श्रीजगन्नाथाष्टकम् (आदि शंकराचार्य विरचित) — भावार्थ सहित
सनातन धर्म के प्रमुख चार धामों में से एक, श्री जगन्नाथ पुरी के अधिपति भगवान जगन्नाथ की स्तुति में आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित 'श्रीजगन्नाथाष्टकम्' एक अत्यंत मधुर, भक्तिपूर्ण और सिद्ध स्तोत्र है। जो भी साधक या भक्त पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ इस अष्टक का गान करता है, भगवान जगन्नाथ उसके सभी पापों का नाश कर उसे अपने परम धाम की प्राप्ति कराते हैं। आइए, भगवान श्री कृष्ण (जगन्नाथ स्वामी) की कृपा प्राप्त करने हेतु इस दिव्य स्तोत्र का संस्कृत मूल पाठ एवं उसका सरल हिंदी भावार्थ ग्रहण करें।
श्लोक १
कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीत-करवो
मुदा गोपी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः।
रमा-शम्भु-ब्रह्मामर-पति-गणेशार्चित-पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
मुदा गोपी-नारी-वदन-कमलास्वाद-मधुपः।
रमा-शम्भु-ब्रह्मामर-पति-गणेशार्चित-पदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
हे जगन्नाथ! जो यमुना तट के वृन्दावन में मधुर लीलाएँ करते हैं, गोपियों के प्रेमरस में निमग्न रहते हैं तथा जिनके चरणों की लक्ष्मी, शिव, ब्रह्मा, इन्द्र और गणेश भी पूजा करते हैं, वे प्रभु सदा मेरे नेत्रों के सम्मुख विराजमान रहें।
श्लोक २
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखि-पिच्छं कटि-तटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते।
सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते।
सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
जिनके बाएँ हाथ में बाँसुरी है, सिर पर मोरपंख सुशोभित है, कटि पर पीताम्बर शोभा दे रहा है और जिनकी चितवन सखाओं पर प्रेम बरसाती है, जो सदा वृन्दावन की लीलाओं में रमे रहते हैं—वे जगन्नाथ मेरे नेत्रों के सम्मुख रहें।
श्लोक ३
महाम्भोधेस्तीरे कनक-रुचिरे नील-शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना।
सुभद्रा-मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
वसन् प्रासादान्तः सहज-बलभद्रेण बलिना।
सुभद्रा-मध्यस्थः सकल-सुर-सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
जो समुद्र के तट पर स्थित स्वर्णमय नीलाचल धाम में अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं तथा देवताओं को भी दर्शन और सेवा का अवसर प्रदान करते हैं, वे भगवान जगन्नाथ मेरे नेत्रों के सम्मुख रहें।
श्लोक ४
कृपापारावारः सजल-जलद-श्रेणि-रुचिरो
रमा-वाणी-रामः स्फुरद्-अमल-पङ्केरुह-मुखः।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुति-गण-शिखा-गीत-चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
रमा-वाणी-रामः स्फुरद्-अमल-पङ्केरुह-मुखः।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुति-गण-शिखा-गीत-चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
जो असीम कृपा के सागर हैं, वर्षा-मेघ के समान श्यामल एवं मनोहर हैं, जिनका मुख निर्मल कमल के समान शोभायमान है, जिनकी महिमा वेद और देवता गाते हैं—वे जगन्नाथ मेरे नेत्रों के सम्मुख रहें।
श्लोक ५
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित-भूदेव-पटलैः
स्तुति-प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः।
दयासिन्धुर्बन्धुः सकल-जगतां सिन्धु-सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
स्तुति-प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः।
दयासिन्धुर्बन्धुः सकल-जगतां सिन्धु-सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
जो रथयात्रा के समय रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों की स्तुतियाँ करुणापूर्वक सुनते हैं, जो समस्त संसार के बन्धु और दया के सागर हैं, वे भगवान जगन्नाथ सदा मेरे नेत्रों के सम्मुख रहें।
श्लोक ६
परब्रह्मापीडः कुवलय-दलोत्फुल्ल-नयनः
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि।
रसानन्दो राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि।
रसानन्दो राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
जो स्वयं परब्रह्म हैं, जिनके नेत्र खिले हुए नीलकमल के समान सुन्दर हैं, जो नीलाचल में निवास करते हैं और जिनके चरण अनन्त शेष के मस्तक पर प्रतिष्ठित हैं, जो राधाजी के प्रेमरस में आनन्दित रहते है वे प्रभु मेरे नेत्रों के सम्मुख रहें।
श्लोक ७
न वै याचे राज्यं न च कनक-माणिक्य-विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल-जन-काम्यां वर-वधूम्।
सदा काले काले प्रमथ-पतिना गीत-चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
न याचेऽहं रम्यां सकल-जन-काम्यां वर-वधूम्।
सदा काले काले प्रमथ-पतिना गीत-चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
हे प्रभु! मैं न राज्य चाहता हूँ, न स्वर्ण, न रत्नों का वैभव, न ही संसार की प्रिय वस्तुएँ। मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि आप सदा मेरे नेत्रों के सम्मुख विराजमान रहें।
श्लोक ८
हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते।
अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चित-पदं
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते।
अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चित-पदं
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
भावार्थ:
हे देवाधिदेव! इस असार संसार के बन्धनों का शीघ्र नाश कीजिए। हे यादवश्रेष्ठ! मेरे समस्त पापों का नाश कीजिए। हे दीनों के नाथ! मुझे अपने श्रीचरणों में अटल स्थान प्रदान करें और सदैव मेरे नेत्रों के सम्मुख विराजमान रहें।
फलश्रुति (स्तोत्र पाठ का फल)
जगन्नाथाष्टकं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः।
सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥
सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति॥
भावार्थ:
जो मनुष्य श्रद्धा, पवित्रता और एकाग्र भाव से इस श्रीजगन्नाथाष्टक का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अंत में भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
॥ जय जगन्नाथ स्वामी ॥

