पर्यावरण संरक्षण: Gen Z और Gen Alpha से एक शिक्षक की विनम्र अपील

मृत्युंजय"काश्विका"
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🌿 प्रकृति रक्षण: एक शिक्षक का विनम्र आह्वान - वर्तमान और भावी पीढ़ियों (Gen Z & Alpha) के लिए 🌍
मुझे नहीं पता कि मैं जो कहने जा रहा हूँ उसका किस पर कितना प्रभाव पड़ेगा! मैं नहीं जानता कि हमारी Gen Z (जेन ज़ी) और Gen-Alpha (जेन-अल्फा) मेरे इस अपील को कितना सकारात्मक रूप में लेगी! मैं यह भी नहीं जानता कि मेरी इस एक छोटी सी अपील से वास्तव में रातों-रात कोई बड़ा बदलाव आएगा या नहीं! लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि कोई भी प्राकृतिक आपदा (चाहे वह बाढ़ हो, सूखा हो, या भयंकर गर्मी) हमारा नुकसान अवश्य करती है। और यदि हम गहराई से आत्ममंथन करें, तो कहीं न कहीं इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण हम स्वयं ही हैं। आज के इस उपभोक्तावादी युग में हमने प्रकृति का इतना दोहन कर लिया है कि अब वह अपने रौद्र रूप में चेतावनी दे रही है। यह लेख केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक शिक्षक के हृदय की वह पीड़ा और पुकार है, जो अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित देखना चाहता है।
१. क्षणिक सुख बनाम दीर्घकालिक विनाश
आजकल जब अत्यधिक बारिश (Rainy Day), भयंकर शीतलहर, या भीषण गर्मी (नौतपा) के कारण विद्यालयों की छुट्टियाँ घोषित कर दी जाती हैं, तो बच्चों को इस छुट्टी का क्षणिक आनंद अवश्य मिल सकता है। उन्हें लगता है कि चलो, आज पढ़ने नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन यदि हम एक दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य (Long-term perspective) में सोचें, तो पाएंगे कि इस जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से हमारा कितना भयानक नुकसान हो रहा है। अत्यधिक गर्मी के कारण भूजल स्तर गिर रहा है, फसलें बर्बाद हो रही हैं, और बेमौसम बारिश से जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
उस बीते समय की और पर्यावरण की क्षतिपूर्ति कोई नहीं कर सकता। विज्ञान और तकनीक कितनी भी तरक्की क्यों न कर लें, वे एक नई पृथ्वी का निर्माण नहीं कर सकते। इसलिए सभी अभिभावकों, युवाओं, और विशेषकर बच्चों से मेरी विनम्र अपील है कि किसी भी तरह से, जितना संभव हो सके, पर्यावरण को क्षति से बचाएँ। आपका एक छोटा सा प्रयास भी ब्रह्मांडीय स्तर पर बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।
२. सनातन धर्म और पर्यावरण: वेदों का संदेश
हमारी संस्कृति (Sanatan Dharma) में प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं माना गया, बल्कि उसे 'माता' का दर्जा दिया गया है। अथर्ववेद का भूमि सूक्त स्पष्ट रूप से हमें हमारे कर्तव्यों का बोध कराता है:
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु ॥ यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः । यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु ॥
भावार्थ (भूमि सूक्त):
"यह भूमि (पृथ्वी) मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ। पर्जन्य (मेघ/वर्षा) मेरे पिता हैं, वे हमारा पालन-पोषण करें। जिस भूमि में महासागर, नदियाँ और जल समाहित हैं, जिसमें अन्न उत्पन्न होता है और कृषिकार्य होते हैं, जिसमें साँस लेने वाले और विचरण करने वाले सभी प्राणी जीवन धारण करते हैं, वह मातृभूमि हमें प्रथम पेय (जीवनदायी जल और अन्न) प्रदान करे।"
जब हमारे वेद पृथ्वी को माता कहते हैं, तो उस माता को प्लास्टिक, कूड़े और प्रदूषण से दूषित करना साक्षात् मातृ-द्रोह है। भगवत दर्शन का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जो प्रकृति की रक्षा करता है, प्रकृति उसकी रक्षा करती है (प्रकृतिः रक्षति रक्षिता)
३. पर्यावरण बचाने के १० व्यावहारिक और अचूक उपाय
मैंने अपने जीवन और शिक्षण के अनुभव से कुछ बहुत ही छोटी, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण चीजें महसूस की हैं। जिन्हें आज की पीढ़ी और कल के भविष्य से मैं साझा कर रहा हूँ। यदि आपको ये थोड़े भी स्वीकार्य लगें, तो इन्हें अपनी दिनचर्या में अपनाकर आप अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं:
१. पैकेट बंद खाद्य पदार्थ और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का त्याग
आज की युवा पीढ़ी चिप्स, कुरकुरे, बिस्कुट और अन्य पैकेट बंद स्नैक्स की बहुत अधिक आदी हो चुकी है। ये न केवल हमारे स्वास्थ्य (पाचन तंत्र) के लिए हानिकारक हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए मीठा जहर हैं। इनका उपयोग सीमित करें। और यदि आप इनका उपयोग करते भी हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका रैपर इधर-उधर सड़क पर, नाली में या पार्कों में न फेंकें। उसे हमेशा कूड़ेदान (Dustbin) में ही डालें। यदि आस-पास कोई कूड़ेदान नहीं है, तो उस रैपर को अपनी जेब या बैग में सुरक्षित रखें। जब भी कहीं कूड़ेदान दिखे, तभी उसमें डालें। यह छोटी सी आदत हमारे शहरों और नालियों को चोक होने से बचा सकती है।
२. पेनों की रीफिलिंग (Refill): एक छोटी आदत, बड़ा बदलाव
हम पढ़ाई के लिए हर महीने कई पेन खरीदते हैं। यूज़ एंड थ्रो (Use and Throw) पेनों ने दुनिया भर में प्लास्टिक कचरे का एक पहाड़ खड़ा कर दिया है। मेरी अपील है कि अगली बार जब आप कलम खरीदें, तो नया पेन लेने के बजाय दुकानदार से रिफिल मांगें। उसे रिफिल रखने के लिए मजबूर करें (डिमांड बढ़ाएं)। यदि लाखों बच्चे नया पेन खरीदने की जगह केवल रिफिल बदलेंगे, तो इससे विद्यार्थियों के पैसों की तो बचत होगी ही, साथ ही 'प्लास्टिक कंज्यूमिंग' (Plastic Consuming) के स्तर में भारी गिरावट आएगी।
३. कागज का सीमित उपयोग और तकनीकी नवाचार (Innovation)
कागज बनाने के लिए लाखों पेड़ काटे जाते हैं और बेतहाशा पानी का उपयोग होता है। इसलिए, अपनी कॉपियों और कागजों का पूरा उपयोग करें। आवश्यकता से अधिक कागज बर्बाद न करें। मैं हमारी मेधावी Gen-Z और युवा वैज्ञानिकों से यह आह्वान करता हूँ कि वे ऐसे पेन या स्याही (Ink) का आविष्कार करें जिसकी इंक कुछ समय के बाद (मान लीजिये १ महीने बाद) अपने आप उड़ जाए। ताकि उस कागज का बारंबार उपयोग (रिवीजन के लिए) हो सके! और यदि तकनीकी रूप से ऐसा पेन पहले से बन चुका है, तो उसे बाज़ार में सर्वसुलभ बनाने की कोशिश करें। इसके अलावा, डिजिटल नोट्स (Tablets/E-ink displays) का प्रयोग बढ़ाएं।
४. बायोडिग्रेडेबल (Biodegradable) पैकेजिंग की मांग
उपभोक्ता (Consumer) ही बाज़ार का राजा होता है। हम जो मांगेंगे, कंपनियाँ वही बनाएंगी। इसलिए यह संकल्प लें कि आप उस चॉकलेट या उत्पाद को प्राथमिकता नहीं देंगे जो नॉन-डिग्रेडेबल (Non-degradable) यानी कभी नष्ट न होने वाले चमकीले प्लास्टिक रैपर में हो। कंपनियों पर इको-फ्रेंडली (Eco-friendly) पैकेजिंग, जैसे कागज या जल्दी गलने वाले आवरण का उपयोग करने का दबाव हमारी खरीददारी की आदतों से ही बन सकता है।
५. अन्न देवता है: भोज्य पदार्थों की बर्बादी बिल्कुल न करें
शादियों, पार्टियों और यहाँ तक कि हमारे घरों में भी रोज बहुत सारा खाना डस्टबिन में डाल दिया जाता है। एक तरफ दुनिया में करोड़ों लोग भूखे पेट सो रहे हैं, और दूसरी तरफ अन्न की यह बर्बादी पाप के समान है। थाली में उतना ही भोजन लें, जितना आप खा सकें। बचा हुआ भोजन फेंकने से वह लैंडफिल (Landfill) में सड़कर 'मीथेन' (Methane) गैस बनाता है, जो ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) का एक बहुत बड़ा कारण है। अन्न साक्षात् अन्नपूर्णा है, इसका सम्मान करें।
६. जल संरक्षण और RO (आर.ओ.) के वेस्ट वाटर का सदुपयोग
भविष्य के युद्ध पानी के लिए लड़े जाएंगे, यह चेतावनी अब हकीकत में बदल रही है। पानी को बिल्कुल बर्बाद न करें। ब्रश करते समय नल खुला न छोड़ें। सबसे महत्वपूर्ण बात: हमारे घरों में लगे RO (Water Purifier) से १ लीटर शुद्ध पानी निकालने में लगभग ३ लीटर पानी वेस्ट (Waste) हो जाता है। उस RO फ़िल्टर के वेस्ट वाटर को सीधे नाली में न बहाएँ। उसे एक बाल्टी में इकट्ठा करें और उसका उपयोग पोंछा लगाने, बर्तन धोने, कार/साइकिल धोने, या घर के गमलों और पौधों में डालने के लिए करें।
७. फास्ट फैशन (Fast Fashion) का बहिष्कार
आजकल हर दिन नए ट्रेंड के कपड़े आ रहे हैं। कपड़े, जूते, चप्पल, पानी की बॉटल, स्कूल बैग्स और थैले का प्रयोग अधिकतम समय तक करें। जब तक वह चीज़ पूरी तरह ख़राब न हो जाए, तब तक सिर्फ बोरियत के कारण उसे न फेंकें। फैशन इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी प्रदूषणकारी इंडस्ट्रीज़ में से एक है। सूती (Cotton) और खादी को बढ़ावा दें और अपनी पुरानी उपयोग योग्य वस्तुओं को किसी जरूरतमंद को दान कर दें।
८. पॉलीथिन का त्याग और कपड़े के थैले की वापसी
हम सब जानते हैं कि पॉलीथिन पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह जानवरों (विशेषकर गौ माता) के पेट में जाकर उनकी जान ले रहा है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रहा है। एक छोटा सा नियम बनाएं: जब भी घर से बाहर बाज़ार या सब्जी लेने निकलें, तो एक कपड़े का थैला (Cloth Bag) अवश्य लेकर निकलें। यह थैला आपकी गाड़ी की डिक्की में या आपकी जेब में हमेशा होना चाहिए। अगर हम पॉलीथिन लेना बंद कर देंगे, तो दुकानदार उसे रखना स्वतः बंद कर देंगे।
९. दिखावे की संस्कृति (Consumerism) से बचाव
आजकल सोशल मीडिया के कारण हम एक 'दिखावे की संस्कृति' (Show-off Culture) में जी रहे हैं। केवल समाज में अपना रुतबा दिखाने या इंटरनेट पर तस्वीरें डालने के लिए अनावश्यक गैजेट्स, वाहन, कपड़े और संसाधनों की खरीददारी न करें। किसी भी वस्तु का उपयोग लंबे समय तक करें। दिखावे के चक्कर मे अपना मेहनत से कमाया हुआ धन और प्राकृतिक पर्यावरण—दोनों को क्षति न पहुँचाएँ। सादा जीवन, उच्च विचार की नीति अपनाएं।
१०. 'Best out of Waste': पुरानी पीढ़ी का ज्ञान अपनाएं
हमारी दादी-नानी पुरानी साड़ियों से रजाई/गद्दे (कंथरी) बना लेती थीं, पुराने डिब्बों को मसालेदानी बना लेती थीं। वह 'सर्कुलर इकॉनमी' (Circular Economy) का सबसे बेहतरीन उदाहरण था। अपनी दादी-नानी से या आज के समय में इंटरनेट (YouTube/DIY Videos) से best of waste (कबाड़ से जुगाड़) के नुस्खे सीखें। घर में फेंकी जाने वाली चीजों (जैसे कांच की बोतलें, कार्डबोर्ड, पुराने कपड़े) से कई सजावटी चीजें, पॉट्स, और उपयोगी वस्तुएं बनाएं। यह रचनात्मकता (Creativity) आपको मानसिक शांति भी देगी और प्रकृति का भला भी करेगी।
निष्कर्ष: आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी विरासत
यकीन मानिए, यदि हम और आप मिलकर इन छोटी-छोटी बातों को अपनी जीवनशैली (Lifestyle) का हिस्सा बना लें, तो निश्चित रूप से हम जलवायु परिवर्तन जैसी तमाम विकट परिस्थितियों से बच सकते हैं। बूंद-बूंद से ही सागर बनता है। हमारा एक-एक प्रयास उस 'पर्यावरण-यज्ञ' में एक आहुति के समान है।
अन्यथा, जरा सोचिए! यदि हम ऐसे ही अंधे होकर प्रकृति का दोहन करते रहे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को कैसी धरती और कैसा आसमान देंगे? क्या हम उन्हें सांस लेने के लिए केवल ऑक्सीजन के सिलिंडर और पीने के लिए जहरीला पानी विरासत में देना चाहते हैं? आप इसकी भयावहता की कल्पना अवश्य कर पा रहे होंगे।
सधन्यवाद एवं विनम्र प्रार्थना सहित
मृत्युंजय मिश्र
शिक्षक, केंद्रीय विद्यालय
पर्यावरण संरक्षण: Gen Z और Gen Alpha से एक शिक्षक की विनम्र अपील

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