सब ते दुर्लभ कवन शरीरा? काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद और मनुष्य जन्म का रहस्य (Ramcharitmanas)

Sooraj Krishna Shastri
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सब ते दुर्लभ कवन शरीरा? काकभुशुण्डि और गरुड़ संवाद का संपूर्ण रहस्य और दार्शनिक विवेचन
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'श्रीरामचरितमानस' का उत्तरकाण्ड अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का सर्वोच्च शिखर है। इस काण्ड में पक्षिराज गरुड़ जी द्वारा परम तत्त्वदर्शी संत काकभुशुण्डि जी से पूछे गए सात प्रश्न केवल एक पक्षी के दूसरे पक्षी से पूछे गए साधारण प्रश्न नहीं हैं; अपितु वे संपूर्ण मानवता, जीव और जगत् के कल्याण के लिए जीवन-दर्शन के सात महा-दिव्य सूत्र हैं। इन प्रश्नों में मानव अस्तित्व का उद्देश्य, धर्म का रहस्य, दुःखों का मूल कारण, और आत्मकल्याण का अत्यंत गहन मार्ग निहित है। आइए, शास्त्रों, उपनिषदों, भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत महापुराण के विशद आलोक में इस अद्भुत 'काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद' के पीछे छिपे सनातन सत्य का अत्यंत विस्तार से दर्शन करें।
१. गरुड़ का मोह और काकभुशुण्डि की शरण: ज्ञान के समक्ष अहंकार का समर्पण
इस दिव्य संवाद की पृष्ठभूमि समझना अत्यंत आवश्यक है। लंका युद्ध के दौरान जब मेघनाद ने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी को 'नागपाश' में बाँध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर पक्षिराज गरुड़ जी वहाँ आए और उन्होंने साँपों को खाकर प्रभु को नागपाश से मुक्त किया। परंतु, भगवान को नागपाश में बंधा देखकर गरुड़ जी के मन में 'मोह' (संशय) उत्पन्न हो गया। सोचने लगे, "जो अखिल ब्रह्मांड के नायक हैं, जो परब्रह्म हैं, वे एक तुच्छ राक्षस के बाणों से कैसे बंध सकते हैं? क्या ये सचमुच भगवान हैं या कोई साधारण मनुष्य?"
गरुड़ जी अपनी इस शंका के समाधान के लिए पहले देवर्षि नारद के पास गए, फिर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के पास गए, और अंत में देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) के पास कैलाश पर्वत पर पहुँचे। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि मोह की निवृत्ति केवल 'सत्संग' से हो सकती है। शिवजी ने गरुड़ को नीलगिरि पर्वत पर निवास करने वाले एक कौवे— काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया।
यहाँ यह जानना परम आवश्यक है कि काकभुशुण्डि जी कौन हैं। वे भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त, ब्रह्मनिष्ठ महात्मा और परम तत्त्वदर्शी संत हैं। यद्यपि वे लोमश ऋषि के शापवश 'कौवे' (Crow) के रूप में निवास करते हैं, तथापि वे ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के सर्वोच्च सिंहासन पर प्रतिष्ठित हैं। दूसरी ओर गरुड़ जी पक्षिराज हैं, भगवान विष्णु के निज वाहन हैं, और सामर्थ्य, तेज तथा ऐश्वर्य के परम प्रतीक हैं।
सोचिए, वैकुण्ठ का अधिपति वाहन (गरुड़) एक साधारण कौवे (काकभुशुण्डि) के सामने शिष्य भाव से, दोनों हाथ जोड़कर बैठता है। यह प्रसंग सनातन संस्कृति का वह महान और स्वर्णिम आदर्श प्रस्तुत करता है कि ज्ञान कभी पद, प्रतिष्ठा, आयु, कुल अथवा बाह्य रूप का बंधक नहीं होता। जहाँ सत्य का प्रकाश हो, जहाँ हरि-कथा हो रही हो, वहाँ विनम्र होकर बैठना ही वास्तविक विद्वत्ता है। संत का सम्मान उसके बाह्य स्वरूप, वस्त्र या पद से नहीं, बल्कि उसके अंतःकरण में प्रकाशित ब्रह्मज्ञान से होता है। जहाँ ज्ञान मिले, वहाँ सिर स्वतः झुक जाना चाहिए; जहाँ अहंकार खड़ा रहता है, वहाँ ज्ञान का द्वार हमेशा के लिए बंद हो जाता है।
२. प्रथम प्रश्न: संसार में सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है? (मनुष्य जन्म की सार्थकता)
नीलगिरि पर्वत पर पहुँचकर, गरुड़ जी ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक काकभुशुण्डि जी से सात प्रश्न पूछे। उनका प्रथम और संपूर्ण ब्रह्मांड के जीवों से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न था:
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा ।
सब ते दुर्लभ कवन शरीरा ॥
काकभुशुण्डि जी बिना किसी विलंब के, अत्यंत स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में इसका उत्तर देते हैं:
नर तन सम नहिं कवनिउ देही ।
जीव चराचर जाचत तेही ॥
नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी ।
ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥
विस्तृत दार्शनिक विवेचन: चौरासी लाख योनियाँ और मनुष्य देह
काकभुशुण्डि जी कहते हैं— "हे पक्षिराज! इस ब्रह्मांड में मनुष्य शरीर (नर तन) के समान कोई दूसरा दुर्लभ शरीर नहीं है। जल, थल और नभ में रहने वाले समस्त चराचर प्राणी (पशु, पक्षी, कीट, पतंग यहाँ तक कि देवता भी) इसी मनुष्य शरीर की याचना (कामना) करते हैं।"
मनुष्य जन्म देवताओं से भी श्रेष्ठ क्यों है?
शास्त्रों के अनुसार कुल ८४ लाख योनियाँ हैं। इनमें 'देव योनि' केवल भोग योनि है। देवता स्वर्ग में अपने पुण्यों का फल भोगते हैं, वे कोई नया कर्म नहीं कर सकते। पशु-पक्षी 'तिर्यक योनि' में आते हैं, वे केवल अपनी प्रवृत्तियों (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) के अधीन हैं; उन्हें अच्छे-बुरे का विवेक नहीं है। परन्तु केवल 'मनुष्य योनि' ही कर्म योनि और मोक्ष योनि दोनों है। मनुष्य ही वह जीव है जिसे 'विवेक' और 'स्वतंत्र इच्छा' (Free Will) का वरदान प्राप्त है।
काकभुशुण्डि जी मनुष्य देह को एक सीढ़ी (निसेनी) बताते हैं। इसी सीढ़ी पर खड़ा होकर मनुष्य यदि दुष्कर्म करे, तो वह 'नरक' में गिर सकता है; यदि सकाम पुण्य कर्म करे, तो 'स्वर्ग' जा सकता है; और यदि निष्काम भगवद्भक्ति तथा आत्मज्ञान प्राप्त कर ले, तो वह साक्षात् 'अपवर्ग' (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। यही वह देह है जो ज्ञान का दीप प्रज्वलित करती है, वैराग्य का अंकुर विकसित करती है और भगवद्भक्ति के माध्यम से परमात्मा से जीव के अद्वैत एकत्व का अनुभव कराती है।
३. वेदों, उपनिषदों और पुराणों का शंखनाद: 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्'
भारतीय ऋषि-परंपरा ने मानव शरीर को केवल मांस, मज्जा, अस्थि और रक्त का एक भौतिक ढांचा नहीं माना, बल्कि इसे 'धर्म का आधार, साधना का मंदिर और आत्मसाक्षात्कार का एकमात्र सेतु' कहा है। महर्षियों ने महा-उद्घोष किया है: "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।" अर्थात् यह शरीर ही समस्त धर्म, तपस्या और लोकमंगल का प्रथम साधन है। शरीर के बिना किसी भी प्रकार की साधना संभव नहीं है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव जी को मनुष्य जन्म की दुर्लभता समझाते हुए कहते हैं:
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
न्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.9.29)
भावार्थ:
"असंख्य जन्मों (८४ लाख योनियों) में भटकने के उपरांत प्राप्त यह मनुष्य जन्म यद्यपि क्षणभंगुर (अनित्य) है, फिर भी यह परम कल्याण (मोक्ष) प्रदान करने वाला है। इसलिए एक धीर और विवेकी मनुष्य को चाहिए कि मृत्यु के आने से पूर्व ही (जब तक शरीर में बल है), वह आत्मकल्याण और परमात्मा की प्राप्ति के लिए शीघ्रता से प्रयत्न करे। क्योंकि जहाँ तक विषय-भोगों (खाना, पीना, सोना, संतानोत्पत्ति) का प्रश्न है, वे तो सूअर, कुत्ते और गधे की योनियों में भी सर्वत्र उपलब्ध हैं। उनके लिए मनुष्य जन्म बर्बाद करना मूर्खता है।"
भगवद्गीता (9.33) में भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से यही कहते हैं: "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।" अर्थात्, यह संसार अनित्य (नाशवान) और असुखम् (दुःखालय) है; अतः इस दुर्लभ मानव जीवन को पाकर तू केवल मेरा भजन कर। आगे भगवान कहते हैं:
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
(गीता 9.34)
"मुझमें ही अपना मन लगा, मेरा ही भक्त बन, मेरा ही पूजन कर और मुझे ही नमस्कार कर। जब तेरा मन, बुद्धि, कर्म और संपूर्ण जीवन मुझ परमात्मा को समर्पित हो जाएगा, तब तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करेगा।" मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी पूर्ण शरणागति में है।
कठोपनिषद् का वह अमर और दिव्य आह्वान आज भी गूंज रहा है: "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।" (उठो, जागो, और श्रेष्ठ तत्त्वदर्शी आचार्यों का सान्निध्य प्राप्त कर आत्मविद्या को जानो)। मुण्डकोपनिषद् भी मनुष्य को चेतावनी देता है— "परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्" (विवेकी मनुष्य कर्मफल से प्राप्त इस संसार की सीमाओं और नश्वरता का भली-भांति परीक्षण करके वैराग्य प्राप्त कर लेता है)।
४. द्वितीय प्रश्न: संसार में सबसे बड़ा दुःख और सुख क्या है?
मनुष्य जन्म के महत्व को समझने के पश्चात, गरुड़ जी जीवन के सबसे व्यावहारिक और मर्मस्पर्शी विषय पर दूसरा प्रश्न करते हैं:
बड़ दुःख कवन, कवन सुख भारी ।
सो संक्षेपहि कहहु बिचारी ॥
काकभुशुण्डि जी संसार के समस्त अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और अध्यात्म का सार केवल एक चौपाई में रख देते हैं:
नहिं दरिद्र सम दुःख जग माहीं ।
संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥
आध्यात्मिक दरिद्रता: संसार का सबसे भयानक दुःख
काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि संसार में 'दरिद्रता' (गरीबी) के समान कोई दूसरा दुःख नहीं है। परंतु हमें यहाँ रुककर विचार करना चाहिए। क्या यहाँ 'दरिद्रता' का अर्थ केवल धन, बैंक-बैलेंस या संपत्ति का अभाव है? नहीं! भौतिक दरिद्रता तो प्रारब्ध के अनुसार आती-जाती रहती है। वास्तविक और सबसे भयंकर दरिद्रता है— आध्यात्मिक दरिद्रता
ईश्वर की विस्मृति (भगवान को भूल जाना), धर्महीनता, हृदय में करुणा का अभाव, विवेक की शून्यता, संतोष का न होना, और भक्ति से विमुख होना ही असली दरिद्रता है। एक व्यक्ति जिसके पास संसार का समस्त वैभव हो, जो करोड़ों के महलों में सोता हो, परंतु यदि उसके मन में शांति नहीं है, हृदय में भगवान का स्मरण नहीं है, और रात को सोने के लिए नींद की गोलियां खानी पड़ती हैं, तो शास्त्रों की दृष्टि में वह संसार का सबसे बड़ा दरिद्र (भिखारी) है। इसके विपरीत, एक फटेहाल झोपड़ी में रहने वाला कबीर या रैदास, जिसके हृदय में राम-नाम की संपत्ति है, वह त्रिभुवन का सबसे बड़ा धनवान है। "गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान। जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान।"
५. सबसे बड़ा सुख: 'संत मिलन सम सुख जग नाहीं'
यदि दरिद्रता सबसे बड़ा दुःख है, तो सबसे बड़ा सुख क्या है? काकभुशुण्डि जी कहते हैं— "संत मिलन।" यहाँ 'संत मिलन' का अर्थ केवल किसी भगवा वस्त्र धारी के दर्शन कर लेना या भीड़ में खड़े होकर कथा सुन लेना मात्र नहीं है। संत मिलन का वास्तविक अर्थ है— ऐसे ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के 'सान्निध्य' (संग) की प्राप्ति होना, जिनकी दृष्टि मात्र से हमारे जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म हो जाएँ।
संत का प्रभाव (The Alchemical Transformation):
सच्चे संत पारस पत्थर के समान होते हैं (बल्कि उससे भी श्रेष्ठ)। पारस तो केवल लोहे को सोना बनाता है, परंतु संत अपने संपर्क में आने वाले पापी से पापी लोहे को भी अपने ही समान 'पारस' (संत) बना देते हैं। वाल्मीकि जैसे डाकू को जब देवर्षि नारद (संत) का संग मिला, तो वे आदिकवि महर्षि वाल्मीकि बन गए। संत का संग मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, अशांति से परम शांति की ओर, अहंकार से विनय की ओर, और जन्म-मरण के बंधन से साक्षात् मुक्ति की ओर ले जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध (कपिल-देवहूति संवाद) में भगवान कपिल माता देवहूति को सत्संग की यही महिमा बताते हुए कहते हैं:
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
(श्रीमद्भागवत 3.25.25)
भावार्थ:
"सच्चे संतों के प्रसंग (संगति) में मेरी (भगवान की) शूरवीरता और लीलाओं का यथार्थ ज्ञान कराने वाली कथाएँ होती हैं। वे कथाएँ हृदय और श्रवण (कानों) दोनों के लिए परम रसायन (अमृत) के समान मीठी और रोग-नाशक होती हैं। उन कथाओं का निरंतर सेवन करने से, मोक्ष के मार्ग पर चलने वाले साधक के हृदय में सबसे पहले 'श्रद्धा' उत्पन्न होती है। श्रद्धा के बाद मेरे प्रति 'रति' (प्रेम) जाग्रत होता है, और रति के गाढ़े हो जाने पर साक्षात् 'परा-भक्ति' (जिससे मेरी प्राप्ति होती है) स्वतः ही अनुक्रम से आ जाती है।"
गोस्वामी तुलसीदास जी भी इसी सत्य की मुहर लगाते हुए कहते हैं: "बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥" अर्थात् बिना सत्संग के भले-बुरे का विवेक जागृत नहीं होता, और वह सत्संग भी भगवान श्रीराम की अहैतुकी कृपा के बिना प्राप्त नहीं हो सकता।
६. जीवन का वास्तविक सार और निष्कर्ष
इस सम्पूर्ण प्रसंग, संवाद और दार्शनिक विवेचन का सार यही है कि मनुष्य शरीर समस्त ब्रह्मांड की योनियों में सर्वाधिक दुर्लभ और ईश्वर का दिया गया सबसे बड़ा वरदान (सौभाग्य) है। इस शरीर को पाकर यदि हमने इसे केवल धन कमाने, कोठियां बनाने, भोग-विलास और अहंकार की तुष्टि में गँवा दिया, तो हमसे बड़ा मूर्ख और अभागा इस ब्रह्मांड में कोई दूसरा नहीं होगा। "बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रन्थिन्ह गावा॥"
इस जीवन का एकमात्र और सर्वोच्च उद्देश्य है— आत्मोन्नति, हृदय की शुद्धि, भगवान का निरंतर स्मरण, संतों का संग और निष्काम भगवद्भक्ति की प्राप्ति। संसार का सबसे बड़ा दुःख 'आध्यात्मिक दरिद्रता' (ज्ञान और भक्ति का अभाव) है और संसार का सबसे बड़ा सुख 'संतों का सान्निध्य' तथा भगवान के श्रीचरणों में अविचल प्रेम की प्राप्ति है। यही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है, यही हमारे ऋषि-मुनियों और सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है, और यही जन्म-मरण के चक्र से निकालकर जीव को अमरत्व (मोक्ष) की ओर ले जाने वाला एकमात्र दिव्य पथ है।
अंतिम प्रार्थना (विरह और भक्ति का चरम भाव)
जब जीव को इस दुर्लभ मनुष्य जन्म का और भगवान के प्रेम का वास्तविक ज्ञान हो जाता है, तब संसार के सभी विषय उसे नीरस लगने लगते हैं। तब वह केवल भगवान के दर्शन के लिए तड़पता है। अंत में, एक सच्चे भक्त के हृदय की उस विरह-वेदना में डूबकर, हे मेरे परम कृपालु नाथ! मैं आपसे आर्त भाव से यही प्रार्थना करता हूँ:
अमून्यधन्यानि दिनान्तराणि
हरे त्वदालोकनमन्तरेण ।
अनाथबन्धो करुणैकसिन्धो
हा हन्त हा हन्त कथं नयामि ।।
प्रार्थना का भावार्थ:
"हे हरि! हे मेरे प्राणनाथ! आपके श्रीमुख के दर्शन के बिना बीतने वाले ये सारे दिन मेरे लिए धन्य नहीं हैं, बल्कि ये अत्यन्त दुःखद, व्यर्थ और निष्फल हैं। हे अनाथों के बन्धु! हे करुणा के एकमात्र अथाह सागर! आपके दर्शन के अभाव में मैं जीवन के इन शेष दिनों को कैसे व्यतीत करूँ? हाय, हाय! यह विरह की अग्नि अब असहनीय हो गई है। कृपया शीघ्र आकर मुझे अपने श्रीचरणों की शरण प्रदान कीजिए।"
सब ते दुर्लभ कवन शरीरा? काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद और मनुष्य जन्म का रहस्य (Ramcharitmanas)

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