आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः
चतुर्दशः पाठः (पाठ १४) — दीपकम (कक्षा ६)
१. मूल पाठः एवं भावार्थः
| संस्कृत गद्यांशः (बालक-माता संवादः) | हिन्दी भावार्थः |
|---|---|
| बालकः: मातः! अद्य तु अवकाशदिनम् अस्ति। अद्य अहं सम्पूर्णदिने विश्रामं करिष्यामि। | बालक - माँ! आज तो छुट्टी का दिन है। आज मैं पूरे दिन आराम करूँगा। |
| माता: अवकाशः विद्यालयस्य अस्ति न तु स्वाध्यायस्य। बहु आलस्यं करोषि। उत्तिष्ठ, परिश्रमं कुरु। | माँ - छुट्टी विद्यालय की है, न कि स्वयं पढ़ाई (स्वाध्याय) करने की। तुम बहुत आलस्य करते हो। उठो, परिश्रम करो। |
| बालकः: अहम् उत्तीर्णः भविष्यामि। किम् अधिकेन परिश्रमेण? | बालक - मैं पास (उत्तीर्ण) हो जाऊँगा। ज़्यादा मेहनत करने से क्या फायदा? |
| माता: यः परिश्रमं करोति, सः एव जीवने सफलतां प्राप्नोति। परिश्रमः एव मनुष्यस्य मित्रम् अस्ति। आलस्यं तु शत्रुः इव अस्ति। | माँ - जो परिश्रम करता है, वही जीवन में सफलता प्राप्त करता है। परिश्रम ही मनुष्य का सच्चा मित्र है। आलस्य तो शत्रु के समान है। |
| बालकः: तत् कथं मातः? | बालक - वह कैसे माँ? |
| माता: यदि ज्ञातुम् इच्छसि, तर्हि एतां कथां पठ। | माँ - यदि तुम जानना चाहते हो, तो इस कहानी को पढ़ो। |
| कथा (भिक्षुकस्य कथा) | हिन्दी भावार्थः |
|---|---|
| एकस्मिन् विशाले ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत्। यद्यपि सः उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत् तथापि सः भिक्षाटनं करोति स्म। मार्गे यः कोऽपि मिलति तं सः कथयति – “कृपया भिक्षां यच्छतु। दरिद्राय दानं करोतु। पुण्यं प्राप्नोतु।” इति। केचन जनाः तस्मै धनं यच्छन्ति। केचन च तर्जयन्ति। | एक बड़े गाँव में कोई भिखारी रहता था। हालाँकि वह लंबा और मजबूत शरीर वाला युवक था, फिर भी वह भीख माँगता था। रास्ते में जो भी उसे मिलता, वह उससे कहता - "कृपया भीख दीजिए। गरीब को दान दीजिए। पुण्य प्राप्त कीजिए।" कुछ लोग उसे धन देते थे। और कुछ लोग उसे डांटते थे। |
| एकदा तेन मार्गेण कश्चित् धनिकः आगच्छति। सः भिक्षुकः मनसि एव चिन्तयति – “अहो मम भाग्यम्। अद्य अहं प्रभूतं धनं प्राप्नोमि” इति। भिक्षुकः धनिकं वदति –“आर्य! अहम् अतीव दरिद्रः अस्मि। कृपया दानं करोतु” इति। धनिकः तं पृष्टवान् –“त्वं किम् इच्छसि?” “आर्य! अहं प्रभूतं धनम् इच्छामि” इति सः सविनयम् उक्तवान्। | एक बार उस रास्ते से कोई अमीर आदमी आ रहा था। वह भिखारी मन ही मन सोचने लगा - "अरे मेरा सौभाग्य! आज मुझे बहुत सारा धन मिलेगा।" भिखारी ने अमीर आदमी से कहा - "हे आर्य! मैं बहुत गरीब हूँ। कृपया दान दीजिए।" अमीर आदमी ने उससे पूछा - "तुम क्या चाहते हो?" "आर्य! मैं बहुत सारा धन चाहता हूँ," उसने विनम्रता से कहा। |
| तदा धनिकः वदति –“अहं तुभ्यं सहस्रं रूप्यकाणि यच्छामि। त्वं मह्यं तव पादौ यच्छ।” भिक्षुकः वदति –“अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददामि? विना पादौ कथं वा चलामि?” धनिकः वदति –“अस्तु, त्वं पञ्चसहस्रं रूप्यकाणि स्वीकुरु। मह्यं तव हस्तौ यच्छ।” भिक्षुकः वदति –“हस्ताभ्यां विना अहं कथं भिक्षां स्वीकरोमि?” एवमेव धनिकः सहस्राधिकैः रूप्यकैः तस्य अनेकानि शरीराङ्गानि क्रेतुम् इष्टवान्। किन्तु भिक्षुकः निराकृतवान्। | तब अमीर आदमी बोला - "मैं तुम्हें एक हजार रुपये दूँगा। तुम मुझे अपने दोनों पैर दे दो।" भिखारी बोला - "मैं अपने पैर तुम्हें कैसे दे दूँ? बिना पैरों के मैं कैसे चलूँगा?" अमीर आदमी बोला - "ठीक है, तुम पाँच हजार रुपये ले लो। मुझे अपने दोनों हाथ दे दो।" भिखारी बोला - "बिना हाथों के मैं भीख कैसे लूँगा?" इसी तरह अमीर आदमी ने हज़ारों रुपये देकर उसके कई शरीर के अंगों को खरीदना चाहा। लेकिन भिखारी ने मना कर दिया। |
| तदा धनिकः उक्तवान्। “पश्य मित्र! तव समीपे एव सहस्राधिकमूल्यकानि वस्तूनि सन्ति। तथापि किमर्थं त्वम् आत्मानं दुर्बलं मन्यसे? सौभाग्येन एव वयं मानवजन्म प्राप्तवन्तः। अस्य सफलतार्थं प्रयत्नं कुरु। इतः गच्छ, शुभं भवतु” इति। | तब अमीर आदमी ने कहा - "देखो मित्र! तुम्हारे पास ही हज़ारों रुपये मूल्य की चीजें (शरीर के अंग) मौजूद हैं। फिर भी तुम खुद को कमजोर क्यों मानते हो? बड़े सौभाग्य से ही हमें मानव जन्म मिला है। इसे सफल बनाने के लिए प्रयत्न (परिश्रम) करो। यहाँ से जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।" |
| तस्माद्दिनात् भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान्। अतः एव सज्जनाः वदन्ति – आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।। |
उस दिन से भिखारी ने भीख माँगना छोड़कर मेहनत से धन कमाकर सम्मान के साथ जीवन बिताना शुरू कर दिया। इसीलिए सज्जन लोग कहते हैं – आलस्य ही मनुष्यों के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं है, जिसे करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता। |
२. शब्दार्थ-सारणी
| संस्कृत शब्दः | हिन्दी अर्थः | English |
|---|---|---|
| दृढकायः | मजबूत शरीर वाला | Strong body |
| भिक्षाटनम् | भीख के लिए घूमना | Roaming to beg |
| प्रभूतम् | ढेर सारा / पर्याप्त | A lot of |
| अतीव | बहुत सारा / बहुत | Excessive |
| मह्यम् | मुझे / मेरे लिए | For me |
| शरीराङ्गानि | शरीर के अङ्ग | Body parts |
| निराकृतवान् | अस्वीकार किया | Refused |
| दुर्बलम् | निर्बल / कमजोर | Weak |
| त्यक्त्वा | छोड़कर | Having left |
| नावसीदति | दुःखी नहीं होता है | Doesn't feel sad |
३. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-४)
| १. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि यच्छन्तु: | |
|---|---|
| (क) भिक्षुकः किं करोति स्म? | भिक्षाटनम् |
| (ख) कदाचित् तेन मार्गेण कः आगच्छति? | धनिकः |
| (ग) भिक्षुकः धनिकात् किम् इच्छति? | प्रभूतं धनम् (धनम्) |
| (घ) धनिकः भिक्षुकात् किं याचितवान्? | पादौ / हस्तौ (शरीराङ्गानि) |
| (ङ) सौभाग्येन वयं किं प्राप्तवन्तः? | मानवजन्म |
| २. प्रश्नानाम् उत्तराणि ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति पदेन लिखन्तु (यथा – ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत्। ➔ आम्): | |
|---|---|
| (क) भिक्षुकः उन्नतः दृढकायः च आसीत्। ➔ | आम् |
| (ख) जनाः तस्मै दण्डं यच्छन्ति। ➔ | न |
| (ग) भिक्षुकः प्रभूतं धनम् इच्छति। ➔ | आम् |
| (घ) भिक्षुकः धनिकाय पादौ ददाति। ➔ | न |
| (ङ) भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यजति। ➔ | आम् |
| ३. वाक्येषु द्वितीयाविभक्तेः शब्दानां द्विवचने परिवर्तनं कृत्वा वाक्यानि लिखन्तु: | |
|---|---|
| यथा– चन्द्रशेखरः लेखं लिखति। ➔ चन्द्रशेखरः लेखौ लिखति। | |
| (क) आपणिकः अङ्कनीं ददाति। ➔ | आपणिकः अङ्कन्यौ ददाति। |
| (ख) मातामही कथां श्रावयति। ➔ | मातामही कथे श्रावयति। |
| (ग) सैनिकः मां रक्षति। ➔ | सैनिकः आवां रक्षति। |
| (घ) कृष्णः कन्दुकं गृह्णाति। ➔ | कृष्णः कन्दुकौ गृह्णाति। |
| (ङ) छात्रः श्लोकं पठति। ➔ | छात्रः श्लोकौ पठति। |
| ४. चित्रं दृष्ट्वा द्वितीयाविभक्तेः वाक्यानि रचयन्तु: |
|---|
| (चित्र में बालिकाएँ, पक्षी, शिक्षक, नर्तकी आदि के अनुसार द्वितीया विभक्ति के प्रयोग) |
| • बालिकाः विद्यालयं गच्छन्ति。 • पक्षिणः फलानि खादन्ति。 • शिक्षकः पाठं पाठयति。 • नर्तकी वेशं (मुद्राम्) धरति。 • अहं पुस्तकं स्वीकरोमि। |
४. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ५-७)
| ५. कोष्ठके विद्यमानानां शब्दानां द्वितीयाविभक्तेः एकवचनरूपेण सह वाक्यानि लिखन्तु: | |
|---|---|
| यथा– भक्तः (देव) नमति। ➔ भक्तः देवं नमति। | |
| (क) छात्राः (ग्रन्थ) पठन्ति। ➔ | छात्राः ग्रन्थं पठन्ति। |
| (ख) बालकाः (कथा) लिखन्ति। ➔ | बालकाः कथां लिखन्ति। |
| (ग) रमा (लेखनी) क्रीणाति। ➔ | रमा लेखनीं क्रीणाति। |
| (घ) शिक्षकः (अस्मद्) पाठयति। ➔ | शिक्षकः माम् पाठयति। |
| (ङ) अर्जुनः (नदी) पश्यति। ➔ | अर्जुनः नदीं पश्यति। |
| (च) पितामही (रजनी) आह्वयति। ➔ | पितामही रजनीं आह्वयति। |
| (छ) अहं (युष्मद्) नमस्करोमि। ➔ | अहं त्वां नमस्करोमि। |
| (ज) कृषकः (क्षेत्र) कर्षति। ➔ | कृषकः क्षेत्रं कर्षति। |
| (झ) पर्यटकः (कन्याकुमारी) गच्छति। ➔ | पर्यटकः कन्याकुमारीं गच्छति। |
| (ञ) चित्रकारः (चित्र) रचयति। ➔ | चित्रकारः चित्रं रचयति। |
| ६. द्वितीयाविभक्तेः एकवचनशब्दानां बहुवचने परिवर्तनं कृत्वा वाक्यानि रचयन्तु: | |
|---|---|
| यथा– वयं सुभाषितं वदामः। ➔ वयं सुभाषितानि वदामः। | |
| (क) अरुणः दूरवाणीं नयति। ➔ | अरुणः दूरवाणीः नयति। |
| (ख) पिता लेखनीम् आनयति। ➔ | पिता लेखनीः आनयति। |
| (ग) जननी पाकं पचति। ➔ | जननी पाकान् पचति। |
| (घ) मातामहः मां बोधयति। ➔ | मातामहः अस्मान् बोधयति। |
| (ङ) अग्रजा त्वाम् आह्वयति। ➔ | अग्रजा युष्मान् आह्वयति। |
| ७. चित्रं दृष्ट्वा द्वितीयाविभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्यानि रचयन्तु (विद्यालय/मैदान): |
|---|
| १. अहं विशालं विद्यालयं पश्यामि। २. बालकाः कन्दुकं क्षिपन्ति। ३. अध्यापकः बालकान् पाठयति। ४. बालिका पुस्तकं पठति। ५. जनाः सूर्यम् अवलोकयन्ति। ६. बालकः योगासनं करोति। ७. छात्राः सुन्दराणि पुष्पाणि पश्यन्ति। ८. कश्चित् बालकः तत्र जलं पिबति। ९. सर्वे छात्राः गुरुं नमन्ति। १०. अध्यापकः अङ्कनीं गृह्णाति। |
५. योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
| शब्दरूपाणि (द्वितीया विभक्तिः) | |||
|---|---|---|---|
| (क) अकारान्त-पुंलिङ्गशब्दाः | |||
| ग्राम | ग्रामम् | ग्रामौ | ग्रामान् |
| भिक्षुक | भिक्षुकम् | भिक्षुकौ | भिक्षुकान् |
| बालक | बालकम् | बालकौ | बालकान् |
| (ख) आकारान्त-स्त्रीलिङ्गशब्दाः | |||
| भिक्षा | भिक्षाम् | भिक्षे | भिक्षाः |
| माला | मालाम् | माले | मालाः |
| बालिका | बालिकाम् | बालिके | बालिकाः |
| (ग) ईकारान्त-स्त्रीलिङ्गशब्दाः | |||
| नदी | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
| लेखनी | लेखनीम् | लेखन्यौ | लेखनीः |
| भगिनी | भगिनीम् | भगिन्यौ | भगिनीः |
| (घ) अकारान्त-नपुंसकलिङ्गशब्दाः | |||
| फल | फलम् | फले | फलानि |
| जल | जलम् | जले | जलानि |
| गृह | गृहम् | गृहे | गृहाणि |
| (ङ) सर्वनामशब्दाः | |||
| अस्मद् | माम् | आवाम् | अस्मान् |
| युष्मद् | त्वाम् | युवाम् | युष्मान् |
| तद् (पुं.) | तम् | तौ | तान् |
| एतद् (पुं.) | एतम् | एतौ | एतान् |
| उदाहरणाम् अनुसृत्य पदानां द्वितीयाविभक्तेः रूपाणि लिखन्तु: | |||
|---|---|---|---|
| युवकः ➔ युवकम् | भिक्षा ➔ भिक्षाम् | नदी ➔ नदीम् | धनम् ➔ धनम् |
| आसन्दः ➔ आसन्दम् | पूजा ➔ पूजाम् | लेखनी ➔ लेखनीम् | नगरम् ➔ नगरम् |
| धनिकौ ➔ धनिकौ | कविते ➔ कविते | जननी ➔ जननीम् | पुष्पे ➔ पुष्पे |
| पादाः ➔ पादान् | नासिका ➔ नासिकाम् | कर्तरी ➔ कर्तरीम् | पुष्पाणि ➔ पुष्पाणि |
| गोलदीपौ ➔ गोलदीपौ | पत्रिकाः ➔ पत्रिकाः | अङ्कन्यौ ➔ अङ्कन्यौ | पुस्तकानि ➔ पुस्तकानि |
| हस्तः ➔ हस्तम् | पेटिका ➔ पेटिकाम् | सम्मार्जन्यः ➔ सम्मार्जनीः | वनानि ➔ वनानि |
| अहम् ➔ माम् | यूयम् ➔ युष्मान् | द्रोणी ➔ द्रोणीम् | त्वम् ➔ त्वाम् |
| युवाम् ➔ युवाम् | आवाम् ➔ आवाम् | भगिनी ➔ भगिनीम् | सः ➔ तम् |
| श्लोकान् पठन्तु, अवगच्छन्तु स्मरन्तु च: |
|---|
| विना वेदं विना गीतां विना रामायणीं कथाम्। विना कविं कालिदासं भारतं भारतं न हि॥ भावार्थ: वेद, गीता, रामायण और कालिदास के बिना भारत, भारत नहीं है। रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ भावार्थ: जो व्यक्ति प्रतिदिन सोते समय श्रीराम, कार्तिकेय, हनुमान, गरुड़ और भीम का स्मरण करता है, उसके बुरे सपने नष्ट हो जाते हैं। |
भाषाक्रीडा: बालकाः गणद्वये विभजनीयाः। शिक्षकः प्रथमाविभक्त्यन्तं कमपि शब्दं वदति। प्रथमगणस्य छात्रः तस्य द्वितीयाविभक्तेः एकवचनरूपं वदेत्। द्वितीयगणस्य छात्रः तस्यैव बहुवचनरूपं वदेत्।
परियोजनाकार्यम्:
१. पाठे दर्शितानां चित्राणाम् अनुसारं द्वितीयाविभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्यानि रचयन्तु।
२. द्वितीयाविभक्तेः आधारेण स्वदिनचर्यायाः विषये दश वाक्यानि लिखन्तु।
३. किं भवन्तः एवरेस्ट-पर्वतारोहिणीम् अरुणिमा-सिन्हां जानन्ति? तस्याः विषये अन्वेषणं कृत्वा स्वभाषया दशवाक्यैः निबन्धं लिखन्तु।
परियोजनाकार्यम्:
१. पाठे दर्शितानां चित्राणाम् अनुसारं द्वितीयाविभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्यानि रचयन्तु।
२. द्वितीयाविभक्तेः आधारेण स्वदिनचर्यायाः विषये दश वाक्यानि लिखन्तु।
३. किं भवन्तः एवरेस्ट-पर्वतारोहिणीम् अरुणिमा-सिन्हां जानन्ति? तस्याः विषये अन्वेषणं कृत्वा स्वभाषया दशवाक्यैः निबन्धं लिखन्तु।

