स्वदेश (सम्पूर्ण कविता, भावार्थ एवं अभ्यास-कार्य)
- १. सम्पूर्ण कविता (17 पंक्तियाँ) (प्रारंभिक पंक्तियों से लेकर अंतिम पंक्ति तक)
- २. कवि-परिचय (गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' का जीवन एवं कृतियाँ)
- ३. सम्पूर्ण पद-वार भावार्थ (तीनों पदों की सरल एवं विस्तृत व्याख्या)
- ४. मेरी समझ से & मिलान करें (MCQs एवं सही अर्थ का मिलान)
- ५. सोच-विचार & प्रश्नोत्तर (पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्न)
- ६. भाषा की बात & व्याकरण (समानार्थी शब्द, योजक चिह्न एवं अस्त्र-शस्त्र)
सम्पूर्ण मूल कविता — स्वदेश
जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार-संग, उसका होता संसार नहीं।
जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं।
जिससे न जाति-उद्धार हुआ, होगा उसका उद्धार नहीं।
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े, पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं माता-पिता बंधु जिसमें, हम हैं जिसके राजा-रानी।।
जिसने कि खजाने खोले हैं, नव रत्न दिये हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी।।
उस पर है नहीं पसीजा जो, क्या है वह भू का भार नहीं।
निश्चित है निस्संशय निश्चित, है जान एक दिन जाने को।
है काल-दीप जलता हरदम, जल जाना है परवानों को।
सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
✦ कवि से परिचय
'स्वदेश' कविता के रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883-1972) हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में हुआ था। उन्होंने ब्रजभाषा में कविता लिखना प्रारंभ कर खड़ी बोली के श्रेष्ठ कवियों में अपना स्थान बनाया। वे एक प्रखर राष्ट्रभक्त कवि थे। सरकारी नौकरी में होने के कारण वे अपनी राष्ट्रीय ओजस्वी रचनाएँ 'त्रिशूल' उपनाम से लिखते थे। उनकी उल्लेखनीय रचनाओं में 'त्रिशूल तरंग', 'राष्ट्रीय मंत्र' तथा 'कृषक क्रंदन' प्रमुख हैं।
कविता का पद-वार सम्पूर्ण भावार्थ
✦ प्रथम पद (पंक्ति १ से ७) का भावार्थ
"वह हृदय नहीं है पत्थर है... स्वदेश का प्यार नहीं।"
भावार्थ: कवि कहते हैं कि जिस मनुष्य के मन में अपनी मातृभूमि के प्रति रंचमात्र भी प्रेम नहीं है, उसका हृदय जीवित मानव का हृदय नहीं बल्कि संवेदनहीन पत्थर के समान है। जिसके भीतर जीवन का उत्साह, देशभक्ति और ओज नहीं जगा, उसका जीवन व्यर्थ है। जो व्यक्ति समय और संसार की प्रगति के साथ कदम मिलाकर नहीं चलता, यह संसार कभी उसका आदर नहीं करता। जिसने कठिनाइयों के सामने अपना साहस खो दिया, वह अपने जीवन का लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं कर सकता। जिसके प्रयासों से अपनी जाति, समाज और देश का उत्थान नहीं हुआ, उसका स्वयं का उद्धार भी संभव नहीं है। जिसके मन में देश-प्रेम और करुणा की रस-धार नहीं बहती, वह मनुष्य निष्प्राण है।
✦ द्वितीय पद (पंक्ति ८ से ११) का भावार्थ
"जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े... दुनिया दीवानी।।"
भावार्थ: कवि भारतभूमि का पावन स्मरण करते हुए कहते हैं कि जिस मातृभूमि की धूल-मिट्टी में पलकर हम बड़े हुए हैं, जहाँ से हमें भोजन के लिए दाना और पीने के लिए पानी मिला है; जिस पवित्र भूमि पर हमारे माता-पिता, भाई-बंधु और आत्मीय जन निवास करते हैं और जिसके स्वतंत्र नागरिक के रूप में हम शान से रहते हैं; जिस भारतमाता ने हमारे विकास के लिए अपने अमूल्य संपदा के खजाने खोल दिए हैं तथा बेजोड़ (लासानी) नौ रत्न व संसाधन प्रदान किए हैं, जिसकी ज्ञान-परंपरा और संस्कृति पर बड़े-बड़े विद्वान भी गर्व करते हैं और पूरी दुनिया जिसकी दीवानी है, ऐसी मातृभूमि सर्वथा वंदनीय है।
✦ तृतीय पद (पंक्ति १२ से १७) का भावार्थ
"उस पर है नहीं पसीजा जो... स्वदेश का प्यार नहीं।"
भावार्थ: कवि कहते हैं कि ऐसी उपकारी मातृभूमि के प्रति जिसका हृदय नहीं पसीजता (जिसमें देश-प्रेम और कर्तव्यबोध नहीं जागता), वह मनुष्य इस धरती पर भार के समान है। यह बात निसंदेह सत्य और निश्चित है कि यह मानव शरीर एक न एक दिन अंत को प्राप्त होगा। जिस प्रकार परवाने काल-रूपी दीपक की लौ पर बिना झिझक के न्योछावर हो जाते हैं, उसी प्रकार सच्चे राष्ट्रभक्तों को भी देश के गौरव और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। राष्ट्र का उत्थान और रक्षा हमारे अपने संकल्प और हाथों में है; असली ताकत बाहरी शस्त्रों (तोप या तलवार) में नहीं बल्कि हमारे अपने आत्मबल और राष्ट्र-प्रेम में है।
अभ्यास-कार्यम् : मेरी समझ से एवं मिलान
✦ मिलकर करें मिलान (स्तम्भ १ एवं स्तम्भ २)
| स्तम्भ १ (कविता की पंक्ति) | स्तम्भ २ (सही अर्थ / संदर्भ) |
|---|---|
| १. जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं। | जिसने किसी कार्य को करने का साहस छोड़ दिया हो वह किसी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। |
| २. जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं। | जो स्वयं के साथ ही दूसरों को भी प्रेरित और उत्साहित नहीं कर सकते उनका जीवन निष्फल और अर्थहीन है। |
| ३. जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी। | जिसकी ज्ञानसंपदा से समूचा विश्व प्रभावित है। |
| ४. सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं। | जिस प्रकार युद्ध में तोप और तलवार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मनुष्य की प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। |
अभ्यास-कार्यम् : सोच-विचार एवं प्रश्नोत्तर
भाषा की बात (व्याकरण एवं शब्द-ज्ञान)
✦ (क) समानार्थी शब्द तालिका
| मूल शब्द | समानार्थी शब्द १ | समानार्थी शब्द २ |
|---|---|---|
| दीपक | दीप | प्रदीप |
| हृदय | दिल | जी |
| तलवार | कृपाण | असि |
| दुनिया | संसार | जग |
| पत्थर | पाषाण | पाहन |
| पृथ्वी | धरा | भू / भूमण्डल |
✦ (ख) योजक चिह्न (-) का प्रयोग तथा अर्थ-विस्तार
• दाना-पानी: दाना और पानी (भोजन एवं जल)
• माता-पिता: माता और पिता
• राजा-रानी: राजा और रानी
• काल-दीप: काल का दीप
• संसार-संग: संसार के संग
✦ (ग) देश-प्रेमियों के अस्त्र-शस्त्र (साधन एवं कर्तव्य)
• विद्यार्थी: सत्य, विद्या एवं कलम
• अध्यापक: ज्ञान, संस्कार एवं चरित्र-निर्माण
• कृषक: हल, परिश्रम एवं अन्न-उत्पादन
• चिकित्सक: करुणा, चिकित्सा एवं जीवन-रक्षण
• वैज्ञानिक: अनुसंधान एवं नवाचार
• श्रमिक: कठिन परिश्रम एवं निर्माण

