श्रीमद्‍भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध, अध्याय 21 (कर्दम ऋषि की तपस्या) Hindi | Bhagwat Darshan

Sooraj Krishna Shastri
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श्रीमद्‍भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः

कर्दम-तपस्या एवं भगवद्-दर्शनं नाम एकविंशोऽध्यायः

Srimad Bhagavatam Canto 3 Chapter 21 Kardama Muni's penance and Lord Vishnu's appearance
विदुर उवाच
स्वायम्भुवस्य च मनोर्वंशः परमसम्मतः । कथ्यतां भगवन्यत्र मैथुनेनैधिरे प्रजाः ॥ १ ॥
भावार्थ: विदुरजी ने पूछा — हे भगवन् (मैत्रेय जी)! स्वायम्भुव मनु का वंश अत्यन्त आदरणीय और परम श्रेष्ठ माना गया है। इस वंश में मैथुन धर्म (स्त्री-पुरुष के संयोग) से प्रजा की वृद्धि किस प्रकार हुई? कृपया मुझे वह कथा सुनाएं।
प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ स्वायम्भुवस्य वै । यथाधर्मं जुगुपतुः सप्तद्वीपवतीं महीम् ॥ २ ॥
भावार्थ: स्वायम्भुव मनु के प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र हुए। उन दोनों ने धर्मपूर्वक सात द्वीपों वाली इस सम्पूर्ण पृथ्वी का भलीभांति पालन और रक्षा की।
तस्य वै दुहिता ब्रह्मन् देवहूतीति विश्रुता । पत्‍नी प्रजापतेरुक्ता कर्दमस्य त्वयानघ ॥ ३ ॥
भावार्थ: हे निष्पाप ब्रह्मन्! उन्हीं स्वायम्भुव मनु की एक विख्यात पुत्री थी जिसका नाम देवहूति था। आपने पहले बताया था कि वह प्रजापति कर्दम जी की पत्नी हुई।
तस्यां स वै महायोगी युक्तायां योगलक्षणैः । ससर्ज कतिधा वीर्यं तन्मे शुश्रूषवे वद ॥ ४ ॥
भावार्थ: उन महायोगी कर्दम मुनि ने अष्टांग योग के समस्त सद्गुणों (शील-स्वभाव आदि) से संपन्न अपनी पत्नी देवहूति के गर्भ से कितने प्रकार की संतानें (वीर्य) उत्पन्न कीं? मैं यह सुनने का अत्यंत इच्छुक हूँ, कृपया मुझे बताएं।
रुचिर्यो भगवान्ब्रह्मन् दक्षो वा ब्रह्मणः सुतः । यथा ससर्ज भूतानि लब्ध्वा भार्यां च मानवीम् ॥ ५ ॥
भावार्थ: हे ब्रह्मन्! प्रजापति भगवान रुचि और ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष ने भी स्वायम्भुव मनु की अन्य कन्याओं (आकूति और प्रसूति) को पत्नी रूप में प्राप्त करके किस प्रकार प्रजा (संतानों) की सृष्टि की?
मैत्रेय उवाच
प्रजाः सृजेति भगवान् कर्दमो ब्रह्मणोदितः । सरस्वत्यां तपस्तेपे सहस्राणां समा दश ॥ ६ ॥
भावार्थ: मैत्रेयजी ने कहा — हे विदुरजी! जब ब्रह्माजी ने प्रजापति कर्दम को 'संतान उत्पन्न करो' ऐसी आज्ञा दी, तब उन्होंने सरस्वती नदी के पावन तट पर दस हजार (10,000) वर्षों तक कठोर तपस्या की।
ततः समाधियुक्तेन क्रियायोगेन कर्दमः । सम्प्रपेदे हरिं भक्त्या प्रपन्नवरदाशुषम् ॥ ७ ॥
भावार्थ: उस तपस्या काल में कर्दमजी ने एकाग्र चित्त (समाधि) और भक्तिपूर्वक, शरणागतों को शीघ्र ही मनवांछित वरदान देने वाले भगवान श्रीहरि की क्रियायोग (आराधना विधि) द्वारा उपासना की।
तावत्प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे । दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद्वपुः ॥ ८ ॥
भावार्थ: हे विदुर (क्षत्ता)! सत्ययुग के उस समय उनकी आराधना से कमलनयन भगवान श्रीहरि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने शब्दब्रह्ममय (वेदों द्वारा प्रतिपादित) साकार दिव्य रूप धारण करके कर्दम जी को दर्शन दिया।
स तं विरजमर्काभं सितपद्मोत्पलस्रजम् । स्निग्धनीलालकव्रात वक्त्राब्जं विरजोऽम्बरम् ॥ ९ ॥
भावार्थ: कर्दम जी ने देखा कि भगवान का वह स्वरूप सर्वथा निर्मल और सूर्य के समान परम तेजस्वी है। वे श्वेत कमल और नील कुमुदों की माला धारण किए हैं, उनका मुखकमल चिकनी और नीली अलकों (घुँघराले बालों) से सुशोभित है तथा वे निर्मल पीताम्बर पहने हुए हैं।
किरीटिनं कुण्डलिनं शङ्खचक्रगदाधरम् । श्वेतोत्पलक्रीडनकं मनःस्पर्शस्मितेक्षणम् ॥ १० ॥
भावार्थ: उनके मस्तक पर सुवर्ण मुकुट, कानों में कुण्डल और हाथों में शंख, चक्र तथा गदा सुशोभित थे। चौथे हाथ में वे एक श्वेत कमल लिए खेल रहे थे और अपनी मधुर मुस्कान तथा प्रेमभरी चितवन से भक्त के मन को स्पर्श (आनन्दित) कर रहे थे।
विन्यस्तचरणाम्भोजं अंसदेशे गरुत्मतः । दृष्ट्वा खेऽवस्थितं वक्षः श्रियं कौस्तुभकन्धरम् ॥ ११ ॥
भावार्थ: वे गरुड़ जी के कंधों पर अपने चरण-कमल रखे हुए आकाश में विराजमान थे। उनके वक्षस्थल पर स्वर्णरेखा रूप में लक्ष्मीजी (श्रीवत्स) विराजमान थीं और गले में कौस्तुभ मणि झिलमिला रही थी।
जातहर्षोऽपतन्मूर्ध्ना क्षितौ लब्धमनोरथः । गीर्भिस्त्वभ्यगृणात्प्रीति स्वभावात्मा कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥
भावार्थ: भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन पाकर कर्दम जी का मनोरथ पूर्ण हो गया और वे परमानंद से भरकर पृथ्वी पर सिर टेककर दण्डवत गिर पड़े। फिर स्वाभाविक प्रेम से भरकर हाथ जोड़कर मधुर वाणी में भगवान की स्तुति करने लगे।
ऋषिरुवाच
जुष्टं बताद्याखिलसत्त्वराशेः सांसिध्यमक्ष्णोस्तव दर्शनान्नः । यद्दर्शनं जन्मभिरीड्य सद्भिः आशासते योगिनो रूढयोगाः ॥ १३ ॥
भावार्थ: कर्दम ऋषि ने कहा — हे स्तुति करने योग्य प्रभो! आप सम्पूर्ण विशुद्ध सत्त्वगुण के निधान हैं। अहो! आज आपके दर्शन से हमारे नेत्रों को अपने होने का परम फल (सिद्धि) प्राप्त हो गया है। सिद्ध योगीजन भी अनेक श्रेष्ठ जन्मों तक साधन करके आपके जिस दर्शन की अभिलाषा करते हैं, वह आज मुझे मिल गया है।
ये मायया ते हतमेधसस्त्वत् पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम् । उपासते कामलवाय तेषां रासीश कामान् निरयेऽपि ये स्युः ॥ १४ ॥
भावार्थ: हे ईश! जिन लोगों की बुद्धि आपकी माया से मारी गई है, वे संसार-सागर से पार लगाने वाले जहाजरूप आपके चरण-कमलों की उपासना भी तुच्छ सांसारिक भोगों के लिए करते हैं; और आप इतने उदार हैं कि उन्हें वे भोग भी दे देते हैं, जो नरक (अधम योनियों) में भी सुलभ हैं।
तथा स चाहं परिवोढुकामः समानशीलां गृहमेधधेनुम् । उपेयिवान् मूलमशेषमूलं दुराशयः कामदुघाङ्घ्रिपस्य ॥ १५ ॥
भावार्थ: हे प्रभो! ठीक उसी प्रकार तुच्छ वासनाओं (दुराशय) से युक्त होकर मैं भी अपने समान शील-स्वभाव वाली और गृहस्थ धर्म में कामधेनु के समान सहायक एक कन्या से विवाह करने की इच्छा लेकर सबके मूल कारण और कल्पवृक्ष स्वरूप आपके चरणों की शरण में आया हूँ।
प्रजापतेस्ते वचसाधीश तन्त्या लोकः किलायं कामहतोऽनुबद्धः । अहं च लोकानुगतो वहामि बलिं च शुक्लानिमिषाय तुभ्यम् ॥ १६ ॥
भावार्थ: हे अधीश! आप सबके प्रजापति (स्वामी) हैं। कामनाओं के मारे हुए ये सारे संसारी जीव आपकी वेदरूपी रस्सी (आज्ञा) से बंधे हुए हैं। मैं भी उसी लोक-परम्परा का अनुसरण करता हुआ हे शुद्धस्वरूप काल-रूपी प्रभो! आपको (गृहस्थ धर्म के पालन रूपी) भेंट समर्पित करता हूँ।
लोकांश्च लोकानुगतान् पशूंश्च हित्वा श्रितास्ते चरणातपत्रम् । परस्परं त्वद्‍गुणवादसीधु पीयूषनिर्यापितदेहधर्माः ॥ १७ ॥
भावार्थ: परन्तु हे नाथ! जो धीर पुरुष इस लोक-व्यवहार और इसके पीछे दौड़ने वाले पशुलुल्य (अज्ञानी) मनुष्यों का संग छोड़कर आपके चरण-कमल रूपी छत्र की शरण ले लेते हैं, वे आपस में आपके गुणगान रूपी मधुर अमृत का पान करके शरीर के धर्म (भूख-प्यास और देहाभिमान) को भी भूल जाते हैं।
न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां त्रयोदशारं त्रिशतं षष्टिपर्व । षण्नेम्यनन्तच्छदि यत्त्रिणाभि करालस्रोतो जगदाच्छिद्य धावत् ॥ १८ ॥
भावार्थ: आपका यह कालचक्र जो अविनाशी धुरी (ब्रह्म) पर घूमता है—जिसमें तेरह अरे (अधिकमास सहित 13 महीने), तीन सौ साठ जोड़ (360 दिन), छह नेमियां (6 ऋतुएं), अनन्त पत्ते (निमेष-पल आदि) और तीन नाभियां (तीन चौमासे) हैं—यह भयानक वेग से दौड़ता हुआ सारे जगत् की आयु को काटता रहता है, परन्तु यह आपके उन अनन्य भक्तों की आयु को क्षीण नहीं कर पाता।
एकः स्वयं सञ्जगतः सिसृक्षया अद्वितीययात्मन् अधि योगमायया । सृजस्यदः पासि पुनर्ग्रसिष्यसे यथोर्णनाभिः भगवन् स्वशक्तिभिः ॥ १९ ॥
भावार्थ: हे भगवन्! आप स्वयं एक और अद्वितीय हैं। जब आपके मन में जगत् की रचना करने की इच्छा होती है, तब आप अपने ही आश्रित रहने वाली योगमाया को स्वीकार करके, मकड़ी (ऊर्णनाभि) की भांति अपनी ही शक्तियों से इस विश्व की रचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और अंत में इसे अपने ही भीतर समेट लेते हैं।
नैतद्‍बताधीश पदं तवेप्सितं यन्मायया नस्तनुषे भूतसूक्ष्मम् । अनुग्रहायास्त्वपि यर्हि मायया लसत्तुलस्या भगवान् विलक्षितः ॥ २० ॥
भावार्थ: हे अधीश! आप जो अपनी माया से हमारे लिए इन सूक्ष्म और स्थूल भूतों (इन्द्रिय विषयों) का विस्तार करते हैं, यह वास्तव में आपको भी अभीष्ट नहीं है (क्योंकि आप तो जीव का कल्याण चाहते हैं)। तथापि, जब आप सुंदर तुलसी की माला से सुशोभित होकर अपनी योगमाया से हमारे सामने प्रकट हुए हैं, तो यह हमारे ऊपर आपका परम अनुग्रह ही सिद्ध हो।
तं त्वानुभूत्योपरतक्रियार्थं स्वमायया वर्तितलोकतन्त्रम् । नमाम्यभीक्ष्णं नमनीयपाद सरोजमल्पीयसि कामवर्षम् ॥ २१ ॥
भावार्थ: आप आत्मानुभव के आनंद से ही समस्त कर्मों से निवृत्त (पूर्णकाम) हैं, फिर भी अपनी माया से लोक-व्यवस्था चला रहे हैं। थोड़ी सी सेवा करने पर भी समस्त कामनाओं की वर्षा करने वाले आपके वंदनीय चरण-कमलों में मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
ऋषिरुवाच
इत्यव्यलीकं प्रणुतोऽब्जनाभः तं आबभाषे वचसामृतेन । सुपर्णपक्षोपरि रोचमानः प्रेमस्मित उद्‌वीक्षणविभ्रमद्‍भ्रूः ॥ २२ ॥
भावार्थ: मैत्रेय ऋषि ने कहा — इस प्रकार कर्दम जी द्वारा निष्कपट भाव से स्तुति किए जाने पर, गरुड़ जी की पीठ (पंखों) पर सुशोभित कमलनाभ भगवान ने प्रेमभरी मुस्कान और सुंदर भ्रू-विलास युक्त चितवन से देखते हुए अपनी अमृतमयी वाणी में उनसे कहा।
श्रीभगवानुवाच
विदित्वा तव चैत्यं मे पुरैव समयोजि तत् । यदर्थं आत्मनियमैः त्वयैवाहं समर्चितः ॥ २३ ॥
भावार्थ: श्रीभगवान ने कहा — हे कर्दम! जिस विषय (विवाह) के लिए तुमने आत्मसंयमपूर्वक मेरी आराधना की है, तुम्हारे मन के उस संकल्प को जानकर मैंने पहले ही उसकी पूरी व्यवस्था कर दी है।
न वै जातु मृषैव स्यात् प्रजाध्यक्ष मदर्हणम् । भवद्विधेष्वतितरां मयि सङ्गृभितात्मनाम् ॥ २४ ॥
भावार्थ: हे प्रजापते! मेरी पूजा कभी भी व्यर्थ (झूठी) नहीं जाती; और तुम जैसे महात्माओं के विषय में तो कहना ही क्या, जिन्होंने अपना मन पूर्ण रूप से मुझमें ही लगा रखा है।
प्रजापतिसुतः सम्राट् मनुर्विख्यातमङ्गलः । ब्रह्मावर्तं योऽधिवसन् शास्ति सप्तार्णवां महीम् ॥ २५ ॥
भावार्थ: ब्रह्माजी के पुत्र सम्राट् स्वायम्भुव मनु, जो अपने शुभ और मंगलमय कर्मों के लिए अत्यंत विख्यात हैं, ब्रह्मावर्त में निवास करते हुए सात समुद्रों वाली इस पृथ्वी का शासन करते हैं।
स चेह विप्र राजर्षिः महिष्या शतरूपया । आयास्यति दिदृक्षुस्त्वां परश्वो धर्मकोविदः ॥ २६ ॥
भावार्थ: हे विप्र! धर्म के मर्मज्ञ वे राजर्षि मनु अपनी महारानी शतरूपा के साथ तुम्हारा दर्शन करने की इच्छा से परसों यहाँ तुम्हारे आश्रम में आएंगे।
आत्मजां असितापाङ्गीं वयःशीलगुणान्विताम् । मृगयन्तीं पतिं दास्यति अनुरूपाय ते प्रभो ॥ २७ ॥
भावार्थ: हे प्रभो! वे अपनी काले नेत्रों वाली तथा यौवन, शील और सद्गुणों से सम्पन्न पुत्री (देवहूति) को, जो योग्य पति की खोज में है, तुम्हें सुयोग्य और अनुरूप वर जानकर समर्पित करेंगे।
समाहितं ते हृदयं यत्र इमान् परिवत्सरान् । सा त्वां ब्रह्मन् नृपवधूः काममाशु भजिष्यति ॥ २८ ॥
भावार्थ: हे ब्रह्मन्! इतने वर्षों से तुम्हारा चित्त जिस प्रकार की पत्नी की कामना में लगा हुआ था, वह राजकुमारी शीघ्र ही तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हारी सेवा करेगी।
या त आत्मभृतं वीर्यं नवधा प्रसविष्यति । वीर्ये त्वदीये ऋषय आधास्यन्ति अञ्जसात्मनः ॥ २९ ॥
भावार्थ: वह राजकुमारी तुम्हारे द्वारा स्थापित तेज (वीर्य) से नौ कन्याओं को जन्म देगी, और आगे चलकर मरीचि आदि श्रेष्ठ ऋषि तुम्हारी उन कन्याओं से प्रसन्नतापूर्वक संतानें उत्पन्न करेंगे।
त्वं च सम्यग् अनुष्ठाय निदेशं म उशत्तमः । मयि तीर्थीकृताशेष क्रियार्थो मां प्रपत्स्यसे ॥ ३० ॥
भावार्थ: तुम भी पूर्णतः विशुद्ध चित्त होकर मेरी आज्ञा का भलीभांति पालन करोगे और अपने समस्त कर्मों का फल मुझे अर्पित करके अंत में मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।
कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान् । मय्यात्मानं सह जगद् द्रक्ष्यस्यात्मनि चापि माम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: तुम जितेन्द्रिय होकर समस्त जीवों पर दया करोगे और उन्हें अभयदान दोगे; तब तुम जगत् सहित अपनी आत्मा को मुझमें और मुझे अपनी आत्मा में अनुभव करोगे।
सहाहं स्वांशकलया त्वद्वीर्येण महामुने । तव क्षेत्रे देवहूत्यां प्रणेष्ये तत्त्वसंहिताम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: हे महामुने! मैं भी अपनी अंश-कला से तुम्हारे वीर्य द्वारा तुम्हारी पत्नी देवहूति के गर्भ से (कपिल रूप में) अवतीर्ण होऊंगा और तत्त्वज्ञान का उपदेश करने वाले सांख्य शास्त्र की रचना करूंगा।
मैत्रेय उवाच
एवं तं अनुभाष्याथ भगवान् प्रत्यगक्षजः । जगाम बिन्दुसरसः सरस्वत्या परिश्रितात् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी कहते हैं — इस प्रकार कर्दम मुनि से कहकर, इंद्रियातीत (प्रत्यगक्षज) भगवान श्रीहरि सरस्वती नदी के जल से घिरे हुए उस बिन्दु सरोवर से अपने धाम को चले गए।
निरीक्षतस्तस्य ययावशेष सिद्धेश्वराभिष्टुतसिद्धमार्गः । आकर्णयन् पत्ररथेन्द्रपक्षैः उच्चारितं स्तोममुदीर्णसाम ॥ ३४ ॥
भावार्थ: कर्दम जी के देखते-ही-देखते, समस्त सिद्धेश्वरों द्वारा प्रशंसित सिद्ध-मार्ग (वैकुण्ठ पथ) से भगवान प्रस्थान कर गए। जाते समय वे पक्षीराज गरुड़ के पंखों से उच्चारित होने वाले सामवेद के स्तोत्रों (बृहद्रथन्तर साम) को सुनते जा रहे थे।
अथ सम्प्रस्थिते शुक्ले कर्दमो भगवानृषिः । आस्ते स्म बिन्दुसरसि तं कालं प्रतिपालयन् ॥ ३५ ॥
भावार्थ: विशुद्धसत्त्वमय भगवान (शुक्ल) के चले जाने के पश्चात, भगवान कर्दम ऋषि उनके द्वारा बताए गए समय (परसों) की प्रतीक्षा करते हुए उसी बिन्दु सरोवर के तट पर ठहरे रहे।
मनुः स्यन्दनमास्थाय शातकौम्भपरिच्छदम् । आरोप्य स्वां दुहितरं सभार्यः पर्यटन् महीम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: उधर सम्राट् स्वायम्भुव मनु सोने से मढ़े हुए रथ पर अपनी पत्नी शतरूपा और कन्या देवहूति को बिठाकर पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए...
तस्मिन् सुधन्वन्नहनि भगवान् यत्समादिशत् । उपायादाश्रमपदं मुनेः शान्तव्रतस्य तत् ॥ ३७ ॥
भावार्थ: हे श्रेष्ठ धनुर्धर विदुर! भगवान ने जिस दिन के लिए कहा था, ठीक उसी दिन शांतव्रती कर्दम मुनि के उस आश्रम पर आ पहुँचे...
यस्मिन्भगवतो नेत्रान् न्यपतन् अश्रुबिन्दवः । कृपया सम्परीतस्य प्रपन्नेऽर्पितया भृशम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ: ...जहाँ अपने शरणागत भक्त पर अत्यंत करुणा से द्रवित हो जाने के कारण भगवान के नेत्रों से अश्रु-बिन्दु गिरे थे...
तद्वै बिन्दुसरो नाम सरस्वत्या परिप्लुतम् । पुण्यं शिवामृतजलं महर्षिगणसेवितम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ: ...और जिससे वह स्थान 'बिन्दु सरोवर' कहलाया। वह सरोवर सरस्वती नदी के जल से परिपूर्ण था, उसका जल अत्यंत पवित्र, कल्याणकारी तथा अमृत के समान मधुर था और महर्षिगण सदा उसका सेवन करते थे।
पुण्यद्रुमलताजालैः कूजत् पुण्यमृगद्विजैः । सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं वनराजिश्रियान्वितम् ॥ ४० ॥
भावार्थ: वह सरोवर पवित्र वृक्षों और लताओं के झुरमुटों से घिरा था, जिनमें पवित्र पशु और पक्षी मधुर बोलियां बोल रहे थे। वह सब ऋतुओं के फलों और फूलों से लदी हुई वनराजि की शोभा से संपन्न था।
मत्तद्विजगणैर्घुष्टं मत्तभ्रमर विभ्रमम् । मत्तबर्हिनटाटोपं आह्वयन् मत्तकोकिलम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ: वहाँ मतवाले पक्षियों के झुंड कलरव कर रहे थे, मतवाले भंवरे आनंद से मंडरा रहे थे, मस्त मयूर नटों की भांति गर्व से नाच रहे थे और मतवाली कोयलें एक-दूसरे को कूक कर बुला रही थीं।
कदम्ब चम्पकाशोक करञ्ज बकुलासनैः । कुन्दमन्दारकुटजैः चूतपोतैः अलङ्कृतम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ: वह आश्रम कदम्ब, चम्पा, अशोक, करंज, मौलसिरी, विजयसार, कुन्द, मन्दार, कुटज और आम के नन्हे-नन्हे वृक्षों से अलंकृत था।
कारण्डवैः प्लवैर्हंसैः कुररैः जलकुक्कुटैः । सारसैः चक्रवाकैश्च चकोरैः वल्गु कूजितम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ: कारण्डव (बतख), प्लव (जलकौए), हंस, कुरर (टिटिहरी), जलमुर्गे, सारस, चकवे और चकोर आदि पक्षियों के मधुर कलरव से वह स्थान गूंज रहा था।
तथैव हरिणैः क्रोडैः श्वावित् गवय कुञ्जरैः । गोपुच्छैः हरिभिः मर्कैः नकुलैः नाभिभिर्वृतम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: इसी प्रकार वह वन हरिण, जंगली सूअर, साही, नीलगाय, हाथी, लंगूर, सिंह, बंदर, नेवले और कस्तूरी मृगों से भरा हुआ था।
प्रविश्य तत्तीर्थवरं आदिराजः सहात्मजः । ददर्श मुनिमासीनं तस्मिन् हुतहुताशनम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ: अपनी पुत्री के साथ उस श्रेष्ठ तीर्थ में प्रवेश करके आदिराज स्वायम्भुव मनु ने देखा कि कर्दम मुनि अग्निहोत्र (हवन) से निवृत्त होकर वहाँ आसन पर बैठे हुए हैं।
रोचिष्णुं उग्रतपसा युञ्जतो योगमात्मनः । नातिक्षामं भगवतः स्निग्धापाङ्गावलोकनात् । तद्व्याहृतामृतकला पीयूषश्रवणेन च ॥ ४६ ॥
भावार्थ: घोर तपस्या और योगाभ्यास करने के कारण उनका शरीर अत्यंत कांतिमान हो रहा था। यद्यपि उन्होंने दीर्घकाल तक तप किया था, फिर भी भगवान की स्निग्ध (प्रेममयी) कृपादृष्टि पड़ने और उनके मुख से झरते हुए अमृतमय वचनों का पान करने से उनका शरीर अधिक दुर्बल (क्षीण) नहीं हुआ था।
प्रांशुं पद्मपलाशाक्षं जटिलं चीरवाससम् । उपसंश्रित्य मलिनं यथार्हणमसंस्कृतम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ: उनका कद लंबा था, नेत्र कमल-दल के समान विशाल थे, सिर पर जटाएं थीं और वे वृक्ष की छाल (वल्कल) पहने हुए थे। बिना तराशे हुए अनमोल रत्न की भांति उनका शरीर कुछ मटमैला (धूलि-धूसरित) होने पर भी अत्यंत तेजस्वी लग रहा था।
अथोटजमुपायातं नृदेवं प्रणतं पुरः । सपर्यया पर्यगृह्णात् प्रतिनन्द्यानुरूपया ॥ ४८ ॥
भावार्थ: जब सम्राट् मनु ने कुटी के पास आकर मुनि के सामने प्रणाम किया, तब कर्दम जी ने आशीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया और उनके पद के अनुरूप अर्घ्य-पाद्य आदि पूजा-विधि से उनका यथोचित सत्कार किया।
गृहीतार्हणमासीनं संयतं प्रीणयन् मुनिः । स्मरन् भगवदादेशं इत्याह श्लक्ष्णया गिरा ॥ ४९ ॥
भावार्थ: पूजा स्वीकार करने के बाद जब राजा मनु शांत भाव से आसन पर बैठ गए, तब मुनि ने भगवान के आदेश का स्मरण करते हुए उन्हें प्रसन्न करने के लिए अत्यंत मधुर वाणी में इस प्रकार कहा।
नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते । वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालिनी ॥ ५० ॥
भावार्थ: कर्दम जी बोले — हे राजदेव! निश्चय ही आपका यह भ्रमण (दौरा) सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए ही होता है, क्योंकि आप साक्षात भगवान श्रीहरि की पालन करने वाली शक्ति हैं।
योऽर्केन्दु अग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् । रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लाय ते नमः ॥ ५१ ॥
भावार्थ: आप अवसर के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, धर्म और वरुण के रूप (गुण) धारण करते हैं; ऐसे साक्षात भगवान विष्णु स्वरूप (शुक्ल) आपको मेरा नमस्कार है।
न यदा रथमास्थाय जैत्रं मणिगणार्पितम् । विस्फूर्जत् चण्डकोदण्डो रथेन त्रासयन् अघान् ॥ ५२ ॥
भावार्थ: हे राजन्! यदि आप मणियों से जड़े हुए अपने विजयी रथ पर सवार होकर और भयंकर धनुष की टंकार से पापियों को भयभीत करते हुए...
स्वसैन्यचरणक्षुण्णं वेपयन् मण्डलं भुवः । विकर्षन् बृहतीं सेनां पर्यटसि अंशुमानिव ॥ ५३ ॥
भावार्थ: ...तथा अपनी विशाल सेना के पैरों की धमक से भूमण्डल को कंपाते हुए सूर्य के समान पृथ्वी पर भ्रमण न करें...
तदैव सेतवः सर्वे वर्णाश्रमनिबन्धनाः । भगवद्रचिता राजन् भिद्येरन् बत दस्युभिः ॥ ५४ ॥
भावार्थ: ...तो हे राजन्! उसी समय डाकू और दुष्ट लोग भगवान द्वारा बनाई गई वर्ण और आश्रम की सारी मर्यादाओं (सेतुओं) को तोड़-फोड़कर नष्ट कर दें।
अधर्मश्च समेधेत लोलुपैर्व्यङ्कुशैर्नृभिः । शयाने त्वयि लोकोऽयं दस्युग्रस्तो विनङ्क्ष्यति ॥ ५५ ॥
भावार्थ: यदि आप प्रजा की रक्षा से उदासीन होकर सो जाएं (शांत बैठ जाएं), तो लोभी और निरंकुश मनुष्यों के कारण चारों ओर अधर्म बढ़ जाएगा और यह सारा संसार लुटेरों के हाथ में पड़कर नष्ट हो जाएगा।
अथापि पृच्छे त्वां वीर यदर्थं त्वं इहागतः । तद्वयं निर्व्यलीकेन प्रतिपद्यामहे हृदा ॥ ५६ ॥
भावार्थ: फिर भी हे वीर! मैं आपसे पूछता हूँ कि यहाँ आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है? आप जो भी आज्ञा देंगे, हम निष्कपट हृदय से उसका पूरा पालन करेंगे।

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