सच्चे संत की पहचान: 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' और आचरण का महत्व
सनातन धर्म में धर्म का सार केवल वाणी या उपदेशों में नहीं, अपितु जीवन के आचरण में प्रकट होना चाहिए। उपदेश देना अपेक्षाकृत सरल है, परन्तु उसी उपदेश को अपने आचरण में उतारना ही वास्तविक साधना है। आज के युग में जहाँ पाखंड और वाक्चातुर्य को ही ज्ञान मान लिया गया है, वहाँ गोस्वामी तुलसीदास, संत कबीर और श्रीमद्भागवत के वचन हमें आत्मनिरीक्षण का सच्चा दर्पण दिखाते हैं। आइए जानें कि एक सच्चे संत, ज्ञानी और कथावाचक के वास्तविक लक्षण क्या हैं और धर्म की प्रतिष्ठा कैसे होती है।
१. सच्चे संत का स्वरूप: षट विकार से मुक्ति
गोस्वामी तुलसीदास जी संत-स्वरूप की दिव्य पहचान कराते हुए कहते हैं:
षट विकार जित अनघ अकामा ।
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥
भावार्थ:
संत केवल भगवा वस्त्र धारण करने वाला या शास्त्रों का ज्ञाता नहीं होता, बल्कि वह अपने अंतःकरण को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य (ईर्ष्या) जैसे षड्विकारों से निर्मल कर चुका होता है। उसका जीवन निष्काम, निष्पाप, अपरिग्रही (अकिंचन), अचल और आत्मानन्द से परिपूर्ण होता है। वह बाह्य ऐश्वर्य का नहीं, अपितु ब्रह्मानन्द का अधिकारी होता है, और उसका सम्पूर्ण जीवन शान्ति, करुणा तथा लोकमंगल का आश्रय बन जाता है।
२. 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे': कथनी और करनी का अंतर
यही वह स्थान है जहाँ प्रत्येक साधक को आत्मचिन्तन करना चाहिए। तुलसीदास जी ने अत्यन्त मार्मिक शब्दों में समाज की वास्तविकता को उद्घाटित किया है:
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥
जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥
अर्थात् संसार में नीति, धर्म और सदाचार का दूसरों को उपदेश देने वाले असंख्य लोग मिल जाएंगे, किन्तु उन आदर्शों को स्वयं जीने वाले महापुरुष अत्यन्त दुर्लभ हैं। यह वचन किसी की आलोचना नहीं, अपितु आत्मनिरीक्षण का दर्पण है। यदि शास्त्रों का प्रकाश हमारे व्यवहार को प्रकाशित न करे, तो वह केवल शब्दों का संग्रह बनकर रह जाता है। धर्म की प्रतिष्ठा वाक्चातुर्य से नहीं, चरित्र की पवित्रता से होती है।
संत कबीरदास जी भी इसी सत्य को अत्यन्त सरल शब्दों में कहते हैं:
कथनी मीठी खाँड सी, करनी विष की लोय ।
कथनी तज करनी करे, विष से अमृत होय ॥
कथनी तज करनी करे, विष से अमृत होय ॥
मधुर वचन तभी सार्थक हैं जब उनके पीछे सत्यनिष्ठ जीवन खड़ा हो। अन्यथा शब्दों की मिठास भी निष्प्राण हो जाती है। आचरण ही वह तप है जो वाणी को प्रामाणिकता प्रदान करता है।
३. पाखंड का आवरण और सद्ग्रंथों का लुप्त होना
तुलसीदास जी वर्षा ऋतु के प्रसंग में समाज में व्याप्त पाखंड पर गहरा प्रहार करते हैं:
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ॥
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ॥
भावार्थ:
जब कोई मार्ग लंबे समय तक उपयोग में नहीं आता, तब उस पर हरी घास उग जाती है। बाहर से भूमि सुंदर दिखाई देती है, किन्तु वास्तविक पथ (रास्ता) छिप जाता है और पथिक भ्रमित हो जाता है। इसी प्रकार जब समाज में पाखंड, मिथ्या तर्क, दंभ और प्रदर्शन प्रधान हो जाते हैं, तब सद्ग्रंथ गुप्त हो जाते हैं। 'गुप्त होहिं' का अर्थ यह नहीं कि ग्रंथ नष्ट हो जाते हैं, बल्कि उनका यथार्थ आध्यात्मिक रहस्य और लोकमंगलकारी संदेश पाखंड की परतों के नीचे छिप जाता है। लोग शब्दों में उलझ जाते हैं, पर तत्त्व को नहीं पहचान पाते।
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा ।
पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई ।
ता कहुँ संत कहइ सब कोई ॥
पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई ।
ता कहुँ संत कहइ सब कोई ॥
कलियुग में ऐसे लोग भी होंगे जो शास्त्रों का वास्तविक ज्ञान नहीं रखते, लोभी और विषयासक्त होंगे, फिर भी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करेंगे। मिथ्या आडंबर रचने वालों को ही अज्ञानी समाज 'संत' मान बैठेगा।
४. सच्चे ज्ञानी और कथावाचक (वक्ता) के शास्त्रीय लक्षण
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान का वास्तविक प्रमाण बताते हुए कहते हैं:
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।।
ज्ञान का प्रमाण वाणी नहीं, बल्कि चरित्र है। विद्वता नहीं, बल्कि विनम्रता (अमानित्व) है; बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता (अदम्भित्व) है।
श्रीमद्भागवत के वक्ता के लक्षण:
पद्म पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि कथा की व्यासपीठ पर किसे बैठना चाहिए:
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत् ।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिस्पृहः ॥
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽतिनिस्पृहः ॥
जो विरक्त, वैष्णव, विप्र, वेद एवं शास्त्रों का शुद्ध ज्ञान रखने वाला, दृष्टान्त देकर जटिल विषयों को सरलता से समझाने में कुशल, धैर्यवान तथा धन, यश और अन्य सांसारिक लोभों से सर्वथा निस्पृह (मोह-रहित) हो, उसी को श्रीमद्भागवत का वक्ता बनाना चाहिए। केवल वाक्पटुता (गाल बजाना) या बाह्य प्रदर्शन किसी को संत या पंडित नहीं बना सकते।
शास्त्रों का उपयोग किसके हाथ में सार्थक है?
यावद् विप्रगतं शास्त्रं शास्त्रत्वं तावदेव हि ।
विप्रेतरगतं शास्त्रमशास्त्रत्वं विदुर्बुधाः ॥
विप्रेतरगतं शास्त्रमशास्त्रत्वं विदुर्बुधाः ॥
जब तक शास्त्र धर्मनिष्ठ, आचारवान और योग्य आचार्य के हाथों में रहता है, तब तक वह अपने वास्तविक कल्याणकारी स्वरूप को बनाए रखता है। परन्तु जब वही शास्त्र ऐसे व्यक्ति के हाथ में चला जाता है जो उसके तत्त्व और मर्यादा को नहीं समझता, तब ज्ञानीजन उसे अशास्त्र (विकृत) ही मानते हैं।
५. आचरण की महत्ता और विषयों से पतन
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इस सिद्धान्त को स्थापित करते हैं: "यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।" (श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, समाज उसी का अनुसरण करता है।) अतः संत, गुरु, आचार्य और प्रत्येक सज्जन का प्रथम दायित्व अपने जीवन को आदर्श बनाना है।
संत सोपानदेव अपने अभंग में कहते हैं: "दुरोनी पातका दिसती मनोहर, उठावले भार वैष्णवांचे।" दूर से विषय-वासनाएँ आकर्षक प्रतीत होती हैं, परन्तु उनका परिणाम बन्धन है। सच्चे संत अपने जीवन का भार स्वयं उठाकर संसार के दुःखों को हल्का करते हैं।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
विषयों का निरन्तर चिन्तन आसक्ति उत्पन्न करता है, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध और अन्ततः विवेक का नाश होकर जीव पतन की ओर अग्रसर होता है। इसके विपरीत, जो यती (संन्यासी) "कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्" होते हैं, वे जीवन में ही ब्रह्मानन्द का अनुभव करते हैं।
६. सत्संग और परोपकार: धर्म का प्राण
श्रीमद्भागवत महापुराण सत्संग को समस्त आध्यात्मिक उन्नति का मूल मानता है:
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
संतों का संग हृदय और कानों के लिए रसायन (अमृत) है। उसी से श्रद्धा उत्पन्न होती है, श्रद्धा से अनुराग, अनुराग से रति और अंततः भगवान की परा-भक्ति प्राप्त होती है। गोस्वामी जी भी कहते हैं— "बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥"
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥
परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥
सनातन धर्म में परोपकार को धर्म का प्राण कहा गया है। जैसे वृक्ष फल देते हैं, नदियाँ जल देती हैं, और गौ माता दूध देती हैं, वैसे ही सच्चा संत अथवा सज्जन अपने ज्ञान, धन और जीवन को ईश्वर की धरोहर मानकर लोकमंगल में अर्पित करता है। उसके लिए संपत्ति 'संग्रह' का नहीं, 'सेवा' का साधन होती है। "संत बिटप सरिता गिरि धरनी। परहित हेतु सबन्ह कै करनी॥"
निष्कर्ष एवं प्रार्थना
अतः हमें किसी के दोषों का निर्णय करने से पहले स्वयं अपने अंतःकरण का परीक्षण करना चाहिए। प्रश्न यह नहीं कि कौन कितना उपदेश देता है, प्रश्न यह है कि हम स्वयं अपने जीवन में कितना धर्म, कितना सत्य, कितनी करुणा और कितना भगवान का स्मरण उतार पाए हैं।
कबीरदास जी कहते हैं— "साधु संगति कीजिए, हरि रस बरसे नित्य। लोहे को पारस मिले, मिटे जन्म की वृत्ति॥" जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार सच्चे संतों के सान्निध्य से मनुष्य का जीवन दिव्यता से आलोकित हो जाता है। उनका जीवन ही उपदेश है, और उनका आचरण ही धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण है।
अंत में भगवान के श्रीचरणों में वंदना करते हुए:
नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥
प्रार्थना:
"जिन परम भगवान के नाम का संकीर्तन समस्त पापों का नाश करने वाला है, और जिनको किया गया प्रणाम समस्त दुःखों का शमन कर देता है, उन परम हरि को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।"

