Ishwar Ansh Jeev Avinashi: आत्मा और परमात्मा का रहस्य | The Immortal Soul & Maya

Sooraj Krishna Shastri
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जानिए 'ईश्वर अंस जीव अबिनासी' चौपाई का गूढ़ अर्थ। आत्मा (Soul), परमात्मा और माया (Maya) का रहस्य समझें। सूरदास जी के प्रसंग और वेदों के ज्ञान के साथ जीवन बदलने वाली पोस्ट.

Ishwar Ansh Jeev Avinashi: आत्मा और परमात्मा का रहस्य | The Immortal Soul & Maya

Ishwar Ansh Jeev Avinashi: आत्मा और परमात्मा का रहस्य | The Immortal Soul & Maya
Ishwar Ansh Jeev Avinashi: आत्मा और परमात्मा का रहस्य | The Immortal Soul & Maya


"ईश्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥"

श्री रामचरितमानस की यह चौपाई जीवन के सबसे बड़े सत्य को उद्घाटित करती है। हम अक्सर खुद को यह नश्वर शरीर मान बैठते हैं, लेकिन सत्य यह है कि हम उस परमपिता परमात्मा के अंश हैं।

आज के इस लेख में हम जानेंगे कि शास्त्रों के अनुसार आत्मा का स्वरूप क्या है, वह शरीर में कहाँ रहती है, और माया के बंधन को काटकर परम शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है।


1. आत्मा का स्वरूप: हम कौन हैं?

तुलसीदास जी कहते हैं:

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥

हे तात! यह अकथनीय कहानी है जो केवल अनुभव की जा सकती है। जीव (आत्मा) ईश्वर का अंश है, इसलिए वह अविनाशी (जिसका नाश न हो), चेतन (जागृत), निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है।

चूँकि हम ईश्वर के अंश हैं, इसलिए हम परम आनंद, विशुद्ध प्रेम, ज्ञान और शांति के अधिकारी हैं। यह स्थिति स्थूल नहीं, अति सूक्ष्म है। जब हम खुद को 'देह' (शरीर) न मानकर 'देही' (आत्मा) मानते हैं, तभी हम उस सच्चिदानंद की शरण में जा सकते हैं।


2. शरीर में आत्मा का निवास कहाँ है?

अक्सर जिज्ञासु प्रश्न करते हैं कि आत्मा शरीर में कहाँ रहती है? वेद इसका स्पष्ट उत्तर देते हैं:

हृदि ह्येषा आत्मा

अर्थात्, आत्मा हृदय में निवास करती है।

लेकिन प्रश्न उठता है: "यदि आत्मा हृदय में है, तो चेतना पूरे शरीर में कैसे है?"

महर्षि वेद व्यास ने इसे दो बहुत ही सुंदर उदाहरणों से समझाया है:

  • चंदन का उदाहरण (अविरोधश्चचंदनवत): जिस प्रकार माथे पर लगा चंदन एक जगह होते हुए भी पूरे शरीर को शीतलता का अनुभव कराता है।
  • पुष्प का उदाहरण (व्यक्तिरको गंधवत्): जिस प्रकार फूल बगीचे के एक कोने में खिलता है, लेकिन उसकी सुगंध पूरे बगीचे में फैल जाती है।

उसी प्रकार, आत्मा हृदय में स्थित होकर भी अपनी चेतना से नख से लेकर शिख तक पूरे शरीर को चेतन (जीवित) रखती है।


3. भगवान दर्शन कैसे देते हैं? (सूरदास जी का प्रसंग)

ईश्वर को पाने के लिए आँखों की नहीं, 'व्याकुलता' और 'भाव' की आवश्यकता होती है।

एक बार भक्त शिरोमणि सूरदास जी भगवान के मंदिर गए। लोगों ने उपहास करते हुए पूछा,
"अरे सूरदास! तुम्हारी आँखें तो हैं नहीं, तुम भगवान के दर्शन कैसे करोगे?"

सूरदास जी ने जो उत्तर दिया, वह हर भक्त के लिए एक सबक है। वे बोले:

"दर्शन के लिये मेरे नेत्र नहीं हैं तो क्या हुआ? क्या मेरे ठाकुरजी (भगवान) के भी नेत्र नहीं हैं? वे तो मुझे देख लेंगे न! यदि वे मुझे देखकर प्रसन्न हो गए, तो समझो मेरा काम हो गया।"

भगवान हमारी जीवन की व्यवस्था नहीं, मन की अवस्था देखते हैं।


4. माया और अविद्या: आनंद में बाधा

हम आनंद स्वरूप हैं, फिर हम दुखी क्यों हैं? इसका कारण है अविद्या और माया।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं:

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:

यह जीव मेरा ही सनातन अंश है, लेकिन प्रकृति (माया) में स्थित होकर यह मन और इंद्रियों के संघर्ष में फँसा हुआ है।

माया त्रिगुणात्मिका है:

  • तमोगुण: अंधकार और आलस्य।
  • रजोगुण: इच्छाएं और क्रियाशीलता।
  • सत्त्वगुण: प्रकाश और पवित्रता।

हम अविद्या के कारण अपने दोष नहीं देख पाते। हम सोचते हैं कि हम सबसे श्रेष्ठ हैं। सांसारिक व्यक्ति के लिए माया ही सत्य है, लेकिन ज्ञानी के लिए यह 'अनिर्वचनीय' है।


5. मुक्ति का उपाय

जिस प्रकार किसी पेड़ को नष्ट करने के लिए उसकी शाखाएँ काटने से काम नहीं चलता, उसकी जड़ काटनी पड़ती है। उसी प्रकार, दुखों को मिटाने के लिए अविद्या रूपी जड़ को काटना होगा।

अविद्या का नाश केवल ब्रह्म ज्ञान से संभव है, केवल बाहरी इंद्रिय दमन से नहीं। जब ज्ञान का उदय होता है, तब राग और द्वेष स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं।

जैसे गर्मी में सूखी धरती बारिश की बूँदें पड़ते ही हरी-भरी हो जाती है, वैसे ही जब जीवन में गुरु और गोविंद की कृपा बरसती है, तो जीव का अव्यक्त आनंद प्रकट हो उठता है।


निष्कर्ष

यह संपूर्ण जगत, जो पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है, माया की ही उपज है और अंततः उसी परम तत्व में विलीन हो जाएगा। इसलिए हमें उस अविनाशी परमात्मा की शरण लेनी चाहिए।

अंत में, उस प्रभु के चरणों में यही प्रार्थना है:

अद्याभवत सफलता नयन-द्वयस्य्, देव! त्वदीय चरणाम्बुज-वीक्षणेन।
अद्य त्रिलोकतिलक ! प्रतिभाषते में, संसार-वारिधिरयं चुलुक-प्रमाणम्॥

(अर्थ: हे देव! आपके चरण कमलों के दर्शन से आज मेरे नेत्र सफल हो गए। हे त्रिलोक तिलक! आज आपकी कृपा से यह विशाल भवसागर मुझे चुल्लू भर पानी के समान तुच्छ लग रहा है।)

जय श्री राम!
(यदि यह लेख आपको अच्छा लगा हो, तो इसे अपने परिजनों के साथ साझा अवश्य करें।)


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