वृन्दावन में भक्ति और दैन्य का महासंगम
यहाँ प्रस्तुत है गोस्वामी तुलसीदास जी के ब्रज-प्रवास की यह दिव्य गाथा:
वृन्दावन… यह केवल भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु भक्ति का वह रसातल है जहाँ तर्क मौन हो जाता है, पांडित्य नतमस्तक हो जाता है और अहंकार मोम की भाँति पिघलकर 'प्रेम' बन जाता है। इसी पावन ब्रजभूमि पर जब रामचरितमानस के रचयिता, परम राम-भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी का आगमन हुआ, तो भक्ति के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जुड़ा, जो युगों-युगों तक संतों को विनम्रता का पाठ पढ़ाता रहेगा।
१. प्रथम प्रसंग: अहंकार का विसर्जन (संत नाभा जी का भंडारा)
कथा आती है कि तुलसीदास जी ब्रज में निवास कर रहे थे। यद्यपि उनकी रुचि भीड़-भाड़ वाले भंडारों में नहीं थी, परंतु महादेव की अंतःप्रेरणा से वे महान संत नाभा जी के आश्रम में आयोजित विशाल भंडारे की ओर चल पड़े।
संतों की भीड़ और तुलसी का आसन
जब वे वहाँ पहुँचे, तो विलंब हो चुका था। संतों का महासागर उमड़ा हुआ था। तिल रखने की भी जगह शेष न थी। ऐसे में गोस्वामी जी ने अपनी विद्वता या प्रतिष्ठा का मान न करते हुए, वह स्थान चुना जिसे संसार सबसे अपवित्र मानता है—जूता-घर। जहाँ संतों की चरण-पादुकाएं (पनहियाँ) रखी थीं, वे वहीं जाकर चुपचाप बैठ गए।
खीर का पात्र और अद्भुत मांग
भंडारे में 'खीर' का प्रसाद वितरित हो रहा था, क्योंकि ब्रज के ठाकुर को खीर अति प्रिय है। परोसने वाला सेवक जब तुलसीदास जी के पास पहुँचा, तो देखा कि बाबा के पास कोई बर्तन ही नहीं है।
उसने पूछा— "बाबा! खीर तो ले लूँ, पर आपका पात्र कहाँ है? बिना बर्तन के प्रसाद कैसे दूँ?"
तुलसीदास जी के चेहरे पर एक बाल-सुलभ मुस्कान तैर गई। उन्होंने पास ही रखी एक संत की पनहिया (जूता) उठाई और सेवक के आगे बढ़ा दी।
वे बोले— "भैया! इसी में खीर डाल दो।"
क्रोध और करुणा का संवाद
यह दृश्य देखकर सेवक सन्न रह गया। उसे लगा कि यह साधु भंडारे का अपमान कर रहा है। वह क्रोधित होकर कटु वचन कहने लगा। शोर सुनकर स्वयं संत नाभा जी वहाँ आ पहुँचे।
तब तुलसीदास जी की आँखों से प्रेमाश्रु बह निकले। उन्होंने रुंधे गले से जो कहा, वह भक्ति का सर्वोच्च सिद्धांत बन गया:
परिणाम:
यह सुनते ही वहां सन्नाटा छा गया। जिन चरणों की वंदना दुनिया करती थी, वे चरण आज जूतों के पास बैठकर स्वयं को धन्य मान रहे थे। संत नाभा जी और उपस्थित संत समाज ने तुलसीदास जी के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। यह तुलसी का 'दैन्य' था—जहाँ स्वयं को 'तृण से भी तुच्छ' मानकर प्रभु को पाया जाता है।
२. द्वितीय प्रसंग: जब मुरलीधर बने धनुर्धर (मदनमोहन जी का मंदिर)
दूसरा प्रसंग भक्ति की उस हठ का है, जिसने भगवान को अपना रूप बदलने पर विवश कर दिया।
ब्रज में 'राम' की खोज
तुलसीदास जी को यह भली-भांति ज्ञात था कि तत्वतः राम और कृष्ण एक ही हैं। परन्तु ब्रज की गली-गली में केवल "राधे-राधे" की गूँज थी। तुलसी का चातक मन अपने 'राम' के नाम के लिए प्यासा था। उन्होंने ब्रज की दशा देखकर कहा:
राधा राधा रटत हैं, आक ढ़ाक अरू खैर।।
(अर्थात: इस ब्रजभूमि में वृक्ष, लताएँ और पत्तियां भी केवल राधा-राधा रट रही हैं, यहाँ राम नाम सुनने को नहीं मिलता।)
पुजारी का व्यंग्य और भक्त की पुकार
तुलसीदास जी श्री मदनमोहन जी के मंदिर में दर्शन करने गए। वहाँ भगवान कृष्ण त्रिभंगी मुद्रा में, बंसी धारण किए, राधारानी के साथ विराजमान थे। किसी पुजारी ने हँसी में कह दिया— "बाबा! यहाँ धनुष-बाण वाले नहीं, बंसी वाले की चलती है। तुम्हारे राम यहाँ नहीं दिखेंगे।"
यह बात तुलसी के हृदय में उतर गई। उन्होंने न तो कृष्ण को नकारा, न ही राम को छोड़ा। उन्होंने तो बस अपने इष्ट से अधिकार पूर्वक कहा—
"प्रभु! मैं जानता हूँ आप ही मेरे रघुनाथ हैं। छवि आपकी आज भी अद्भुत है, पर मेरा मन उस रूप पर अटका है जिस पर मैंने अपना जीवन न्योछावर किया है।"
तुलसीदास जी ने मस्तक नहीं झुकाया, बल्कि एक शर्त रख दी:
तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष-बाण लो हाथ।।
दिव्य रूपांतरण
भक्त की वाणी में इतना बल था कि पत्थर की मूरत भी पिघल गई। उस क्षण एक चमत्कार हुआ। देखते ही देखते, मदनमोहन जी ने अपनी बाँसुरी त्याग दी, मोरपंख का मुकुट तो रहा, पर हाथों में धनुष और बाण प्रकट हो गए। त्रिभंगी मुद्रा त्यागकर भगवान सावधान मुद्रा में 'रघुनाथ' बनकर खड़े हो गए।
भगवान ने सिद्ध कर दिया कि वे 'भक्त-पराधीन' हैं। भक्त जिस भाव से भजता है, भगवान उसी रूप में प्रकट हो जाते हैं।
सार: भक्ति का संदेश
गोस्वामी तुलसीदास जी के ये दो प्रसंग हमें जीवन के दो सबसे बड़े सूत्र देते हैं:
- विनम्रता (Humility): ईश्वर ऊँचे सिंहासन पर नहीं, बल्कि वहाँ मिलते हैं जहाँ हम अपने अहंकार के जूते बाहर उतार देते हैं। जहाँ 'मैं' समाप्त होता है, वहीं से 'हरि' शुरू होते हैं।
- अनन्य निष्ठा (Dedication): रूप चाहे जो हो, ईश्वर एक है। पर भक्त का प्रेम इतना प्रगाढ़ होना चाहिए कि भगवान को भी भक्त की इच्छा के अनुरूप ढलना पड़े।
धन्य हैं गोस्वामी तुलसीदास जी, जिन्होंने हमें सिखाया कि भक्ति का अर्थ माँगना नहीं, बल्कि मिट जाना है।
जय सिया राम। जय श्री राधे।

