करक चतुर्थी (करवा चौथ): शास्त्रीय, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं समसामयिक अनुशीलन
भारतीय सांस्कृतिक एवं धार्मिक वाङ्मय में व्रतों और पर्वों का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। ये पर्व न केवल आध्यात्मिक चेतना के उन्नायक हैं, अपितु पारिवारिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संरचना को भी सुदृढ़ करते हैं। इनमें 'करक चतुर्थी', जिसे लोकभाषा में 'करवा चौथ' कहा जाता है, एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं व्यापक रूप से मनाया जाने वाला स्त्री-पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से भारत के उत्तरी और पश्चिमी राज्यों—पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात—में सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं अखंड सौभाग्य की कामना के लिए निर्जला (बिना जल और अन्न के) रूप में संपन्न किया जाता है। यह शोध आलेख करक चतुर्थी के शास्त्रीय प्रमाणों, संस्कृत श्लोकों एवं विधानों, ऐतिहासिक आख्यानों, क्षेत्रीय विविधताओं, आधुनिक समाजशास्त्रीय तथा शारीरिक विज्ञान के दृष्टिकोणों और वर्ष 2026 के परिप्रेक्ष्य में इसके पंचांगीय एवं आर्थिक प्रभावों का अत्यंत सूक्ष्म एवं विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
शास्त्रीय प्रमाण, पंचांगीय अवस्थिति एवं ग्रंथीय संदर्भ
हिन्दू काल गणना के अनुसार, करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। ध्यातव्य है कि भारत में पंचांग की दो मुख्य प्रणालियाँ प्रचलित हैं—पूर्णिमान्त और अमान्त। उत्तर भारत में पूर्णिमान्त प्रणाली के अंतर्गत यह कार्तिक मास में पड़ता है, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ भागों में प्रचलित अमान्त पंचांग के अनुसार यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आता है। मास के नामकरण में भिन्नता के बावजूद, यह व्रत संपूर्ण भारत में एक ही खगोलीय दिन पर संपन्न होता है।
शास्त्रों में इस व्रत के विधान और महत्त्व का विशद वर्णन प्राप्त होता है। 'वामन पुराण', 'स्कन्द पुराण' तथा 'हरिवंश पुराण' में इस व्रत के आदि स्वरूप और आख्यानों का उल्लेख है। धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में 'निर्णय सिन्धु', 'धर्म सिन्धु' और पंडित विश्वनाथ शर्मा द्वारा रचित 'व्रतराज' (जिसकी भाषा टीका माधवाचार्य खेमराज द्वारा की गई है) में करक चतुर्थी की तिथि के निर्धारण और अनुष्ठान की विधि का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। 'निर्णय सिन्धु' के अनुसार, इस व्रत के लिए वह चतुर्थी तिथि ग्राह्य होती है जो चंद्रोदय व्यापिनी हो, अर्थात् जिस दिन चंद्रमा के उदय के समय चतुर्थी तिथि विद्यमान हो। यदि दो दिन चतुर्थी चंद्रोदय के समय व्याप्त हो, तो पूर्वविद्धा (तृतीया से युक्त) चतुर्थी को प्राथमिकता दी जाती है।
पंचमहाभूत और करवे का दार्शनिक प्रतीकवाद
शब्द 'करक' या 'करवा' का अर्थ मिट्टी का वह टोंटीदार पात्र है, जिसका उपयोग चंद्रमा को अर्घ्य (जल) देने के लिए किया जाता है। यह पात्र केवल जल का संवाहक नहीं है, अपितु यह जीवन, उर्वरता और ब्रह्मांडीय तत्त्वों का द्योतक है। भारतीय दर्शन में 'पंचमहाभूत' (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की अवधारणा अत्यंत गूढ़ है और यह माना जाता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड इन्हीं पाँच तत्त्वों से निर्मित है।
करवा चौथ की पूजा में प्रयुक्त मिट्टी का यह पात्र इन पंचमहाभूतों का सूक्ष्म प्रतीक है। करवे का निर्माण मिट्टी से होता है जो पृथ्वी तत्त्व का द्योतक है; इसके भीतर भरा जाने वाला जल या दूध जीवन-ऊर्जा का प्रतीक है; करवे के ऊपर रखा जाने वाला प्रज्वलित दीपक अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है; दीपक की लौ के प्रज्वलन के लिए उत्तरदायी तत्त्व वायु है; और करवे के भीतर का रिक्त स्थान आकाश (स्पेस) का द्योतक है।
कृषि प्रधान समाज में इस पर्व का एक अन्य आर्थिक एवं समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण भी है। यह पर्व रबी की फसल (विशेषकर गेहूँ) की बुवाई के समय आता है। प्राचीन काल में गेहूँ को सुरक्षित रखने वाले बड़े मिट्टी के पात्रों को भी 'करवा' कहा जाता था। अतः यह व्रत पति की रक्षा के साथ-साथ उत्तम कृषि उपज और खाद्यान्न सुरक्षा की प्रार्थना का भी एक अप्रत्यक्ष रूप रहा है।
संस्कृत श्लोक, मंत्र एवं अनुष्ठान का दार्शनिक विश्लेषण
करवा चौथ का अनुष्ठान केवल उपवास नहीं है; यह मंत्रों के नाद और प्रतीकों के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तादात्म्य स्थापित करने की एक शास्त्रीय प्रक्रिया है। व्रत का आरंभ सूर्योदय से पूर्व होता है और रात्रि में चंद्र-दर्शन तथा अर्घ्य दान के पश्चात् ही व्रत का पारण (समापन) किया जाता है।
व्रत का संकल्प: प्रातःकाल स्नानादि के पश्चात् स्त्रियाँ अंजलि में जल लेकर संकल्प करती हैं:
मम सुख सौभाग्य पुत्र-पौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।
इस संकल्प में स्पष्ट रूप से केवल पति की आयु ही नहीं, अपितु संपूर्ण परिवार के सुख, सौभाग्य, पुत्र-पौत्रादि और सुस्थिर समृद्धि की कामना अंतर्निहित है।
माता पार्वती (गौरा) की वंदना: गोधूलि वेला में पूजा के समय यह श्लोक अत्यंत फलदायी माना गया है:
नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥
(हे हरवल्लभे, मुझ भक्तिभाव से युक्त नारी को आप अखंड सौभाग्य और शुभ संतति प्रदान करें।)
करवा दान मंत्र:
करकं क्षीरसंपूर्णा तोयपूर्णमयापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरंजीवतु मे पतिः॥
इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्याद्विजसत्तमे। सुवासिनीभ्यो दद्याच्च आदद्यात्ताभ्य एववा।।
इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्याद्विजसत्तमे। सुवासिनीभ्यो दद्याच्च आदद्यात्ताभ्य एववा।।
(दूध अथवा जल से भरे हुए और रत्नों से युक्त इस करवे को मैं दान कर रही हूँ ताकि मेरे पति चिरायु हों।)
चंद्रमा को अर्घ्य मंत्र:
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद्भव। गृहाणार्घ्यं शशांकेदं रोहिण्या सहितो मम।।
(हे क्षीर सागर और महर्षि अत्रि के नेत्रों से उत्पन्न शशांक! अपनी प्रिय पत्नी रोहिणी के साथ आप मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करें।) ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन और मातृ छाया का प्रतीक माना गया है, और तंत्र में कार्तिक मास की रात्रियों को जागरण और सिद्धि का काल कहा गया है।
करवा चौथ 2026: पंचांगीय गणना, तिथिक्रम एवं चंद्रोदय का वैज्ञानिक आधार
सटीक पंचांग और चंद्रोदय का समय इस व्रत का प्राण है, क्योंकि चंद्र दर्शन के बिना व्रत का पारण निषिद्ध है। वर्ष 2026 में करवा चौथ का पावन पर्व 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा।
| विवरण | समय / तिथि (29 अक्टूबर 2026) |
|---|---|
| पर्व की तिथि एवं वार | 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार |
| चतुर्थी तिथि प्रारंभ | प्रातः 01:06 बजे |
| चतुर्थी तिथि समाप्त | रात्रि 10:09 बजे |
| गौरी-शिव पूजा का शुभ मुहूर्त | सायं 05:38 से 06:56 बजे (प्रदोष काल) |
| व्रत का कुल समय (अनुमानित) | प्रातः 06:31 से रात्रि 08:12 बजे तक |
भारत के प्रमुख नगरों में चंद्रोदय का समय (29 अक्टूबर 2026)
भारत के विशाल भौगोलिक विस्तार के कारण देशांतर और अक्षांश में भिन्नता होती है, जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण भारत में चंद्रोदय के समय में लगभग 74 मिनट का व्यापक अंतर देखा जाता है। धर्मशास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि व्रती महिलाओं को अपने स्थानीय क्षितिज पर चंद्रमा के उदित होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
| नगर (City) | चंद्रोदय का समय | क्षेत्रीय भौगोलिक विशेषता |
|---|---|---|
| कोलकाता | 07:42 PM | पूर्वी भारत; यहाँ चंद्रोदय सबसे पहले होता है। |
| पटना | 07:47 PM | पूर्वी मध्य भारत। |
| वाराणसी | 07:57 PM | उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग। |
| नई दिल्ली | 08:12 PM | उत्तर भारत का मानक चंद्रोदय समय। |
| जयपुर | 08:23 PM | पश्चिमी उत्तर भारत। |
| बेंगलुरु | 08:51 PM | दक्षिण भारत। |
| मुंबई | 08:56 PM | पश्चिमी तट; यहाँ चंद्रोदय सबसे विलंब से होता है। |
पौराणिक आख्यान एवं ऐतिहासिक संदर्भ
महाभारत का संदर्भ और द्रौपदी का व्रत
कथा के अनुसार, जब पांडव नीलगिरि के जंगलों में अज्ञातवास और तपस्या कर रहे थे, तब अर्जुन किसी विशिष्ट अनुष्ठान के लिए वहां से दूर चले गए। शेष पांडवों पर उस अवधि में अनेक संकट आने लगे। महारानी द्रौपदी ने अपने सखा भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार, द्रौपदी ने कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को पूर्ण विधि-विधान से यह निर्जला व्रत किया, जिसके प्रभाव से पांडवों के सभी संकट टल गए।
रानी वीरवती और भ्रातृ-प्रेम का द्वंद्व
सात भाइयों की इकलौती बहन रानी वीरवती ने विवाह के पश्चात् अपने मायके में पहला करवा चौथ रखा। निर्जला व्रत के कारण वह मूर्छित होने लगी। भाइयों ने वृक्ष के पीछे अग्नि जलाकर छलनी की ओट से कृत्रिम चंद्रमा का दृश्य उत्पन्न कर दिया। भाइयों के छल से अनभिज्ञ वीरावती ने झूठे चंद्रमा को अर्घ्य दे दिया। इसके परिणामस्वरूप उसके पति की मृत्यु हो गई। परंतु उसने हार नहीं मानी, एक वर्ष तक तपस्या की और अगले करवा चौथ पर माता पार्वती के आशीर्वाद से अपने पति को पुनर्जीवित कर लिया। यह कथा दर्शाती है कि कृत्रिमता कभी वास्तविक सिद्धि नहीं दे सकती; सत्य की प्रतीक्षा अनिवार्य है।
पतिव्रता करवा की कथा
एक पतिव्रता स्त्री 'करवा' के पति को मगरमच्छ ने पकड़ लिया। करवा ने सूत के कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांध दिया और यमराज से उसे मृत्युदंड देने को कहा। यमराज के संकोच करने पर, करवा ने अपने सतीत्व के प्रभाव से उन्हें शाप देने की चेतावनी दी। भयभीत यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और उसके पति को प्राणदान दिया।
चौथ का बरवाड़ा: आस्था का ऐतिहासिक शक्तिपीठ
राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में अरावली पर्वत की चोटी पर स्थित 'चौथ माता का मंदिर' देश का एकमात्र और सबसे ख्याति प्राप्त करवा चौथ माता का मंदिर है। इसकी स्थापना सन् 1451 में राजा भीमसिंह चौहान ने की थी। बूंदी राजघराने सहित पूरे हाड़ौती क्षेत्र में चौथ माता को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
क्षेत्रीय विविधताएँ एवं सांस्कृतिक परिदृश्य
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पंजाब, हरियाणा एवं हिमाचल:
व्रत का आरंभ सूर्योदय से पूर्व सास द्वारा दी गई 'सरगी' से होता है। दोपहर में 'बाया' आता है। संध्याकाल में महिलाएँ गोलाकार बैठकर 'थाली बटाना' की रस्म करती हैं और गीत गाती हैं।
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उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान:
यहाँ 'चौथ माता' की पूजा होती है। अर्घ्य से पूर्व पूछा जाता है "धापी की नी धापी?", और उत्तर मिलता है "जल से धापी, सुहाग से ना धापी"। 'ऐपन' नामक पारंपरिक कला से भित्तिचित्र भी बनाए जाते हैं।
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गुजरात एवं महाराष्ट्र:
यहाँ व्रत अधिक सरलता से मनाया जाता है। महिलाएँ सामूहिक रूप से मंदिरों में जाकर कथा सुनती हैं।
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जम्मू एवं कश्मीर:
कश्मीरी महिलाएँ पारंपरिक 'फेरन' पहनती हैं और 'कुठ' (मिट्टी की विशेष मूर्ति) बनाकर माता पार्वती की पूजा करती हैं।
आधुनिक समाजशास्त्र एवं नारीवादी विमर्श
कट्टरपंथी नारीवादी दृष्टिकोण से कभी-कभी इस पर्व को पितृसत्तात्मक संरचना का प्रतीक माना जाता है। परंतु, आधुनिक सहस्राब्दी (Millennial) स्त्रियों का दृष्टिकोण अत्यंत भिन्न है। आज की स्त्रियाँ इसे दबाववश नहीं, बल्कि अपनी इच्छा (Choice), प्रेम और सांस्कृतिक जुड़ाव (Sisterhood) के रूप में मनाती हैं। आधुनिक समाजों में समानता का संदेश देते हुए अब बड़ी संख्या में पुरुष भी अपनी पत्नियों के साथ यह उपवास रखते हैं, जो इस पर्व के लोकतंत्रीकरण (Democratization) को दर्शाता है।
शरीर विज्ञान एवं इंटरमिटेंट फास्टिंग का चिकित्साशास्त्रीय अनुशीलन
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में 'निर्जला व्रत' (Dry Fasting) और 'इंटरमिटेंट फास्टिंग' (Intermittent Fasting) पर हो रहे शोध इसके शारीरिक प्रभावों पर नवीन प्रकाश डालते हैं।
| शारीरिक मापदंड (Physiological Parameter) | उपवास का प्रभाव (Effect of Fasting) | वैज्ञानिक तंत्र (Scientific Mechanism) |
|---|---|---|
| चयापचय (Metabolism) | वसा ऑक्सीकरण में वृद्धि। | शरीर ऊर्जा के लिए लिवर ग्लाइकोजन और वसा को केटोन्स में बदलता है। |
| हार्मोनल संतुलन | इंसुलिन संवेदनशीलता में वृद्धि। | रक्त शर्करा के स्तर में गिरावट से अग्न्याशय ग्लूकागन स्रावित करता है। |
| मस्तिष्क कार्यप्रणाली | मूड में सुधार, तनाव में कमी। | BDNF (Brain-Derived Neurotrophic Factor) के स्तर में वृद्धि। |
| कोशिका मरम्मत | ऑटोफैगी (Autophagy) को बढ़ावा। | शरीर क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट कर स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण करता है। |
| नींद की संरचना (Sleep) | कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं। | स्मार्टवॉच डेटा के अनुसार गहरी नींद और हृदय गति स्थिर रहती है। |
करवा चौथ 2026 का आर्थिक परिदृश्य: व्यापार और 'वोकल फॉर लोकल'
आधुनिक भारत में करवा चौथ भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था का एक शक्तिशाली इंजन बन चुका है। CAIT की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के करवा चौथ पर लगभग 28,000 करोड़ रुपये का ऐतिहासिक व्यापार होने का अनुमान है (जो 2024 के 22,000 करोड़ से 27% अधिक है)।
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वोकल फॉर लोकल:
चीनी उत्पादों के बहिष्कार से स्थानीय कुम्हारों, मेहंदी कलाकारों और ब्यूटी पार्लर संचालकों को भारी रोजगार मिला है।
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स्वर्ण एवं आभूषण बाज़ार:
2026 में सोने की कीमत 1,30,000 रुपये प्रति 10 ग्राम पार कर जाने के कारण उपभोक्ता 'लाइटवेट ज्वेलरी' (Lightweight Jewellery) और चांदी के करवों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
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वस्त्र एवं शृंगार उद्योग:
16 शृंगार के अनुष्ठानिक महत्त्व के कारण लाल साड़ियों, चूड़ियों और कॉस्मेटिक्स की बिक्री में अभूतपूर्व उछाल आया है।
अहोई अष्टमी से अंतर्संबंध और अनुष्ठानिक निरंतरता
करवा चौथ का एक अत्यंत सूक्ष्म संबंध 'अहोई अष्टमी' के व्रत से है (जो 2026 में 1 नवंबर को है)। करवा चौथ की पूजा के करवे को सुरक्षित रखा जाता है, और अहोई अष्टमी के दिन तारों को अर्घ्य देने के लिए उसी करवे का प्रयोग किया जाता है। तत्पश्चात्, दीपावली के दिन इसी करवे के जल का पूरे घर में छिड़काव किया जाता है। यह अनुष्ठानिक निरंतरता दर्शाती है कि एक स्त्री का जीवन पति की मंगल-कामना (करवा चौथ) से होकर संतान के संरक्षण (अहोई अष्टमी) और फिर संपूर्ण परिवार की समृद्धि (दीपावली) तक एक अखंड शृंखला में गुंथा हुआ है।
निष्कर्ष
'करक चतुर्थी' या करवा चौथ भारतीय संस्कृति की उस सनातन धारा का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ वैयक्तिक तपस्या को पारिवारिक कल्याण के साथ जोड़ा गया है। ऐतिहासिक आख्यान सिद्ध करते हैं कि यह पर्व नारी को अबला नहीं, बल्कि 'शक्ति' के रूप में स्थापित करता है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यह पर्व पितृसत्तात्मक बाध्यता को त्यागकर ऐच्छिक भागीदारी के नव-युग में प्रवेश कर चुका है। स्वास्थ्य विज्ञान जहाँ इसके उपवास को ऑटोफैगी के लिए लाभकारी मान रहा है, वहीं अर्थशास्त्र इसे 28,000 करोड़ रुपये के व्यापार का केंद्र मान रहा है। 29 अक्टूबर 2026 को चंद्रोदय के समय का यह दर्शन भारतीय आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का एक विराट क्षण होगा।
यह जानकारी केवल शैक्षणिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह या उपवास संबंधी स्वास्थ्य निर्णयों के लिए कृपया योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
इन स्रोतों से जानकारी ली गई
- करवा चौथ किस ग्रंथ में लिखा है? - Quora
- महत्व : करवा चौथ महोत्सव - MahamayaRatanpur
- Karva Chauth: A celebration of love - Incredible India
- Karva Chauth - Wikipedia
- Karwa Chauth - Drik Panchang
- 2026 करवा चौथ व्रत का दिन और पूजा मुहूर्त नई दिल्ली - Drik Panchang
- Ahoi Ashtami 2026: 1 Nov Vrat & Katha - Divine Hindu
- Ahoi Ashtami - Wikipedia
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- Essence of Pancha Maha Bhutas - Kamakoti.org
- Karva Chauth: The History Behind the Vrat Katha - JKYog
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- Karva Chauth Festival - Punjabi Samaj
- Karwa Chauth Mantra: करवा चौथ के विशेष मंत्र - Patrika
- Karwa Chauth 2025: पूजा के समय करें इन मंत्रों का जप - Jagran
- Karwa Chauth 2026: Date & Moonrise - PanchangBodh
- करवा चौथ का पवित्र मंत्र - Webdunia
- Unique Karwa Chauth Traditions Across India - Zee News
- Karva Chauth - Britannica
- चन्द्र अर्घ्य मन्त्र - Prabhu Bhakti
- कार्तिक महीने में पूजे जाने वाले व्रत - AajTak
- Janmashtami puja vidhi - LiveHindustan
- Karwa Chauth Vrat Katha - PanchangBodh
- Karwa Chauth 2026 Moonrise Time by City - PanchangBodh
- History of Karva Chauth - Premastrologer
- Mahabharata #1: Draupadi The Lady of Substance - Medium
- THE LEGEND OF MAHABHARATA RELATING TO 'KARVA CHAUTH'
- History And Significance of Karwa Chauth - FNP
- Karwa Chauth History: Fabled Stories - FlowerAura
- Karwa Chauth Vrat Katha in Hindi - Nisha Henna Arts
- करवाचौथ पर देश के सबसे पुराने चौथ माता मंदिर का इतिहास - NBT
- 1100 फीट ऊंची पहाड़ी पर विराजती हैं चौथ माता - Patrika
- कहां बना है चौथ माता का मंदिर - LiveHindustan
- Temples in Sawai Madhopur — Sacred Sites
- Chauth Ka Barwara Temples - RajasthanTourPlanner
- Regional Variations of Karwa Chauth - Happy Diwali
- Karwa Chauth: Regional Traditions - Lovenspire
- Aipan Art Karwachauth Puja Thali - Uttarakhand Haat
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- CAIT: Rs 22000 crore business expected this Karwa Chauth - Financial Express
- Karva Chauth festivities set to drive Rs 22000 cr economic boost - ET
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- Ahoi Ashtami Vrat Katha - Drik Panchang
- Significance of Ahoi Ashtami Vrat Katha - Times of India
- Ahoi Ashtami 2022: अहोई अष्टमी में करवे के जल का क्या करें - YouTube
- अहोई अष्टमी पर करवाचौथ वाले करवे का क्या है महत्व - PakwanGali

