श्रीकृष्ण छठी उत्सव 2026: भद्रा काल का साया, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, घर में शिशु के जन्म के बाद सूतक (अशुद्धता) लग जाता है। इस सूतक की शुद्धि के लिए जन्म के ठीक छठे दिन नवजात शिशु को स्नान कराकर 'छठी' (षष्ठी) मनाने का विधान है। नंद बाबा के परिवार में भी कान्हा जी के जन्म के छठे दिन उनकी छठी मनाई गई थी। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए हर वर्ष जन्माष्टमी के छह दिन बाद लड्डू गोपाल की छठी को एक भव्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
छठी की पूजन विधि और परंपराएं
छठी के दिन नवजात शिशु की भांति कान्हा जी की भी विशेष देखभाल और विधि-विधान से पूजन किया जाता है:
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स्नान एवं श्रृंगार:
घर की शुद्धि के पश्चात लड्डू गोपाल को शुद्ध जल और पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र, आभूषण और बांसुरी धारण कराई जाती है। उन्हें पहली बार काजल भी लगाया जाता है।
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विशेष भोग:
इस दिन भगवान को मुख्य रूप से कढ़ी-चावल, माखन-मिश्री और पंजीरी का भोग अर्पित किया जाता है।
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नामकरण व उत्सव:
कान्हा जी का प्रतीकात्मक नामकरण किया जाता है। महिलाएं भगवान की आरती उतारती हैं, उन पर न्योछावर करती हैं और पारंपरिक 'सोहर' गीत गाती हैं।
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छठी माता पूजन:
बाल कृष्ण के साथ-साथ इस दिन छठी माता का भी पूजन किया जाता है और उन्हें भी भोग अर्पित किया जाता है।
2026 में भद्रा और राहुकाल का पेंच (9 या 10 सितंबर?)
वर्ष 2026 में 4 सितंबर (शुक्रवार) को जन्माष्टमी का पर्व मनाया गया है, क्योंकि रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का संयोग इसी दिन बना था। तिथियों की गणना के अनुसार जन्माष्टमी से छठा दिन 9 सितंबर (बुधवार) को पड़ रहा है। लेकिन इस दिन भद्रा काल और राहुकाल का साया होने के कारण पूजा के समय को लेकर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
9 सितंबर (बुधवार) की ग्रह स्थिति:
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तिथि:
त्रयोदशी तिथि दोपहर 12:31 बजे तक रहेगी, तत्पश्चात चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होगी।
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राहुकाल:
दोपहर 12:00 बजे से 01:30 बजे तक रहेगा।
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भद्रा काल:
दोपहर 12:30 बजे से प्रारंभ होकर रात्रि 11:29 बजे तक रहेगा।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, जब भद्रा का वास मृत्युलोक (पृथ्वी) में होता है, तब उस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य या उत्सव मनाना वर्जित माना जाता है। चूंकि छठी भी एक उत्सव है, इसलिए भद्रा काल और राहुकाल में इसका पूजन नहीं किया जा सकता। रात्रि के समय छठी मनाने की परंपरा नहीं है।
छठी पूजन के सटीक मुहूर्त और विकल्प
भद्रा और राहुकाल के दृष्टिगत, आप अपनी स्थानीय परंपरा और पंडितों के परामर्श के अनुसार निम्नलिखित दो विकल्पों में से किसी एक का चयन कर सकते हैं:
विकल्प 1: 9 सितंबर (बुधवार) को पूजा का समय
यदि आप तिथिनुसार छठे दिन ही पूजन करना चाहते हैं, तो आपको राहुकाल और भद्रा लगने से पूर्व ही पूजा संपन्न करनी होगी।
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शुभ मुहूर्त:
सुबह 11:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक (केवल 30 मिनट)।
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विशेष नोट:
यह विकल्प उन लोगों के लिए उपयुक्त है जिनके स्थानीय क्षेत्र में सुबह के समय छठी पूजने की परंपरा है।
विकल्प 2: 10 सितंबर (गुरुवार) को पूजा का समय
चूंकि अधिकतर स्थानों पर छठी का पूजन दोपहर या शाम के समय किया जाता है, ऐसे में 9 तारीख को भद्रा के कारण कई लोग 10 सितंबर (गुरुवार) को उत्सव मनाना अधिक उपयुक्त मानेंगे।
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पहला मुहूर्त (राहुकाल से पूर्व):
दोपहर 12:00 बजे से 01:25 बजे तक।
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वर्जित समय (राहुकाल):
दोपहर 01:30 बजे से 03:00 बजे तक।
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दूसरा मुहूर्त (राहुकाल के बाद):
दोपहर 03:05 बजे से शाम 06:32 बजे तक।
10 सितंबर 2026 का पंचांग विवरण
| विवरण | समय |
|---|---|
| ब्रह्म मुहूर्त | सुबह 04:39 से 05:27 तक |
| सूर्योदय / सूर्यास्त | सुबह 06:15 / शाम 06:32 |
| नक्षत्र | मघा (दोपहर 02:04 तक), तत्पश्चात फाल्गुनी |
| योग | सिद्ध योग (शाम 07:17 तक), तत्पश्चात साध्य |
छठी के पावन अवसर पर बहुत से भक्त लड्डू गोपाल के निमित्त उपवास भी रखते हैं। संपूर्ण विधि-विधान से पूजा संपन्न करने और छठी माता व भगवान को भोग अर्पित करने के पश्चात, उसी भोग को प्रसाद रूप में ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाना चाहिए।

