श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
पृथोरश्वमेधयागो नाम एकोनविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच
अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।
ब्रह्मावर्ते मनोः क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥ १ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — इसके पश्चात महाराज पृथु ने उस 'ब्रह्मावर्त' देश में, जो स्वायम्भुव मनु का क्षेत्र है और जहाँ सरस्वती नदी पूर्व दिशा की ओर बहती है, सौ अश्वमेध यज्ञों की दीक्षा ली।
तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः ।
शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥ २ ॥
भावार्थ: यह जानकर कि महाराज पृथु के कर्म मेरे कर्मों से भी महान (श्रेष्ठ) हो रहे हैं, शतक्रतु (सौ यज्ञ करने वाले) इंद्र पृथु के उस महान यज्ञ-महोत्सव को सहन नहीं कर सके।
यत्र यज्ञपतिः साक्षाद् भगवान् हरिरीश्वरः ।
अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरुः प्रभुः ॥ ३ ॥
भावार्थ: उस यज्ञ में साक्षात यज्ञपति, सर्वात्मा, सर्वलोकगुरु और परमेश्वर भगवान श्रीहरि (विष्णु) स्वयं उपस्थित होकर हविष्य ग्रहण कर रहे थे।
अन्वितो ब्रह्मशर्वाभ्यां लोकपालैः सहानुगैः ।
उपगीयमानो गन्धर्वैः मुनिभिश्चाप्सरोगणैः ॥ ४ ॥
भावार्थ: भगवान श्रीहरि के साथ वहाँ ब्रह्मा जी, शिव जी (शर्व), और अपने-अपने अनुचरों (सेवकों) के साथ सभी लोकपाल भी उपस्थित थे। गंधर्व, मुनि और अप्सराएँ भगवान का गुणगान कर रहे थे।
सिद्धा विद्याधरा दैत्या दानवा गुह्यकादयः ।
सुनन्दनन्दप्रमुखाः पार्षदप्रवरा हरेः ॥ ५ ॥
भावार्थ: उनके साथ सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, यक्ष (गुह्यक) आदि तथा सुनंद और नंद आदि भगवान श्रीहरि के मुख्य पार्षद भी आए थे।
कपिलो नारदो दत्तो योगेशाः सनकादयः ।
तमन्वीयुर्भागवता ये च तत्सेवनोत्सुकाः ॥ ६ ॥
भावार्थ: कपिल मुनि, देवर्षि नारद, दत्तात्रेय, सनक आदि योगेश्वर, और जो भी अन्य महान भगवद्भक्त भगवान की सेवा करने के लिए उत्सुक थे, वे सभी वहाँ उपस्थित थे।
यत्र धर्मदुघा भूमिः सर्वकामदुघा सती ।
दोग्धि स्माभीप्सितान् अर्थान् यजमानस्य भारत ॥ ७ ॥
भावार्थ: हे भारत (विदुर)! उस यज्ञ में धर्म का दोहन करने वाली पृथ्वी, यजमान (पृथु) की सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनु बनकर, उन्हें मनचाही वस्तुएँ (अन्न, फल, जल आदि) प्रदान कर रही थी।
ऊहुः सर्वरसान्नद्यः क्षीरदध्यन्नगोरसान् ।
तरवो भूरिवर्ष्माणः प्रासूयन्त मधुच्युतः ॥ ८ ॥
भावार्थ: नदियाँ दूध, दही, अन्न और अन्य सभी रसों को बहा रही थीं। विशाल वृक्षों से शहद टपक रहा था और वे नाना प्रकार के फल-फूल उत्पन्न कर रहे थे।
सिन्धवो रत्ननिकरान् गिरयोऽन्नं चतुर्विधम् ।
उपायनं उपाजह्रुः सर्वे लोकाः सपालकाः ॥ ९ ॥
भावार्थ: समुद्रों ने रत्नों के ढेर, और पर्वतों ने चार प्रकार का अन्न (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय) भेंट किया। सभी लोकपालों सहित सारे लोक वहाँ उपहार लेकर उपस्थित हुए थे।
इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम् ।
असूयन् भगवान् इन्द्रः प्रतिघातमचीकरत् ॥ १० ॥
भावार्थ: भगवान अधोक्षज (विष्णु) के भक्त महाराज पृथु का ऐसा परम अभ्युदय (उन्नति और महिमा) देखकर, देवराज इंद्र को ईर्ष्या (असूया) हुई और उन्होंने यज्ञ में विघ्न डालना शुरू कर दिया।
चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् ।
वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन् अपोवाह तिरोहितः ॥ ११ ॥
भावार्थ: जब महाराज पृथु अपने सौंवे (अंतिम) अश्वमेध यज्ञ में यज्ञपति भगवान विष्णु की आराधना कर रहे थे, तब इंद्र ने ईर्ष्यावश अदृश्य होकर उस यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया।
तं अत्रिर्भगवानैक्षत् त्वरमाणं विहायसा ।
आमुक्तमिव पाखण्डं योऽधर्मे धर्मविभ्रमः ॥ १२ ॥
भावार्थ: आकाश मार्ग से तेजी से जाते हुए उस इंद्र को भगवान अत्रि मुनि ने देख लिया। इंद्र ने पाखंडी (झूठे संन्यासी) का रूप धारण कर रखा था, जो वास्तव में अधर्म होते हुए भी देखने में धर्म जैसा लगता है।
अत्रिणा चोदितो हन्तुं पृथुपुत्रो महारथः ।
अन्वधावत सङ्क्रुद्धः तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १३ ॥
भावार्थ: अत्रि मुनि के उकसाने पर पृथु के पुत्र महारथी (विजिताश्व) ने अत्यंत क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए उसका पीछा किया और पुकारकर कहा — "रुक जा! रुक जा!"
तं तादृशाकृतिं वीक्ष्य मेने धर्मं शरीरिणम् ।
जटिलं भस्मनाच्छन्नं तस्मै बाणं न मुञ्चति ॥ १४ ॥
भावार्थ: परन्तु जब उसने इंद्र को जटाओं वाले और शरीर पर भस्म लपेटे हुए रूप में देखा, तो उसे साक्षात धर्म का स्वरूप समझकर उस पर बाण नहीं छोड़ा।
वधान्निवृत्तं तं भूयो हन्तवेऽत्रिरचोदयत् ।
जहि यज्ञहनं तात महेन्द्रं विबुधाधमम् ॥ १५ ॥
भावार्थ: उसे वध किए बिना लौटता देख अत्रि मुनि ने उसे फिर से प्रेरित करते हुए कहा — "हे तात! यज्ञ में विघ्न डालने वाले उस देवताओं में सबसे नीच इंद्र (महेंद्र) को मार डालो।"
एवं वैन्यसुतः प्रोक्तः त्वरमाणं विहायसा ।
अन्वद्रवद् अभिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥ १६ ॥
भावार्थ: अत्रि मुनि के इस प्रकार कहने पर, पृथु का वह पुत्र (विजिताश्व) क्रोधित होकर आकाश में तेजी से भागते हुए इंद्र के पीछे ऐसे दौड़ा, जैसे गिद्धराज (जटायु) रावण के पीछे दौड़े थे।
सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट् ।
वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञं उपेयिवान् ॥ १७ ॥
भावार्थ: यह देखकर स्वर्ग के राजा इंद्र उस घोड़े और उस पाखंडी वेश को वहीं छोड़कर अंतर्धान (गायब) हो गए। तब वह वीर (विजिताश्व) अपने यज्ञ के पशु (घोड़े) को लेकर पिता के यज्ञमंडप में लौट आया।
तत्तस्य चाद्भुत कर्म विचक्ष्य परमर्षयः ।
नामधेयं ददुस्तस्मै विजिताश्व इति प्रभो ॥ १८ ॥
भावार्थ: हे प्रभो (विदुर)! उसके इस अद्भुत कर्म (पराक्रम) को देखकर महर्षियों ने उस पृथु-पुत्र का नाम 'विजिताश्व' (घोड़े को जीतकर लाने वाला) रख दिया।
उपसृज्य तमस्तीव्रं जहाराश्वं पुनर्हरिः ।
चषालयूपतश्छन्नो हिरण्यरशनं विभुः ॥ १९ ॥
भावार्थ: कुछ समय बाद, सर्वसमर्थ इंद्र ने फिर से घोर अंधकार (तम) फैलाकर, यज्ञ के यूप (खंभे) में सोने की जंजीर से बंधे हुए उस घोड़े को छिपकर चुरा लिया।
अत्रिः सन्दर्शयामास त्वरमाणं विहायसा ।
कपालखट्वाङ्गधरं वीरो नैनमबाधत ॥ २० ॥
भावार्थ: अत्रि मुनि ने फिर से आकाश में भागते हुए इंद्र को दिखाया, जो इस बार हाथ में कपाल और खट्वांग (नरमुंड लगा डंडा) धारण किए हुए था। इसलिए वीर विजिताश्व ने (उसे फिर से साधु समझकर) उस पर प्रहार नहीं किया।
अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा ।
सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् ॥ २१ ॥
भावार्थ: परन्तु जब अत्रि मुनि ने उसे फिर से उकसाया, तो उसने क्रोध में आकर अपना बाण तान लिया। यह देखकर इंद्र उस रूप और घोड़े को छोड़कर फिर से अंतर्धान हो गया।
वीरश्चाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत् ।
तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बलाः ॥ २२ ॥
भावार्थ: वीर विजिताश्व ने घोड़े को ले लिया और पिता के यज्ञ में लौट आया। परन्तु ज्ञान में कमजोर (मूर्ख) लोगों ने इंद्र द्वारा छोड़े गए उन निंदनीय (पाखंडी) रूपों को अपना लिया।
यानि रूपाणि जगृहे इन्द्रो हयजिहीर्षया ।
तानि पापस्य खण्डानि लिङ्गं खण्डमिहोच्यते ॥ २३ ॥
भावार्थ: इंद्र ने घोड़े को चुराने की इच्छा से जो-जो (पाखंडी) रूप धारण किए थे, वे ही पाप के खंड (पाखंड) कहलाए। ऐसे झूठे चिह्नों (वेश) को ही 'पाखंड' कहा जाता है।
एवमिन्द्रे हरत्यश्वं वैन्ययज्ञजिघांसया ।
तद्गृहीतविसृष्टेषु पाखण्डेषु मतिर्नृणाम् ॥ २४ ॥
भावार्थ: इस प्रकार महाराज पृथु के यज्ञ को नष्ट करने की इच्छा से इंद्र द्वारा घोड़े को चुराने के लिए धारण किए गए और फिर छोड़ दिए गए पाखंडों में, मूर्ख लोगों की बुद्धि फँस गई।
धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु ।
प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५ ॥
भावार्थ: लोग नंगे रहने वाले, लाल कपड़े पहनने वाले आदि उपधर्मों (पाखंडों) को, उनकी मीठी और तर्कपूर्ण बातों के धोखे में आकर, प्रायः सच्चा धर्म मानकर उनमें आसक्त हो जाते हैं।
तदभिज्ञाय भगवान् पृथुः पृथुपराक्रमः ।
इन्द्राय कुपितो बाणं आदत्तोद्यतकार्मुकः ॥ २६ ॥
भावार्थ: यह जानकर (कि इंद्र पाखंड फैला रहा है), महान पराक्रमी भगवान पृथु बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र को मारने के लिए अपना धनुष उठाकर बाण तान लिया।
तमृत्विजः शक्रवधाभिसन्धितं
विचक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमसह्यरंहसम् ।
निवारयामासुरहो महामते
न युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात् ॥ २७ ॥
भावार्थ: उन्हें इंद्र का वध करने के लिए तैयार और क्रोध में असहनीय (दुष्प्रेक्ष्य) देखकर ऋत्विजों (पुजारियों) ने उन्हें रोका और कहा — "हे महामते! यज्ञ की दीक्षा लिए हुए यजमान को, यज्ञ-पशु के अतिरिक्त किसी और का वध करना उचित (शास्त्र सम्मत) नहीं है।"
वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनं
ह्वयामहे त्वच्छ्रवसा हतत्विषम् ।
अयातयामोपहवैरनन्तरं
प्रसह्य राजन् जुहवाम तेऽहितम् ॥ २८ ॥
भावार्थ: "हे राजन्! आपके यज्ञ को नष्ट करने वाले उस इंद्र का तेज (शक्ति) आपके यश के सामने नष्ट हो चुका है। हम अमोघ (अयातयाम) मंत्रों से आह्वान करके आपके उस शत्रु को बलपूर्वक इसी अग्नि में हवन कर देंगे।"
इत्यामन्त्र्य क्रतुपतिं विदुरास्यर्त्विजो रुषा ।
स्रुग्घस्तान् जुह्वतोऽभ्येत्य स्वयम्भूः प्रत्यषेधत ॥ २९ ॥
भावार्थ: हे विदुर जी! यजमान पृथु से ऐसा कहकर, ज्यों ही वे क्रोधित ऋत्विज (पुजारी) हाथ में स्रुवा (हवन का चम्मच) लेकर इंद्र की आहुति डालने लगे, त्यों ही स्वयं ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर उन्हें रोक दिया।
न वध्यो भवतां इन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनुः ।
यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनवः सुराः ॥ ३० ॥
भावार्थ: ब्रह्मा जी ने कहा — "इंद्र का वध करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है, क्योंकि यज्ञ भगवान का ही स्वरूप है और तुम जिस इंद्र को यज्ञ (आहुति) से मारना चाहते हो, वह देवता (इंद्र) भी भगवान का ही रूप है।"
तदिदं पश्यत महद् धर्मव्यतिकरं द्विजाः ।
इन्द्रेणानुष्ठितं राज्ञः कर्मैतद्विजिघांसता ॥ ३१ ॥
भावार्थ: "हे ब्राह्मणों! जरा सोचो, राजा के यज्ञ में विघ्न डालने की इच्छा से इंद्र ने जो यह पाखंड (झूठे धर्म) फैलाया है, वह धर्म का कितना बड़ा उल्लंघन (व्यतिकर) है।"
पृथुकीर्तेः पृथोर्भूयात् तर्ह्येकोनशतक्रतुः ।
अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैः यद्भवान् मोक्षधर्मवित् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: "इसलिए महान कीर्ति वाले पृथु का नाम अब 'एकोनशतक्रतु' (99 यज्ञों वाले) ही रहे। हे राजन्! आपको सौंवे यज्ञ की क्या आवश्यकता है, क्योंकि आप तो स्वयं मोक्ष-धर्म को जानने वाले हैं।"
नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमर्हसि ।
उभावपि हि भद्रं ते उत्तमश्लोकविग्रहौ ॥ ३३ ॥
भावार्थ: "आपको अपने ही स्वरूप महेंद्र (इंद्र) पर क्रोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि हे कल्याण स्वरूप! आप दोनों ही भगवान उत्तमश्लोक (विष्णु) के ही अंश (विग्रह) हैं।"
मास्मिन्महाराज कृथाः स्म चिन्तां
निशामयास्मद्वच आदृतात्मा ।
यद्ध्यायतो दैवहतं नु कर्तुं
मनोऽतिरुष्टं विशते तमोऽन्धम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ: "हे महाराज! आप इस (सौंवे यज्ञ के न होने) की चिंता मत कीजिए और आदरपूर्वक मेरी बात सुनिए। दैव (प्रारब्ध) के द्वारा रोके गए काम को पूरा करने की जिद करने से मन अत्यंत क्रोधित हो जाता है और घोर अंधकार (अज्ञान) में गिर जाता है।"
क्रतुर्विरमतामेष देवेषु दुरवग्रहः ।
धर्मव्यतिकरो यत्र पाखण्डैः इन्द्रनिर्मितैः ॥ ३५ ॥
भावार्थ: "इसलिए यह यज्ञ यहीं रुक जाना चाहिए। देवताओं से हठ करना ठीक नहीं। देखिए, इंद्र द्वारा बनाए गए इन पाखंडों से धर्म का कितना नाश (व्यतिकर) हो रहा है।"
एभिरिन्द्रोपसंसृष्टैः पाखण्डैर्हारिभिर्जनम् ।
ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्वमुट् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: "जो इंद्र आपका यज्ञ नष्ट कर रहा है और आपके घोड़े को चुरा रहा है, उसके द्वारा बनाए गए इन मनमोहक पाखंडों में फँसकर आपकी प्रजा भ्रष्ट हो रही है, इसे देखिए।"
भवान्परित्रातुमिहावतीर्णो
धर्मं जनानां समयानुरूपम् ।
वेनापचारादवलुप्तमद्य
तद्देहतो विष्णुकलासि वैन्य ॥ ३७ ॥
भावार्थ: "हे वैन्य! आप लोगों के धर्म की रक्षा करने के लिए ही राजा वेन के शरीर से भगवान विष्णु की कला (अंश) के रूप में अवतरित हुए हैं, जो धर्म वेन के पापों के कारण नष्ट हो गया था।"
स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते
सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि ।
ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरं
प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ॥ ३८ ॥
भावार्थ: "हे प्रजापते! आप अपने इस जन्म के उद्देश्य (धर्म-रक्षा) का विचार कीजिए और मुझ विश्वसृज (ब्रह्मा) के संकल्प को पूरा कीजिए। हे प्रभो! इंद्र द्वारा फैलाई गई इन पाखंड रूपी भयंकर माताओं (उपधर्मों/झूठे रास्तों) का नाश कीजिए।"
मैत्रेय उवाच
इत्थं स लोकगुरुणा समादिष्टो विशाम्पतिः ।
तथा च कृत्वा वात्सल्यं मघोनापि च सन्दधे ॥ ३९ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — लोकगुरु ब्रह्मा जी द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर, प्रजापालक राजा पृथु ने वैसा ही किया और प्रेमपूर्वक इंद्र (मघवा) के साथ संधि कर ली।
कृतावभृथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे ।
वरान्ददुस्ते वरदा ये तद्बर्हिषि तर्पिताः ॥ ४० ॥
भावार्थ: यज्ञ के अंत में अवभृथ स्नान कर चुके महान कर्मों वाले पृथु को, यज्ञ में तृप्त हुए देवताओं (वरदाताओं) ने अनेक वरदान दिए।
विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः ।
आशिषो युयुजुः क्षत्तः आदिराजाय सत्कृताः ॥ ४१ ॥
भावार्थ: हे क्षत्त (विदुर)! राजा के सत्कार और श्रद्धापूर्वक दी गई दक्षिणा से संतुष्ट हुए, सत्य आशीर्वाद वाले ब्राह्मणों ने भी प्रसन्न होकर उन आदिराज (पृथु) को आशीर्वाद दिए।
त्वयाऽऽहूता महाबाहो सर्व एव समागताः ।
पूजिता दानमानाभ्यां पितृदेवर्षिमानवाः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: ब्राह्मणों ने कहा — "हे महाबाहु! आपने जिन पितरों, देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों को बुलाया था, वे सभी यहाँ आए और आपने दान-सम्मान से उन सभी की भलीभांति पूजा (सत्कार) की है।"

