श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
प्राचीनबर्हिर्नारदसंवादो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः
प्राचीनबर्हिरुवाच
भगवंस्ते वचोऽस्माभिः न सम्यक् अवगम्यते ।
कवयस्तद्विजानन्ति न वयं कर्ममोहिताः ॥ १ ॥
भावार्थ: राजा प्राचीनबर्हि ने कहा — हे भगवन्! आपके कहे हुए वचनों (कथा के रहस्य) को हम लोग ठीक से नहीं समझ पाए हैं। जो ज्ञानी (कवि) हैं, वे ही इसे समझ सकते हैं। हम लोग तो सकाम कर्मों (यज्ञों आदि) में मोहित हैं (इसलिए हमारी समझ में कुछ नहीं आया)।
नारद उवाच
पुरुषं पुरञ्जनं विद्याद् यद् व्यनक्त्यात्मनः पुरम् ।
एक द्वि त्रि चतुष्पादं बहुपादमपादकम् ॥ २ ॥
भावार्थ: नारद जी ने कहा — पुरंजन शब्द का अर्थ 'पुरुष' (जीवात्मा) समझना चाहिए, क्योंकि वही अपने लिए एक, दो, तीन, चार, बहुत पैरों वाले या बिना पैरों वाले पुर (शरीर/नगर) का निर्माण (व्यनक्ति) करता है।
योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः ।
यन्न विज्ञायते पुम्भिः नामभिर्वा क्रियागुणैः ॥ ३ ॥
भावार्थ: जिसे 'अविज्ञात' (सखा) कहा गया है, वह उस पुरुष (जीव) का सखा और ईश्वर (परमात्मा) है। उसे अविज्ञात इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य उसे किसी एक नाम, क्रिया (काम) या गुण से नहीं जान सकता।
यदा जिघृक्षन् पुरुषः कार्त्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान् ।
नवद्वारं द्विहस्ताङ्घ्रि तत्रामनुत साध्विति ॥ ४ ॥
भावार्थ: जब वह पुरुष (जीव) प्रकृति के सभी गुणों (सुखों) को पूरी तरह से भोगना (जिघृक्षन्) चाहता है, तब वह नौ द्वारों, दो हाथों और दो पैरों वाले इस (मानव) शरीर को सबसे अच्छा (साधु) मानता है।
बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान् ममाहमिति यत्कृतम् ।
यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान् ॥ ५ ॥
भावार्थ: उस 'प्रमदा' (पुरंजनी) को 'बुद्धि' समझना चाहिए, जो 'मैं' और 'मेरा' (अहंकार) पैदा करती है। इसी बुद्धि के सहारे जीव इस शरीर में रहकर इन्द्रियों (अक्षों) के द्वारा विषयों (गुणों) को भोगता है।
सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् ।
सख्यस्तद्वृत्तयः प्राणः पञ्चवृत्तिर्यथोरगः ॥ ६ ॥
भावार्थ: पुरंजनी के सखा (मित्र) वे दसों इन्द्रियां (ज्ञान और कर्म) हैं। उसकी सखियां (सहेलियां) उन इन्द्रियों की वृत्तियां (कार्य) हैं। और वह पाँच फन वाला साँप (उरग) पांच वृत्तियों वाला 'प्राण' है।
बृहद्बलं मनो विद्याद् उभयेन्द्रियनायकम् ।
पञ्चालाः पञ्च विषया यन्मध्ये नवखं पुरम् ॥ ७ ॥
भावार्थ: जो ग्यारहवां सेनापति था (बृहद्बल), उसे दोनों प्रकार की इन्द्रियों का स्वामी 'मन' समझना चाहिए। पांचाल देश पांच विषय (रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श) हैं, और उनके बीच में नौ द्वारों वाला यह शरीर (नवखं पुरम्) स्थित है।
अक्षिणी नासिके कर्णौ मुखं शिश्नगुदौ इति ।
द्वे द्वे द्वारौ बहिर्याति यस्तद् इन्द्रियसंयुतः ॥ ८ ॥
भावार्थ: दो आंखें, दो नथुने, दो कान, एक मुंह, और जननेंद्रिय (शिश्न) तथा गुदा — इस प्रकार नौ दरवाजे हैं। जीव इन्द्रियों के साथ इन दरवाज़ों से बाहर (विषयों की ओर) जाता है।
अक्षिणी नासिके आस्यं इति पञ्च पुरः कृताः ।
दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरः स्मृतः ॥ ९ ॥
भावार्थ: दो आंखें, दो नथुने और एक मुंह — ये पांच दरवाजे पूर्व की ओर (सामने) बताए गए हैं। दाहिना कान दक्षिण दिशा का और बायां कान उत्तर दिशा का दरवाजा (द्वार) है।
पश्चिमे इत्यधो द्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते ।
खद्योताऽऽविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते ।
रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः ॥ १० ॥
भावार्थ: पश्चिम के दो दरवाजे नीचे की ओर स्थित गुदा और शिश्न (जननेंद्रिय) हैं। 'खद्योता' और 'आविर्मुखी' नाम की दोनों आंखें एक ही जगह बनी हैं। जीव (ईश्वर) रूपी राजा आँखों की शक्ति (द्युमान) से 'विभ्राजित' नाम के विषय (रूप) को देखता है।
नलिनी नालिनी नासे गन्धः सौरभ उच्यते ।
घ्राणोऽवधूतो मुख्यास्यं विपणो वाग् रसविद्रसः ॥ ११ ॥
भावार्थ: 'नलिनी' और 'नालिनी' नासिका के दो छिद्र (नथुने) हैं, गंध ही 'सौरभ' देश है, और सूँघने की शक्ति (घ्राण) ही 'अवधूत' सखा है। 'मुख्या' नाम का दरवाजा मुँह (आस्य) है, वाणी ही 'विपण' है, और रस (स्वाद) ही 'रसविद्' सखा है।
आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम् ।
पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः ॥ १२ ॥
भावार्थ: बोलना (व्यवहार) ही 'आपण' नामक देश है, और अनेक प्रकार का भोजन (अंध) ही 'बहूदन' देश है। दाहिना कान 'पितृहू' और बायां कान 'देवहू' कहा गया है।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पञ्चालसंज्ञितम् ।
पितृयानं देवयानं श्रोत्रात् श्रुतधराद्व्रजेत् ॥ १३ ॥
भावार्थ: पांचाल देश वास्तव में प्रवृत्ति (कर्म) और निवृत्ति (ज्ञान) मार्ग बताने वाले शास्त्र हैं। 'श्रुतधर' (सुनने की शक्ति) के माध्यम से मनुष्य कानों (श्रोत्र) द्वारा इन शास्त्रों को सुनकर पितृयान (दक्षिण) या देवयान (उत्तर) मार्ग पर जाता है।
आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वाः व्यवायो ग्रामिणां रतिः ।
उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निर्ऋतिर्गुद उच्यते ॥ १४ ॥
भावार्थ: 'आसुरी' नाम का दरवाजा जननेंद्रिय (मेढ्र) है। कामी लोगों का स्त्री प्रसंग (रति) ही 'ग्रामक' विषय है। उपस्थ (जननेंद्रिय की शक्ति) को 'दुर्मद' सखा कहा गया है। और 'निर्ऋति' नाम का दरवाजा गुदा (मल द्वार) है।
वैशसं नरकं पायुः लुब्धकोऽन्धौ तु मे शृणु ।
हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥ १५ ॥
भावार्थ: 'वैशस' (नरक/मल त्याग) विषय है और मल त्यागने की शक्ति (पायु) ही 'लुब्धक' सखा है। अब उन दो अंधे निवासियों के बारे में सुनो। वे हाथ और पैर हैं, जिनकी मदद से पुरुष (जीव) काम करता है और चलता (याति) है।
अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते ।
तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः ॥ १६ ॥
भावार्थ: अंतःपुर (रनिवास) 'हृदय' है, और 'विषूचीन' सखा मन को कहा गया है। मन के गुणों (सत्त्व, रज, तम) के अनुसार ही जीव मोह, शांति (प्रसाद) या हर्ष (खुशी) का अनुभव करता है।
यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा ।
तथा तथोपद्रष्टात्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते ॥ १७ ॥
भावार्थ: बुद्धि (रानी) जिस-जिस प्रकार से गुणों के प्रभाव में आकर विकार (बदलाव/भाव) को प्राप्त होती है या विकार पैदा करती है, साक्षी आत्मा भी बुद्धि की उन वृत्तियों (सुख-दुःख आदि) का अनुकरण (अनुभव) करने लगती है (यद्यपि आत्मा निर्विकार है)।
देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयोऽगतिः ।
द्विकर्मचक्रस्त्रिगुण ध्वजः पञ्चासुबन्धुरः ॥ १८ ॥
भावार्थ: शरीर ही वह रथ है, इन्द्रियां घोड़े हैं, वर्ष (आयु का बीतना) उसकी गति है। पुण्य और पाप उसके दो पहिए (कर्मचक्र) हैं, तीन गुण ध्वजा (झंडा) हैं, और पांच प्राण बैठने का स्थान (बंधुर) हैं।
मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हृन्नीडो द्वन्द्वकूबरः ।
पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ॥ १९ ॥
भावार्थ: मन ही लगाम (रश्मि) है, बुद्धि सारथी (सूत) है, हृदय रथ का बैठक (नीड़) है, और शोक-मोह (या सुख-दुःख) आदि द्वंद्व ही दो जूए (कूबर) हैं। पांच इन्द्रियों के विषय रथ के आयुध (हथियार) हैं, और सात धातुएं (रस, रक्त, मांस आदि) उसके आवरण (वरूथक) हैं।
आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ।
एकादशेन्द्रियचमूः पञ्चसूनाविनोदकृत् ॥ २० ॥
भावार्थ: कर्मेन्द्रियों की शक्ति (आकूति) उसकी पांच प्रकार की गतियां (विक्रम) हैं। यह रथ मृगतृष्णा (झूठे सांसारिक सुखों) के पीछे दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियां उसकी सेना हैं, और पांच प्रकार के पाप (सूना - चूल्हा, चक्की आदि) ही उसके शिकार का खेल (विनोद) हैं।
संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः ।
तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः ।
हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥ २१ ॥
भावार्थ: 'चंडवेग' संवत्सर (वर्ष) है, जो काल (समय) का प्रतीक है। गंधर्व उस वर्ष के 360 दिन हैं और गंधर्वियां 360 रातें हैं। ये दिन-रात अपनी परिक्रमा (बीतने) से लगातार आयु (उम्र) को चुरा रहे (हर रहे) हैं।
कालकन्या जरा साक्षात् लोकस्तां नाभिनन्दति ।
स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ॥ २२ ॥
भावार्थ: वह काल-कन्या साक्षात 'जरा' (बुढ़ापा) है, जिसका कोई भी व्यक्ति स्वागत (अभिनंदन) नहीं करता। लोगों के नाश (क्षय) के लिए ही यवनों के स्वामी 'मृत्यु' (भय) ने उसे अपनी बहन मान लिया था।
आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः ।
भूतोपसर्गाशुरयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ॥ २३ ॥
भावार्थ: यवनेश्वर (मृत्यु) के यवन सैनिक मानसिक चिंताएं (आधि) और शारीरिक बीमारियां (व्याधि) हैं, जो सब जगह विचरते हैं। और बहुत तेजी से नाश करने वाला 'प्रज्वार' सर्दी और गर्मी (या शीत और दाह) से आने वाला दो तरह का ज्वर (बुखार) है।
एवं बहुविधैर्दुःखैः दैवभूतात्मसम्भवैः ।
क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः ॥ २४ ॥
भावार्थ: इस प्रकार देवताओं, प्राणियों और अपने शरीर से उत्पन्न (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) बहुत तरह के दुःखों को सहते हुए, अज्ञान (तम) से ढका हुआ जीव सौ वर्षों तक इस शरीर में रहकर कष्ट भोगता है।
प्राणेन्द्रियमनोधर्मान् आत्मन्यध्यस्य निर्गुणः ।
शेते कामलवान्ध्यायन् ममाहं इति कर्मकृत् ॥ २५ ॥
भावार्थ: जीव वास्तव में निर्गुण है, लेकिन वह प्राण, इन्द्रिय और मन के धर्मों (भूख, प्यास, सुख-दुःख) को अपने ऊपर ओढ़कर (अध्यस्य) 'मैं और मेरा' के अहंकार में फँस जाता है, और विषयों (काम) का चिंतन करते हुए कर्म करता रहता है।
यदा आत्मानं अविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम् ।
पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥ २६ ॥
भावार्थ: जब पुरुष (जीवात्मा) अपने सच्चे स्वरूप (परमात्मा/परम गुरु) को भूलकर, प्रकृति के गुणों (सांसारिक भोगों) में फँस जाता है, तब वह अपनी दृष्टि खो बैठता है (स्वदृक्)।
गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः ।
शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथाकर्माभिजायते ॥ २७ ॥
भावार्थ: तब वह गुणों का अभिमानी होकर लाचारी (अवश) से कर्म करने लगता है। और अपने कर्मों के अनुसार ही वह शुक्ल (सात्त्विक), कृष्ण (तामसिक) या लोहित (राजसिक) योनियों में जन्म लेता है।
शुक्लात् प्रकाशभूयिष्ठान् लोकान् आप्नोति कर्हिचित् ।
दुःखोदर्कान् क्रियायासान् तमःशोकोत्कटान् क्वचित् ॥ २८ ॥
भावार्थ: सात्त्विक (शुक्ल) कर्मों से वह प्रकाश (ज्ञान/सुख) वाले लोकों (स्वर्ग आदि) को प्राप्त करता है। राजसिक कर्मों से वह दुःख देने वाले और मेहनत वाले (मनुष्य) लोक को, और तामसिक कर्मों से वह अज्ञान (तम) और शोक से भरे (पशु आदि) लोकों को प्राप्त करता है।
क्वचित् पुमान् क्वचिच्च स्त्री क्वचिद् नोभयमन्धधीः ।
देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं भवः ॥ २९ ॥
भावार्थ: अंधी बुद्धि वाला जीव अपने कर्मों और गुणों के अनुसार कभी पुरुष, कभी स्त्री और कभी नपुंसक (न पुरुष, न स्त्री) का जन्म लेता है। कभी वह देवता, कभी मनुष्य और कभी पशु-पक्षी (तिर्यक्) बनता है।
क्षुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् ।
चरन्विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥ ३० ॥
भावार्थ: जैसे भूख से तड़पता हुआ कोई कुत्ता (सारमेय) घर-घर भटकता है, और उसे भाग्य के अनुसार कहीं डंडा मिलता है तो कहीं खाने को रोटी (भोजन)...
तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन् ।
उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: ...ठीक उसी तरह कामनाओं से भरा हुआ जीव (कामाशय) ऊँचे-नीचे रास्तों (योनियों) में भटकता हुआ, ऊपर (स्वर्ग), नीचे (नरक) या बीच (पृथ्वी) में अपने भाग्य के अनुसार सुख (प्रिय) या दुःख (अप्रिय) भोगता है।
दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।
जीवस्य न व्यवच्छेदः स्यात् चेत् तत् प्रतिक्रिया ॥ ३२ ॥
भावार्थ: यदि जीव को दैव, भूत या अपनी आत्मा (मन) से मिलने वाले दुःखों को दूर करने का कोई पक्का उपाय (प्रतिक्रिया) मिल भी जाए, तो भी दुःखों का पूरी तरह नाश (व्यवच्छेद) कभी नहीं हो सकता।
यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् ।
तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः ॥ ३३ ॥
भावार्थ: दुःखों को दूर करने के सांसारिक उपाय वैसे ही हैं, जैसे कोई आदमी सिर पर रखे भारी बोझ को उठाकर कंधे पर रख ले (बोझ तो उतना ही रहता है, बस जगह बदल जाती है)।
नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम् ।
द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥ ३४ ॥
भावार्थ: हे निष्पाप (अनघ)! कर्मों (दुःखों) का सच्चा उपाय कोई दूसरा कर्म (कर्मकांड) नहीं हो सकता, क्योंकि दुःख और उसके उपाय (कर्म) — ये दोनों ही अज्ञान (अविद्या) से पैदा हुए हैं, जैसे सपने में सपने का उपाय करना (झूठा है)।
अर्थे हि अविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३५ ॥
भावार्थ: जब तक मन (लिंग शरीर) है, तब तक यह संसार (संसृति) झूठा होने पर भी ख़त्म नहीं होता (दुःख देता रहता है), ठीक वैसे ही जैसे सपने में शरीर के न होने पर भी आदमी मन से भटकता रहता है और दुःख उठाता है।
अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरंपरा ।
संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥ ३६ ॥
भावार्थ: इसलिए, ज्ञानस्वरूप (अर्थभूत) आत्मा के लिए, अज्ञान से पैदा हुई अनर्थों की इस परंपरा (संसार-चक्र) का पूरी तरह नाश, परम गुरु (परमात्मा) की अनन्य भक्ति से ही हो सकता है।
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः ।
सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥ ३७ ॥
भावार्थ: यदि भगवान वासुदेव में पूरी एकाग्रता (समाहित) के साथ भक्तियोग किया जाए, तो वह निश्चित रूप से (जल्द ही) वैराग्य और सच्चा ज्ञान पैदा कर देता है।
सोऽचिराद् एव राजर्षे स्याद् अच्युतकथाश्रयः ।
श्रृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: हे राजर्षे! जो व्यक्ति भगवान अच्युत की कथाओं का आश्रय लेता है, और उन्हें प्रतिदिन श्रद्धा के साथ सुनता या पढ़ता है, उसे यह ज्ञान और वैराग्य बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाता है।
यत्र भागवता राजन्साधवो विशदाशयाः ।
भगवद्गुणानुकथन श्रवणव्यग्रचेतसः ॥ ३९ ॥
भावार्थ: हे राजन्! जहाँ शुद्ध हृदय (विशदाशय) वाले साधु और भगवद्भक्त इकट्ठा होते हैं, और जहाँ उनका मन भगवान के गुणों को सुनने और कहने (कथा कीर्तन) में ही लगा (व्यग्र) रहता है...
तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र
पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति ।
ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णैः
तान्न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ ४० ॥
भावार्थ: "...वहाँ महापुरुषों के मुख से भगवान (मधुसूदन) के चरित्र रूपी अमृत (पीयूष) की नदियां चारों ओर बहती रहती हैं। हे राजन्! जो लोग अपनी प्यास बुझाए बिना, पूरे ध्यान से (गाढ़े कानों से) इस अमृत को पीते हैं, उन्हें भूख, प्यास, डर, शोक और मोह कभी नहीं छू सकते।"
एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः ।
न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधौ रतिम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ: लेकिन स्वभाव से ही पैदा हुए इन भूख, प्यास, शोक आदि उपद्रवों (कष्टों) में फँसा हुआ यह जीव-लोक, श्रीहरि की कथाओं के अमृत-सागर में कभी प्रेम (रति) नहीं करता।
प्रजापतिपतिः साक्षाद् भगवान् गिरिशो मनुः ।
दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्मा जी, साक्षात भगवान शिव (गिरिश), मनु, दक्ष आदि प्रजापति, नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक आदि कुमार...
मरीचिः अत्रि अङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ॥ ४३ ॥
भावार्थ: ...मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, और मेरे (नारद) समेत जितने भी बड़े-बड़े ब्रह्मज्ञानी (ब्रह्मवादी) हैं...
अद्यापि वाचस्पतयः तपोविद्यासमाधिभिः ।
पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: ...ये सभी बड़े-बड़े विद्वान (वाचस्पति) अपनी तपस्या, विद्या (ज्ञान) और समाधि से ढूँढते (देखते) रहने पर भी, आज तक उस परमेश्वर को नहीं देख पाए हैं, जो सबको देख रहा है।
शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।
मन्त्रलिङ्गैः व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ: क्योंकि वे लोग वेदों (शब्दब्रह्म) के विशाल और कठिन (अपार) सागर में ही भटकते रहते हैं, और मन्त्रों (इन्द्र आदि) में फँसकर सकाम कर्मों (यज्ञों) का ही आचरण करते हैं, इसलिए वे परम तत्त्व (परमात्मा) को नहीं जान पाते।
यदा यस्य अनुगृह्णाति भगवान् आत्मभावितः ।
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ: जब भगवान किसी भक्त के प्रेम (आत्मभाव) से प्रसन्न होकर उस पर अपनी कृपा (अनुग्रह) करते हैं, तब वह भक्त लोक (संसार) और वेद (कर्मकांड) में फँसी हुई अपनी बुद्धि (आसक्ति) को छोड़ देता है।
तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन् अज्ञानात् अर्थकाशिषु ।
मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्र स्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु ॥ ४७ ॥
भावार्थ: इसलिए हे बर्हिष्मन्! तुम उन अज्ञान से भरे कर्मों (सकाम यज्ञों) को ही परमार्थ (सच्चा सुख) मत मान बैठो, जो कानों को सुनने में तो बहुत मीठे (अर्थकांक्षी) लगते हैं, लेकिन असल में परम तत्त्व (परमात्मा) से कोसों दूर हैं।
स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः ।
आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः ॥ ४८ ॥
भावार्थ: वे लोग कभी अपने सच्चे लोक (परमात्मा) को नहीं जान पाते, जहाँ भगवान जनार्दन निवास करते हैं। धुएं (यज्ञ के धुएं) से जिनकी बुद्धि अंधी हो गई है (धूम्रधियो), ऐसे लोग वेदों का अर्थ केवल सकाम कर्म (कर्मकांड) ही बताते हैं।
आस्तीर्य दर्भैः प्रागग्रैः कार्त्स्न्येन क्षितिमण्डलम् ।
स्तब्धो बृहद् वधात् मानी कर्म नावैषि यत्परम् ।
तत्कर्म हरितोषं यत् सा विद्या तन्मतिर्यया ॥ ४९ ॥
भावार्थ: तुम पूर्व दिशा की ओर कुशा (दर्भ) बिछाकर (यज्ञ करके) और हज़ारों पशुओं को मारकर अहंकारी (मानी) और कठोर (स्तब्ध) हो गए हो। तुम नहीं जानते कि सच्चा कर्म क्या है। असली कर्म वही है जिससे श्रीहरि प्रसन्न हों, और असली विद्या वही है जिससे भगवान में बुद्धि (भक्ति) लगे।
हरिर्देहभृतामात्मा स्वयं प्रकृतिरीश्वरः ।
तत्पादमूलं शरणं यतः क्षेमो नृणामिह ॥ ५० ॥
भावार्थ: भगवान श्रीहरि ही सभी देहधारियों (जीवों) के आत्मा, प्रकृति और ईश्वर हैं। इसलिए उनके चरण-कमलों की शरण लेना ही मनुष्यों के लिए सबसे बड़ा कल्याण (क्षेम) है।
स वै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि ।
इति वेद स वै विद्वान् यो विद्वान् स गुरुर्हरिः ॥ ५१ ॥
भावार्थ: वे भगवान ही सबसे प्यारे (प्रियतम) और सबकी आत्मा हैं, जिनसे ज़रा सा भी भय नहीं है। जो इस बात को जानता है, वही सच्चा विद्वान है। और जो ऐसा विद्वान है, वही सच्चा गुरु है, और वही साक्षात श्रीहरि है।
नारद उवाच
प्रश्न एवं हि सञ्छिन्नो भवतः पुरुषर्षभ ।
अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम् ॥ ५२ ॥
भावार्थ: नारद जी ने कहा — हे पुरुषों में श्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे प्रश्न का पूरी तरह समाधान (उत्तर) कर दिया है। अब मैं तुम्हें एक बहुत ही गहरा (गुह्य) और पक्का (सुनिश्चित) रहस्य बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
क्षुद्रं चरं सुमनसां शरणे मिथित्वा
रक्तं षडङ्घ्रिगणसामसु लुब्धकर्णम् ।
अग्रे वृकान् असुतृपोऽविगणय्य यान्तं
पृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्नम् ॥ ५३ ॥
भावार्थ: "एक ऐसा हिरण (मृग) है जो फूलों के बगीचे में अपनी पत्नी (हिरनी) के साथ मैथुन (भोग) कर रहा है। वह भौंरों (षडंघ्रि) के मधुर गुंजन (सामसु) को सुनने में इतना मग्न (लुब्धकर्ण) है कि उसे यह दिखाई ही नहीं देता कि उसके आगे खून पीने वाले भेड़िए (वृक) खड़े हैं, और पीछे से एक शिकारी (लुब्धक) ने उस पर बाण तान रखा है। तुम इस हिरण (मृग) पर विचार (मृगय) करो।"
अस्यार्थः
सुमनःसमधर्मणां स्त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधु गन्धवत् क्षुद्रतमं । काम्यकर्मविपाकजं कामसुखलवं जैह्व्यौपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय तद् अभिनिवेशित मनसं । षडङ्घ्रिगण सामगीतवत् अतिमनोहर वनितादि जन आलापेषु अतितरां अति प्रलोभित कर्णमग्रे । वृकयूथवदात्मन आयुर्हरतो अहोरात्रान् तान् काल लव विशेषान् अविगणय्य गृहेषु विहरन्तं पृष्ठत एव । परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धकः कृतान्तोऽन्तः शरेण यमिह पराविध्यति तं इमं आत्मानमहो । राजन् भिन्नहृदयं द्रष्टुमर्हसीति ॥ ५४ ॥
भावार्थ: इसका अर्थ यह है — हे राजन्! फूल के समान स्वभाव वाली स्त्रियों के शरण (घर/आश्रम) में, जो व्यक्ति फूलों के रस की तरह तुच्छ (छोटे) सकाम कर्मों (जीभ और जननेंद्रिय के सुखों) को खोजता है, और अपनी पत्नी के साथ रमण (भोग) करता है; जो भौंरों के गीत के समान स्त्रियों और परिवार के लोगों की मीठी-मीठी बातों को सुनने में इतना फँसा हुआ है कि वह भेड़ियों के झुंड के समान अपनी उम्र (आयु) को कम करने वाले दिनों और रातों की परवाह नहीं करता; और जिसे पीछे से शिकारी (मृत्यु/काल) ने अदृश्य बाण मार दिया है, ऐसे हृदय बिंधे हुए (मृत्यु के करीब) हिरण के रूप में तुम अपने आप (आत्मा) को देखो!
स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनोऽन्तः
चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते ।
जह्यङ्गनाश्रममसत् तमयूथगाथं
प्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ॥ ५५ ॥
भावार्थ: "इसलिए तुम उस हिरण के व्यवहार को अपने अंदर देखकर सावधान हो जाओ। अपने मन को हृदय में रोको, और कान (तथा अन्य इन्द्रियों) की वृत्तियों को मन में समेट लो। स्त्रियों की मीठी बातों (गाथाओं) से भरे इस झूठे (असत्) गृहस्थाश्रम को छोड़ दो, और हंसों (परमहंस संतों/परमात्मा) के शरण (चरणों) से प्रेम (प्रीणीहि) करो, तथा इस सांसारिक जीवन से धीरे-धीरे विरक्त (दूर) हो जाओ।"
राजोवाच
श्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मन् भगवान् यदभाषत ।
नैतज्जानन्ति उपाध्यायाः किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥ ५६ ॥
भावार्थ: राजा प्राचीनबर्हि ने कहा — "हे ब्रह्मन्! आपने जो कुछ कहा, मैंने उसे सुना और उस पर गहराई से विचार (अन्वीक्षित) किया। मेरे जो आचार्य (उपाध्याय/पुरोहित) थे, वे शायद इस रहस्य को नहीं जानते थे, वरना वे मुझे यह सब क्यों नहीं बताते?"
संशयोऽत्र तु मे विप्र सञ्छिन्नस्तत्कृतो महान् ।
ऋषयोऽपि हि मुह्यन्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तयः ॥ ५७ ॥
भावार्थ: "हे विप्र! मेरे मन में उन पुरोहितों के द्वारा पैदा किया गया एक बड़ा संदेह (संशय) था, जो अब पूरी तरह मिट गया है। यह कर्मों का विषय इतना कठिन है कि इसमें इन्द्रियां तो क्या, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी मोहित (भ्रमित) हो जाते हैं।"
कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम् ।
अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥ ५८ ॥
भावार्थ: (मेरा संदेह यह था कि) "मनुष्य इस जन्म (इह) में जिस स्थूल शरीर (देह) से कर्म करता है, मृत्यु के बाद वह शरीर तो यहीं छूट जाता है। फिर परलोक (अमुत्र) में वह किसी दूसरे शरीर से उन कर्मों का फल कैसे भोगता है?"
इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह ।
कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ॥ ५९ ॥
भावार्थ: "वेदों को जानने वाले मीमांसकों (पुरोहितों) का ऐसा ही कहना (वाद) सुना जाता है कि जो कर्म यहाँ किया जाता है, वह अदृश्य (परोक्ष) हो जाता है और तुरंत दिखाई (प्रकाशित) नहीं देता, फिर वह फल कैसे देता है?"
नारद उवाच
येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् ।
भुङ्क्ते हि अव्यवधानेन लिङ्गेन मनसा स्वयम् ॥ ६० ॥
भावार्थ: नारद जी ने कहा — "मनुष्य जिस 'लिंग शरीर' (सूक्ष्म शरीर/मन) के द्वारा इस जन्म में कर्म शुरू करता है, मृत्यु के बाद (अमुत्र) बिना किसी रुकावट के (अव्यवधान) वह उसी लिंग शरीर (मन) के द्वारा स्वयं कर्मों का फल भोगता है।"
शयानं इमं उत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा ।
कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा ॥ ६१ ॥
भावार्थ: "जैसे सपने (स्वप्न) में मनुष्य अपने इस सोए हुए और सांस लेते हुए स्थूल शरीर को बिस्तर पर छोड़कर, अपने मन में बैठे हुए विचारों (कर्मों) को मानसिक शरीर (लिंग शरीर) के द्वारा भोगता है, वैसे ही मृत्यु के बाद भी होता है।"
ममैते मनसा यद्यद् असौ अहं इति ब्रुवन् ।
गृह्णीयात् तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भवः ॥ ६२ ॥
भावार्थ: "मनुष्य अपने मन में जिन-जिन चीज़ों को 'मैं' (अहं) और 'मेरा' (मम) मानकर ग्रहण करता है (आसक्ति रखता है), वही उसके कर्म बन जाते हैं, और इन्हीं कर्मों (संस्कारों) के कारण उसका पुनर्जन्म (पुनर्भव) होता है।"
यथानुमीयते चित्तं उभयैरिन्द्रियेहितैः ।
एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभिः ॥ ६३ ॥
भावार्थ: "जैसे मनुष्य की ज्ञान और कर्म इन्द्रियों की हरकतों से उसके मन (चित्त) की स्थिति का पता चल जाता है (अनुमान लगाया जाता है), वैसे ही मन की वृत्तियों (विचारों/स्वभाव) से उसके पिछले जन्म (प्राग्देह) के कर्मों का पता चल जाता है।"
नानुभूतं क्व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम् ।
कदाचिद् उपलभ्येत यद् रूपं यादृगात्मनि ॥ ६४ ॥
भावार्थ: "मनुष्य के मन (सपनों या विचारों) में कभी-कभी ऐसे रूप या चीज़ें भी दिखाई देती हैं, जिन्हें उसने इस शरीर से न तो कभी देखा है, न सुना है, और न ही अनुभव किया है।"
तेनास्य तादृशं राजन् लिङ्गिनो देहसम्भवम् ।
श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति ॥ ६५ ॥
भावार्थ: "इसलिए हे राजन्! तुम्हें यह विश्वास (श्रद्धा) कर लेना चाहिए कि जीव (लिंगी) ने वे चीज़ें अपने किसी पिछले शरीर (जन्म) में ज़रूर देखी या अनुभव की होंगी। क्योंकि जो चीज़ कभी अनुभव (अनुभूत) ही न की गई हो, वह मन में आ (छू) ही नहीं सकती।"
मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति ।
भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः ॥ ६६ ॥
भावार्थ: "तुम्हारा कल्याण हो! मनुष्य का मन ही उसके पिछले जन्मों (पूर्वरूपों) की कहानी कहता है, और यही मन यह भी बता देता है कि भविष्य में उसे कौन सा शरीर मिलेगा या नहीं मिलेगा (मोक्ष मिलेगा)।"
अदृष्टमश्रुतं चात्र क्वचित् मनसि दृश्यते ।
यथा तथानुमन्तव्यं देशकालक्रियाश्रयम् ॥ ६७ ॥
भावार्थ: "कभी-कभी मन (या सपने) में जो ऐसी चीज़ें दिखाई देती हैं, जो न तो कभी देखी गई हैं और न सुनी गई हैं (जैसे सोने का पहाड़); उन्हें यह मानना चाहिए कि वे मन में देश, काल और क्रियाओं के अलग-अलग मिश्रण (जुड़ने) से बनी हैं।"
सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः ।
आयान्ति बहुशो यान्ति सर्वे समनसो जनाः ॥ ६८ ॥
भावार्थ: "सभी इन्द्रियों के विषय (अनुभव) क्रम से (एक-एक करके) मन में आते हैं और चले जाते हैं। मन वाले सभी मनुष्यों के साथ ऐसा ही होता है।"
सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि ।
तमश्चन्द्रमसीवेदं उपरज्यावभासते ॥ ६९ ॥
भावार्थ: "जब मन पूरी तरह से शुद्ध (सत्त्वगुण में स्थित) होकर भगवान के ध्यान में लग जाता है, तब उसमें यह सारा ब्रह्मांड (संसार) वैसे ही स्पष्ट रूप से दिखाई देने (उपरज्य) लगता है, जैसे चाँदनी में राहु (अंधकार) दिखाई दे जाता है।"
नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते ।
यावद्बुद्धिमनोऽक्षार्थ गुणव्यूहो ह्यनादिमान् ॥ ७० ॥
भावार्थ: "जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रियां, और विषयों का यह अनादि काल से चला आ रहा समूह (गुणव्यूह / लिंग शरीर) मौजूद रहता है, तब तक पुरुष (जीवात्मा) में 'मैं' (अहं) और 'मेरा' (मम) का यह भाव (अहंकार) कभी दूर (व्यवधीयते) नहीं होता।"
सुप्तिमूर्च्छोपतापेषु प्राणायनविघाततः ।
नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि ॥ ७१ ॥
भावार्थ: "गहरी नींद (सुप्ति), बेहोशी (मूर्च्छा), भारी दुःख, मृत्यु और भयंकर बुखार (प्रज्वार) के समय, जब प्राणों की गति रुक जाती है (इन्द्रियां काम नहीं करतीं), तब यह 'मैं' (अहंकार) का ज्ञान थोड़ी देर के लिए महसूस (ईहते) नहीं होता।"
गर्भे बाल्येऽप्यपौष्कल्याद् एकादशविधं तदा ।
लिङ्गं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा ॥ ७२ ॥
भावार्थ: "गर्भ में और बचपन (बाल्यावस्था) में, इन्द्रियों का पूरी तरह विकास (अपौष्कल्य) न होने के कारण, यह ग्यारह इन्द्रियों वाला (लिंग शरीर) अहंकार वैसे ही प्रकट नहीं होता (छिपा रहता है), जैसे अमावस्या (कुहू) की रात को चंद्रमा छिपा रहता है।"
अर्थे हि अविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ७३ ॥
भावार्थ: "भले ही सामने कोई विषय (भोग) मौजूद न हो, फिर भी विषयों का ध्यान (चिंतन) करने वाले जीव का संसार (जन्म-मरण) कभी खत्म नहीं होता; ठीक वैसे ही जैसे सपने में चीजें (अनर्थ) न होने पर भी वे दिखाई देती हैं।"
एवं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत्षोडश विस्तृतम् ।
एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७४ ॥
भावार्थ: "इस प्रकार पांच तन्मात्राएं, तीन गुण (मन, बुद्धि, अहंकार) और सोलह विकार (इन्द्रियां आदि) मिलकर यह 'लिंग शरीर' बनता है। जब यह लिंग शरीर चेतना (आत्मा) से जुड़ जाता है, तभी उसे 'जीव' (जीवात्मा) कहा जाता है।"
अनेन पुरुषो देहान् उपादत्ते विमुञ्चति ।
हर्षं शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति ॥ ७५ ॥
भावार्थ: "इसी लिंग शरीर (मन/सूक्ष्म शरीर) के कारण जीव नए शरीर धारण करता है और पुराने छोड़ता (मरता) है। इसी के कारण वह खुशी (हर्ष), शोक, डर, दुःख और सुख का अनुभव करता है।"
यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च ।
न त्यजेन्म्रियमाणोऽपि प्राग्देहाभिमतिं जनः ॥ ७६ ॥
भावार्थ: "जैसे एक कीड़ा (तृणजलूका/इल्ली) जब तक दूसरे पत्ते को पकड़ नहीं लेता, तब तक पहले पत्ते को नहीं छोड़ता; वैसे ही मरता हुआ जीव भी तब तक अपने पहले शरीर का मोह (अभिमान) नहीं छोड़ता, जब तक उसे नया शरीर (लिंग शरीर के अनुसार) नहीं मिल जाता।"
अदृष्टं दृष्टवन्नङ्क्षेद्भूतं स्वप्नवदन्यथा ।
भूतं भवद्भविष्यच्च सुप्तं सर्वरहोरहः ॥ ७७ ॥
भावार्थ: "जो (लिंग शरीर) दिखाई नहीं देता, वह इस दिखाई देने वाले (स्थूल) शरीर की तरह कभी नष्ट नहीं होता। अतीत (भूत), वर्तमान (भवत्) और भविष्य (भविष्यत्) — इन तीनों कालों में जो कुछ भी है, वह सब इसी मन (लिंग शरीर) का ही खेल (सपना) है, और यही मनुष्य के जन्म-मरण (भव) का कारण है।"
यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् ।
मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम् ॥ ७७ ॥
(*नोट: श्लोक 77 के उत्तरार्ध और 78 के पूर्वार्ध को मिलाकर अर्थ किया गया है)
भावार्थ: "हे राजाओं के राजा! जब तक जीव अपने कर्मों के कारण एक के बाद एक (व्यवधान से) नया शरीर प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक यह मन ही सभी प्राणियों के जन्म (भव) का कारण (भावन) बना रहता है।"
यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् ।
सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः ॥ ७८ ॥
भावार्थ: "जब मनुष्य इन्द्रियों द्वारा भोगे गए विषयों (सुखों) का बार-बार ध्यान (चिन्तन) करते हुए सकाम कर्म करता है, तब अज्ञान (अविद्या) के कारण उस आत्मा (अनात्मा/जीव) का कर्मों में बंधन पक्का हो जाता है।"
अतस्तद् अपवादार्थं भज सर्वात्मना हरिम् ।
पश्यन् तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः ॥ ७९ ॥
भावार्थ: "इसलिए इस अज्ञान और कर्म-बंधन को जड़ से उखाड़ने (अपवाद) के लिए, तुम पूरी लगन (सर्वात्मा) से भगवान श्रीहरि का भजन करो। तुम इस सारे संसार को उन्हीं का स्वरूप (तदात्मक) समझकर देखो, क्योंकि इसी संसार की उत्पत्ति, स्थिति और नाश उन्हीं से होता है।"
मैत्रेय उवाच
भागवतमुख्यो भगवान् नारदो हंसयोर्गतिम् ।
प्रदर्श्य ह्यमुमामन्त्र्य सिद्धलोकं ततोऽगमत् ॥ ८० ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — भगवान के परम भक्त (भागवतमुख्यो) देवर्षि नारद जी, राजा प्राचीनबर्हि को इस प्रकार हंसों (जीव और परमात्मा) की गति का ज्ञान देकर, और उनसे विदा (आमन्त्र्य) लेकर, सिद्धलोक को चले गए।
प्राचीनबर्ही राजर्षिः प्रजासर्गाभिरक्षणे ।
आदिश्य पुत्रानगमत् तपसे कपिलाश्रमम् ॥ ८१ ॥
भावार्थ: राजर्षि प्राचीनबर्हि ने भी अपनी प्रजा की रक्षा का भार अपने पुत्रों (प्रचेताओं) को सौंप दिया, और स्वयं तपस्या करने के लिए कपिल मुनि के आश्रम (गंगा सागर) चले गए।
तत्रैकाग्रमना धीरो गोविन्द चरणाम्बुजम् ।
विमुक्तसङ्गोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात् ॥ ८२ ॥
भावार्थ: वहाँ जाकर उन धीर राजा ने, सभी सांसारिक आसक्तियों से मुक्त होकर (विमुक्तसंग), एकाग्र मन से भगवान गोविन्द के चरण-कमलों की अनन्य भक्ति की, और अंत में वे भगवान के ही समान स्वरूप (साम्यता/सारूप्य मुक्ति) को प्राप्त हो गए।
एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ ।
यः श्रावयेत् यः श्रृणुयात् स लिङ्गेन विमुच्यते ॥ ८३ ॥
भावार्थ: हे निष्पाप (अनघ) विदुर! देवर्षि नारद द्वारा गाए गए (सुनाए गए) परोक्ष (रहस्यमयी) आत्मज्ञान (अध्यात्म) के इस आख्यान (कहानी) को जो कोई भी सुनता है या दूसरों को सुनाता है, वह लिंग-शरीर (कर्म-बंधन) से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।
एतन्मुकुन्दयशसा भुवनं पुनानं
देवर्षिवर्यमुखनिःसृतमात्मशौचम् ।
यः कीर्त्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठ्यं
नास्मिन् भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्धः ॥ ८४ ॥
भावार्थ: देवर्षियों में श्रेष्ठ नारद जी के मुख से निकली हुई यह कथा भगवान मुकुंद के यश से सारे संसार को पवित्र करने वाली है। जो व्यक्ति इस कथा का गान करता है या इसे समझता (अधिगच्छति) है, उसके मन का सारा मैल (शौच) धुल जाता है। वह परम पद (मोक्ष) प्राप्त करता है और सभी बंधनों से मुक्त होकर फिर कभी इस संसार में नहीं भटकता।
अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम् ।
एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः ॥ ८५ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — मैंने तुम्हें यह अद्भुत और रहस्यमयी (पारोक्ष्य) अध्यात्म-कथा सुना दी है। इस कथा को सुनने से पुरुष का अपनी पत्नी और गृहस्थाश्रम से जो मोह है, वह कट जाता है, और परलोक (मृत्यु के बाद जीवन) के विषय में जो भी संदेह (संशय) होते हैं, वे सब नष्ट हो जाते हैं।

