मानस रोग: जीव के दुःखों का वास्तविक कारण और उसकी अचूक औषधि
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'श्रीरामचरितमानस' के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी और पक्षिराज गरुड़ जी के मध्य हुआ संवाद संपूर्ण आध्यात्मिक मनोविज्ञान का सार है। छः अत्यंत गूढ़ प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के पश्चात्, गरुड़ जी का सातवाँ और अंतिम प्रश्न था— "जीव के दुःख का वास्तविक कारण क्या है? मानस रोग (मन के रोग) क्या हैं?" काकभुशुण्डि जी का उत्तर अत्यंत स्पष्ट और हृदयस्पर्शी है। वे बताते हैं कि मनुष्य का वास्तविक शत्रु बाहर नहीं, भीतर बैठा हुआ है। न यह नश्वर संसार हमारे दुःख का कारण है, न कोई व्यक्ति और न कोई परिस्थिति; समस्त क्लेशों का मूल केवल हमारे भीतर छिपे 'मानस रोग' हैं। आइए, शास्त्रों, उपनिषदों और भगवद्गीता के आलोक में इन मानस रोगों के कारण, लक्षण और उनकी अचूक औषधि का विस्तार से दर्शन करें।
१. मानस रोगों का मूल कारण: मोह और अविद्या
काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी के प्रश्न का उत्तर देते हुए समस्त मानस रोगों के पिता (मूल) का परिचय देते हैं:
मोह सकल ब्याधिन कर मूला ।
अर्थात् 'मोह'— जो वास्तव में आत्मविस्मृति (अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाना) और अविद्या (अज्ञान) है— समस्त मानसिक विकारों का मूल कारण है। जीव परमात्मा का अंश है, परंतु जब वह इस भौतिक देह, परिवार और संसार को ही अपना सर्वस्व मान बैठता है, तब वह मोह के जाल में फँस जाता है।
ईशावास्योपनिषद् (मंत्र ७) इस मोह के नाश का उपाय बताते हुए कहता है:
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
भावार्थ:
जिस ज्ञानी पुरुष को समस्त प्राणियों में अपना ही आत्मस्वरूप दिखाई देता है (सबमें भगवान दिखाई देते हैं), उसके लिए न मोह रहता है, न शोक। जहाँ एकत्व (अद्वैत) का अनुभव है, जहाँ भेद-भाव समाप्त हो जाता है, वहाँ मानसिक रोगों का प्रवेश कदापि नहीं हो सकता।
२. मानस रोगों की शृंखला: काम, क्रोध और लोभ
जैसे आयुर्वेद में शरीर के रोगों का कारण वात, पित्त और कफ के असंतुलन को माना गया है, उसी प्रकार तुलसीदास जी ने मन के त्रिदोष बताए हैं— काम (कामना), क्रोध और लोभ।
मानस त्रिदोष का मनोविज्ञान:
कामना (इच्छा) चंचल वायु (वात) के समान सम्पूर्ण अन्तःकरण में दौड़ती रहती है। जब वह कामना अपूर्ण रह जाती है, तो वह क्रोध (पित्त की गर्मी) बन जाती है। और यदि वह कामना पूर्ण हो जाए, तो भी मनुष्य तृप्त नहीं होता, बल्कि और अधिक पाने की इच्छा लोभ (कफ) का रूप धारण कर लेती है। इच्छा कभी समाप्त नहीं होती, वह केवल अपना रूप बदलती रहती है।
श्रीमद्भगवद्गीता (2.62-63) में भगवान श्रीकृष्ण इस पूरी मानस रोग शृंखला का वर्णन करते हैं:
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
अर्थात्, विषयों का निरंतर चिंतन करने से उनमें संग (आसक्ति) उत्पन्न होता है। आसक्ति से कामना पैदा होती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रंश (विवेक का नाश), और अंततः बुद्धि का नाश होने से मनुष्य का पतन हो जाता है। यही मानस रोगों की संपूर्ण और विनाशकारी श्रृंखला है।
कठोपनिषद् (2.3.14) स्पष्ट करता है कि इन रोगों से मुक्ति कब मिलती है:
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥
"जब हृदय में स्थित सभी कामनाएँ (Desires) पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं, तब यह नश्वर मनुष्य इसी जीवन में अमृतस्वरूप ब्रह्म का अनुभव कर लेता है।" इससे यह सिद्ध होता है कि कामना ही सबसे बड़ा बंधन है और कामनाओं का क्षय ही मुक्ति का द्वार है।
३. काकभुशुण्डि जी का अत्यंत सूक्ष्म निदान (Diagnosis)
काकभुशुण्डि जी प्रत्येक मानसिक विकार को एक शारीरिक रोग (बीमारी) के रूप में अत्यंत सजीवता से चित्रित करते हैं। यह केवल एक उपमा नहीं, वरन् मानव-मन का सबसे गहन मनोवैज्ञानिक निरीक्षण है:
मानसिक विकारों का शारीरिक रोगों से संबंध:
- ममता (Attachment): यह दाद (Ringworm) के समान है जो खुजाने पर मीठी लगती है पर बाद में जलन देती है।
- ईर्ष्या (Jealousy): यह खुजली के समान है।
- परायी उन्नति देखकर जलना: यह क्षयरोग (T.B.) है, जो भीतर ही भीतर मनुष्य को खा जाता है।
- दुष्टता और कुटिलता: यह कुष्ठरोग (Leprosy) के समान है।
- अहंकार (Ego): यह जोड़ों का दर्द (गठिया) है, जो मनुष्य को झुकने (विनम्र होने) नहीं देता।
- दम्भ और कपट: ये नसों को पीड़ा देने वाले रोग हैं।
- तृष्णा (Endless Desire): यह जलोदर (Dropsy) रोग है, जिसमें पेट पानी से भर जाता है फिर भी प्यास नहीं बुझती।
- लोकेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा (तीनों वासनाएँ): ये सन्निपात (प्रचण्ड ज्वर) हैं।
जैसे शरीर के रोग भीतर से मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण करते हैं, वैसे ही ये मानसिक विकार मनुष्य के आत्मबल, विवेक और मानसिक शान्ति को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं।
४. मानस रोग मृत्यु के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते
सबसे भयानक बात यह है कि शारीरिक रोग तो मृत्यु के साथ शरीर के जलने पर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु मानस रोग आत्मा के साथ अगले जन्म तक जाते हैं। संत कबीरदास जी इसी यथार्थ को प्रकट करते हैं:
माया मुई न मन मुआ, मरि-मरि गया शरीर ।
आशा तृष्णा न मुई, कह गए दास कबीर ॥
आशा तृष्णा न मुई, कह गए दास कबीर ॥
शरीर नष्ट हो जाता है, परन्तु यदि आशा, तृष्णा और अहंकार जीवित हैं, तो जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता। श्रीमद्भागवत भी स्पष्ट कहता है कि जीव जिस 'संस्कार' को लेकर शरीर त्यागता है, वही संस्कार अगले जन्म की प्रवृत्तियों का आधार बनते हैं। अतः मानस रोग केवल एक जन्म तक सीमित नहीं रहते; वे संस्कार (Karmic Impressions) बनकर जीव के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलते हैं।
५. इन भयंकर मानस रोगों की अचूक औषधि क्या है?
प्रश्न उठता है कि जब ये रोग इतने भयंकर हैं, तो इनसे मुक्ति का मार्ग क्या है? काकभुशुण्डि जी अत्यन्त करुणा से इसका समाधान (Prescription) बताते हैं:
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा ।
जौं एहि भाँति बनै संजोगा ॥
जौं एहि भाँति बनै संजोगा ॥
शास्त्र धर्म, तप, जप, यज्ञ, व्रत, दान और ज्ञान का उपदेश देते हैं। ये सब अत्यन्त आवश्यक साधन हैं, क्योंकि ये मन को शुद्ध करते हैं और साधक को पात्र बनाते हैं; किन्तु रोग का समूल नाश तब होता है जब भगवान् की 'अहैतुकी कृपा' का उदय होता है। और वह कृपा कब प्राप्त होती है?
सदगुरु बैद बचन बिस्वासा ।
संजम यह न विषय कै आसा ॥
संजम यह न विषय कै आसा ॥
आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति:
- वैद्य (Doctor): सद्गुरु ही इस रोग के वैद्य हैं।
- औषधि (Medicine): सद्गुरु के वचनों (उपदेश) में अटूट विश्वास (श्रद्धा) रखना ही औषधि है।
- परहेज़ (Diet/Restraint): विषयों (संसार के भोगों) से संयम और उनसे आशा छोड़ देना ही परहेज़ है।
- पोषक आहार (Nutrition): सत्संग ही पोषक आहार है।
- पूर्ण आरोग्यता (Cure): भगवन्नाम उसका अमृत है और भगवान् के चरणों में अनन्य समर्पण ही पूर्ण आरोग्यता (मोक्ष) है।
भगवद्गीता (18.66) का अंतिम और सर्वोच्च संदेश भी यही पूर्ण समर्पण है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
"सभी प्रकार के धर्मों का आश्रय छोड़कर, तू केवल मेरी (परमात्मा की) शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों और मानस रोगों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।" अर्थात् जब जीव सम्पूर्ण अहंकार छोड़कर भगवान् की शरण ग्रहण करता है, तभी उसके समस्त भीतरी रोगों का अन्त होता है।
६. आत्म-साक्षात्कार: अज्ञान ही बंधन, ज्ञान ही मोक्ष
निष्कर्ष यही है कि संसार को बदलने का प्रयत्न करने से पहले अपने अन्तःकरण (भीतर) को शुद्ध करना आवश्यक है। बाहरी रोग औषधियों से मिटते हैं, परन्तु मानस रोग केवल भगवत्कृपा, सद्गुरु की शरण, सत्संग, नामस्मरण और निष्काम भक्ति से ही नष्ट होते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं:
कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़े बन माहिं ।
ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं ॥
ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं ॥
अर्थात्, परमात्मा हमारे भीतर ही विराजमान हैं, परन्तु मोहवश (अज्ञान के कारण) जीव उन्हें बाहर संसार में खोजता फिरता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् (3.8) इस अज्ञान को मिटाने का महामंत्र देता है:
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
भावार्थ:
"मैं उस महान पुरुष (परमात्मा) को जानता हूँ जो सूर्य के समान तेजस्वी और अज्ञान के अंधकार (माया) से सर्वथा परे है। केवल उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु (जन्म-मरण के चक्र) को पार कर जाता है; मोक्ष प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।"
निष्कर्ष एवं प्रार्थना
संत ज्ञानेश्वर जी ने कहा है— "अज्ञान हेचि बंधन, ज्ञान हेचि मोक्ष।" (अज्ञान ही बन्धन है और ज्ञान ही मुक्ति है।) जहाँ मोह का अंधकार मिटता है, वहीं ज्ञान का सूर्य उदित होता है। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं प्रेम प्रकट होता है; और जहाँ श्रीराम की अहैतुकी कृपा बरसती है, वहाँ समस्त मानस रोग सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं।
अंत में, हम अपने परम कृपालु प्रभु के श्रीचरणों में यही प्रार्थना करते हैं:
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे ।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नमः ।।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नमः ।।
प्रार्थना का भावार्थ:
"हम उन भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हैं, जो सत् (नित्य सत्ता), चित् (शुद्ध चेतना) और आनन्द (परमानन्द) के साक्षात् स्वरूप हैं; जो इस सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति, पालन और संहार के मूल कारण हैं; तथा जो जीव के तीनों प्रकार के तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुःखों और मानस रोगों) का समूल नाश करने वाले हैं।"

