पञ्चमः पाठः - दानवीरः कर्णः
पाठ परिचय: यह प्रसंग महाकवि भास द्वारा रचित 'कर्णभारम्' नाटक से संकलित है। इसमें दानवीर कर्ण की अद्वितीय दानशीलता को दर्शाया गया है। अर्जुन की सहायता के लिए देवराज इन्द्र (शक्र) ब्राह्मण वेष में आकर कर्ण से भिक्षा मांगते हैं।
१. सम्पूर्ण पाठ अनुवाद (गद्यांश एवं श्लोक)
(ततः प्रविशति ब्राह्मणवेषधारी शक्रः) - [तदनन्तर ब्राह्मण का वेष धारण किए हुए इन्द्र प्रवेश करते हैं।]
सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः ।
जलं जलस्थानगतं च शुष्यति
हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ॥
२. शब्दार्थाः (Sanskrit, Hindi, English)
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत-पर्यायः | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|---|
| महत्तराम् | अतिविशालाम् | बहुत बड़ी | Very large |
| मुहूर्तकम् | क्षणमात्रम् | कुछ देर / क्षण भर | For a moment |
| वाजिनाम् | अश्वानाम् | घोड़ों का | Of horses |
| वारणानाम् | गजानाम् | हाथियों का | Of elephants |
| वृन्दम् | समूहम् | समूह / झुंड | Group / Multitude |
| अपर्याप्तम् | असीमितम् | असीमित / बहुत अधिक | Unlimited / Abundant |
| शक्रः | इन्द्रः | देवराज इन्द्र | Indra |
| गृहीत्वा | स्वीकृत्य | लेकर / ग्रहण करके | Having taken |
| आगत्य | आगम्य | आकर / लौटकर | Having come |
| जित्वा | जयं प्राप्य | जीतकर | Having conquered |
| प्रसीदतु | प्रसन्नो भवतु | प्रसन्न हों | Be pleased |
| भेतव्यम् | भयं करणीयम् | डरना चाहिए | Should be afraid |
| आत्मगतम् | मनोगतम् | मन ही मन | To oneself |
| प्रकाशम् | प्रकटम् | प्रकट रूप से | Publicly / Aloud |
| अविहा | हा कष्टम् / मा एवम् | अरे नहीं! (निषेधार्थक) | Oh no! / Do not do this |
| कामः | इच्छा | कामना / इच्छा | Desire |
| अङ्गराजः | अङ्गदेशस्य नृपः | अंग देश का राजा (कर्ण) | King of Anga (Karna) |
| अलम् वारयितुम् | निवारणं मा कुरु | रोकना व्यर्थ है / मत रोको | Enough, do not stop |
| कालपर्ययात् | कालक्रमेण | समय बीतने से | With passage of time |
| सुबद्धमूलाः | सुदृढमूलाः | मजबूत जड़ों वाले | Very firmly rooted |
| पादपः | तरुः / वृक्षः | पेड़ / वृक्ष | Tree |
| शुष्यति | शुष्कता भवति | सूख जाता है | Dries up |
| हुतम् | आहुति रूपम् | हवन किया हुआ | Offered in sacrifice |
३. अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरणम्)
उत्तमपुरुषस्य प्रयोगः (Use of First Person)
संस्कृत: उत्तमपुरुषस्य प्रयोगः वक्तुः कृते (बोलने वाले के लिए) भवति। यदा कश्चित् जनः स्वस्य विषये किमपि वदति, तदा उत्तमपुरुषस्य प्रयोगः भवति। अस्मिन् 'अस्मद्' शब्दस्य सर्वनामपदानि कर्तृरूपेण भवन्ति।
हिन्दी: उत्तमपुरुष का प्रयोग वक्ता (बोलने वाले) के लिए किया जाता है। जब कोई व्यक्ति अपने बारे में कुछ बोलता है, तब उत्तमपुरुष का प्रयोग होता है। इसमें 'अस्मद्' (मैं/हम) शब्द के सर्वनाम रूप कर्ता के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
| पुरुषः | एकवचनम् (Singular) | द्विवचनम् (Dual) | बहुवचनम् (Plural) |
|---|---|---|---|
| उत्तमपुरुषः | अहम् (मैं / I) | आवाम् (हम दोनों / We two) | वयम् (हम सब / We all) |
| क्रिया (वर्तमान काल) | पठ् + आमि = पठामि | पठ् + आवः = पठावः | पठ् + आमः = पठामः |
वाक्यप्रयोगाः (Examples):
- एकवचने: अहं पठामि। (मैं पढ़ता हूँ। / I read.)
- द्विवचने: आवां पठावः। (हम दोनों पढ़ते हैं। / We two read.)
- बहुवचने: वयं पठामः। (हम सब पढ़ते हैं। / We read.)
विशेषः उत्तमपुरुष के सर्वनाम रूप तीनों लिंगों (पुंलिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग) में समान रहते हैं।
४. अभ्यासकार्यम् (प्रश्नोत्तराणि)
१. एकपदेन उत्तरत (One-word answers):
-
यथा - के निपतन्ति ?उत्तरम्: पादपाः
-
क. ब्राह्मणवेषधारी कः प्रविशति ?उत्तरम्: शक्रः (इन्द्रः)
-
ख. शक्रः कं भिक्षां याचते ?उत्तरम्: कर्णम्
-
ग. कर्णः प्रथमं किं दातुम् इच्छति ?उत्तरम्: गोसहस्रम्
-
घ. कालपर्ययात् का क्षयं गच्छति ?उत्तरम्: शिक्षा
-
ङ. कः कर्णं वारयति ?उत्तरम्: शल्यराजः
२. उचितं पर्यायं मेलयत (Match the following):
| क (मूल शब्दः) | ख (पर्यायवाची शब्दः) |
|---|---|
| वृन्दम् | समूहम् |
| १. वृक्षाः | ख. पादपाः |
| २. शक्रः | ङ. इन्द्रः |
| ३. स्वर्णम् | ग. कनकम् |
| ४. वाजिनः | क. अश्वाः |
| ५. अङ्गराजः | घ. कर्णः |
३. प्रथमपुरुषस्य क्रियापदानि उत्तमपुरुषे परिवर्तयत—
| क (प्रथमपुरुषः) | ख (उत्तमपुरुषः) |
|---|---|
| यथा — पिबति | पिबामि |
| क. करोति | करोमि |
| ख. ददाति | ददामि |
| ग. इच्छति | इच्छामि |
| घ. गच्छति | गच्छामि |
| ङ. हसति | हसामि |
५. क्रियाकलापः (Activities)
- १. अधोलिखितं श्लोकं सस्वरं गायत अर्थविषये च सहपाठिभिः सह चर्चां कुरुत।
(शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्... हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ॥ श्लोक का सस्वर गायन करें एवं उसके अर्थ पर कक्षा में चर्चा करें।)शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्
सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः ।
जलं जलस्थानगतं च शुष्यति
हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ॥ - २. द्वौ छात्रौ मिलित्वा कर्णशक्रयोः संवादस्य ध्वन्यङ्कनं कृत्वा कक्षायां श्रावयताम्।
(दो छात्र मिलकर कर्ण और शक्र के संवाद का अभिनय करें या ऑडियो रिकॉर्डिंग करके सुनाएँ।) - ३. 'अस्मद्' शब्दस्य सर्वाणि रूपाणि प्रदत्त प्रारूपं दृष्ट्वा स्फोरकपत्रे लिखत—
(चार्ट पेपर पर 'अस्मद्' शब्द के सभी विभक्तियों के रूप लिखकर कक्षा में प्रदर्शित करें।)विभक्तिः एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम् प्रथमा अहम् आवाम् वयम् द्वितीया माम् आवाम् अस्मान् तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी मह्यम् आवाभ्याम् अस्मभ्यम् पञ्चमी मत् आवाभ्याम् अस्मत् षष्ठी मम आवयोः अस्माकम् सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु


bahut badiya
जवाब देंहटाएंApka anuvad bahut Acha hai
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