वैराग्य के पंखों पर बैठकर, हरि-भक्ति के आकाश में उड़ना ही मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

