श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः
कापिलेये द्वात्रिंशोऽध्यायः
कपिल उवाच
अथ यो गृहमेधीयान् धर्मानेवावसन्गृहे ।
काममर्थं च धर्मान् स्वान् दोग्धि भूयः पिपर्ति तान् ॥ १ ॥
भावार्थ: भगवान कपिल कहते हैं — हे माता! जो मनुष्य घर में रहकर केवल गृहस्थ आश्रम के सकाम धर्मों का ही पालन करता है, वह धर्म के द्वारा अर्थ और काम का दोहन करता है (उन्हें प्राप्त करता है) और फिर उन्हीं (अर्थ और काम) को बार-बार भोगता रहता है।
स चापि भगवद्धर्मात् काममूढः पराङ्मुखः ।
यजते क्रतुभिर्देवान् पितॄंश्च श्रद्धयान्वितः ॥ २ ॥
भावार्थ: वासनाओं से मोहित वह मनुष्य भगवत्-प्राप्ति के निष्काम धर्म से विमुख होकर, केवल सांसारिक फल की इच्छा से अत्यंत श्रद्धापूर्वक यज्ञों द्वारा देवताओं और पितरों की पूजा करता है।
तत् श्रद्धया क्रान्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् ।
गत्वा चान्द्रमसं लोकं सोमपाः पुनरेष्यति ॥ ३ ॥
भावार्थ: पितरों और देवताओं के व्रतों में जिसकी बुद्धि श्रद्धापूर्वक लगी हुई है, ऐसा वह सकाम पुरुष मृत्यु के बाद चन्द्रलोक (स्वर्ग) में जाता है। वहाँ सोम (अमृत) का पान करके पुण्य क्षीण होने पर वह पुनः इस पृथ्वी पर लौट आता है।
यदा चाहीन्द्रशय्यायां शेतेऽनन्तासनो हरिः ।
तदा लोका लयं यान्ति ते एते गृहमेधिनाम् ॥ ४ ॥
भावार्थ: जब प्रलयकाल में भगवान श्रीहरि शेषनाग (अहीन्द्र) की शय्या पर शयन करते हैं, तब इन सकाम गृहस्थों के वे स्वर्ग आदि सभी लोक भी लीन (नष्ट) हो जाते हैं।
ये स्वधर्मान्न दुह्यन्ति धीराः कामार्थहेतवे ।
निःसङ्गा न्यस्तकर्माणः प्रशान्ताः शुद्धचेतसः ॥ ५ ॥
भावार्थ: इसके विपरीत, जो धीर पुरुष अपने धर्मों (कर्मों) से काम और अर्थ का दोहन नहीं करते (सकाम फल नहीं चाहते); जो आसक्ति-रहित होकर अपने सारे कर्म भगवान को अर्पण कर देते हैं; जो अत्यंत शांत और शुद्ध चित्त वाले हैं...
निवृत्तिधर्मनिरता निर्ममा निरहङ्कृताः ।
स्वधर्माप्तेन सत्त्वेन परिशुद्धेन चेतसा ॥ ६ ॥
भावार्थ: ...जो निवृत्ति धर्म (सांसारिक भोगों से पीछे हटने) में लगे रहते हैं; जो ममता और अहंकार से रहित हैं; वे अपने निष्काम स्वधर्म के पालन से प्राप्त हुए सत्त्वगुण के कारण परम शुद्ध अंतःकरण वाले हो जाते हैं।
सूर्यद्वारेण ते यान्ति पुरुषं विश्वतोमुखम् ।
परावरेशं प्रकृतिं अस्योत्पत्त्यन्तभावनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ: ऐसे निष्काम योगी सूर्यद्वार (अर्चिरादि मार्ग/प्रकाश मार्ग) से होते हुए उस सर्वव्यापी, कारण और कार्य के स्वामी परम पुरुष (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) के पास जाते हैं, जो इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं।
द्विपरार्धावसाने यः प्रलयो ब्रह्मणस्तु ते ।
तावद् अध्यासते लोकं परस्य परचिन्तकाः ॥ ८ ॥
भावार्थ: वे परब्रह्म का चिंतन करने वाले निष्काम साधक दो परार्ध (ब्रह्मा की पूरी आयु) के अंत में होने वाले महाप्रलय तक ब्रह्मा जी के उसी 'सत्यलोक' में निवास करते हैं।
क्ष्माम्भोऽनलानिलवियन् मनैन्द्रियार्थ
भूतादिभिः परिवृतं प्रतिसञ्जिहीर्षुः ।
अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा
कालं पराख्यमनुभूय परः स्वयम्भूः ॥ ९ ॥
भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, इन्द्रियां, विषय और अहंकार आदि से घिरे हुए इस ब्रह्मांड को जब ब्रह्मा जी समेटना (लीन करना) चाहते हैं, तब वे अपना दो परार्ध का समय पूरा करके निर्गुण परब्रह्म (अव्याकृत) में प्रवेश कर जाते हैं।
एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टा
ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।
तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं
ब्रह्म प्रधानमुपयान्ति अगताभिमानाः ॥ १० ॥
भावार्थ: इस प्रकार प्राण और मन को जीतने वाले जो विरक्त योगी ब्रह्मा जी के लोक में गए थे, वे अहंकार से सर्वथा मुक्त होकर ब्रह्मा जी के साथ ही उस आनंदस्वरूप, सनातन परम पुरुष परब्रह्म में प्रवेश कर जाते हैं।
अथ तं सर्वभूतानां हृत्पद्मेषु कृतालयम् ।
श्रुतानुभावं शरणं व्रज भावेन भामिनि ॥ ११ ॥
भावार्थ: इसलिए हे भामिनि (माता)! आप भी अतिशय प्रेम-भाव के साथ उन भगवान की ही शरण में जाएँ, जो सभी प्राणियों के हृदय-कमल में निवास करते हैं और जिनका प्रभाव वेदों में सुना जाता है।
आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः ।
योगेश्वरैः कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तकैः ॥ १२ ॥
भावार्थ: चराचर जगत के आदि कारण, वेदों को गर्भ में धारण करने वाले वे ब्रह्मा जी भी, भृगु आदि ऋषियों, सनत्कुमार आदि योगेश्वरों और योग का प्रचार करने वाले सिद्धों के साथ...
भेददृष्ट्याभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा ।
कर्तृत्वात्सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम् ॥ १३ ॥
भावार्थ: ...निष्काम कर्म करने पर भी, अपनी भेददृष्टि (ईश्वर से स्वयं को अलग मानना) और कर्तृत्व के अभिमान के कारण (मोक्ष न पाकर) सगुण ब्रह्म (पुरुषोत्तम भगवान) को ही प्राप्त होते हैं।
स संसृत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना ।
जाते गुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते ॥ १४ ॥
भावार्थ: वे ब्रह्मा जी ईश्वर रूपी काल के द्वारा प्रकृति के गुणों में क्षोभ उत्पन्न होने पर, पुनः नई सृष्टि के आरंभ में अपने पूर्व कर्मों के अनुसार वैसे ही (सृष्टिकर्ता के रूप में) उत्पन्न हो जाते हैं।
ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं च तेऽपि धर्मविनिर्मितम् ।
निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरे सति ॥ १५ ॥
भावार्थ: उनके साथ गए हुए वे ऋषि आदि भी, अपने धर्म से प्राप्त उस पारमेष्ठ्य (ब्रह्मा के समान) ऐश्वर्य को भोगकर, गुणों का क्षोभ होने पर फिर से इसी संसार में लौट आते हैं।
ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः ।
कुर्वन्ति अप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः ॥ १६ ॥
भावार्थ: जो लोग इस लोक में अत्यंत आसक्त मन वाले हैं, जो कर्मों में ही पूर्ण श्रद्धा रखते हैं और जो शास्त्र-विहित नित्य-नैमित्तिक कर्मों को भी पूरी तरह सकाम भाव से ही करते हैं...
रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः ।
पितॄन् यजन्ति अनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः ॥ १७ ॥
भावार्थ: ...जिनकी बुद्धि रजोगुण से कुंठित (मलिन) है, जो कामनाओं में डूबे हैं, जिनकी इन्द्रियां वश में नहीं हैं, और जिनका मन घर-गृहस्थी में ही लगा हुआ है, वे लोग प्रतिदिन (स्वर्ग आदि की इच्छा से) पितरों की पूजा करते हैं।
त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः ।
कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः ॥ १८ ॥
भावार्थ: धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) में ही फंसे हुए वे लोग, अज्ञानियों का नाश करने वाले और जिनके महान पराक्रम का वर्णन किया जाना चाहिए, उन मधुसूदन भगवान की कथाओं से हमेशा विमुख रहते हैं।
नूनं दैवेन विहता ये चाच्युतकथासुधाम् ।
हित्वा शृण्वन्ति असद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः ॥ १९ ॥
भावार्थ: निश्चय ही वे लोग विधाता (ईश्वर) द्वारा ठगे गए हैं, जो भगवान अच्युत की कथा रूपी अमृत को छोड़कर सांसारिक विषयों की गंदी कहानियाँ वैसे ही सुनते हैं, जैसे मल खाने वाला सुअर केवल विष्ठा (मल) ही खोजता है।
दक्षिणेन पथार्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते ।
प्रजामनु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृतः ॥ २० ॥
भावार्थ: वे सकाम कर्म करने वाले मृत्यु के बाद दक्षिण मार्ग (धूम-मार्ग) से पितृलोक में जाते हैं, और वहां से अपने पुण्यों का फल भोगकर पुनः अपनी ही संतान (प्रजा) के घर में जन्म ले लेते हैं। उनके कर्म केवल श्मशान (मृत्यु) तक ही सीमित रहते हैं।
ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति ।
पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः ॥ २१ ॥
भावार्थ: हे सती माता! जब उनके पुण्य क्षीण (खत्म) हो जाते हैं, तब देवताओं द्वारा उनका स्वर्ग का ऐश्वर्य तुरंत छीन लिया जाता है और वे विवश होकर पुनः इस मृत्युलोक में गिर पड़ते हैं।
तस्मात्त्वं सर्वभावेन भजस्व परमेष्ठिनम् ।
तद्गुणाश्रयया भक्त्या भजनीयपदाम्बुजम् ॥ २२ ॥
भावार्थ: इसलिए हे माता! आप अपने संपूर्ण भावों से उन परब्रह्म परमात्मा का भजन करें, जिनके चरणकमल परम पूजनीय हैं, और यह भजन उनके निर्गुण स्वरूप के प्रति अनन्य भक्ति द्वारा ही करें।
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं यद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ २३ ॥
भावार्थ: भगवान वासुदेव में निष्काम भाव से किया गया भक्तियोग बहुत ही शीघ्र संसार से वैराग्य उत्पन्न कर देता है और वह परम ज्ञान प्रदान करता है, जिससे साक्षात् ब्रह्म-दर्शन होता है।
यदास्य चित्तमर्थेषु समेष्विन्द्रियवृत्तिभिः ।
न विगृह्णाति वैषम्यं प्रियं अप्रियमित्युत ॥ २४ ॥
भावार्थ: जब इस भक्त का चित्त इन्द्रियों के विषयों में समान भाव रखने लगता है और अनुकूल (प्रिय) तथा प्रतिकूल (अप्रिय) के बीच कोई भी भेद या राग-द्वेष ग्रहण नहीं करता...
स तदैवात्मनात्मानं निःसङ्गं समदर्शनम् ।
हेयोपादेयरहितं आरूढं पदमीक्षते ॥ २५ ॥
भावार्थ: ...तब वह उसी क्षण अपनी ही आत्मा के द्वारा उस आत्मतत्त्व का साक्षात् दर्शन कर लेता है, जो सर्वथा अनासक्त (निःसंग), समदर्शी, त्यागने-ग्रहण करने से परे (हेयोपादेयरहित) और अपने सर्वोच्च पद पर स्थित है।
ज्ञानमात्रं परं ब्रह्म परमात्मेश्वरः पुमान् ।
दृश्यादिभिः पृथग्भावैः भगवान् एक ईयते ॥ २६ ॥
भावार्थ: वह एक ही भगवान शुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। वही अलग-अलग दृष्टियों से परब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, पुरुष और दृश्य जगत (संसार) के रूप में प्रतीत होते हैं।
एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः ।
युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यद् असङ्गस्तु कृत्स्नशः ॥ २७ ॥
भावार्थ: इस संसार में योगियों को सर्वांगपूर्ण योग का बस इतना ही अभीष्ट फल प्राप्त होता है कि वे इस सम्पूर्ण प्रपंच (संसार) से पूरी तरह अनासक्त (असंग) हो जाएं।
ज्ञानमेकं पराचीनैः इन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् ।
अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा ॥ २८ ॥
भावार्थ: वह निर्गुण ब्रह्म ज्ञानस्वरूप और एक ही है, परन्तु अज्ञान (भ्रांति) के कारण बहिर्मुखी (बाहर की ओर भागने वाली) इन्द्रियों द्वारा वह शब्द, स्पर्श, रूप आदि अनेक भौतिक विषयों के रूप में भासता (दिखाई देता) है।
यथा महान् अहंरूपः त्रिवृत् पञ्चविधः स्वराट् ।
एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद्यतः ॥ २९ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार एक ही महत्तत्त्व — अहंकार के रूप में, तीनों गुणों के रूप में, पंचमहाभूतों के रूप में, और ग्यारह इन्द्रियों के रूप में (कुल मिलाकर) इस ब्रह्मांड (जगत्) रूपी शरीर में प्रकट होता है...
एतद्वै श्रद्धया भक्त्या योगाभ्यासेन नित्यशः ।
समाहितात्मा निःसङ्गो विरक्त्या परिपश्यति ॥ ३० ॥
भावार्थ: ...उसी प्रकार जो योगी श्रद्धा, भक्ति और निरंतर योग के अभ्यास से अपने चित्त को एकाग्र कर लेता है, वह विरक्त और अनासक्त होकर इस एक ही सत्य (ब्रह्म) का सब रूपों में दर्शन कर लेता है।
इत्येतत्कथितं गुर्वि ज्ञानं तद्ब्रह्मदर्शनम् ।
येन अनुबुद्ध्यते तत्त्वं प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ ३१ ॥
भावार्थ: हे आदरणीये माता (गुर्वि)! मैंने तुम्हें ब्रह्म का साक्षात्कार कराने वाला वह श्रेष्ठ ज्ञान बता दिया है, जिसके द्वारा प्रकृति और पुरुष के यथार्थ तत्त्व का बोध हो जाता है।
ज्ञानयोगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः ।
द्वयोरप्येक एवार्थो भगवत् शब्दलक्षणः ॥ ३२ ॥
भावार्थ: मुझमें निष्ठा रखने वाला ज्ञानयोग और निर्गुण अवस्था वाला भक्तियोग — इन दोनों का फल एक ही है, और वह है 'भगवान' शब्द से पुकारे जाने वाले परमतत्त्व की प्राप्ति।
यथेन्द्रियैः पृथग्द्वारैः अर्थो बहुगुणाश्रयः ।
एको नानेयते तद्वद् भगवान् शास्त्रवर्त्मभिः ॥ ३३ ॥
भावार्थ: जैसे एक ही वस्तु अनेक गुणों का आश्रय होने के कारण अलग-अलग इन्द्रियों द्वारा अलग-अलग रूप में (आँख से रूप, कान से शब्द आदि) अनुभव की जाती है; वैसे ही एक ही भगवान विभिन्न शास्त्रों के अलग-अलग मार्गों से अनेक रूपों में प्राप्त होते हैं।
क्रियया क्रतुभिर्दानैः तपःस्वाध्यायमर्शनैः ।
आत्मेन्द्रियजयेनापि सन्न्यासेन च कर्मणाम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ: कर्मकाण्ड (क्रिया) से, यज्ञों से, दान से, तपस्या से, वेदों के अध्ययन-मनन से, मन और इन्द्रियों को जीतने से, सकाम कर्मों के संन्यास से...
योगेन विविधाङ्गेन भक्तियोगेन चैव हि ।
धर्मेणोभयचिह्नेन यः प्रवृत्तिनिवृत्तिमान् ॥ ३५ ॥
भावार्थ: ...यम-नियम आदि अंगों वाले अष्टांग योग से, निष्काम भक्तियोग से, तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों प्रकार के धर्मों का पालन करने से...
आत्मतत्त्वावबोधेन वैराग्येण दृढेन च ।
ईयते भगवानेभिः सगुणो निर्गुणः स्वदृक् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: ...आत्मतत्त्व के ज्ञान से और दृढ़ वैराग्य से — इन सभी साधनों के द्वारा वही एक स्वयंप्रकाश भगवान सगुण और निर्गुण रूप में प्राप्त किए जाते हैं।
प्रावोचं भक्तियोगस्य स्वरूपं ते चतुर्विधम् ।
कालस्य चाव्यक्तगतेः योऽन्तर्धावति जन्तुषु ॥ ३७ ॥
भावार्थ: हे माता! मैंने तुम्हें सकाम और निष्काम भेद से चार प्रकार के भक्तियोग का स्वरूप बता दिया। इसके साथ ही उस काल की अव्यक्त गति भी बता दी, जो सभी प्राणियों के पीछे (मृत्यु बनकर) दौड़ रहा है।
जीवस्य संसृतीर्बह्वीः अविद्याकर्म निर्मिताः ।
यास्वङ्ग प्रविशन्नात्मा न वेद गतिमात्मनः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: अज्ञान और सकाम कर्मों के कारण जीव की जो अनेक प्रकार की गतियां (योनियां) होती हैं, उनका भी मैंने वर्णन किया है। इन योनियों में फँसकर यह जीव अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मगति) को भूल जाता है।
नैतत्खलायोपदिशेन् नाविनीताय कर्हिचित् ।
न स्तब्धाय न भिन्नाय नैव धर्मध्वजाय च ॥ ३९ ॥
भावार्थ: यह परम गोपनीय उपदेश कभी भी दुष्ट (खल) को, अविनीत (उद्दंड) को, घमंडी (स्तब्ध) को, पापियों (भिन्नाय) को और पाखंडी (धर्मध्वज) को नहीं देना चाहिए।
न लोलुपायोपदिशेत् न गृहारूढचेतसे ।
नाभक्ताय च मे जातु न मद्भक्तद्विषामपि ॥ ४० ॥
भावार्थ: जो विषयों का लालची हो, जिसका मन केवल घर-गृहस्थी में ही फंसा हो, जो मेरा भक्त न हो, और जो मेरे भक्तों से द्वेष रखता हो, उसे भी यह उपदेश कभी नहीं देना चाहिए।
श्रद्दधानाय भक्ताय विनीताय अनसूयवे ।
भूतेषु कृतमैत्राय शुश्रूषाभिरताय च ॥ ४१ ॥
भावार्थ: यह उपदेश केवल उसे देना चाहिए जो श्रद्धालु हो, भक्त हो, विनम्र हो, दूसरों के दोष न निकालता हो (अनसूय), सभी प्राणियों का मित्र हो, और सेवा करने में तत्पर हो।
बहिर्जातविरागाय शान्तचित्ताय दीयताम् ।
निर्मत्सराय शुचये यस्याहं प्रेयसां प्रियः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: जिसे बाहरी विषयों से वैराग्य हो गया हो, जिसका चित्त शांत हो, जो डाह (मत्सर) न करता हो, जो पवित्र हो, और जिसे मैं (परमात्मा) प्राणों से भी अधिक प्रिय हूँ—उसी को यह ज्ञान देना चाहिए।
य इदं श्रृणुयाद् अम्ब श्रद्धया पुरुषः सकृत् ।
यो वाभिधत्ते मच्चित्तः स ह्येति पदवीं च मे ॥ ४३ ॥
भावार्थ: हे माता! जो मनुष्य मुझमें चित्त लगाकर इस परम पवित्र उपदेश को एक बार भी श्रद्धापूर्वक सुनता है या दूसरों को सुनाता है, वह मेरे उस परम पद (मोक्ष) को निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है।

