श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः
कर्दम-देवहूति-विहारो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच
पितृभ्यां प्रस्थिते साध्वी पतिं इङ्गितकोविदा ।
नित्यं पर्यचरत् प्रीत्या भवानीव भवं प्रभुम् ॥ १ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी कहते हैं — माता-पिता (मनु और शतरूपा) के चले जाने के बाद, पति के संकेतों को समझने वाली साध्वी देवहूति ने, जिस प्रकार माता पार्वती (भवानी) भगवान शंकर (भव) की सेवा करती हैं, उसी प्रकार बड़े प्रेम से नित्य अपने पति की सेवा की।
विश्रम्भेणात्मशौचेन गौरवेण दमेन च ।
शुश्रूषया सौहृदेन वाचा मधुरया च भोः ॥ २ ॥
भावार्थ: हे विदुर जी! उन्होंने पूर्ण विश्वास, मन और शरीर की पवित्रता, आदर-भाव, इंद्रिय-संयम, निष्काम सेवा, प्रगाढ़ प्रेम और मधुर वाणी के द्वारा...
विसृज्य कामं दम्भं च द्वेषं लोभमघं मदम् ।
अप्रमत्तोद्यता नित्यं तेजीयांसमतोषयत् ॥ ३ ॥
भावार्थ: ...तथा कामना, दम्भ (पाखंड), द्वेष, लोभ, पाप और मद (अभिमान) को सर्वथा त्यागकर, सदा सावधान और तत्पर रहते हुए अपने परम तेजस्वी पति को संतुष्ट किया।
स वै देवर्षिवर्यस्तां मानवीं समनुव्रताम् ।
दैवाद्गरीयसः पत्युः आशासानां महाशिषः ॥ ४ ॥
भावार्थ: मनु की पुत्री देवहूति पूर्णतः पतिव्रता थीं और दैव से भी बढ़कर अपने पति से ही परम कल्याण (महान आशीर्वाद) की आशा रखती थीं।
कालेन भूयसा क्षामां कर्शितां व्रतचर्यया ।
प्रेमगद्गदया वाचा पीडितः कृपयाब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ: बहुत समय तक कठोर व्रत और सेवा का पालन करने के कारण जब वे अत्यंत दुर्बल और कृश हो गईं, तब देवर्षियों में श्रेष्ठ कर्दम जी ने करुणा से द्रवित होकर प्रेम-गद्गद वाणी में उनसे कहा।
कर्दम उवाच
तुष्टोऽहमद्य तव मानवि मानदायाः
शुश्रूषया परमया परया च भक्त्या ।
यो देहिनामयमतीव सुहृत्स्वदेहो
नावेक्षितः समुचितः क्षपितुं मदर्थे ॥ ६ ॥
भावार्थ: कर्दम जी ने कहा — हे आदर देने वाली मनुनन्दिनि! तुम्हारी इस उत्कृष्ट सेवा और परम भक्ति से मैं आज अत्यंत प्रसन्न हूँ। सभी देहधारियों को अपना यह शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है, परन्तु तुमने मेरी सेवा के लिए अपने इस शरीर को सुखाने (गलाने) में भी तनिक परवाह नहीं की।
ये मे स्वधर्मनिरतस्य तपःसमाधि
विद्यात्मयोगविजिता भगवत्प्रसादाः ।
तानेव ते मदनुसेवनयावरुद्धान्
दृष्टिं प्रपश्य वितराम्यभयानशोकान् ॥ ७ ॥
भावार्थ: अपने धर्म में तत्पर रहते हुए मैंने तप, समाधि, विद्या और आत्मयोग के द्वारा भगवान की जो भय और शोक से रहित कृपा-विभूतियाँ प्राप्त की हैं, वे सब तुमने मेरी सेवा से ही अपने वश में कर ली हैं। अब मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ, तुम उन्हें स्वयं देख लो।
अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्विजृम्भ
विभ्रंशितार्थरचनाः किमुरुक्रमस्य ।
सिद्धासि भुङ्क्ष्व विभवान् निजधर्मदोहान्
दिव्यान् नरैर्दुरधिगान् नृपविक्रियाभिः ॥ ८ ॥
भावार्थ: उन दिव्य भोगों के सामने दूसरे सांसारिक भोग भला क्या हैं, जिनकी सारी रचना भगवान उरुक्रम की भौंहों के तनिक-से इशारे (काल की गति) से ही नष्ट हो जाती है? तुम अपने पतिव्रत धर्म के पालन से सिद्ध हो चुकी हो; अतः अब उन दिव्य ऐश्वर्यों का भोग करो, जो राजसी ठाट-बाट वाले बड़े-बड़े सम्राटों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ हैं।
एवं ब्रुवाणमबलाखिलयोगमाया
विद्याविचक्षणमवेक्ष्य गताधिरासीत् ।
सम्प्रश्रयप्रणयविह्वलया गिरेषद्
व्रीडावलोकविलसद् हसिताननाह ॥ ९ ॥
भावार्थ: समस्त योगमाया और विद्याओं में निपुण मुनि को इस प्रकार कहते हुए देखकर देवहूति की सारी मानसिक व्यथा दूर हो गई। तब लज्जा भरी चितवन और मंद मुस्कान से सुशोभित मुख वाली देवहूति ने विनय और प्रेम से गद्गद वाणी में कहा।
देवहूतिरुवाच
राद्धं बत द्विजवृषैतदमोघयोग
मायाधिपे त्वयि विभो तदवैमि भर्तः ।
यस्तेऽभ्यधायि समयः सकृदङ्गसङ्गो
भूयाद्गरीयसि गुणः प्रसवः सतीनाम् ॥ १० ॥
भावार्थ: देवहूति ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ! हे स्वामिन्! आप अमोघ योगमाया के अधीश्वर हैं, इसलिए आपके लिए यह सब सिद्ध ही है—यह मैं भलीभांति जानती हूँ। परन्तु आपने विवाह के समय जो यह प्रतिज्ञा (शर्त) की थी कि संतान होने तक हमारा समागम हो, वह अब पूर्ण हो; क्योंकि श्रेष्ठ पति से संतान की प्राप्ति होना कुलस्त्रियों के लिए एक महान गौरव (गुण) की बात है।
तत्रेतिकृत्यमुपशिक्ष यथोपदेशं
येनैष मे कर्शितोऽतिरिरंसयाऽऽत्मा ।
सिद्ध्येत ते कृतमनोभवधर्षिताया
दीनस्तदीश भवनं सदृशं विचक्ष्व ॥ ११ ॥
भावार्थ: अतः हे ईश! उसके लिए कामशास्त्र के उपदेश के अनुसार जो कर्तव्य हो, कृपया वह उपाय कीजिए; जिससे आपके प्रति तीव्र रति-इच्छा और काम-पीड़ा के कारण दुर्बल हुआ मेरा यह दीन शरीर स्वस्थ व पुष्ट हो सके। साथ ही, इसके लिए एक उपयुक्त भवन की भी व्यवस्था करने की कृपा करें।
मैत्रेय उवाच
प्रियायाः प्रियमन्विच्छन् कर्दमो योगमास्थितः ।
विमानं कामगं क्षत्तः तर्ह्येवाविरचीकरत् ॥ १२ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी कहते हैं — हे विदुर! अपनी प्रिया देवहूति का प्रिय करने की इच्छा से महर्षि कर्दम ने योगबल का आश्रय लेकर उसी क्षण इच्छानुसार चलने वाले एक दिव्य विमान (कामग विमान) की रचना कर दी।
सर्वकामदुघं दिव्यं सर्वरत्नसमन्वितम् ।
सर्वर्द्ध्युपचयोदर्कं मणिस्तम्भैरुपस्कृतम् ॥ १३ ॥
भावार्थ: वह दिव्य विमान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला और सब प्रकार के रत्नों से जड़ा हुआ था। उसमें समस्त सिद्धियाँ और ऐश्वर्य निरंतर बढ़ते रहते थे तथा वह मणिमय स्तम्भों (खम्भों) से सुशोभित था।
दिव्योपकरणोपेतं सर्वकालसुखावहम् ।
पट्टिकाभिः पताकाभिः विचित्राभिः अलङ्कृतम् ॥ १४ ॥
भावार्थ: वह दिव्य सामग्री से संपन्न और सभी ऋतुओं में सुख देने वाला था तथा रंग-बिरंगी रेशमी पट्टियों और विचित्र पताकाओं (झंडियों) से अलंकृत था।
स्रग्भिर्विचित्रमाल्याभिः मञ्जुशिञ्जत् षडङ्घ्रिभिः ।
दुकूलक्षौमकौशेयैः नानावस्त्रैः विराजितम् ॥ १५ ॥
भावार्थ: वह विमान भांति-भांति के फूलों की मालाओं—जिन पर भंवरे मधुर गुंजार कर रहे थे—तथा रेशमी, सूती आदि नाना प्रकार के वस्त्रों से सजा हुआ था।
उपर्युपरि विन्यस्त निलयेषु पृथक्पृथक् ।
क्षिप्तैः कशिपुभिः कान्तं पर्यङ्कव्यजनासनैः ॥ १६ ॥
भावार्थ: उस सात मंजिल वाले विमान के एक के ऊपर एक बने हुए अलग-अलग कक्षों में बिछे हुए कालीनों, पलंगों, पंखों और आसनों के कारण वह अत्यंत मनोहर लग रहा था।
तत्र तत्र विनिक्षिप्त नानाशिल्पोपशोभितम् ।
महामरकतस्थल्या जुष्टं विद्रुमवेदिभिः ॥ १७ ॥
भावार्थ: वह स्थान-स्थान पर बनी हुई नाना प्रकार की शिल्प-कलाओं (चित्रकारियों व मूर्तियों) से सुशोभित था। उसका फर्श उत्तम पन्ने (मरकतमणि) का बना था और उस पर मूंगे (विद्रुम) के चबूतरे बने हुए थे।
द्वाःसु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटवत् ।
शिखरेषु इन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैः अधिश्रितम् ॥ १८ ॥
भावार्थ: उसके द्वारों पर मूंगे की देहलियाँ और हीरे (वज्र) के किवाड़ चमक रहे थे, तथा नीलम (इन्द्रनील) मणि के बने शिखरों पर सोने के कलश रखे हुए थे।
चक्षुष्मत् पद्मरागाग्र्यैः वज्रभित्तिषु निर्मितैः ।
जुष्टं विचित्रवैतानैः महार्हैः हेमतोरणैः ॥ १९ ॥
भावार्थ: हीरे की दीवारों में जड़े हुए श्रेष्ठ पद्मराग मणियों (माणिक्य) से ऐसा लगता था मानो उस विमान के नेत्र हों। वह विचित्र चंदोवों और बहुमूल्य स्वर्ण-तोरणों से युक्त था।
हंसपारावतव्रातैः तत्र तत्र निकूजितम् ।
कृत्रिमान् मन्यमानैः स्वान् अधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २० ॥
भावार्थ: वहाँ बने हुए कृत्रिम हंसों और कबूतरों को अपने ही समान सजीव पक्षी समझकर, असली हंसों और कबूतरों के झुंड बार-बार उनके पास उड़कर जाते और कलरव करते थे, जिससे वह विमान गूंज रहा था।
विहारस्थानविश्राम संवेशप्राङ्गणाजिरैः ।
यथोपजोषं रचितैः विस्मापनम् इवात्मनः ॥ २१ ॥
भावार्थ: उसमें सुखपूर्वक रहने के लिए विहार-स्थल, विश्राम-गृह, शयन-कक्ष, भीतरी आंगन और बाहरी चौक आदि इतने सुंदर ढंग से बने थे कि उन्हें देखकर स्वयं कर्दम जी को भी आश्चर्य होता था।
ईदृग्गृहं तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा ।
सर्वभूताशयाभिज्ञः प्रावोचत् कर्दमः स्वयम् ॥ २२ ॥
भावार्थ: ऐसे दिव्य भवन को देखकर भी जब देवहूति का मन बहुत प्रसन्न नहीं हुआ (क्योंकि उनका अपना शरीर मैला और दुर्बल था), तब सबके हृदय की बात जानने वाले कर्दम जी ने स्वयं उनसे कहा।
निमज्ज्यास्मिन् ह्रदे भीरु विमानं इदमारुह ।
इदं शुक्लकृतं तीर्थं आशिषां यापकं नृणाम् ॥ २३ ॥
भावार्थ: "हे भीरु (सुन्दरी)! तुम पहले इस (बिन्दु) सरोवर में स्नान कर लो और फिर इस विमान पर चढ़ो। भगवान विष्णु (शुक्ल) द्वारा बनाया गया यह पवित्र तीर्थ मनुष्यों की संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।"
सा तद्भर्तुः समादाय वचः कुवलयेक्षणा ।
सरजं बिभ्रती वासो वेणीभूतांश्च मूर्धजान् ॥ २४ ॥
भावार्थ: कमलनयनी देवहूति ने पति की आज्ञा स्वीकार की। उस समय वे मैले वस्त्र पहने थीं, सिर के बाल उलझकर जटा जैसे हो गए थे...
अङ्गं च मलपङ्केन सञ्छन्नं शबलस्तनम् ।
आविवेश सरस्वत्याः सरः शिवजलाशयम् ॥ २५ ॥
भावार्थ: ...तथा उनका शरीर और वक्षस्थल मैल से ढका हुआ था। उसी अवस्था में उन्होंने सरस्वती के कल्याणकारी जल से भरे उस सरोवर में प्रवेश किया।
सान्तः सरसि वेश्मस्थाः शतानि दश कन्यकाः ।
सर्वाः किशोरवयसो ददर्शोत्पलगन्धयः ॥ २६ ॥
भावार्थ: सरोवर के भीतर बने एक भवन में उन्होंने एक हजार (१०००) कन्याएं देखीं, जो सभी किशोरावस्था की थीं और जिनके शरीर से नीलकमल के समान सुगंध आ रही थी।
तां दृष्ट्वा सहसोत्थाय प्रोचुः प्राञ्जलयः स्त्रियः ।
वयं कर्मकरीस्तुभ्यं शाधि नः करवाम किम् ॥ २७ ॥
भावार्थ: देवहूति को देखते ही वे सारी कन्याएं सहसा उठ खड़ी हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं— "हे देवि! हम आपकी दासियां हैं, हमें आज्ञा दीजिए कि हम आपकी क्या सेवा करें?"
स्नानेन तां महार्हेण स्नापयित्वा मनस्विनीम् ।
दुकूले निर्मले नूत्ने ददुरस्यै च मानदाः ॥ २८ ॥
भावार्थ: इसके बाद उन आदर देने वाली कन्याओं ने मनस्विनी देवहूति को बहुमूल्य सुगंधित द्रव्यों से स्नान कराया और पहनने के लिए दो निर्मल एवं नवीन रेशमी वस्त्र दिए।
भूषणानि परार्ध्यानि वरीयांसि द्युमन्ति च ।
अन्नं सर्वगुणोपेतं पानं चैवामृतासवम् ॥ २९ ॥
भावार्थ: फिर उन्होंने देवहूति को अत्यंत बहुमूल्य, श्रेष्ठ और देदीप्यमान आभूषण पहनाए तथा सब गुणों से युक्त दिव्य अन्न और अमृत के समान मधुर पेय पदार्थ भोजन के लिए दिए।
अथादर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् ।
विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३० ॥
भावार्थ: तत्पश्चात देवहूति ने दर्पण में अपना स्वरूप देखा—वे सुंदर माला और निर्मल वस्त्र धारण किए हुए थीं, उनका शरीर सर्वथा निर्मल हो गया था, मांगलिक शृंगार संपन्न हुआ था और वे कन्याएं उनका बहुत सम्मान कर रही थीं।
स्नातं कृतशिरःस्नानं सर्वाभरणभूषितम् ।
निष्कग्रीवं वलयिनं कूजत् काञ्चननूपुरम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: सिर से स्नान करने के बाद वे समस्त आभूषणों से सजी हुई थीं। उनके गले में स्वर्ण-पदक (निष्क), कलाइयों में कंगन और चरणों में रुनझुन करते हुए सोने के नूपुर शोभा पा रहे थे।
श्रोण्योरध्यस्तया काञ्च्या काञ्चन्या बहुरत्नया ।
हारेण च महार्हेण रुचकेन च भूषितम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: उनकी कमर में अनेक रत्नों से जड़ी हुई सोने की करधनी और वक्षस्थल पर बहुमूल्य मोतियों का हार तथा सुवर्ण-आभूषण (रुचक) सुशोभित थे।
सुदता सुभ्रुवा श्लक्ष्ण स्निग्धापाङ्गेन चक्षुषा ।
पद्मकोशस्पृधा नीलैः अलकैश्च लसन्मुखम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: सुंदर दांत, सुंदर भौंहें, कोमल और प्रेमभरे कटाक्ष वाले नेत्र (जो कमल की कली से होड़ कर रहे थे) तथा नीली अलकों (घुंघराले बालों) से उनका मुखकमल अत्यंत खिल उठा था।
यदा सस्मार ऋषभं ऋषीणां दयितं पतिम् ।
तत्र चास्ते सह स्त्रीभिः यत्रास्ते स प्रजापतिः ॥ ३४ ॥
भावार्थ: अपना ऐसा दिव्य रूप देखकर जैसे ही उन्होंने ऋषिश्रेष्ठ अपने प्रियतम पति कर्दम जी का स्मरण किया, वैसे ही वे उन सहस्र कन्याओं के साथ उसी स्थान पर पहुँच गईं जहाँ प्रजापति कर्दम जी विराजमान थे।
भर्तुः पुरस्तादात्मानं स्त्रीसहस्रवृतं तदा ।
निशाम्य तद्योगगतिं संशयं प्रत्यपद्यत ॥ ३५ ॥
भावार्थ: अपने पति के सामने सहसा अपने-आप को एक हजार दासियों से घिरा हुआ पाकर और पति की ऐसी अद्भुत योगशक्ति देखकर वे आश्चर्यचकित हो गईं।
स तां कृतमलस्नानां विभ्राजन्तीमपूर्ववत् ।
आत्मनो बिभ्रतीं रूपं संवीतरुचिरस्तनीम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: हे शत्रुतापन विदुर! स्नान से निर्मल होकर अपूर्व कांति से दमकती हुई, अपने पूर्व के राजकुमारी जैसे दिव्य रूप को धारण किए हुए, सुंदर वस्त्रों से ढके उरोजों वाली...
विद्याधरीसहस्रेण सेव्यमानां सुवाससम् ।
जातभावो विमानं तद् आरोहयद् अमित्रहन् ॥ ३७ ॥
भावार्थ: ...और एक हजार विद्याधरियों द्वारा सेवित तथा सुंदर वस्त्र धारण किए हुए देवहूति को देखकर कर्दम मुनि के हृदय में अनुराग उमड़ आया और उन्होंने उन्हें उस दिव्य विमान पर चढ़ा लिया।
तस्मिन् अलुप्तमहिमा प्रिययानुरक्तो
विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने ।
बभ्राज उत्कचकुमुद्गणवानपीच्यः
ताराभिरावृत इव उडुपतिः नभःस्थः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: अपनी प्रिया में अनुरक्त और विद्याधरियों से सेवित होने पर भी परम सुंदर कर्दम जी की योग-महिमा तनिक भी कम नहीं हुई। वे उस विमान में ऐसे सुशोभित हुए जैसे आकाश में खिले हुए कुमुदों की शोभा बढ़ाने वाला चन्द्रमा तारों से घिरा हुआ चमक रहा हो।
तेनाष्टलोकपविहारकुलाचलेन्द्र
द्रोणीष्वनङ्गसखमारुतसौभगासु ।
सिद्धैर्नुतो द्युधुनिपातशिवस्वनासु
रेमे चिरं धनदवल्ललनावरूथी ॥ ३९ ॥
भावार्थ: उस विमान के द्वारा उन्होंने कुबेर (धनद) की भांति सुंदरियों से घिरे रहकर और सिद्धों द्वारा प्रशंसित होते हुए, आठों लोकपालों के विहार-स्थल गिरिराज सुमेरु की उन सुंदर घाटियों में दीर्घकाल तक विहार किया, जो कामदेव के सखा (शीतल-मंद-सुगंध) पवन और आकाशगंगा के झरनों की मधुर ध्वनि से अत्यंत रमणीक थीं।
वैश्रम्भके सुरसने नन्दने पुष्पभद्रके ।
मानसे चैत्ररथ्ये च स रेमे रामया रतः ॥ ४० ॥
भावार्थ: उन्होंने अपनी परम सुंदरी पत्नी देवहूति के साथ वैश्रम्भक, सुरसन, नन्दनवन, पुष्पभद्रक, मानसरोवर और चैत्ररथ आदि दिव्य उपवनों में आनंदपूर्वक विहार किया।
भ्राजिष्णुना विमानेन कामगेन महीयसा ।
वैमानिकानत्यशेत चरन् लोकान् यथानिलः ॥ ४१ ॥
भावार्थ: इच्छानुसार चलने वाले उस विशाल एवं देदीप्यमान विमान के द्वारा वायु के समान स्वच्छंद रूप से विभिन्न लोकों में विचरते हुए, उन्होंने विमानचारी देवताओं को भी पीछे छोड़ दिया (अर्थात उनका ऐश्वर्य देवताओं से भी बढ़कर था)।
किं दुरापादनं तेषां पुंसां उद्दामचेतसाम् ।
यैराश्रितस्तीर्थपदः चरणो व्यसनात्ययः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: जिन महामना पुरुषों ने जन्म-मृत्यु रूपी संकट को मिटाने वाले भगवान श्रीहरि के पवित्र चरण-कमलों का आश्रय ले लिया है, उनके लिए भला कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?
प्रेक्षयित्वा भुवो गोलं पत्न्यै यावान् स्वसंस्थया ।
बह्वाश्चर्यं महायोगी स्वाश्रमाय न्यवर्तत ॥ ४३ ॥
भावार्थ: अपनी पत्नी को संपूर्ण भूमण्डल के समस्त द्वीप-खंडों और उसके अनेक आश्चर्यजनक दृश्यों को दिखाने के पश्चात, महायोगी कर्दम जी वापस अपने आश्रम में लौट आए।
विभज्य नवधाऽऽत्मानं मानवीं सुरतोत्सुकाम् ।
रामां निरमयन् रेमे वर्षपूगान् मुहूर्तवत् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: आश्रम में आकर उन्होंने रति के लिए उत्सुक मनु-पुत्री देवहूति को प्रसन्न करने के लिए अपने शरीर को नौ रूपों में विभाजित कर लिया और उनके साथ अनेक वर्षों तक इस प्रकार रमण किया मानो वह समय एक मुहूर्त (क्षण) के समान बीत गया हो।
तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता ।
न चाबुध्यत तं कालं पत्यापीच्येन सङ्गता ॥ ४५ ॥
भावार्थ: उस विमान में आनंद बढ़ाने वाली उत्तम शय्या पर अपने परम सुंदर पति के संग में लीन रहने के कारण देवहूति को भी उस लंबे समय के बीतने का कुछ पता ही न चला।
एवं योगानुभावेन दम्पत्यो रममाणयोः ।
शतं व्यतीयुः शरदः कामलालसयोर्मनाक् ॥ ४६ ॥
भावार्थ: इस प्रकार योग के प्रभाव से काम-क्रीड़ा में तत्पर होकर रमण करते हुए उन दंपति के सौ (१००) वर्ष एक क्षण के समान बीत गए।
तस्यां आधत्त रेतस्तां भावयन् आत्मनाऽऽत्मवित् ।
नोधा विधाय रूपं स्वं सर्वसङ्कल्पविद्विभुः ॥ ४७ ॥
भावार्थ: समस्त संकल्पों को जानने वाले और समर्थ आत्मज्ञानी कर्दम जी ने अपने को नौ रूपों में विभक्त करके तथा देवहूति को अपने ही समान भाव से देखते हुए उनमें अपना तेज (वीर्य) स्थापित किया।
अतः सा सुषुवे सद्यो देवहूतिः स्त्रियः प्रजाः ।
सर्वास्ताश्चारुसर्वाङ्ग्यो लोहितोत्पलगन्धयः ॥ ४८ ॥
भावार्थ: फलस्वरूप, देवहूति ने उसी दिन एक साथ नौ कन्याओं को जन्म दिया। वे सभी कन्याएं हर अंग से परम सुंदरी थीं और उनके शरीर से लाल कमल के समान दिव्य सुगंध आती थी।
पतिं सा प्रव्रजिष्यन्तं तदाऽऽलक्ष्योशती बहिः ।
स्मयमाना विक्लवेन हृदयेन विदूयता ॥ ४९ ॥
भावार्थ: इसके बाद जब सुंदरी देवहूति ने देखा कि अब उनके पति (अपनी शर्त के अनुसार) संन्यास लेने के लिए वन में जाने की तैयारी कर रहे हैं, तब उनका हृदय अत्यंत व्याकुल और संतप्त हो उठा, यद्यपि बाहर से वे मुस्कुराती रहीं।
लिखन्त्यधोमुखी भूमिं पदा नखमणिश्रिया ।
उवाच ललितां वाचं निरुध्याश्रुकलां शनैः ॥ ५० ॥
भावार्थ: वे सिर झुकाकर अपने मणि के समान चमकते हुए नखों वाले चरणों से भूमि कुरेदने लगीं और अपने आँसुओं को किसी प्रकार रोककर धीरे-से मनोहर वाणी में बोलीं।
देवहूतिरुवाच
सर्वं तद्भगवान् मह्यं उपोवाह प्रतिश्रुतम् ।
अथापि मे प्रपन्नाया अभयं दातुमर्हसि ॥ ५१ ॥
भावार्थ: देवहूति ने कहा — हे भगवन्! आपने मुझसे जो कुछ प्रतिज्ञा की थी, वह सब पूर्ण कर दी है; तथापि मैं आपकी शरण में आई हूँ, अतः आपको मुझे अभयदान भी देना चाहिए।
ब्रह्मन् दुहितृभिस्तुभ्यं विमृग्याः पतयः समाः ।
कश्चित्स्यान्मे विशोकाय त्वयि प्रव्रजिते वनम् ॥ ५२ ॥
भावार्थ: हे ब्रह्मन्! आपकी इन कन्याओं के लिए योग्य वरों की खोज तो इन्हें स्वयं अथवा आपको ही करनी होगी; परन्तु आपके वन (संन्यास) में चले जाने पर मेरे शोक को दूर करने वाला (आत्मज्ञान रूपी सहारा देने वाला) भी कोई होना चाहिए।
एतावतालं कालेन व्यतिक्रान्तेन मे प्रभो ।
इन्द्रियार्थप्रसङ्गेन परित्यक्तपरात्मनः ॥ ५३ ॥
भावार्थ: हे प्रभो! परमात्मा के चिंतन को छोड़कर केवल इंद्रियों के भोगों में आसक्त रहने के कारण मेरा अब तक का यह सारा समय व्यर्थ ही बीत गया है; अब और अधिक समय नष्ट नहीं होना चाहिए।
इन्द्रियार्थेषु सज्जन्त्या प्रसङ्गस्त्वयि मे कृतः ।
अजानन्त्या परं भावं तथाप्यस्तु अभयाय मे ॥ ५४ ॥
भावार्थ: मैंने इंद्रिय-भोगों में आसक्त रहकर आपके परम (ब्रह्मनिष्ठ) स्वरूप को न जानते हुए भी आपसे प्रेम किया है; तथापि आप जैसे महापुरुष का संग मेरे लिए जन्म-मृत्यु के भय को मिटाने वाला (अभयदायक) सिद्ध हो।
सङ्गो यः संसृतेर्हेतुः असत्सु विहितोऽधिया ।
स एव साधुषु कृतो निःसङ्गत्वाय कल्पते ॥ ५५ ॥
भावार्थ: अज्ञानवश असत् (विषयी) पुरुषों से किया गया जो संग संसार-बंधन का कारण होता है, वही संग यदि साधु-महात्माओं के साथ किया जाए तो संसार की समस्त आसक्तियों से मुक्त कर देने वाला हो जाता है।
नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते ।
न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः ॥ ५६ ॥
भावार्थ: इस लोक में जिस मनुष्य का कर्म न तो धर्म के लिए होता है, न वैराग्य उत्पन्न करता है और न ही पवित्र चरणों वाले भगवान श्रीहरि की सेवा में लगता है—वह मनुष्य जीवित रहते हुए भी मुर्दे के समान ही है।
साहं भगवतो नूनं वञ्चिता मायया दृढम् ।
यत्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात् ॥ ५७ ॥
भावार्थ: निश्चय ही मैं भगवान की प्रबल माया से बुरी तरह ठगी गई हूँ, जो मोक्ष देने में समर्थ आप जैसे पति को पाकर भी मैंने संसार-बंधन से छूटने की इच्छा नहीं की!

