99% People Don't Know: सृष्टि का सबसे पहला राक्षस कौन था?

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
99% People Don't Know: सृष्टि का सबसे पहला राक्षस कौन था?
सनातन धर्म के अधिकांश जिज्ञासुओं से यदि पूछा जाए कि सृष्टि का सबसे पहला राक्षस कौन था? तो अधिकांश लोग हिरण्यकश्यपु, रावण, तारकासुर या महिषासुर का नाम लेते हैं। किंतु, सत्य इन सबसे कहीं अधिक प्राचीन और रहस्यमयी है। सृष्टि की रचना से बहुत पूर्व, जब न यह पृथ्वी थी, न अनंत आकाश, न सूर्य का प्रकाश था और न ही चंद्रमा की शीतलता; यहाँ तक कि जब 'समय' (काल) का भी कोई अस्तित्व नहीं था, तब जलप्रलय के उस घोर अंधकार में दो ऐसे महादैत्यों का जन्म हुआ था, जिन्होंने साक्षात् परब्रह्म भगवान श्रीहरि विष्णु को भी पाँच हजार वर्षों तक निरंतर युद्ध करने पर विवश कर दिया था। उनका नाम था— मधु और कैटभ

मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) और श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार, यह कथा केवल दो दैत्यों के जन्म और मृत्यु की सामान्य कहानी नहीं है। यह कथा प्रतीक है ब्रह्मांड के निर्माण की, वेदों (ज्ञान) की रक्षा की, अज्ञान रूपी अंधकार के नाश की और भगवान विष्णु की उस दिव्य बुद्धि की, जिसके सामने बड़े से बड़ा अहंकार भी चूर-चूर हो जाता है। आइए, कालचक्र के उस आदि बिंदु पर चलते हैं और इस अलौकिक कथा का विस्तार से दर्शन करते हैं।
१. मंगलाचरण: भगवान श्रीहरि और महामाया की स्तुति
इस ब्रह्मांडीय कथा को आरंभ करने से पूर्व, उन जगत्पालक भगवान विष्णु और योगनिद्रा स्वरूपा भगवती महामाया की स्तुति अनिवार्य है, जिनकी माया से यह संपूर्ण चराचर जगत संचालित होता है:
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥
भावार्थ:
जिनका स्वरूप अत्यंत शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल उद्गमित है, जो देवताओं के भी ईश्वर हैं, जो संपूर्ण विश्व के आधार हैं, आकाश के समान सर्वव्यापी हैं, मेघों के समान जिनका श्याम वर्ण है, जो माता लक्ष्मी के स्वामी हैं और योगियों द्वारा ध्यान में प्राप्त होते हैं, उन भव-भय (संसार के भय) को हरने वाले भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। इसी प्रकार, जो भगवती महामाया ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं, उन आद्या शक्ति को मेरा नमन है।
२. प्रलयकाल का दृश्य और मधु-कैटभ का रहस्यमयी जन्म
सृष्टि के आदि काल (कल्प के आरंभ) में चारों ओर केवल अनंत जल ही जल था। इसे शास्त्रों में 'एकार्णव' (Causal Ocean) कहा गया है। उस विराट और अथाह जलराशि के मध्य, सहस्र फनों वाले अनंत शेषनाग की दिव्य शय्या पर भगवान श्रीहरि विष्णु 'योगनिद्रा' में लीन थे। उनके हृदय में संपूर्ण आगामी सृष्टि का नक्शा और भविष्य छिपा था, किंतु अभी सृष्टि का विस्तार प्रारंभ नहीं हुआ था।
उसी समय, भगवान विष्णु के कानों से कुछ मैल (कर्णमल) बाहर आया। प्रभु की दिव्य और अनंत देह से उत्पन्न होने के कारण वह साधारण मैल नहीं था, बल्कि उसमें तामसी और राजसी शक्तियों का समावेश था। उसी कर्णमल से दो अत्यंत विशाल, भयंकर और तेजस्वी दैत्यों का जन्म हुआ। शास्त्रों में बताया गया है कि 'मधु' तमोगुण का और 'कैटभ' रजोगुण का प्रतीक था। जन्म लेते ही उनका शरीर विशाल पर्वतों के समान हो गया और उनकी शारीरिक शक्ति असाधारण थी। चूँकि उनका जन्म भगवान की देह से हुआ था, इसलिए वे साधारण असुरों की भांति दुर्बल नहीं थे; उनमें ईश्वरीय अंश की आभा और दानवी क्रूरता दोनों का मिश्रण था।
३. महाशक्ति की कठोर तपस्या और अजेय होने का वरदान
मधु और कैटभ जन्म से ही अत्यंत महत्वाकांक्षी थे। उन्होंने उस अनंत महासागर में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई और एक-दूसरे से कहा, "हम इस अथाह जलराशि में उत्पन्न हुए हैं, किंतु हमारी उत्पत्ति का कारण क्या है? यदि हमें इस ब्रह्मांड पर राज करना है और सबसे शक्तिशाली बनना है, तो हमें ऐसी शक्ति प्राप्त करनी होगी जिसे कोई भी देवता या शक्ति पराजित न कर सके।"
इसके बाद, दोनों दैत्यों ने समस्त भोगों और भूख-प्यास का त्याग कर दिया। उन्होंने महाशक्ति आदिशक्ति (भगवती वाग्बीज) की अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ कर दी। हजारों वर्षों तक वे बिना हिले-डुले निरंतर तप में लीन रहे। उनका तप इतना प्रचंड था कि उस जलमय ब्रह्मांड में भी उनके तप की अग्नि से प्रकंपन होने लगा। अंततः आदिशक्ति जगदम्बा उनके सामने प्रकट हुईं।
तुष्टाव तां तदा देवी वाग्बीजेन महासुरौ।
वरं वृणीष्वं दैत्येन्द्रौ यदभीष्टं तव हृदि॥
महादेवी ने प्रसन्न होकर कहा, "वत्स, मैं तुम्हारी इस अद्वितीय तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मांगो, क्या वरदान चाहते हो?"
दोनों दैत्यों ने बिना विलंब किए एक स्वर में कहा, "हे जगन्माता! यदि आप प्रसन्न हैं, तो हमें ऐसा वरदान दीजिए कि हमारी मृत्यु केवल और केवल हमारी अपनी इच्छा से हो। हमारे चाहे बिना काल भी हमारे प्राण न हर सके।"
महादेवी ने कुछ क्षण विचार किया और मुस्कुराते हुए बोलीं, "तथास्तु! (ऐसा ही हो)। तुम्हारी इच्छा के बिना कोई भी देवता, दानव, यक्ष या गंधर्व तुम्हारा वध नहीं कर सकेगा।" यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं।
४. अहंकार का उद्भव: ब्रह्मा जी पर आक्रमण और वेदों का हरण
'स्वेच्छा मृत्यु' (इच्छा मृत्यु) का यह अमोघ वरदान प्राप्त होते ही मधु और कैटभ के मन में भयंकर अहंकार (Ego) उत्पन्न हो गया। उन्हें लगने लगा कि अब तीनों लोकों और कालचक्र में कोई भी उनका सामना नहीं कर सकता। अभिमान से अंधे होकर वे उस जलराशि में उन्मत्त होकर घूमने लगे।
उसी समय भगवान विष्णु की नाभि से एक विशाल दिव्य कमल उत्पन्न हुआ था, जिस पर बैठकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना की तैयारी कर रहे थे। ब्रह्मा जी के पास चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) शब्द ब्रह्म के रूप में विद्यमान थे। इन्हीं वेदों के ज्ञान के आधार पर संपूर्ण सृष्टि, ग्रहों, नक्षत्रों और जीवन का निर्माण होना था।
घूमते-घूमते मधु और कैटभ उस नाभि-कमल के पास पहुँचे। उन्होंने ब्रह्मा जी को देखा और अहंकार में चूर होकर बोले, "अरे मूर्ख! तुम यहाँ बैठकर क्या कर रहे हो? यदि तुम स्वयं को सृष्टि का निर्माता मानते हो, तो पहले हमारे साथ युद्ध करके अपनी शक्ति सिद्ध करो। अन्यथा अपना स्थान छोड़ दो!"
ब्रह्मा जी अत्यंत सात्विक और शांतिप्रिय देवता हैं। वे कुछ समझ पाते या प्रतिवाद करते, उससे पहले ही उन दोनों महादैत्यों ने ब्रह्मा जी के हाथों से सृष्टि के मूल आधार— चारों वेदों —को छीन लिया और उन्हें लेकर महासागर की अथाह गहराइयों (पाताल) में छिप गए।
वेदों के हरण का ब्रह्मांडीय प्रभाव:
  • सृष्टि का रुक जाना: वेदों के बिना ज्ञान का प्रकाश लुप्त हो गया। ब्रह्मा जी भूल गए कि सृष्टि की रचना कैसे करनी है, क्योंकि वेद ही वह ब्लूप्रिंट (Blueprint) थे जिससे ब्रह्मांड बनना था।
  • समय का ठहरना: अंधकार छा गया और कालचक्र अपनी गति भूल गया।
  • देवताओं में त्राहि-त्राहि: सूक्ष्म रूप में विद्यमान सभी देव शक्तियां चिंतित हो उठीं कि यदि वेद वापस न आए, तो जगत का कभी प्राकट्य नहीं हो सकेगा।
५. ब्रह्मा जी द्वारा 'रात्रिसूक्त' से देवी की स्तुति
भयभीत और असहाय ब्रह्मा जी ने देखा कि जगत के रक्षक भगवान विष्णु अभी भी गहन योगनिद्रा में सो रहे हैं। ब्रह्मा जी ने प्रभु को जगाने का बहुत प्रयास किया, किंतु महामाया की योगनिद्रा से ग्रस्त होने के कारण श्रीहरि नहीं जागे। तब ब्रह्मा जी समझ गए कि जब तक भगवती योगनिद्रा प्रभु के नेत्रों से नहीं हटेंगी, तब तक सृष्टि की रक्षा नहीं हो सकती।
तब ब्रह्मा जी ने एकाग्रचित्त होकर भगवती योगनिद्रा (दुर्गा) की अत्यंत अद्भुत स्तुति की, जिसे आज 'रात्रिसूक्त' (तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त) के नाम से जाना जाता है:
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता॥
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्याविशेषतः।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा॥
प्रबोधय जगत्स्वामीं प्रसुप्तं योऽच्युतो जलौ।
तौ च मोहय दैत्येन्द्रौ मधुकैटभसंज्ञकौ॥
ब्रह्मा जी की पुकार:
"हे देवि! आप ही स्वाहा हैं, आप ही स्वधा हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही अमृत और नित्य अक्षर ब्रह्म हैं। हे जगन्माता! यह संपूर्ण विश्व आपके ही द्वारा रचा गया है। इस समय भगवान विष्णु आपकी योगनिद्रा के वशीभूत होकर सो रहे हैं। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप श्रीहरि के नेत्रों, मुख और हृदय से निकलकर उन्हें जगाएं, और उन दोनों क्रूर दैत्यों—मधु और कैटभ—के मन में मोह उत्पन्न करें, ताकि उनका नाश हो सके।"
६. श्रीहरि का जागरण और पाँच हजार वर्षों का महायुद्ध
ब्रह्मा जी की करुण पुकार सुनकर तामसी देवी योगनिद्रा भगवान विष्णु के नेत्रों, नासिका, बाहु और हृदय से निकलकर आकाश में खड़ी हो गईं। योगनिद्रा के हटते ही जगतपालक भगवान श्रीहरि विष्णु अपनी शय्या से उठ बैठे।
उन्होंने भयभीत ब्रह्मा जी को देखा और संपूर्ण स्थिति को अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया। भगवान तुरंत उस महासागर की अथाह गहराइयों की ओर बढ़े, जहाँ मधु और कैटभ वेदों को छिपाकर मद में चूर बैठे थे। भगवान ने वहाँ पहुंचकर अत्यंत शांत किंतु गंभीर स्वर में कहा, "मधु! कैटभ! वेद इस ब्रह्मांड की धरोहर हैं। इन्हें चुराना महापाप है। तुम इन्हें तुरंत वापस लौटा दो।"
भगवान का यह वचन सुनकर दोनों दैत्य जोर से अट्टहास करने लगे। उन्होंने कहा, "अब यह वेद हमारी संपत्ति हैं। यदि तुम्हें ये चाहिए, तो पहले हमें युद्ध में पराजित करके दिखाओ!"
इसके पश्चात् भगवान विष्णु और उन दोनों महादैत्यों के बीच ऐसा भीषण युद्ध (मल्लयुद्ध) प्रारंभ हुआ, जिसकी कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देती है।
महायुद्ध का रौद्र दृश्य:
  • यह युद्ध कोई अस्त्र-शस्त्र का युद्ध नहीं था, बल्कि यह 'बाहु-युद्ध' (Wrestling/Hand-to-hand combat) था, जो देव और दानव के बीच सीधे शारीरिक बल का प्रदर्शन था।
  • महासागर की लहरें प्रचंड हो उठीं। उनके पैरों की धमक से पाताल लोक कांपने लगा। ऐसा प्रतीत होता था मानो जलराशि उबलने लगी हो।
  • पाँच हजार वर्षों तक (5000 Years) यह निरंतर युद्ध चलता रहा। भगवान विष्णु ने अपने अनेक प्रहार किए, लेकिन महादेवी आदिशक्ति के 'इच्छा मृत्यु' के वरदान के कारण दोनों दैत्य बार-बार बच जाते। वे जितनी बार थकते या घायल होते, उतनी ही शक्ति से फिर खड़े हो जाते।
७. ईश्वरीय बुद्धि (Divine Intellect) का प्रयोग और माया का जाल
हजारों वर्षों के युद्ध के बाद भगवान विष्णु समझ गए कि केवल बाहुबल से या किसी भी अस्त्र (सुदर्शन चक्र आदि) से इन दोनों को नहीं मारा जा सकता, क्योंकि इनके पास भगवती का अमोघ वरदान है। जहाँ बल कार्य नहीं करता, वहाँ बुद्धि और नीति का प्रयोग करना चाहिए।
भगवान विष्णु ने आकाश में स्थित महामाया की ओर देखा। माता ने मुस्कुराकर अपनी माया का प्रयोग किया और दोनों दैत्यों की बुद्धि को मोह (अहंकार) से ढक दिया। अब भगवान विष्णु ने मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) आरंभ किया।
युद्ध के बीच भगवान अचानक रुक गए। वे मुस्कुराए और अत्यंत मधुर वाणी में बोले, "मधु और कैटभ! तुम दोनों वास्तव में अद्वितीय और महान योद्धा हो। आज तक तीनों लोकों में मैंने तुम्हारे समान पराक्रमी, बलवान और अथक योद्धा किसी को नहीं देखा। मैं तुम्हारे इस अपार शौर्य से अत्यंत प्रसन्न हूँ!"
अहंकार का मनोविज्ञान: अहंकार व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी होता है। जब आपके शत्रु से आपकी प्रशंसा हो, तो अहंकार चरम पर पहुँच जाता है। दोनों दैत्य, जो पहले से ही अपने बल के मद में अंधे थे, भगवान विष्णु के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर फूले नहीं समाए। उनकी बुद्धि महामाया के प्रभाव से पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी थी।
अत्यंत गर्व से छाती चौड़ी करते हुए वे बोले, "हे विष्णु! तुम भी कम वीर नहीं हो। तुमने पाँच हजार वर्षों तक हमारा सामना किया है। यदि तुम हमारे पराक्रम से इतने ही प्रसन्न हो, तो आज हम तुम्हें वरदान देना चाहते हैं। मांगो, क्या वरदान चाहते हो?"
८. चतुर वरदान और मृत्यु की शर्त
भगवान विष्णु तो इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अत्यंत शांत और दृढ़ स्वर में कहा, "यदि तुम सचमुच मुझे वर देना ही चाहते हो, और अपने वचन के पक्के हो, तो मुझे केवल यही वरदान दो कि तुम्हारा वध मेरे ही हाथों से हो!"
भगवान की यह बात सुनते ही दोनों दैत्यों के पैरों तले जमीन खिसक गई (यद्यपि वहाँ केवल जल था)। वे एक क्षण के लिए स्तब्ध और मौन हो गए। उन्हें तुरंत समझ आ गया कि वे अपनी ही वाणी के जाल में बुरी तरह फंस चुके हैं। 'इच्छा मृत्यु' का वरदान होने के बावजूद, उन्होंने स्वयं ही विष्णु को उन्हें मारने का वरदान (इच्छा) दे दिया था।
किंतु दैत्य होकर भी वे अपने वचन से पीछे नहीं हट सकते थे। उन्होंने चारों ओर देखा, हर जगह केवल जल ही जल था। अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने एक अंतिम चाल चली और एक जटिल शर्त रख दी। उन्होंने कहा, "ठीक है, हम अपना वचन नहीं तोड़ेंगे। तुम हमारा वध कर सकते हो। लेकिन हमारी एक शर्त है—हमारा वध ऐसी जगह होना चाहिए जो पूरी तरह सूखी हो, जहाँ जल की एक भी बूंद न हो। (यही जघने यत्र नोर्वी सलिलेन परिप्लुता)।" उन्हें लगा कि जब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न है, तो विष्णु सूखी जगह कहाँ से लाएंगे।
९. विराट स्वरूप, सुदर्शन चक्र और 'मेदिनी' (पृथ्वी) का निर्माण
भगवान विष्णु मुस्कुराए, क्योंकि भगवान की योजना के आगे कोई बुद्धि नहीं टिक सकती। उन्होंने तुरंत अपने शरीर को विस्तारित किया और अपना विराट स्वरूप (Cosmic Form) धारण कर लिया। भगवान ने जल से बाहर अपनी दोनों विशाल जांघों (Thighs) को ऊपर उठा दिया, जो पूरी तरह जलरहित (सूखी) थीं।
भगवान ने गर्जना करते हुए कहा, "देखो मधु और कैटभ! मेरी जांघों पर कोई जल नहीं है। यहाँ आओ और अपना सिर रखो।" वचनबद्ध होने के कारण दोनों दैत्यों को विवश होकर भगवान की जांघों पर अपना सिर रखना पड़ा।
अगले ही क्षण, भगवान विष्णु ने अपने महाविनाशकारी 'सुदर्शन चक्र' का आह्वान किया। सुदर्शन चक्र करोड़ों सूर्यों के तेज के साथ बिजली की गति से घूमता हुआ आया और देखते ही देखते दोनों महादैत्यों के शीश धड़ से अलग कर दिए।
मेदोभ्यां जलयुक्ताभ्यां तदा मेदिनि निर्मिता।
मधुकैटभयोर्नाशात् वेदोद्धारः कृतो हरिः॥
पृथ्वी का नाम 'मेदिनी' क्यों पड़ा?
पुराणों के अनुसार, जब मधु और कैटभ का वध हुआ, तो उनके शरीर से अपार मात्रा में मेद (चर्बी/Fat) निकला। वह मेद उस अनंत जलराशि में फैल गया और सूर्य के ताप से सूखकर ठोस हो गया। उसी ठोस तत्व से इस पृथ्वी का निर्माण हुआ। इसी कारण पृथ्वी का एक नाम 'मेदिनी' भी है, जो मधु और कैटभ के 'मेद' (चर्बी) से बनी है।
१०. वेदों की पुनर्स्थापना और सृष्टि का आरंभ
उन दोनों महादानवों के प्राण निकलते ही महासागर शांत हो गया। स्वर्ग में देवताओं ने पुष्प वर्षा की और राहत की सांस ली। भगवान विष्णु ने पाताल से चारों वेदों (ज्ञान के पुंज) को सुरक्षित निकाला और उन्हें अत्यंत सम्मान के साथ ब्रह्मा जी को सौंप दिया।
ब्रह्मा जी ने वेदों को अपने हृदय से लगाया और भगवान श्रीहरि को साष्टांग प्रणाम करते हुए कहा, "हे प्रभु! आपकी माया और आपकी बुद्धि अगम्य है। यदि आप न होते, तो इन वेदों के बिना मैं इस सृष्टि की रचना कभी नहीं कर पाता।"
इसके पश्चात्, वेदों में निहित ज्ञान और ध्वनि विज्ञान (Sound Frequencies) के आधार पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण प्रारंभ किया। पृथ्वी (मेदिनी) व्यवस्थित हुई, आकाश बना, सूर्य और चंद्रमा ने दिशाओं को प्रकाशित किया, नवग्रह स्थापित हुए और अंततः विभिन्न योनियों में जीवन का विस्तार प्रारंभ हुआ।
निष्कर्ष एवं आध्यात्मिक संदेश
मधु और कैटभ की यह कथा केवल इतिहास या पौराणिक घटना मात्र नहीं है; यह मानव जीवन का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक दर्शन है। मधु 'राग' (Attachment) का प्रतीक है और कैटभ 'द्वेष' (Aversion/Ego) का। जब मनुष्य के भीतर राग और द्वेष (मधु-कैटभ) अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं, तो वे मनुष्य की बुद्धि और ज्ञान (वेदों) को हर लेते हैं।

यह कथा हमें सिखाती है कि केवल शारीरिक या भौतिक बल कभी पर्याप्त नहीं होता। अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, कितनी भी सिद्धियां या वरदान क्यों न प्राप्त कर ले, अंततः वह ईश्वर की नीति, धर्म और दिव्य बुद्धि के सामने टिक नहीं सकता। यही कारण है कि भगवान विष्णु को केवल जगत का 'पालनकर्ता' ही नहीं, बल्कि धर्म, नीति और ज्ञान का सर्वोच्च रक्षक भी माना जाता है।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
Madhu Kaitabh Vadh Story in Hindi: सृष्टि के पहले राक्षस और भगवान विष्णु का विराट स्वरूप

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!