Aniruddha Vivah Aur Rukmi Vadh: Balaram Ji Ka Krodh (Bhagwat Puran)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

अनिरुद्ध का विवाह और चौपड़ के खेल में रुक्मी का वध: दाऊ भैया का रौद्र रूप

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 61)

रुक्मिणी हरण के समय भगवान श्रीकृष्ण ने विदर्भ के राजकुमार 'रुक्मी' को युद्ध में परास्त कर उसका मुंडन कर दिया था। उस अपमान के बाद रुक्मी ने अपनी राजधानी कुण्डिनपुर छोड़ दी और 'भोजकट' नामक एक नया नगर बसाकर वहीं रहने लगा। रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से घोर शत्रुता रखता था, परंतु अपनी बहन रुक्मिणी से उसका अत्यधिक मोह और प्रेम था। इसी मोह के कारण उसने अपनी पुत्री 'रुक्मवती' का विवाह प्रद्युम्न (श्रीकृष्ण-रुक्मिणी के पुत्र) से कर दिया था। उसी प्रद्युम्न और रुक्मवती के अत्यंत रूपवान पुत्र हुए— अनिरुद्ध। जब अनिरुद्ध विवाह योग्य हुए, तो रुक्मी ने अपनी पौत्री (पोती) 'रोचना' का विवाह अनिरुद्ध से करना स्वीकार कर लिया। यह विवाह भोजकट नगर में आयोजित हुआ, जहाँ से एक भयंकर विनाश का आरंभ हुआ।

1. भोजकट नगर में बारात और कलिंगराज की कुटिल चाल

अनिरुद्ध और रोचना के विवाह के लिए भगवान श्रीकृष्ण, महारानी रुक्मिणी, बलराम जी (दाऊ भैया), प्रद्युम्न, साम्ब और अन्य यदुवंशी अत्यंत धूमधाम से बारात लेकर भोजकट नगर पहुँचे। विवाह का उत्सव अत्यंत आनंद और भव्यता के साथ संपन्न हुआ।

परंतु इस विवाह में अनेक ऐसे राजा भी आए थे, जो भगवान श्रीकृष्ण और यदुवंशियों से ईर्ष्या रखते थे। इनमें सबसे प्रमुख था कलिंग देश का राजा (कलिंगराज)। कलिंगराज अत्यंत कुटिल और घमंडी था। जब विवाह के बाद सभी मंडप में बैठे थे, तो कलिंगराज ने रुक्मी के कान भरे।

कलिंगराज ने रुक्मी से कहा— "हे मित्र! मैंने सुना है कि बलराम को जुआ (चौपड़/पांसे) खेलने का बहुत शौक है, परंतु उन्हें यह खेल खेलना बिल्कुल नहीं आता। तुम चौपड़ के बहुत बड़े खिलाड़ी हो। क्यों न हम बलराम को चौपड़ खेलने के लिए उकसाएं और छल से उनका सारा धन जीत कर उन्हें अपमानित करें?"
2. चौपड़ का खेल (द्यूत क्रीड़ा) और रुक्मी का छल

कलिंगराज की बातों में आकर रुक्मी ने बलराम जी को चौपड़ खेलने की चुनौती दी। बलराम जी स्वभाव से अत्यंत सीधे और खेल-प्रेमी थे, उन्होंने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच दांव लगने लगे।

आरंभ में एक सौ, फिर एक हज़ार और फिर दस हज़ार स्वर्ण मुद्राओं की बाजी लगी। खेल में बलराम जी ही जीत रहे थे, परंतु रुक्मी बेईमानी पर उतर आया। वह हारने पर भी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर कहता— "यह दांव मैंने जीता है! बलराम हार गए!"

बलराम जी का स्वभाव यद्यपि अत्यंत क्रोधी है, परंतु अपनी भावज (रुक्मिणी जी के भाई) का विचार करके और उत्सव का माहौल देखकर वे उस समय रुक्मी की बेईमानी को पी गए। इसके बाद रुक्मी का दुस्साहस और बढ़ गया। उसने एक लाख स्वर्ण मुद्राओं की बाजी लगाई। इस बार भी बलराम जी ने ही दांव जीता, परंतु रुक्मी ने फिर छल किया और बेईमानी से उस धन को अपनी ओर खींच लिया।

3. कलिंगराज का उपहास और आकाशवाणी का सत्य

रुक्मी की इस बेईमानी को देखकर कलिंगराज ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। उसने अपने दाँत दिखाते हुए बलराम जी का उपहास किया और उन्हें 'अनाड़ी' कहा। बलराम जी के नेत्र क्रोध से लाल होने लगे, फिर भी वे स्वयं को रोक रहे थे।

अंत में रुक्मी ने एक अर्बुद (एक अरब / सौ करोड़) स्वर्ण मुद्राओं का महा-दांव लगाया। बलराम जी ने पांसे फेंके और धर्मपूर्वक (बिल्कुल सही तरीके से) वह दांव भी जीत लिया। परंतु रुक्मी की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। उसने छलपूर्वक फिर से घोषणा कर दी— "यह दांव भी मैंने ही जीता है! तुम लोग साक्षी हो, बलराम यह बाजी हार गया।"

उसी समय पूरे मंडप में एक 'आकाशवाणी' (Ethereal Voice) गूंज उठी:

॥ आकाशवाणी की घोषणा ॥
धर्मेण जितवान् रामो रुक्मी वदति किल्बिषम् ।
रामेण जितमेवैतद् यदाह किल रुक्म्यलीकम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.61.27)
अर्थ: आकाशवाणी ने कहा— "बलराम (राम) ने यह दांव बिल्कुल धर्मपूर्वक जीता है। रुक्मी झूठ बोल रहा है। यह महा-दांव राम की ही विजय है और रुक्मी सर्वथा बेईमानी कर रहा है।"
4. रुक्मी का अहंकार और दाऊ भैया का अपमान

आकाशवाणी के स्पष्ट निर्णय के बाद भी मृत्यु जिसके सिर पर नाच रही थी, उस रुक्मी ने आकाशवाणी की ओर ध्यान नहीं दिया। उल्टे कलिंगराज के इशारे पर उसने बलराम जी का भयंकर अपमान करना शुरू कर दिया।

रुक्मी ने भरी सभा में कहा— "अरे! तुम लोग तो गायें चराने वाले वनवासी अहीर हो। तुम राजाओं के साथ पांसे खेलना क्या जानो? पांसे खेलना और बाण चलाना तो केवल राजाओं का काम है। तुम जैसे ग्वालों को हमारे साथ खेलने का कोई अधिकार नहीं है!"

5. दाऊ भैया का रौद्र रूप और रुक्मी का वध

इस अपमानजनक वचन और कलिंगराज के बार-बार दाँत निकालकर हँसने से बलराम जी का धैर्य रूपी बांध टूट गया। साक्षात शेषनाग के अवतार दाऊ भैया का शरीर क्रोध से जलने लगा। उन्होंने खेल के उस भारी 'पासे के पटरे' (अष्टपद / मुद्गर) को ही उठा लिया।

बलराम जी ने सिंह गर्जना करते हुए उस भारी अष्टपद (जिस पर जुआ खेला जा रहा था) से रुक्मी के सिर पर एक ही प्रहार किया। प्रहार इतना भयंकर था कि रुक्मी का सिर फट गया और वह उसी क्षण लहूलुहान होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। एक पल में ही विवाह का उल्लास मृत्यु के सन्नाटे में बदल गया।

इसके बाद बलराम जी कलिंगराज की ओर दौड़े, जो दाँत निकालकर हँस रहा था। बलराम जी ने उसे पकड़ लिया और उसके चेहरे पर ऐसा घूंसा मारा कि उसके सारे दाँत टूटकर ज़मीन पर गिर पड़े। अन्य जो भी कुटिल राजा वहां से भागने का प्रयास कर रहे थे, बलराम जी ने उन्हें भी पकड़-पकड़ कर खूब पीटा और उनकी भुजाएं और पैर तोड़ दिए। सभी दुष्ट राजा खून से लथपथ होकर वहां से भाग खड़े हुए।

6. भगवान श्रीकृष्ण का अद्भुत और कूटनीतिक 'मौन'

जब यह सारा घटनाक्रम हो रहा था, तब भगवान श्रीकृष्ण वहीं उपस्थित थे। रुक्मी उनकी पटरानी रुक्मिणी का सगा भाई था और बलराम जी उनके सगे बड़े भाई थे। ऐसी विकट स्थिति में भगवान ने जो आचरण किया, वह उनकी परम कूटनीति और पारिवारिक समझ को दर्शाता है।

॥ भगवान का मौन ॥
रुक्मिणीबलरामाभ्यां भयेन कृतवेदिकः ।
नोवाच साध्वसाधु वा रुक्मिणो निहते श्यालके ॥
(श्रीमद्भागवत 10.61.35)
अर्थ: रुक्मी के मारे जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने न तो उसे 'बुरा' कहा और न ही 'अच्छा' कहा। क्योंकि यदि वे अच्छा कहते तो महारानी रुक्मिणी (पत्नी) को दुःख होता, और यदि बुरा कहते तो बलराम जी (भाई) को क्रोध आता। इसलिए स्नेह-भंग के भय से भगवान बिल्कुल 'मौन' रहे।

इस प्रकार, दुष्ट रुक्मी का अंत हुआ। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम जी, महारानी रुक्मिणी और नवदंपति (अनिरुद्ध और रोचना) को साथ लेकर यदुवंशियों ने द्वारका के लिए प्रस्थान किया। अनिरुद्ध और रोचना का द्वारका में भव्य स्वागत हुआ।

कथा का आध्यात्मिक और व्यावहारिक संदेश

श्रीमद्भागवत की यह कथा हमें तीन अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देती है:

  • द्यूत (जुए) का परिणाम: महाभारत से लेकर भागवत तक, चौपड़ या जुआ कभी भी विनाश के अलावा कुछ नहीं लाता। जहाँ जुआ है, वहाँ 'छल' अवश्य होगा, और जहाँ छल है, वहाँ मृत्यु निश्चित है।
  • अहंकार पतन का कारण: रुक्मी का ज्ञान और बल उसके अहंकार के आगे तुच्छ हो गया। उसने ईश्वर के अवतार को 'ग्वाला' कहकर अपमानित किया, जिसका दंड उसे तुरंत मिला।
  • परिस्थिति के अनुसार मौन: भगवान श्रीकृष्ण का मौन हमें सिखाता है कि जब दो अत्यंत प्रियजनों (भाई और पत्नी) के बीच का विवाद हो, तो वहाँ बिना पक्ष लिए शांत रहना ही सबसे बड़ी समझदारी है।

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