Sant Aur Asant Ka Marm: काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद, सबसे बड़ा पुण्य और पाप

Sooraj Krishna Shastri
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संत और असंत का मर्म: काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद और मानव जीवन का सर्वोच्च दर्शन
श्रीरामचरितमानस का उत्तरकाण्ड केवल कथा का उपसंहार नहीं है, अपितु यह वेदांत, भक्ति, ज्ञान और कर्म के गूढ़ रहस्यों का एक महासागर है। पक्षिराज गरुड़ और परम तत्त्वदर्शी संत काकभुशुण्डि जी के मध्य हुआ संवाद संपूर्ण मानवता के लिए एक आत्मीय मार्गदर्शिका (Spiritual Manual) है। गरुड़ जी, जो भगवान विष्णु के वाहन और सामर्थ्य के प्रतीक हैं, जब अहंकार-रहित होकर एक कौवे (काकभुशुण्डि जी) के समक्ष शिष्य रूप में बैठते हैं, तो यह दृश्य ही सनातन धर्म की उस महान परंपरा का उद्घोष करता है जहाँ ज्ञान का सम्मान देह, पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि अंतःकरण के प्रकाश से होता है। इसी दिव्य संवाद में गरुड़ जी जीवन के सबसे मूलभूत रहस्यों को उद्घाटित करने वाले प्रश्न पूछते हैं। आइए, श्रीमद्भागवत, उपनिषदों और गीता के आलोक में इन प्रश्नों के पीछे छिपे सनातन सत्य का अत्यंत विस्तार से दर्शन करें।
१. गरुड़ जी का परम जिज्ञासापूर्ण प्रश्न: संत-असंत, पुण्य और पाप का मर्म
ज्ञान-पिपासु गरुड़ जी काकभुशुण्डि जी से अत्यंत विनम्रतापूर्वक प्रश्न करते हैं:
संत असंत मरम तुम्ह जानहु ।
तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला ।
कहहु कवन अघ परम कराला ॥
दार्शनिक पृष्ठभूमि:
गरुड़जी का यह प्रश्न केवल संत और असंत के बाह्य स्वरूप (वेशभूषा) को जानने के लिए नहीं है। यह प्रत्येक साधक के अंतःकरण में उठने वाला सनातन प्रश्न है— वह कौन-सी वृत्ति है जो जीव को भगवान के श्रीचरणों तक पहुँचा देती है, और वह कौन-सी प्रवृत्ति है जो उसे जन्म-मरण के अनवरत चक्र (संसार) में बाँधे रखती है? इसके साथ ही, वे श्रुतियों (वेदों) में वर्णित सबसे महान 'पुण्य' (सत्कर्म) और सबसे भयंकर 'अघ' (पाप) के विषय में जानना चाहते हैं। यही इस दिव्य संवाद का वास्तविक रहस्य है।
२. मनुष्य जन्म की अलौकिक महिमा और जीव की भ्रांति
इन प्रश्नों का उत्तर देने से पूर्व, काकभुशुण्डि जी उस 'साधन' का स्मरण कराते हैं जिसके माध्यम से संतत्व, पुण्य या पाप किया जा सकता है। वह साधन है— मनुष्य का शरीर।
नर तन सम नहिं कवनिउ देही ।
जीव चराचर जाचत तेही ॥
समस्त चराचर प्राणी (देवता, यक्ष, गंधर्व, पशु, पक्षी) जिस देह की अभिलाषा करते हैं, वह मनुष्य शरीर हमें अकारण भगवान की कृपा से प्राप्त हुआ है। यह शरीर केवल भोग, संपत्ति-संग्रह और कर्मफल भोगने के लिए नहीं मिला है, अपितु आत्मबोध, भगवद्भक्ति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए मिला है। परन्तु अज्ञान (माया) के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी वास्तविक पहचान भूल जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (10.84.13) उन लोगों की कड़ी आलोचना करता है जो अज्ञानता के कारण भौतिक और नश्वर वस्तुओं में परम सत्य को खोजते हैं:
यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके
स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ।
यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचिज्
जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः ॥
भावार्थ एवं आत्म-निरीक्षण:
जो मनुष्य वात, पित्त और कफ— इन तीन धातुओं (त्रिधातुके) से बने इस नश्वर और मल-मूत्र से भरे शरीर (कुणपे) को ही अपना वास्तविक स्वरूप (आत्मा) मानता है; जो पत्नी, पुत्र और परिवार में ही 'मेरापन' (स्वधीः) रखता है; जो केवल मिट्टी या पत्थर की मूर्तियों (भौम) को ही पूज्य मानता है; जो तीर्थ को केवल जल (सलिले) मानता है और वहाँ निवास करने वाले तत्त्वज्ञानी संत-महात्माओं (जनेष्वभिज्ञेषु) के महत्त्व को नहीं समझता— वह वास्तव में मनुष्य के रूप में दिखाई देते हुए भी गाय और गधे (गोखरः) के समान अज्ञानग्रस्त है।
संत हमें शरीर की नहीं, आत्मा की पहचान कराते हैं। वे सिखाते हैं कि तीर्थ केवल नदियों के जल में नहीं, बल्कि संतों के सान्निध्य में है; भगवान केवल ईंट-पत्थर के मंदिर में नहीं, अपितु प्रत्येक जीव के हृदय-मन्दिर में विराजमान हैं। इसलिए संत का संग मनुष्य को देहाभिमान से उठाकर भगवद्भाव में प्रतिष्ठित करता है। यही जागरण का मार्ग है।
३. क्षणभंगुर जीवन और आत्मोन्नति का आह्वान
श्रीमद्भागवत महापुराण (11.9.29) मनुष्य को सावधान करते हुए कहता है:
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावद्
निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥
असंख्य जन्मों (८४ लाख योनियों) के उपरान्त प्राप्त यह दुर्लभ मानव जीवन क्षणभंगुर (अनित्य) अवश्य है, किन्तु परम कल्याण (मोक्ष) का एकमात्र द्वार है। अतः मृत्यु के आने से पूर्व ही इसे भगवान की प्राप्ति में सफल बना लेना चाहिए। खाना, सोना और मैथुन (विषय-भोग) तो पशु योनियों में भी उपलब्ध हैं, उनके लिए मनुष्य जीवन नष्ट करना मूर्खता है। कठोपनिषद् (1.3.14) भी इसी जागरण का सिंहनाद करता है: "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।" (उठो, जागो और महापुरुषों की शरण में जाकर आत्मतत्त्व का बोध प्राप्त करो।)
गोस्वामी तुलसीदास जी मनुष्य की इसी भूल को अत्यन्त मार्मिक उपमा द्वारा समझाते हैं:
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर ।
होहिं बिषय रत मंद मंदतर ॥
काँच किरिच बदले ते लेहीं ।
कर ते डारि परस मनि देहीं ॥
जिसके हाथ में पारसमणि हो (मनुष्य शरीर) और वह उसे त्यागकर काँच के टुकड़े (विषय-भोग) चुन ले, उससे बड़ा अभागा और दुर्भाग्यशाली इस संसार में और कौन हो सकता है? भगवन्नाम, भगवद्भक्ति, संतसंग और आत्मज्ञान पारसमणि हैं, जबकि विषय-भोग, अहंकार, मान, पद और संपत्ति का संग्रह केवल काँच के टुकड़े हैं जो अंत में मृत्यु के समय हाथ काटते हैं (पीड़ा देते हैं)।
भगवान श्रीकृष्ण भी गीता (9.33) में यही स्पष्ट उपदेश देते हैं: "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥" (यह संसार अनित्य है, क्षणभंगुर है और दुःखालय है; इसलिए इस मनुष्य शरीर में आकर केवल मेरा भजन करो।)
४. सबसे बड़ा दुःख और सबसे बड़ा सुख
गरुड़ जी के प्रश्न का उत्तर देते हुए काकभुशुण्डि जी जीवन का अत्यन्त गूढ़ और शाश्वत सिद्धान्त प्रकट करते हैं:
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं ।
संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥
आध्यात्मिक दरिद्रता: यहाँ दरिद्रता का अर्थ बैंक बैलेंस या धन का अभाव नहीं है। संसार में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनके पास अपार धन है, परंतु उनके जीवन में शांति नहीं है। वास्तविक निर्धन वह है जिसके हृदय में भगवान का स्मरण नहीं है, जिसका जीवन धर्म से शून्य है और जिसे संतोष प्राप्त नहीं है। वास्तविक धनवान वही है जिसके जीवन में 'भगवन्नाम' का अमूल्य धन सुरक्षित है। "जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान।"
ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मंत्र इसी भौतिक आसक्ति को मिटाकर आध्यात्मिक धन की ओर प्रेरित करता है:
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥
यह सम्पूर्ण चराचर जगत, जो कुछ भी इस संसार में गतिशील अथवा स्थिर है, सब ईश्वर से व्याप्त है, उसी का स्वरूप है। इसलिए त्याग और अनासक्ति की भावना से इस संसार का उपभोग करो। किसी दूसरे के धन या वस्तु के प्रति लोभ मत करो, क्योंकि वास्तव में किसी वस्तु पर किसी का स्थायी अधिकार नहीं है, सब कुछ परमात्मा का है। जो इस रहस्य को जान लेता है, वही सच्चा धनवान है।
परम सुख - संत मिलन: भगवान कपिलदेव माता देवहूति (श्रीमद्भागवत 3.25.25) से कहते हैं:
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
संतों का संग हृदय और श्रवण के लिए रसायन (अमृत) है। उसी से भगवान के प्रति श्रद्धा जागती है, श्रद्धा से प्रेम उत्पन्न होता है और प्रेम से निष्काम भक्ति का दिव्य पुष्प खिल उठता है, जिससे जीव परम सुख (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है।
५. संत का सहज स्वभाव: चलता-फिरता तीर्थ
इसके पश्चात् काकभुशुण्डि जी संत के 'सहज स्वभाव' का वर्णन करते हैं। श्रीमद्भागवत पुराण (1.13.10) में युधिष्ठिर जी विदुर जी से कहते हैं कि संत स्वयं चलते-फिरते तीर्थ हैं:
भवद्विधा भगवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो ।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥
"हे प्रभो! आप जैसे भगवद्भक्त स्वयं ही मूर्तिमंत तीर्थ हैं। आपके हृदय में गदाधर भगवान श्रीकृष्ण सर्वदा निवास करते हैं, इसलिए आप मलिन हो चुके तीर्थों को भी अपने आगमन से पुनः पवित्र (तीर्थीकुर्वन्ति) कर देते हैं।"
पर उपकार बचन मन काया ।
संत सहज सुभाउ खगराया ॥
संत परोपकार का अभिनय (नाटक) नहीं करता, परोपकार ही उसका 'सहज स्वभाव' बन जाता है। जैसे सूर्य बिना भेदभाव के प्रकाश देता है, गंगा बिना पात्रता पूछे सबको पवित्र करती है और वृक्ष पत्थर मारने वाले को भी मधुर फल प्रदान करता है, वैसे ही संत का सम्पूर्ण जीवन करुणा, क्षमा, प्रेम और सेवा की सजीव प्रतिमा बन जाता है।
श्रीमद्भागवत (11.2.45) में उत्तम भागवत (सच्चे संत) की परिभाषा इस प्रकार दी गई है:
सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः ।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥
जो प्रत्येक प्राणी में भगवान का दर्शन करता है और समस्त भूतों को भगवान में स्थित देखता है, वही उत्तम भागवत अर्थात् वास्तविक संत है। उसके लिए कोई अपना या पराया नहीं होता।
श्रीमद्भागवत (3.25.21) महात्माओं के आभूषण (साधुभूषणाः) का वर्णन इस प्रकार करता है:
तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम् ।
अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥
सच्चे साधु वे हैं जो सहनशील (तितिक्षवः) हैं, करुणामय हैं, समस्त प्राणियों के अकारण हितैषी हैं, जिनका कोई शत्रु उत्पन्न ही नहीं हुआ (अजातशत्रवः), और जो शान्ति के मूर्त स्वरूप हैं।
भगवान स्वयं (श्रीमद्भागवत 9.4.68) दुर्वासा ऋषि से कहते हैं:
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥
"संत मेरा हृदय हैं और मैं संतों का हृदय हूँ। वे मेरे अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते, और मैं भी उनके अतिरिक्त तनिक भी किसी और को नहीं जानता। हमारे बीच कोई भेद नहीं है।"
६. असंत का स्वभाव: दूसरों के दुःख का कारण
इसके विपरीत असंत (दुष्ट) का स्वभाव कैसा होता है? काकभुशुण्डि जी कहते हैं:
पर दुख हेतु असंत अभागी ॥
जिसके भीतर अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और स्वार्थ का राज्य है, वह बिना किसी कारण के भी दूसरों के दुःख का कारण बनता है। दूसरों की उन्नति देखकर उसे पीड़ा होती है। भगवद्गीता (16.4) ऐसी वृत्ति को 'आसुरी सम्पदा' कहती है:
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥
दंभ (पाखंड), दर्प (घमंड), अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान— ये सब आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति के लक्षण हैं। ऐसा व्यक्ति बाहर से कितना भी सम्पन्न दिखाई दे, किन्तु भीतर से भय, अशान्ति और असन्तोष की अग्नि में जलता रहता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी असंतों के विनाश का अत्यंत सटीक उदाहरण देते हैं:
पर संपदा बिनासि नसाहीं ।
जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ॥
जो दूसरों का अहित करता है, वह अन्ततः अपना ही विनाश करता है। जैसे ओले (हिम उपल) लहलहाते हुए खेत को नष्ट करके स्वयं भी पिघल कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही द्वेष पहले दूसरे को जलाता है और अंत में द्वेषी को स्वयं भस्म कर देता है।
इसके ठीक विपरीत गीता (12.13) में संत का स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण इन शब्दों में बताते हैं: "अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमा॥" (जो सबसे मैत्री रखता है, करुणामय है, अहंकार-रहित है और सुख-दुःख में समभाव रखता है, वही सच्चा संत है।)
७. सबसे बड़ा पुण्य और सबसे बड़ा पाप (निष्कर्ष)
गरुड़ जी के प्रश्न (कवन पुन्य... कवन अघ) का अंतिम और सारभूत उत्तर यही है:
  • सबसे बड़ा पुण्य (श्रुति विदित विसाला): आत्मस्वरूप का बोध, भगवान का निष्काम भजन, संतों का संग, परोपकार और प्राणिमात्र के प्रति करुणा (अहिंसा) रखना ही वेदों में वर्णित सबसे विशाल पुण्य है। "परहित सरिस धर्म नहिं भाई।"
  • सबसे बड़ा पाप (अघ परम कराला): देहाभिमान, भगवान को विस्मृत कर देना, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को पीड़ा पहुँचाना, तथा संतों की महिमा की निंदा करना सबसे कराल (भयंकर) पाप है। "पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।"
जिस दिन मनुष्य अपने तुच्छ सुख से अधिक, भगवान की प्रसन्नता और प्राणिमात्र के कल्याण को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है, उसी दिन उसके भीतर 'संतत्व' का प्रथम अंकुर फूट पड़ता है। वस्तुतः गोस्वामी तुलसीदास जी इस संवाद के माध्यम से हमें किसी दूसरे 'संत' या 'असंत' की पहचान नहीं करा रहे; वे हमारे ही अंतःकरण का दर्पण हमारे सामने रख रहे हैं ताकि हम अपना आत्मनिरीक्षण कर सकें।
आत्म-निरीक्षण के तीन प्रश्न (Reflection)
प्रत्येक साधक को रात्रि में शयन करने से पूर्व स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए:
१. क्या आज मेरे कारण किसी भी प्राणी का दुःख कम हुआ?
२. क्या आज मेरे हृदय में भगवान का स्मरण कल से अधिक हुआ?
३. क्या आज मेरे भीतर करुणा, क्षमा और परोपकार का विस्तार हुआ?
यदि इन तीनों प्रश्नों का उत्तर "हाँ" है, तो समझना चाहिए कि श्रीराम की अकारण कृपा से हमारे जीवन में संतत्व का प्रथम प्रभात उदित हो चुका है। यदि उत्तर "नहीं" है, तो हमें पुनः भगवन्नाम का आश्रय लेकर अपने जीवन की दिशा सुधारनी चाहिए।
अंतिम प्रार्थना (भगवान के श्रीचरणों में समर्पण)
इस दुर्लभ मनुष्य जीवन की सार्थकता भगवान के चिन्तन में ही है। अतः अंत में प्रभु के श्रीचरणों में हम यही प्रार्थना करते हैं:
जय जय जय देव देव देव
त्रिभुवनमंगलदिव्यनामधेय ।
जय जय जय देव कृष्ण देव
श्रवणमनोनयनामृतावतार ॥
प्रार्थना का भावार्थ:
"हे देवाधिदेव! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आपका दिव्य नाम तीनों लोकों का परम मंगल करने वाला है। हे श्रीकृष्णदेव! आप श्रवण (कानों) के लिए कथामृत, मन के लिए चिन्तनामृत और नेत्रों के लिए दर्शनामृत के साक्षात् अवतार हैं। आपकी जय हो! कृपया हमारे हृदय को संतत्व के प्रकाश से आलोकित करें।"

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