Class 8 Hindi Malhar Chapter 4 Haridwar | हरिद्वार पाठ का सारांश एवं प्रश्नोत्तर

Sooraj Krishna Shastri
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हरिद्वार (यात्रा-वर्णन)

चतुर्थः पाठः (पाठ ४) — मल्हार (कक्षा ८)
  • १. पाठ का सारांश (हरिद्वार यात्रा-वृत्तांत का मूल भाव)
  • २. लेखक-परिचय (भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन एवं कृतियाँ)
  • ३. मेरी समझ से & मिलान करें (MCQs एवं पौराणिक संदर्भ मिलान)
  • ४. सोच-विचार & प्रश्नोत्तर (पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न)
  • ५. भाषा की बात & व्याकरण (आदरार्थ बहुवचन, प्राचीन भाषा शैली एवं काल)

पाठ का सारांश एवं लेखक-परिचय

पाठ का सारांश

'हरिद्वार' आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखा गया एक सुंदर यात्रा-संस्मरण (पत्र) है, जो 14 अक्टूबर 1871 को 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक के नाम लिखा गया था। इसमें लेखक ने अपनी हरिद्वार-यात्रा का अत्यंत सजीव, आध्यात्मिक और प्राकृतिक वर्णन किया है। हरिद्वार तीन ओर से हरे-भरे पर्वतों से घिरा है। गंगाजी का निर्मल और बर्फीला शीतल जल, 'हरि की पैड़ी' घाट, नीलधारा, बिल्व पर्वत और कनखल का उल्लेख इस पत्र में मिलता है। लेखक ने गंगा तट पर स्वयं भोजन बनाकर पत्थर पर खाने का जो अलौकिक आनंद महसूस किया, उसे सोने की थाली के सुख से भी बढ़कर माना है। यह पत्र लगभग 150 वर्ष पुरानी हिंदी भाषा की सुंदर झांकी प्रस्तुत करता है।

लेखक-परिचय (भारतेंदु हरिश्चंद्र)

भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह और युग-प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने "निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल" का अमर संदेश दिया। उन्होंने कविता, नाटक, निबंध, और यात्रा-वृत्तांत जैसी अनेक विधाओं में गद्य को समृद्ध किया। उन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका और महिलाओं के लिए बालाबोधिनी पत्रिकाओं का संपादन किया। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी तथा सरयूपार की यात्रा विशेष उल्लेखनीय हैं।

अभ्यास-कार्यम् : मेरी समझ से

(१) "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" का क्या अर्थ है?
उत्तर: लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
(२) "वैराग्य और भक्ति का उदय होता था" इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
उत्तर: मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव।
(३) "पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था" इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
उत्तर: संतुष्टि में ही सच्चा सुख होता है।
(४) "श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर पर भोजन किया" यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?
उत्तर: सादगी, स्वच्छता और प्रकृति प्रेम।
(५) लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
उत्तर: आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक।
(६) पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?
उत्तर: सरलता, सजीवता और चित्रात्मकता।

मिलकर करें मिलान (शब्द एवं पौराणिक / भौगोलिक संदर्भ)

शब्द पौराणिक एवं भौगोलिक संदर्भ
हरिद्वार यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है, जहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।
गंगा भारतवर्ष की प्रधान नदी जो हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है (भागीरथी, अलकनंदा आदि)।
भगीरथ अयोध्या के सूर्यवंशी राजा जो घोर तपस्या करके गंगा जी को पृथ्वी पर लाए थे।
चण्डिका मान्यताओं के अनुसार दुर्गा माता का एक रूप। (नीलधारा के तट पर शिखर पर मंदिर)
भागवत अठारह पुराणों में सर्वप्रसिद्ध ग्रंथ जिसमें श्रीकृष्ण की लीला कथाएँ वर्णित हैं।
दालचीनी दक्षिण भारत में मिलने वाले एक वृक्ष की सुगंधित छाल जो मसाले और औषधि के काम आती है।

अभ्यास-कार्यम् : सोच-विचार एवं प्रश्नोत्तर

(क) "और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ..." यह वाक्य क्या दर्शाता है?
उत्तर: यह वाक्य लेखक का हरिद्वार के प्रति अगाध प्रेम और आध्यात्मिक जुड़ाव दर्शाता है। उनका शरीर भले लौट आया हो, पर उनका मन अब भी हरिद्वार के पवित्र वातावरण में ही रमा हुआ था।
(ख) "पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।" लेखक का यह कथन आज कितना सच है?
उत्तर: लेखक के समय (1871 ई.) में साधु-पंडों में त्याग और संतोष का भाव था। आज के व्यावसायिक युग में ऐसे संतोषी लोग दुर्लभ हैं, हालाँकि कुछ स्थानों पर अब भी निष्काम सेवा भाव वाले साधु मिल जाते हैं।
(ग) लेखक ने दीवान कृपा राम के बंगले को 'टिकने योग्य' क्यों कहा?
उत्तर: वह स्थान चारों ओर से शीतल पवन से युक्त, शांत, स्वच्छ और गंगातट के निकट स्थित था, जहाँ साधना, अध्ययन और विश्राम के लिए उत्तम वातावरण प्राप्त होता था।
(घ) वृक्षों के फल, फूल, छाल, लकड़ी और राख से लोगों के मनोरथ पूर्ण होने से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इससे वृक्षों के निस्वार्थ परोपकार का बोध होता है। वृक्ष जीवित रहते फल, छाया और ऑक्सीजन देते हैं तथा सूखने या जलने के बाद भी राख व कोयले के रूप में मानव जाति की सेवा करते हैं।

भाषा की बात (व्याकरण एवं भाषा-शैली)

(क) आदरार्थ बहुवचन का प्रयोग ('है' बनाम 'हैं')

जब एकवचन संज्ञा शब्द के प्रति आदर व सम्मान प्रकट करना हो, तो क्रिया बहुवचन में प्रयुक्त होती है। जैसे: "गंगा जी ही देवता हैं।"

• १. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं

• २. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं

• ३. मेरी बहन बाजार जा रही है

• ४. बाहर फेरीवाला आया है

• ५. डाकिया जी आए हैं

• ६. आप तो बहुत दिन बाद आए हैं

• ७. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं

• ८. आपके माता-पिता कहाँ हैं?

• ९. ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं

• १०. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है

(ख) प्राचीन भाषा-शैली का आधुनिक रूप

प्राचीन रूप: "इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।"
आधुनिक रूप: इन पेड़ों पर अनेक रंगों के पक्षी चहचहाते हैं और शहर के दुष्ट शिकारियों से बेखौफ होकर क्रीड़ा करते हैं।

प्राचीन रूप: "शिखर के लिए शिषर, यात्रियों के लिए जात्रियों।"
मानक रूप: शिखर, यात्री।

(ग) पहेली उत्तर (पाठ से खोजे गए शब्द)

• १. मसाले का नाम: दालचीनी

• २. कपास से जुड़ा शब्द: जनेऊ / सूत

• ३. जहाँ स्नान होता है: हरि की पैड़ी (घाट)

• ४. वृक्ष का अंग: वल्ली / छाल / जड़

• ५. तीर्थ का नाम: कनखल / कुशावर्त्त

• ६. एक पर्वत का नाम: विल्वपर्वत

• ७. एक नदी का नाम: गंगा (नीलधारा)

• ८. धार्मिक ग्रंथ का नाम: भागवत

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