Ramdhari Singh Dinkar Poem: है बँधी तक़दीर जलती डार से (विस्तृत अर्थ)

Sooraj Krishna Shastri
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राष्ट्रकवि दिनकर की विद्रोही हुंकार: "है बँधी तक़दीर जलती डार से" का विस्तृत विश्लेषण
भारतीय साहित्य में 'वीर रस' और 'राष्ट्रीय चेतना' के सर्वोच्च हस्ताक्षर रामधारी सिंह 'दिनकर' की लेखनी से जब भी कोई शब्द निकला, वह सीधे समाज की सोई हुई आत्मा पर प्रहार करता था। प्रस्तुत कविता "है बँधी तक़दीर जलती डार से..." भारतीय इतिहास के उस काले और रक्तरंजित दौर (स्वतंत्रता पूर्व और विभाजन के समय) का सजीव चित्रण है, जब देश गुलामी की जंजीरों में तो जकड़ा ही था, साथ ही हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों की आग में भी जल रहा था। इस कविता में कवि का हृदय देश की दुर्दशा, अज्ञानता, धार्मिक कट्टरपंथ और राजनेताओं द्वारा देश को बाँटने की साज़िश को देखकर विदीर्ण हो उठता है। आइए, इस ओजस्वी और मर्मस्पर्शी कविता के प्रत्येक पद्यांश (Stanza) का गहरा दार्शनिक और राष्ट्रीय भावार्थ समझें।
१. कवि की अंतर्द्वंद्व और विद्रोह की आग
है बँधी तक़दीर जलती डार से, आशियाँ को छोड़ उड़ जाऊँ कहाँ?
वेदना मन की सही जाती नहीं, यह ज़हर लेकिन, उगल आऊँ कहाँ?

पापिनी कह जीभ काटी जाएगी, आँख-देखी बात जो मुँह से कहूँ,
हड्डियाँ जल जाएँगी, मन मारकर जीभ थामे मौन भी कैसे रहूँ?
भावार्थ:
कविता के आरंभ में ही दिनकर जी अपने अंतर्मन की घुटन और पीड़ा को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि मेरी (और मेरे देश की) तक़दीर एक ऐसी डाल (डार) से बँधी है जो आग में जल रही है। देश जल रहा है, और मैं इस जलते हुए घोंसले (आशियां) को छोड़कर कहीं भाग भी तो नहीं सकता। मेरे भीतर जो सत्य को देखने की वेदना है, वह असहनीय हो गई है। यह वेदना एक ज़हर के समान है, जिसे मैं न निगल पा रहा हूँ, न उगल पा रहा हूँ।
कवि समाज और सत्ता के डर को उजागर करते हुए कहता है कि यदि मैं सच्चाई बोलूँगा, यदि मैं आँख-देखी बात (दंगों और सत्ता की असलियत) मुँह से कहूँगा, तो समाज मुझे पापी और देशद्रोही कहेगा, मेरी जीभ काट ली जाएगी (मेरी आवाज़ दबा दी जाएगी)। लेकिन यदि मैं चुप रहूँ, तो यह सत्य की आग मेरे भीतर ही मेरी हड्डियों को जलाकर राख कर देगी। एक सच्चा कवि मौन कैसे रह सकता है?
२. मौन का अस्वीकार और बलिदान का संकल्प
तानकर भौंहें, कड़कना छोड़कर मेघ बर्फ़ी-सा पिघल सकता नहीं,
शौक़ हो जिनको, जलें वे प्रेम से, मैं कभी चुपचाप जल सकता नहीं।

बाँसुरी जनमी तुम्हारी गोद में देश-माँ, रोने-रुलाने के लिए,
दौड़कर आगे समय की माँग पर जीभ क्या? गरदन कटाने के लिए।
भावार्थ:
यहाँ कवि का 'रौद्र रूप' प्रकट होता है। दिनकर जी कहते हैं कि जिस प्रकार बादलों (मेघ) का स्वभाव कड़कना और बिजली गिराना है, वे बर्फ की तरह चुपचाप पिघल नहीं सकते, उसी प्रकार मेरा स्वभाव भी अन्याय के खिलाफ कड़कना (आवाज़ उठाना) है। जिन्हें गुलामी और सांप्रदायिकता की आग में चुपचाप जलने का शौक है, वे जलें; परन्तु मैं चुपचाप जलकर भस्म होने वालों में से नहीं हूँ।
वे भारत माता को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे माँ! तुम्हारे इस कवि की बाँसुरी (लेखनी/कविता) केवल श्रृंगार रस या रोने-रुलाने के गीत गाने के लिए नहीं जन्मी है। समय की पुकार और राष्ट्र की माँग पर यह कवि केवल अपनी जीभ (आवाज़) ही नहीं, बल्कि अपना शीश (गरदन) भी कटाने के लिए सबसे आगे खड़ा मिलेगा।
३. देश के बँटवारे की पीड़ा और आत्म-ग्लानि
ज़िंदगी दौड़ी नई संसार में, ख़ून में सबके रवानी और है;
और हैं लेकिन, हमारी क़िस्मतें, आज भी अपनी कहानी और है।

हाथ की जिसकी कड़ी टूटी नहीं, पाँव में जिसके अभी जंज़ीर है;
बाँटने को हाय! तौली जा रही, बेहया उस क़ौम की तक़दीर है!

बेबसी में काँपकर रोया हृदय, शाप-सी आहें गरम आईं मुझे;
माफ़ करना, जन्म लेकर गोद में, हिंद की मिट्टी! शरम आई मुझे।
भावार्थ:
ये पंक्तियां उस समय की वैश्विक और भारतीय स्थिति का तुलनात्मक चित्रण करती हैं। कवि कहता है कि पूरी दुनिया एक नए युग (विज्ञान, प्रगति और स्वतंत्रता) की ओर दौड़ रही है, दुनिया के लोगों के खून में एक नया जोश है। परंतु, हमारे देश की किस्मत और कहानी आज भी वही पुरानी और दर्दनाक है।
विभाजन का दर्द: जिस भारत माता के हाथों और पैरों की गुलामी की जंजीरें (अंग्रेजों की दासता) अभी तक पूरी तरह टूटी भी नहीं थीं, उसी गुलाम देश को धर्म के नाम पर दो टुकड़ों (भारत-पाकिस्तान) में बाँटने के लिए तराजू पर तौला जा रहा है। कवि अपनी ही कौम (समाज) को 'बेहया' (निर्लज्ज) कहता है, जो अपनी आज़ादी से ज्यादा अपने बँटवारे पर लड़ रही है।
इस भयंकर बेबसी को देखकर कवि का हृदय रो पड़ता है। उसके भीतर से शाप जैसी गर्म आहें निकलती हैं। वह क्षोभ और पीड़ा से भरकर कहता है— "हे हिन्दुस्तान की मिट्टी! मुझे माफ़ कर देना, लेकिन आज तुम्हारी गोद में जन्म लेने पर मुझे अपने आप पर 'शर्म' आ रही है।" यह शर्म देश से नफरत की नहीं, बल्कि देशवासियों की मूर्खता पर उत्पन्न असीम दुःख की अभिव्यक्ति है।
४. गिद्धों की तरह नोचा जाता भारत (सांप्रदायिक विद्रूपता)
गुदड़ियों में एक मुट्ठी हड्डियाँ, मौती-सी ग़म की मलीन लकीर-सी।
क़ौम की तक़दीर हैरत से भरी, देखती टुक-टुक खड़ी तसवीर-सी।

चीथड़ों पर एक की आँखें लगीं, एक कहता है कि मैं लूँगा ज़बाँ;
एक की ज़िद है कि पीने दो मुझे ख़ून जो इसकी रगों में है रवाँ!
भावार्थ:
दिनकर जी ने यहाँ भारत देश (या आम जनता) का मानवीकरण एक कुपोषित, फटेहाल और मरणासन्न भिखारी के रूप में किया है। देश की तक़दीर गुदड़ियों (फटे कपड़ों) में लिपटी एक मुट्ठी हड्डियों के समान रह गई है, जिसके चेहरे पर केवल दुःख की मलिन लकीरें हैं। वह देश अपनी यह दुर्दशा देखकर तस्वीर की तरह अवाक और हैरान खड़ा है।
कवि सांप्रदायिक ताकतों (हिंदू-मुस्लिम चरमपंथियों) और राजनेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहता है कि इस गरीब और फटेहाल देश के चीथड़ों (फटे कपड़ों) को नोचने के लिए सब आतुर हैं। कोई इसकी ज़ुबान काटना चाहता है, तो कोई ज़िद पर अड़ा है कि इस देश की रगों में जो थोड़ा बहुत खून बचा है, वह उसे पी लेना चाहता है। सब इस देश का शोषण करने में लगे हैं।
५. खोखली धर्मान्धता पर गहरा प्रहार
ख़ून! ख़ूँ की प्यास, तो जाकर पियो ज़ालिमो, अपने हृदय का ख़ून ही;
मर चुकी तक़दीर हिंदुस्तान की, शेष इसमें एक बूँद लहू नहीं।

मुस्लिमो, तुम चाहते जिसकी ज़बाँ, उस ग़रीबिन ने ज़बाँ खोली कभी?
हिंदुओ, बोलो, तुम्हारी याद में क़ौम की तक़दीर क्या बोली कभी?
भावार्थ:
दिनकर जी धर्म के ठेकेदारों को 'ज़ालिम' (क्रूर) कहते हुए फटकार लगाते हैं। वे कहते हैं कि यदि तुम्हें खून पीने की इतनी ही प्यास है, तो एक-दूसरे का खून बहाने के बजाय अपने ही हृदय का खून पीकर अपनी प्यास बुझा लो। क्योंकि जिस हिन्दुस्तान के टुकड़े करने के लिए तुम लड़ रहे हो, उसकी तक़दीर मर चुकी है, अब उसमें खून की एक बूँद भी शेष नहीं बची है।
वे हिंदू और मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों को आईना दिखाते हैं: "हे मुसलमानों! तुम जिसकी ज़ुबान (उर्दू/सत्ता) चाहते हो, क्या उस गरीब जनता ने कभी अपनी आवाज़ उठाई है? हे हिंदुओं! क्या तुम्हारे इतिहास में इस ग़रीब क़ौम (देश की आम जनता) को कभी बोलने का अधिकार मिला है?" कवि यह स्पष्ट करता है कि आम जनता की तक़दीर तो हमेशा से मूक (गूँगी) ही रही है, धर्म की लड़ाई केवल सत्ताधारियों का षड्यंत्र है।
६. एकता का अभाव और छोटी बातों पर मार-काट
छेड़ता आया ज़माना, पर कभी क़ौम ने मुँह खोलना सीखा नहीं।
जल गई दुनिया हमारे सामने, किंतु हमने बोलना सीखा नहीं。

ताव थी किसकी कि बाँधे क़ौम को, एक होकर हम कहीं मुँह खोलते?
बोलना आता कहीं तक़दीर को, हिंदवाले आसमाँ पर बोलते!
भावार्थ:
भारतीय समाज की सहिष्णुता (जो कि अब कायरता बन चुकी थी) पर प्रहार करते हुए कवि कहता है कि ज़माने (विदेशी आक्रांताओं) ने सदियों तक हमारा शोषण किया, हमें छेड़ा, परन्तु इस देश की जनता ने कभी एकजुट होकर मुँह खोलना (विद्रोह करना) नहीं सीखा। हमारे सामने दुनिया जल गई, लुट गई, पर हम चुप रहे।
कवि कहता है कि यदि हम हिंदू और मुस्लिम आपस में बँटे न होते, यदि हम एक होकर मुँह खोलते, तो दुनिया की किस ताक़त में इतनी हिम्मत थी जो हमें गुलाम बना पाती? यदि भारत के लोगों को एकजुट होकर बोलना (अधिकार माँगना) आता, तो वे आज ज़मीन पर नहीं, बल्कि आसमान की बुलंदियों पर बोल रहे होते!
७. गाय और मस्जिद के नाम पर मूर्खतापूर्ण खून-खराबा
ख़ूँ बहाया जा रहा इंसान का सींगवाले जानवर के प्यार में!
क़ौम की तक़दीर फोड़ी जा रही मस्जिदों की ईंट की दीवार में।
भावार्थ (सर्वाधिक तीखा प्रहार):
ये पंक्तियां पूरे भारतीय साहित्य में धार्मिक कट्टरता पर किया गया सबसे तीखा व्यंग्य हैं। दिनकर जी अत्यंत क्षोभ के साथ कहते हैं कि इस देश में इंसान का कीमती खून एक 'सींग वाले जानवर' (यहाँ गाय/बकरी की कुर्बानी या गौ-हत्या पर होने वाले दंगों का संकेत है) के प्यार में पानी की तरह बहाया जा रहा है!
और दूसरी ओर, इस महान राष्ट्र की तक़दीर को मस्जिदों की ईंट की दीवार (मंदिर-मस्जिद के झगड़ों और बाजे बजाने को लेकर होने वाले विवादों) में फोड़कर नष्ट किया जा रहा है। मनुष्य ने ईश्वर और धर्म को पशुओं और ईंट-पत्थरों तक सीमित कर दिया है, और इसके लिए वह मानवता का कत्ल कर रहा है।
८. नौजवानों का आह्वान: राष्ट्र की रक्षा की अंतिम पुकार
सूझता आगे न कोई पंथ है, है घनी ग़फ़लत-घटा छाई हुई,
नौजवानो क़ौम के, तुम हो कहाँ? नाश की देखो घेड़ी आई हुई।
भावार्थ:
कविता के अंत में कवि गहरे अंधकार को महसूस करता है। वह कहता है कि मुझे देश के भविष्य का कोई साफ रास्ता (पंथ) दिखाई नहीं दे रहा है। चारों ओर अज्ञानता, नफ़रत, और लापरवाही (ग़फ़लत) की अत्यंत घनी काली घटा छाई हुई है।
इस विनाशकारी स्थिति में, दिनकर जी अंततः देश के युवाओं (नौजवानों) को पुकारते हैं। वे कहते हैं— "हे इस देश के युवा रक्त! तुम कहाँ छिपे हो? देखो, देश के नाश (विभाजन और बर्बादी) की घड़ी सिर पर आ खड़ी हुई है। अब केवल तुम्हारी चेतना, तुम्हारी एकता और तुम्हारी क्रांति ही इस राष्ट्र को ईंट-पत्थरों और जानवरों की लड़ाई से निकालकर प्रगति के पथ पर ले जा सकती है।"
निष्कर्ष (Conclusion)
रामधारी सिंह 'दिनकर' की यह कविता केवल उस दौर के विभाजन की कहानी नहीं है, बल्कि यह आज के समाज के लिए भी एक उतना ही प्रासंगिक चेतावनी-पत्र है। यह कविता हमें सिखाती है कि धर्म का वास्तविक अर्थ मानवता है; ईंट, पत्थर या जानवरों के नाम पर एक-दूसरे का खून बहाना राष्ट्र को पतन की ओर ले जाता है। जब तक देश का युवा जागरूक और एकजुट नहीं होगा, तब तक देश की तक़दीर 'जलती डार' से ही बँधी रहेगी। दिनकर जी की यह हुंकार हमें हमारे राष्ट्रीय कर्तव्यों का बोध कराती है।
Ramdhari Singh Dinkar Poem: है बँधी तक़दीर जलती डार से (विस्तृत अर्थ)

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