गुप्त नवरात्रि का रहस्य: दुर्लभ दश महाविद्या स्तोत्र, दान महिमा और प्रामाणिक सिद्ध मन्त्र
सनातन धर्म में शक्ति की उपासना का सर्वोच्च पर्व 'नवरात्रि' है। सामान्यतः लोग वर्ष में दो ही नवरात्रि (चैत्र और शारदीय) जानते हैं, जो देवी दुर्गा के ९ स्वरूपों की पूजा और बाहरी उत्सवों के लिए प्रसिद्ध हैं। परन्तु, आध्यात्मिक साधकों, तांत्रिकों और सिद्धों के लिए 'गुप्त नवरात्रि' (आषाढ़ और माघ) का महत्त्व सर्वाधिक है। 'गुप्त' का अर्थ है छिपा हुआ— अर्थात यह वह समय है जब दिखावे और उत्सव से दूर, साधक एकांत में अपनी आंतरिक ऊर्जा (कुंडलिनी) को जागृत करने के लिए 'दस महाविद्याओं' की गुप्त साधना करते हैं। इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत २०८३ तदनुसार १५ जुलाई २०२६ ईस्वी (बुधवार) से 'आषाढ़ गुप्त नवरात्रि' का दिव्य शुभारंभ हो रहा है, जिसका पारण २३ जुलाई २०२६ को होगा। आइए, इस महा-पर्व के सिद्ध मंत्रों, स्तोत्रों, दान-महिमा और दश महाविद्याओं के अत्यंत गूढ़ रहस्यों का विस्तार से दर्शन करें।
१. मंगलाचरण: विघ्नहर्ता और जगदम्बा की स्तुति
किसी भी महासाधना या महाविद्या की उपासना से पूर्व, भगवान श्री गणेश (विघ्नहर्ता) और भगवती आद्या शक्ति की स्तुति अनिवार्य है। इनके आशीर्वाद के बिना तंत्र या मंत्र की कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती।
नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नम: ।
कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम: ।।
सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम: ।
पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नम: ।।
सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नम: ।
अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नम: ।।
कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम: ।।
सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम: ।
पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नम: ।।
सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नम: ।
अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नम: ।।
भावार्थ (जगदम्बा स्तुति):
उन भगवती देवी को नमस्कार है जो साक्षात् प्रकृति हैं, जो सम्पूर्ण जगत की विधात्री (रचनाकार) हैं। जो कल्याणमयी, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, वृद्धि और सिद्धि स्वरूपा हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम है। जो सत्, चित् और आनन्द रूपिणी हैं, जो इस संसार रूपी महा-अरण्य (वन) का संचालन करती हैं, उन भुवनेश्वरी को नमस्कार है। जो समस्त विश्व का अधिष्ठान (आधार) हैं, जो कूटस्थ (अचल) हैं और जो ओंकार की अर्धमात्रा के रूप में हृदय में निवास करती हैं, उन महाशक्ति को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।
माता की स्तुति के पश्चात्, सिद्धि के देवता भगवान् गजानन का आवाहन किया जाता है:
वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ: ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥
नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं ।
गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च ॥
गजाननंभूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥
नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं ।
गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च ॥
गजाननंभूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥
भावार्थ (गणेश स्तुति):
हे हाथी के जैसे विशालकाय, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों की रश्मियों के समान है। हे प्रभु! मेरे इस साधना रूपी शुभ कार्य को सर्वदा विघ्न-रहित पूर्ण करें। मैं उन भगवान् गजानन की वन्दना करता हूँ, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, सुवर्ण तथा सूर्य के समान देदीप्यमान कान्ति से चमक रहे हैं। वे सर्प का यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करते हैं, एकदन्त हैं, लम्बोदर हैं तथा कमल के आसन पर विराजमान हैं। जो भूतगणों द्वारा सेवित हैं, कैथ और जामुन के फलों का भक्षण करते हैं, उन उमा-पुत्र और समस्त शोकों का विनाश करने वाले विघ्नेश्वर के चरण-कमलों में मैं प्रणाम करता हूँ।
!! ॐ दुं दुर्गायै नमः !!
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ।।
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ।।
२. दुर्लभ-दश महाविद्या स्तोत्रम् (सिद्ध स्तोत्र)
गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की साधना के समय इस अत्यंत 'दुर्लभ-दश महाविद्या स्तोत्रम्' का पाठ करने से साधक के जीवन से समस्त जन्म-जन्मांतर की बाधाओं का अंत हो जाता है। इस स्तोत्र के एक-एक श्लोक में अपार तान्त्रिक ऊर्जा छिपी है:
दुर्ल्लभं मारिणींमार्ग दुर्ल्लभं तारिणींपदम्। मन्त्रार्थ मंत्रचैतन्यं दुर्ल्लभं शवसाधनम्।।
श्मशानसाधनं योनिसाधनं ब्रह्मसाधनम्। क्रियासाधनमं भक्तिसाधनं मुक्तिसाधनम्।।
तव प्रसादाद्देवेशि सर्व्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः।।
नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी। नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनी।।
शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे। प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम्।।
जगत्क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम्। करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्।।
हरार्च्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम्। गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकार भूषिताम्।।
हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम्। सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम्।
मंत्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिंगशोभिताम्।। प्रणमामि महामायां दुर्गा दुर्गतिनाशिनीम्।।
उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम्। नीलां नीलघनाश्यामां नमामि नीलसुंदरीम्।।
श्यामांगी श्यामघटितांश्यामवर्णविभूषिताम्। प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्व्वार्थसाधिनीम्।।
विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम्। आद्यमाद्यगुरोराद्यमाद्यनाथप्रपूजिताम्।।
श्रीदुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मा सुरेश्वरीम्। प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम्।।
त्रिपुरासुंदरी बालमबलागणभूषिताम्। शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम्।।
सुंदरीं तारिणीं सर्व्वशिवागणविभूषिताम्। नारायणी विष्णुपूज्यां ब्रह्माविष्णुहरप्रियाम्।।
सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यगुणवर्जिताम्। सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्च्चितां सर्व्वसिद्धिदाम्।।
दिव्यां सिद्धि प्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम्। महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम्।।
प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम्।।
रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम्। भैरवीं भुवनां देवी लोलजीह्वां सुरेश्वरीम्।।
चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम्। त्रिपुरेशी विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम्।।
अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशीनीम्। कमलां छिन्नभालांच मातंगीं सुरसंदरीम्।।
षोडशीं विजयां भीमां धूम्रांच बगलामुखीम्। सर्व्वसिद्धिप्रदां सर्व्वविद्यामंत्रविशोधिनीम्।।
प्रणमामि जगत्तारां सारांच मंत्रसिद्धये।।
इत्येवंच वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम्। पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनी।।
कुजवारे चतुर्द्दश्याममायां जीववासरे। शुक्रे निशिगते स्तोत्रं पठित्वा मोक्षमाप्नुयात्।
त्रिपक्षे मंत्रसिद्धिः स्यात्स्तोत्रपाठाद्धि शंकरि।।
चतुर्द्दश्यां निशाभागे शनिभौमदिने तथा। निशामुखे पठेत्स्तोत्रं मंत्रसिद्धिमवाप्नुयात्।।
केवलं स्तोत्रपाठाद्धि मंत्रसिद्धिरनुत्तमा। जागर्तिं सततं चण्डी स्तोत्रपाठाद्भुजंगिनी।।
श्मशानसाधनं योनिसाधनं ब्रह्मसाधनम्। क्रियासाधनमं भक्तिसाधनं मुक्तिसाधनम्।।
तव प्रसादाद्देवेशि सर्व्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः।।
नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी। नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनी।।
शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे। प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम्।।
जगत्क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम्। करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्।।
हरार्च्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम्। गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकार भूषिताम्।।
हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम्। सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम्।
मंत्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिंगशोभिताम्।। प्रणमामि महामायां दुर्गा दुर्गतिनाशिनीम्।।
उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम्। नीलां नीलघनाश्यामां नमामि नीलसुंदरीम्।।
श्यामांगी श्यामघटितांश्यामवर्णविभूषिताम्। प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्व्वार्थसाधिनीम्।।
विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम्। आद्यमाद्यगुरोराद्यमाद्यनाथप्रपूजिताम्।।
श्रीदुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मा सुरेश्वरीम्। प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम्।।
त्रिपुरासुंदरी बालमबलागणभूषिताम्। शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम्।।
सुंदरीं तारिणीं सर्व्वशिवागणविभूषिताम्। नारायणी विष्णुपूज्यां ब्रह्माविष्णुहरप्रियाम्।।
सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यगुणवर्जिताम्। सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्च्चितां सर्व्वसिद्धिदाम्।।
दिव्यां सिद्धि प्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम्। महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम्।।
प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम्।।
रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम्। भैरवीं भुवनां देवी लोलजीह्वां सुरेश्वरीम्।।
चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम्। त्रिपुरेशी विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम्।।
अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशीनीम्। कमलां छिन्नभालांच मातंगीं सुरसंदरीम्।।
षोडशीं विजयां भीमां धूम्रांच बगलामुखीम्। सर्व्वसिद्धिप्रदां सर्व्वविद्यामंत्रविशोधिनीम्।।
प्रणमामि जगत्तारां सारांच मंत्रसिद्धये।।
इत्येवंच वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम्। पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनी।।
कुजवारे चतुर्द्दश्याममायां जीववासरे। शुक्रे निशिगते स्तोत्रं पठित्वा मोक्षमाप्नुयात्।
त्रिपक्षे मंत्रसिद्धिः स्यात्स्तोत्रपाठाद्धि शंकरि।।
चतुर्द्दश्यां निशाभागे शनिभौमदिने तथा। निशामुखे पठेत्स्तोत्रं मंत्रसिद्धिमवाप्नुयात्।।
केवलं स्तोत्रपाठाद्धि मंत्रसिद्धिरनुत्तमा। जागर्तिं सततं चण्डी स्तोत्रपाठाद्भुजंगिनी।।
स्तोत्र का आध्यात्मिक माहात्म्य:
यह स्तोत्र तंत्र शास्त्र का वह मणि है जो सामान्यतः दुर्लभ माना जाता है। गुप्त नवरात्रि की मध्य-रात्रि (निशीथ काल) में, या चतुर्दशी, अमावस्या, और मंगलवार/शनिवार की रात्रियों में इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को न केवल भौतिक सुख-समृद्धि, धन, कीर्ति और यश की प्राप्ति होती है, बल्कि उसके भीतर सोई हुई 'भुजंगिनी' (कुंडलिनी शक्ति) भी जाग्रत हो जाती है। यह स्तोत्र मारण, मोहन, उच्चाटन से लेकर अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' तक के सभी द्वार खोल देता है।
३. गुप्त नवरात्रि में दान की असीम महिमा (Daan Punya)
गुप्त नवरात्रि में पूजा-अर्चना के साथ-साथ सुपात्र को किए गए 'दान' का फल कई हजार गुना बढ़ जाता है। इससे साधक के जीवन में सुख-सौभाग्य, ऐश्वर्य और शांति का स्थायी आगमन होता है:
- अनाज का दान (अन्नदान): देवी को प्रसन्न करने और घर में माता अन्नपूर्णा का वास बनाए रखने के लिए गेहूं, चावल, जौ या अन्य अनाज का दान करना चाहिए। अन्नदान को प्राण-दान कहा गया है। इसे किसी योग्य ब्राह्मण या दरिद्र व्यक्ति को देने से घर की आर्थिक दरिद्रता जड़ से मिट जाती है।
- वस्त्र और आभूषण दान: माता के स्वरूप वाली कन्याओं या सुहागिन स्त्रियों को लाल, पीले या सफेद रंग के वस्त्र दान करें। सामर्थ्य हो तो सौभाग्य की प्राप्ति के लिए चांदी या सोने के छोटे आभूषण (जैसे बिछिया या नथ) दान करने से साक्षात् महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
- तिल और गुड़ का दान: तिल और गुड़ का विशेष तात्विक महत्व है। तिल के लड्डू या काले तिल दान करने से राहु-केतु और शनि जनित असाध्य दोष शांत होते हैं और पितरों को तृप्ति मिलती है।
- लाल चंदन और कुमकुम: देवी पूजा में उपयोग होने वाले लाल चंदन और कुमकुम का दान सुहागिनों को करने से वैवाहिक जीवन के क्लेश दूर होते हैं और पति की आयु बढ़ती है।
- गौ सेवा और गोदान: गुप्त नवरात्रि में गौ माता की सेवा (उन्हें हरा चारा खिलाना) या गोदान करने से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं। दान करते समय "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" इस नवार्ण मंत्र का मानसिक जाप अवश्य करना चाहिए।
न विज्ञातं न चागम्यं ना प्राप्यं दिवि चेह वा,
उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रिय आत्मनाम् ।।
उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रिय आत्मनाम् ।।
भावार्थ: "मन, बुद्धि एवं इंद्रियों को संयमित रखने वाले उद्यमशील (परिश्रमी और साधक) व्यक्ति के लिए पृथ्वी, आकाश और पाताल में कोई भी वस्तु अगम्य, अप्राप्य या अज्ञात नहीं है।" अर्थात, सही साधना से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
४. दश महाविद्या साधना: स्वरूप, रहस्य और सिद्ध मन्त्र
शास्त्रों का स्पष्ट वचन है: "व्रतानि यानिचान्यानि दानानि विविधानि च। नवरात्रव्रतस्यास्य नैव तुल्यानि भूतले।।" (अर्थात, पृथ्वी पर जितने भी व्रत और दान हैं, वे नवरात्रि व्रत की बराबरी नहीं कर सकते)। गुप्त नवरात्रि में दश महाविद्याओं की साधना की जाती है।
चेतावनी एवं नियम: महाविद्या साधना अत्यंत उग्र और ऊर्जावान होती है। इससे पहले, किसी योग्य गुरु से दीक्षा लेकर ही इन मंत्रों का जाप करना चाहिए। साधक अपनी योग्यता और गुरु-निर्देशानुसार नीचे दिए गए विभिन्न मंत्रों में से किसी एक का चयन कर सकते हैं।
(१) माता महाकाली (Kali Mahavidya)
दस महाविद्याओं में माता काली का स्थान प्रथम और सर्वोच्च है। वे काल (समय) और मृत्यु की अधिष्ठात्री हैं। उनके ४ प्रमुख स्वरूप हैं— दक्षिणा काली, श्मशान काली, मातृ काली और महाकाली। महाकाली दीक्षा प्राप्त करने वाला साधक बाह्य और आंतरिक शत्रुओं को क्षण भर में भस्म कर देता है।
श्री काली माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. एकाक्षरी काली मन्त्र:ॐ क्रीं
- 2. तीन अक्षरी काली मन्त्र:ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं॥
- 3. पञ्चाक्षरी काली मन्त्र:ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं हूँ फट्॥
- 4. षडाक्षर काली मन्त्र:ॐ क्रीं कालिके स्वाहा॥
- 5. सप्ताक्षरी काली मन्त्र:ॐ हूँ ह्रीं हूँ फट् स्वाहा॥
- 6. श्री दक्षिण काली मन्त्र (8 अक्षर):क्रीं ह्रुं ह्रीं दक्षिणेकालिके क्रीं ह्रुं ह्रीं स्वाहा॥
- 7. श्री दक्षिण काली मन्त्र (15 अक्षर):ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके स्वाहा॥
- 8. श्री दक्षिण काली मन्त्र (21 अक्षर):ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं॥
- 9. श्री दक्षिण काली मन्त्र (22 अक्षरी - सर्वोच्च मन्त्र):ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
- 10. श्री दक्षिण काली मन्त्र अन्य स्वरूप:ॐ ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥
- 11. भद्रकाली मन्त्र:ॐ ह्रौं काली महाकाली किलिकिले फट् स्वाहा॥
- 12. श्री श्मशान काली मन्त्र:ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं॥
जप विधान: गुरु आज्ञा से हकीक की माला (काले रंग की) या रुद्राक्ष से रात्रि में ९ माला जाप करें।
(२) माता तारा (Tara Mahavidya)
माता तारा संसार रूपी भवसागर से तारने (पार लगाने) वाली देवी हैं। तारा दीक्षा प्राप्त साधक के लिए भौतिक धन-दौलत तुच्छ हो जाते हैं। यह वाणी और असीम आर्थिक उन्नति की देवी हैं।
श्री तारा माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. एकाक्षरी तारा मन्त्र:ॐ त्रीं
- 2. तीन अक्षरी तारा मन्त्र:ॐ हूं स्त्रीं हूं॥
- 3. चतुराक्षर तारा मन्त्र:ॐ ह्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं॥
- 4. पञ्चाक्षरी तारा मन्त्र:ॐ ह्रीं त्रीं ह्रुं फट्॥
- 5. षडाक्षर तारा मन्त्र:ऐं ॐ ह्रीं क्रीं हूं फट्॥
- 6. सप्ताक्षर तारा मन्त्र:ॐ त्रीं ह्रीं, ह्रूं, ह्रीं, हुं फट्॥
- 7. हँस तारा मन्त्र:ऐं स्त्रीं ॐ ऐं ह्रीं फट् स्वाहा॥
जप विधान: नीले कांच या स्फटिक की माला से प्रतिदिन १२ माला जाप।
(३) माता त्रिपुरसुन्दरी / षोडशी (Tripura Sundari / Shodashi)
इन्हें 'षोडशी' या 'ललिता' भी कहा जाता है। ये तीनों लोकों (भू, भुवः, स्वः) में सबसे सुंदर हैं। गृहस्थ सुख, अनुकूल विवाह, रूप-यौवन, और चतुर्वर्ग की प्राप्ति के लिए यह श्रीविद्या साधना सर्वोत्तम है।
श्री षोडशी (त्रिपुरसुन्दरी) माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. देवी षोडशी मूल मन्त्र:ऐं सौः क्लीं॥
- 2. पञ्चाक्षर षोडशी मन्त्र:ऐं क्लीं सौः सौः क्लीं॥
- 3. षडाक्षर षोडशी मन्त्र:ऐं क्लीं सौः सौः क्लीं ऐं॥
- 4. अष्टदशाक्षर षोडशी मन्त्र (18 अक्षरी):ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिपुरामदने सर्वशुभं साधय स्वाहा॥
- 5. विंशत्याक्षर षोडशी मन्त्र (20 अक्षरी):ह्रीं श्रीं क्लीं परापरे त्रिपुरे सर्वमीप्सितं साधय स्वाहा॥
- 6. त्रिपुर सुन्दरी गायत्री मन्त्र:क्लीं त्रिपुरादेवि विद्महे कामेश्वरि धीमहि। तन्नः क्लिन्ने प्रचोदयात्॥
जप विधान: रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से १० माला जाप।
(४) माता भुवनेश्वरी (Bhuvaneshwari Mahavidya)
यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड (भुवन) की ईश्वरी हैं। माता भुवनेश्वरी 'ह्रीं' बीज मंत्र की धारिणी हैं। साधक को वशीकरण, चेतना-शक्ति, स्मरण-शक्ति और वाणी-सिद्धि प्राप्त होती है। दरिद्रता का नाश और अपार ऐश्वर्य इनकी कृपा का प्रत्यक्ष फल है।
श्री भुवनेश्वरी माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. एकाक्षरी भुवनेश्वरी मन्त्र:ह्रीं
- 2. त्र्यक्षरी भुवनेश्वरी मन्त्र:आं ह्रीं क्रों॥
- 3. अष्टाक्षर भुवनेश्वरी मन्त्र:आं श्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं ह्रीं श्रीं क्रों॥
- 4. एक बीजाक्षर युक्त मन्त्र:ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 5. द्वय बीजाक्षर युक्त मन्त्र:श्रीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 6. त्र्यय बीजाक्षर युक्त मन्त्र:ॐ श्रीं क्लीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 7. चतुराक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 8. पञ्चाक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ श्रीं ऐं क्लीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 9. षडाक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौंः भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 10. सप्ताक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौंः ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 11. अष्टाक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौंः क्लीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 12. नवाक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं क्लीं सौंः ऐं सौंः भुवनेश्वर्यै नमः॥
- 13. दशाक्षर बीज युक्त मन्त्र:ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौंः क्रीं हूं ह्रीं ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः
जप विधान: स्फटिक की माला से ११ माला जाप।
(५) माता छिन्नमस्ता (Chhinnamasta Mahavidya)
यह महाविद्या अत्यंत उग्र और रहस्यमयी है। छिन्नमस्ता की उपासना से सारस्वत-सिद्धि प्राप्त होती है। शत्रु नाश, कुतर्क पर विजय, असाध्य रोगों से मुक्ति और प्रबल लेखन-ज्ञान की वृद्धि होती है।
श्री छिन्नमस्ता माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. एकाक्षर छिन्नमस्ता मन्त्र:हूं॥
- 2. त्र्यक्षर छिन्नमस्ता मन्त्र:ॐ हूं ॐ॥
- 3. चतुराक्षर छिन्नमस्ता मन्त्र:ॐ हूं स्वाहा॥
- 4. पञ्चाक्षर छिन्नमस्ता मन्त्र:ॐ हूं स्वाहा ॐ॥
- 5. षडाक्षर छिन्नमस्ता मन्त्र:ह्रीं क्लीं श्रीं ऐं हूं फट्॥
- 6. छिन्नमस्ता गायत्री मन्त्र:ॐ वैरोचन्ये विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
जप विधान: रुद्राक्ष की माला से १० माला जाप (अत्यंत सावधानी और गुरु-निर्देश आवश्यक)।
(६) माता त्रिपुर भैरवी (Tripura Bhairavi Mahavidya)
माता भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवी हैं जो भुक्ति (भौतिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों एक साथ प्रदान करती हैं। इनकी साधना से समस्त प्रकार की ऊपरी बाधाओं और भयंकर शत्रुओं का समूल नाश होता है।
श्री त्रिपुर भैरवी माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. भैरवी मूल मन्त्र:ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा॥
- 2. त्र्यक्षरी भैरवी मन्त्र:ह्स्त्रैं ह्स्क्ल्रीं ह्स्त्रौंः॥
- 3. अष्टाक्षरी त्रिपुर भैरवी मन्त्र:हसैं हसकरीं हसैं॥
- 4. श्मशान भैरवी मन्त्र:श्मशान भैरवि नररुधिरास्थि - वसाभक्षिणि सिद्धिं मे देहि मम मनोरथान् पूरय हुं फट् स्वाहा॥
- 5. भैरवी गायत्री मन्त्र:ॐ त्रिपुरायै विद्महे महाभैरव्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
जप विधान: मूँगे की माला (लाल) से १५ माला जाप।
(७) माता धूमावती (Dhumavati Mahavidya)
दस महाविद्याओं में धूमावती ही एकमात्र ऐसी देवी हैं जो 'शून्यता', प्रलय, और अभाव की अधिष्ठात्री हैं। यह जीवन के दुःखों और दरिद्रता को सोख लेती हैं। इनकी साधना से साधक साहसी और तंत्र-बाधा मुक्त हो जाता है।
श्री धूमावती माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. सप्ताक्षर धूमावती मन्त्र:धूं धूमावती स्वाहा॥
- 2. अष्टाक्षर धूमावती मन्त्र:धूं धूं धूमावती स्वाहा॥
- 3. दशाक्षर धूमावती मन्त्र:धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा॥
- 4. चतुर्दशाक्षर धूमावती मन्त्र (14 अक्षरी):धूं धूं धुर धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा॥
- 5. पञ्चदशाक्षर धूमावती मन्त्र (15 अक्षरी):ॐ धूं धूमावती देवदत्त धावति स्वाहा॥
- 6. धूमावती गायत्री मन्त्र:ॐ धूमावत्यै विद्महे संहारिण्यै धीमहि। तन्नो धूमा प्रचोदयात्॥
जप विधान: मोती या काले हकीक की माला से ९ माला जाप। (साधक को सात्विक होना चाहिए)।
(८) माता बगलामुखी (Baglamukhi / Pitambara)
माता बगलामुखी 'स्तम्भन' (Stopping) की देवी हैं। पीताम्बरा रूप में पूजित माता बगलामुखी का साधक कोर्ट-कचहरी, राजनैतिक विवादों और भयंकर युद्धों में सदैव विजयी होता है। यह शत्रुओं की बुद्धि और वाणी को स्तम्भित कर देती हैं।
श्री बगलामुखी माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. एकाक्षरी बगलामुखी मन्त्र:ह्लीं॥
- 2. त्र्यक्षर बगलामुखी मन्त्र:ॐ ह्लीं ॐ॥
- 3. चतुराक्षर बगलामुखी मन्त्र:ॐ आं ह्लीं क्रों॥
- 4. पञ्चाक्षर बगलामुखी मन्त्र:ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्॥
- 5. अष्टाक्षर बगलामुखी मन्त्र:ॐ आं ह्लीं क्रों हुं फट् स्वाहा॥
- 6. नवाक्षर बगलामुखी मन्त्र:ह्रीं क्लीं ह्रीं बगलामुखि ठः॥
- 7. एकादशाक्षर बगलामुखी मन्त्र (11 अक्षरी):ॐ ह्लीं क्लीं ह्लीं बगलामुखि ठः ठः॥
- 8. बगलामुखी गायत्री मन्त्र:ह्लीं बगलामुखी विद्महे दुष्टस्तंभनी धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
जप विधान: हल्दी की माला या पीले कांच की माला से ८ माला जाप। (पीले वस्त्र धारण करें)।
(९) माता मातंगी (Matangi Mahavidya)
माता मातंगी को तांत्रिकों की सरस्वती कहा जाता है। इनकी पूजा करने से साधक को असाधारण वाक्-सिद्धि, सम्मोहन, गायन-वादन (संगीत और कलाओं) में महारत प्राप्त होती है। यह वैवाहिक सुख और आकर्षण की देवी हैं।
श्री मातंगी माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. अष्टाक्षर मातङ्गी मन्त्र:कामिनी रञ्जिनी स्वाहा॥
- 2. दशाक्षर मातङ्गी मन्त्र:ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा॥
- 3. मातङ्गी गायत्री मन्त्र:ॐ शुक्रप्रियायै विद्महे श्रीकामेश्वर्यै धीमहि तन्नः श्यामा प्रचोदयात्॥
जप विधान: स्फटिक की माला से १२ माला जाप।
(१०) माता कमलात्मिका (Kamala Mahavidya)
यह तांत्रिक महालक्ष्मी हैं। माता कमला धन-सम्पदा, चतुर्वर्ग लाभ, ऐश्वर्य और भौतिक सिद्धियों की परम अधिष्ठात्री हैं। यह देवी साधक के जीवन से घोर दरिद्रता और गृह-कलह को जड़ से मिटाकर वहां कीर्ति, आरोग्य और विजय स्थापित करती हैं।
श्री कमला माता के प्रामाणिक मन्त्र:
- 1. एकाक्षर कमला मन्त्र:श्रीं॥
- 2. द्वयक्षर साम्राज्य लक्ष्मी मन्त्र:स्ह्क्ल्रीं हं॥
- 3. त्र्यक्षर साम्राज्य लक्ष्मी मन्त्र:श्रीं क्लीं श्रीं॥
- 4. चतुराक्षर कमला मन्त्र:ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं॥
- 5. पञ्चाक्षर कमला मन्त्र:श्रीं क्लीं श्रीं नमः॥
- 6. नवाक्षर सिद्धि लक्ष्मी मन्त्र:ॐ ह्रीं हूं हां ग्रें क्षों क्रों नमः॥
- 7. दशाक्षरी कमला मन्त्र:नमः कमलवासिन्यै स्वाहा॥
जप विधान: कमलगट्टे की माला से प्रतिदिन १० माला जाप।
निष्कर्ष
गुप्त नवरात्रि केवल ९ दिनों का समय-चक्र नहीं है, यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के धरती पर अवतरण का वह स्वर्णिम काल है, जहाँ जीव अपनी क्षुद्र चेतना (अहंकार) को मिटाकर शिव और शक्ति से एकत्व स्थापित कर सकता है। दश महाविद्याओं की यह साधना मनुष्य को भौतिक भोग से लेकर आध्यात्मिक मोक्ष तक की पूर्णता प्रदान करती है। अतः श्रद्धा, संयम और योग्य गुरु के मार्गदर्शन में इस गुप्त नवरात्रि में भगवती की उपासना अवश्य करनी चाहिए।
॥ जय माता दी ॥
॥ जय माता दी ॥

