श्रावण सोमवार व्रत विधि विशेषांक: संकल्प, षोडशोपचार पूजा, कथा एवं शास्त्रीय नियम
सनातन धर्म में व्रतों का असीम माहात्म्य है, परंतु देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए 'श्रावण सोमवार व्रत' को सर्वोत्तम और अमोघ माना गया है। शिव महापुराण के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान चंद्र (सोम) और शिव (सोमेश्वर) को समर्पित है। श्रावण मास में जो भक्त निष्काम या सकाम भाव से सोमवार का व्रत रखते हैं, उनके जीवन से अकाल मृत्यु, दरिद्रता, गृह-क्लेश और असाध्य रोगों का नाश हो जाता है। सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत कल्पवृक्ष के समान है। आइए, स्कन्द पुराण और शिव पुराण के प्रामाणिक मन्त्रों और षोडशोपचार पूजा विधि (१६ चरणों की पूजा) के साथ श्रावण सोमवार व्रत का पूर्ण विधान जानें।
१. व्रत का स्वरूप और संकल्प विधि
श्रावण सोमवार व्रत प्रातःकाल सूर्योदय से प्रारंभ होकर प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) की पूजा के पश्चात पारण (व्रत खोलने) तक चलता है। व्रत का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण 'संकल्प' है, क्योंकि संकल्प के बिना किया गया व्रत दिशाहीन माना जाता है।
प्रातःकालीन स्नान एवं संकल्प:
सोमवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) में उठकर घर की साफ-सफाई करें। स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल और काले तिल मिलाएं। स्नान करते समय तीर्थों का आवाहन करें:
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
स्नान के पश्चात श्वेत (सफेद) या हल्के रंग के शुद्ध वस्त्र धारण करें। काले या नीले वस्त्र शिव पूजा में वर्जित हैं। इसके पश्चात अपने घर के मंदिर या शिवालय में जाकर, दाएँ हाथ में जल, अक्षत (साबुत चावल), पुष्प, और कुछ द्रव्य (सिक्का) लेकर भगवान शिव के समक्ष इस प्रामाणिक मन्त्र से संकल्प लें:
"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य... (अपना नाम, गोत्र, मास और तिथि बोलें)...
मम आत्मनः श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फल-प्राप्त्यर्थं,
मम क्षेम-स्थैर्य-आयुर्-आरोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्ध्यर्थं,
सकल-मनोकामना-सिद्धये श्री साम्बसदाशिव-प्रीत्यर्थं
श्रावण-सोमवार-व्रतम् अहम् करिष्ये।"
मम आत्मनः श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-फल-प्राप्त्यर्थं,
मम क्षेम-स्थैर्य-आयुर्-आरोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्ध्यर्थं,
सकल-मनोकामना-सिद्धये श्री साम्बसदाशिव-प्रीत्यर्थं
श्रावण-सोमवार-व्रतम् अहम् करिष्ये।"
संकल्प लेने के बाद उस जल को पृथ्वी पर या किसी पात्र में छोड़ दें।
२. पूजन सामग्री (Shiva Puja Samagri)
भगवान शिव अत्यंत भोले हैं, वे केवल भाव के भूखे हैं। फिर भी, शास्त्रीय विधि से पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री एकत्रित कर लें:
- शुद्ध जल, गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर (पंचामृत)।
- बिल्वपत्र (बेलपत्र) 11, 21 या 108 की संख्या में (कटे-फटे न हों)।
- सफेद पुष्प, मदार (आक) के फूल, धतूरा, और भांग।
- भस्म (विभूति), सफेद चंदन (अष्टगंध), रोली, और अक्षत (चावल)।
- जनेऊ (यज्ञोपवीत), वस्त्र (कलावा), इत्र, और धूप-दीप।
- नैवेद्य (भोग) के लिए मौसमी फल, मिष्ठान्न या शक्कर।
- माता पार्वती के लिए सुहाग सामग्री (सिंदूर, चुनरी, चूड़ियाँ आदि)।
३. षोडशोपचार पूजा विधि (16 चरणों की प्रामाणिक पूजा)
सोमवार की पूजा में शिवलिंग का षोडशोपचार (१६ उपचारों से) पूजन किया जाता है। यदि मन्त्र पढ़ना कठिन लगे, तो केवल "ॐ नमः शिवाय" का मानसिक जाप करते हुए ये सामग्रियां अर्पित करें:
- आवाहन व ध्यान: दोनों हाथ जोड़कर शिवजी का ध्यान करें - "ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं..."
- आसन: शिवजी को आसन (पुष्प) अर्पित करें। "ॐ नमः शिवाय आसनार्थे पुष्पं समर्पयामि।"
- पाद्यम्: भगवान के चरणों में जल अर्पित करें।
- अर्घ्यम्: हाथों को धोने के लिए जल अर्पित करें।
- आचमनीयम्: आचमन के लिए जल चढ़ाएं।
- स्नान (रुद्राभिषेक): पहले शुद्ध जल से, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से शिवलिंग का अभिषेक करें। तदुपरान्त पुनः शुद्ध जल और गंगाजल से स्नान कराएं।
- वस्त्र (कलावा): वस्त्र के रूप में कलावा (मौली) अर्पित करें।
- यज्ञोपवीत (जनेऊ): शिवलिंग पर जनेऊ अर्पित करें। "ॐ नमः शिवाय यज्ञोपवीतं समर्पयामि।"
- चन्दन / भस्म: त्रिपुंड के रूप में सफेद चंदन और भस्म लगाएं। (ध्यान रहे, शिवलिंग पर हल्दी या कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता)।
- अक्षत: अखंडित (बिना टूटे) चावल अर्पित करें।
- पुष्प एवं बिल्वपत्र (अत्यंत महत्वपूर्ण): बिल्वपत्र के तीनों पत्तों पर चंदन से 'ॐ' लिखकर, शिवलिंग पर उल्टा (चिकना भाग नीचे) करके चढ़ाएं। मन्त्र- "त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुधम्। त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥" इसके साथ धतूरा और आक के फूल चढ़ाएं।
- धूप: सुगन्धित धूप दिखाएं।
- दीप: गाय के घी का दीपक जलाएं।
- नैवेद्य (भोग): फल, मिठाई या पंचमेवा का भोग लगाएं। "ॐ नमः शिवाय नैवेद्यं निवेदयामि।"
- तांबूल (पान): पान का पत्ता, लौंग और सुपारी अर्पित करें।
- आरती एवं प्रदक्षिणा: कपूर से भगवान शिव की आरती करें। शिवजी की आधी परिक्रमा (प्रदक्षिणा) की जाती है (जहाँ से जल गिरता है, उस निर्मली को लांघा नहीं जाता)।
विशेषांक नियम: शिवलिंग की पूजा के साथ-साथ शिव परिवार (माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय जी और नंदी) की पूजा अनिवार्य है। गौरी-शंकर की संयुक्त पूजा से ही व्रत पूर्ण होता है।
४. श्रावण सोमवार व्रत कथा (Vrat Katha)
व्रत के दिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में पुनः स्नान करके अथवा हाथ-मुंह धोकर शिवजी के समक्ष दीपक जलाएं और इस पावन व्रत कथा का श्रवण/पठन करें:
"प्राचीन काल में एक अत्यंत धनी साहूकार था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, परंतु वह निसंतान था, जिसके कारण वह बहुत दुखी रहता था। संतान प्राप्ति की इच्छा से वह साहूकार प्रतिदिन शिव मंदिर जाकर पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करता था। उसकी असीम भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती ने शिवजी से आग्रह किया, 'हे नाथ! यह साहूकार आपका परम भक्त है, कृपया इसके दुःख को दूर करें।'
भगवान शिव ने कहा, 'पार्वती! इस साहूकार के भाग्य में संतान का योग नहीं है। फिर भी, तुम्हारे आग्रह पर मैं इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूँ, परंतु उस पुत्र की आयु केवल १२ वर्ष की होगी।' शिवजी के वरदान से साहूकार के घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। साहूकार ने यह रहस्य किसी को नहीं बताया।
जब बालक ११ वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे विद्याध्ययन के लिए उसके मामा के साथ काशी भेज दिया। साहूकार ने मामा को आदेश दिया कि रास्ते में जहाँ भी रुकें, ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यज्ञ करते हुए जाएं। रास्ते में एक नगर पड़ा जहाँ एक राजकुमारी का विवाह हो रहा था, परंतु राजकुमार काना (एक आंख से अंधा) था। राजकुमार के पिता ने साहूकार के सुंदर पुत्र को देखकर उसे दूल्हे के कपड़े पहनाकर राजकुमारी से विवाह संपन्न करा दिया। विवाह के बाद साहूकार के पुत्र ने राजकुमारी की चुन्नी पर लिख दिया कि 'तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, परंतु तुम जिसके साथ विदा की जाओगी वह काना है।'
इसके बाद वह काशी चला गया। जब बालक १२ वर्ष का हुआ, तब एक दिन यज्ञ चल रहा था। बालक ने मामा से कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है। वह कमरे में जाकर सो गया और वहीं शिवजी के वरदान अनुसार उसके प्राण निकल गए। मामा ने विलाप किया। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती उधर से गुजर रहे थे। पार्वती जी के करुण आग्रह पर शिवजी ने उस बालक को पुनः जीवित कर दिया।
विद्या पूरी करके जब वे वापस लौट रहे थे, तो उसी नगर में पहुंचे जहाँ उसका विवाह हुआ था। राजकुमारी के पिता ने उसे पहचान लिया और अपनी पुत्री को अपार धन-संपत्ति के साथ विदा किया। साहूकार यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। रात को शिवजी ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा— 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे श्रावण सोमवार व्रत और श्रद्धा से प्रसन्न होकर ही तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।'
जो भी भक्त इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके जीवन से सभी व्याधियां और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और महादेव उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।"
भगवान शिव ने कहा, 'पार्वती! इस साहूकार के भाग्य में संतान का योग नहीं है। फिर भी, तुम्हारे आग्रह पर मैं इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान देता हूँ, परंतु उस पुत्र की आयु केवल १२ वर्ष की होगी।' शिवजी के वरदान से साहूकार के घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। साहूकार ने यह रहस्य किसी को नहीं बताया।
जब बालक ११ वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे विद्याध्ययन के लिए उसके मामा के साथ काशी भेज दिया। साहूकार ने मामा को आदेश दिया कि रास्ते में जहाँ भी रुकें, ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यज्ञ करते हुए जाएं। रास्ते में एक नगर पड़ा जहाँ एक राजकुमारी का विवाह हो रहा था, परंतु राजकुमार काना (एक आंख से अंधा) था। राजकुमार के पिता ने साहूकार के सुंदर पुत्र को देखकर उसे दूल्हे के कपड़े पहनाकर राजकुमारी से विवाह संपन्न करा दिया। विवाह के बाद साहूकार के पुत्र ने राजकुमारी की चुन्नी पर लिख दिया कि 'तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है, परंतु तुम जिसके साथ विदा की जाओगी वह काना है।'
इसके बाद वह काशी चला गया। जब बालक १२ वर्ष का हुआ, तब एक दिन यज्ञ चल रहा था। बालक ने मामा से कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है। वह कमरे में जाकर सो गया और वहीं शिवजी के वरदान अनुसार उसके प्राण निकल गए। मामा ने विलाप किया। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती उधर से गुजर रहे थे। पार्वती जी के करुण आग्रह पर शिवजी ने उस बालक को पुनः जीवित कर दिया।
विद्या पूरी करके जब वे वापस लौट रहे थे, तो उसी नगर में पहुंचे जहाँ उसका विवाह हुआ था। राजकुमारी के पिता ने उसे पहचान लिया और अपनी पुत्री को अपार धन-संपत्ति के साथ विदा किया। साहूकार यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। रात को शिवजी ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा— 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे श्रावण सोमवार व्रत और श्रद्धा से प्रसन्न होकर ही तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।'
जो भी भक्त इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसके जीवन से सभी व्याधियां और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और महादेव उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।"
५. व्रत के नियम, आहार और क्षमा प्रार्थना
क्या खाएं और क्या न खाएं (Vrat Niyam):
श्रावण सोमवार के व्रत में 'एक भुक्त' (दिन में एक बार भोजन) या 'फलाहार' का विधान है।
- दिनभर जलाहार या फलाहार (फल, दूध, जूस) पर रहें।
- संध्याकाल की पूजा और आरती के पश्चात सात्विक भोजन ग्रहण करें। भोजन में नमक (विशेषकर साधारण समुद्री नमक) का प्रयोग वर्जित है। यदि आवश्यक हो तो सेंधा नमक ले सकते हैं।
- कुछ लोग मीठा व्रत रखते हैं (जैसे खीर, हलवा या साबूदाना की मीठी खिचड़ी)।
- ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें। दिन के समय शयन न करें (दिन में सोना वर्जित है)। क्रोध, निंदा और असत्य भाषण से बचें।
क्षमा प्रार्थना (Kshama Prarthana):
पूजा के अंत में भगवान शिव से अपनी भूल-चूक के लिए अवश्य क्षमा मांगें:
आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महेश्वर।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
भावार्थ: हे परमेश्वर! मैं न तो आपको बुलाना (आवाहन) जानता हूँ, न ही आपकी पूजा का विधान जानता हूँ। मेरी पूजा में जो भी मन्त्र, क्रिया या भक्ति की कमी रह गई हो, हे महादेव! उसे पूर्ण करें और मुझे क्षमा करें।
६. उद्यापन विधि (Udyapan)
श्रावण मास के अंतिम (चौथे या पांचवें) सोमवार को व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दिन विशेष रुद्राभिषेक करें, शिव-पार्वती का पंचामृत से स्नान कराएं। पूजा के पश्चात किसी ब्राह्मण दंपत्ति को वस्त्र, फल, मिष्ठान्न और दक्षिणा देकर भोजन कराएं और उनका आशीर्वाद लें। इसके पश्चात ही स्वयं पारण करें।
॥ ॐ साम्बसदाशिवाय नमः ॥
॥ हर हर महादेव ॥
॥ हर हर महादेव ॥

