हम सभी यह सोचते हैं कि यदि कोई व्यक्ति राजा बन जाए या उसके पास असीमित ऐश्वर्य आ जाए, तो वह अपनी दिनचर्या में आराम और विलासिता को शामिल कर लेगा। परंतु श्रीमद्भागवत महापुराण में द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण का जो दैनिक जीवन वर्णित है, वह हमें आश्चर्यचकित कर देता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारका में 16,108 महलों में एक साथ अपनी योगमाया से 16,108 रूप धारण करके निवास करते थे। और सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि उन सभी 16,108 महलों में भगवान की दिनचर्या बिलकुल एक समान होती थी। यह दिनचर्या संसार के प्रत्येक मनुष्य— चाहे वह विद्यार्थी हो, गृहस्थ हो, या राजनेता— के लिए सफलता और शांति का सबसे बड़ा सूत्र है।
द्वारका में जब रात्रि का अंतिम प्रहर (सूर्य उदय होने से लगभग डेढ़-दो घंटे पहले का समय) आता, जिसे 'ब्रह्म मुहूर्त' कहा जाता है, तब पारिजात के पुष्पों की सुगंध के साथ शीतल वायु बहने लगती। इस शुभ बेला में पक्षी चहचहाने लगते और मुर्गों की बांग सुनाई देती। रुक्मिणी जी और अन्य रानियाँ भगवान को जगाने से संकोच करती थीं कि कहीं उनके प्रियतम की नींद न टूट जाए, परंतु भगवान स्वयं ही अपनी योगनिद्रा का त्याग करके उठ जाते थे।
दध्यौ प्रसन्नकरण आत्मानं तमसः परम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.70.4)
यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही परब्रह्म हैं, फिर भी वे ध्यान करते थे। क्यों? ताकि संसार के लोगों को यह शिक्षा मिले कि दिन की शुरुआत हमेशा शांत मन से ईश्वर के ध्यान से करनी चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त का ध्यान चित्त को दिन भर के संघर्षों के लिए शक्ति प्रदान करता है।
ध्यान के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण शुद्ध, निर्मल और पवित्र जल से स्नान करते थे। स्नान के उपरांत वे अत्यंत स्वच्छ और पवित्र 'पीतांबर' (पीले रंग के वस्त्र) धारण करते थे।
वस्त्र धारण करने के बाद, भगवान शास्त्र-विधि के अनुसार 'संध्यावंदन' (सूर्य उदय के समय की जाने वाली वैदिक प्रार्थना) करते थे। इसके पश्चात वे मौन होकर 'गायत्री मंत्र' का जप करते थे। मंत्र जप के बाद, भगवान श्रीकृष्ण वेदी पर 'अग्निहोत्र' (हवन) करते थे। वे पवित्र अग्नि में आहुतियां डालते थे। जो परमेश्वर सभी यज्ञों का भोक्ता है (अर्थात जिसे सभी आहुतियां अंततः प्राप्त होती हैं), वह स्वयं अग्नि में आहुति दे रहा था! यह उनका समाज को कर्मकांड और वैदिक मर्यादा सिखाने का तरीका था।
अर्थात, श्रेष्ठ पुरुष जैसा-जैसा आचरण करते हैं, सामान्य मनुष्य भी वैसा ही करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण अपना नित्य कर्म इसलिए करते थे ताकि प्रजा कभी आलसी न हो और धर्म का मार्ग न छोड़े।
हवन और सूर्योपस्थान के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय और अद्भुत नियम शुरू होता था— 'गोदान' (गायों का दान)। द्वारकाधीश का ऐश्वर्य ऐसा था कि वे कोई साधारण दान नहीं करते थे।
भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण प्रतिदिन 13,084 गायों का दान सुपात्र ब्राह्मणों और ज्ञानियों को करते थे। (कुछ पुराणों में यह संख्या और भी अधिक बताई गई है, क्योंकि यह दान 16,108 महलों से एक साथ होता था)।
- ये गाएं साधारण नहीं होती थीं; वे सभी दुधारू, शांत स्वभाव वाली और अपनी पहली बछिया (बछड़े) के साथ होती थीं।
- उनके सींगों पर सोने का पानी (Gold Plating) चढ़ा होता था।
- उनके खुरों (Hooves) में चांदी जड़ी होती थी।
- गले में रेशमी वस्त्र और मोतियों की मालाएं पहनाई जाती थीं।
गायों के दान के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मणों को तिल, रेशमी वस्त्र, और स्वर्ण आभूषण भी दान करते थे। यह सिद्ध करता है कि एक आदर्श गृहस्थ को अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा प्रतिदिन या नियमित रूप से समाज कल्याण और दान-पुण्य में लगाना चाहिए।
गोदान और ब्राह्मणों को प्रणाम करने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण 'मांगलिक वस्तुओं' (Auspicious things) का स्पर्श और दर्शन करते थे। वे प्रतिदिन सवत्सा गो (बछड़े वाली गाय), अग्नि, ब्राह्मण, स्वर्ण, घी, सूर्य, जल, और पृथ्वी का स्पर्श करके उन्हें प्रणाम करते थे।
इसके बाद उनका शृंगार होता था। उनके अंग-रक्षक और सेवक उन्हें चंदन का लेप लगाते, गले में दिव्य 'कौस्तुभ मणि' और 'वैजयंती माला' पहनाते। तत्पश्चात, भगवान दर्पण (शीशे) में अपना वह त्रिभुवन-मोहन रूप निहारते थे। भगवान का यह रूप इतना सुंदर था कि जो भी उन्हें एक बार देख लेता, उसके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।
भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत आदर्श पति थे। अपने राजकाज के लिए निकलने से पहले, वे अपनी रानियों (रुक्मिणी, सत्यभामा आदि) को प्रेमपूर्ण वचनों, मुस्कान और दृष्टि से अत्यंत आनंदित करते थे। यह बताता है कि एक सफल मनुष्य वही है जो बाहर के कामों में उलझने से पहले अपने घर और परिवार को प्रसन्न और संतुष्ट रखे।
इसके बाद, भगवान श्रीकृष्ण अंतःपुर (महलों) से बाहर आते। महलों के बाहर उनके सारथी 'दारुक' अपने अद्भुत रथ के साथ खड़े रहते थे, जिसमें शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नाम के चार दिव्य घोड़े जुते होते थे। भगवान रथ पर सवार होते। उनके बाहर निकलते ही द्वारका के नागरिक, बंदीजन, सूत और मागध (स्तुति गाने वाले) भगवान की जय-जयकार करने लगते।
भगवान श्रीकृष्ण का रथ राजमहल से निकलकर 'सुधर्मा सभा' की ओर जाता था। (सुधर्मा सभा देवराज इंद्र ने द्वारका को भेंट की थी, इस सभा की विशेषता थी कि इसमें बैठने वाले व्यक्ति को कभी भूख, प्यास, शोक या मृत्यु का भय नहीं सताता था)।
सुधर्मा सभा में प्रवेश करते ही, भगवान श्रीकृष्ण सबसे ऊँचे और दिव्य सिंहासन पर विराजमान होते थे। सभा में यदुवंश के महान महारथी— महाराज उग्रसेन, दाऊ भैया (बलराम जी), प्रद्युम्न, सात्यकि, अक्रूर, और अन्य वृष्णि-भोज वंशी यादव— उपस्थित रहते थे।
वृतो यदुसिंहैर्विरेजे स तदा यथोडुपतिर्ग्रहतारागणैः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.70.17)
इस सभा में भगवान श्रीकृष्ण केवल गंभीर राजकाज ही नहीं करते थे। यहाँ कुशल नर्तकियाँ नृत्य करती थीं, श्रेष्ठ गायक शास्त्रीय गायन करते थे, और विदूषक (Comedians) अपने चुटकुलों से सभी को हंसाते थे। इन सबके बीच, भगवान श्रीकृष्ण महाराज उग्रसेन और बलराम जी के साथ मिलकर द्वारका राज्य के अत्यंत गंभीर राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य विषयों पर निर्णय लेते थे। (भगवान कभी स्वयं राजा नहीं बने, उन्होंने उग्रसेन जी को ही राजा बनाए रखा, यह उनकी असीम नम्रता थी)।
भगवान श्रीकृष्ण की इस दिनचर्या में जीवन का सबसे बड़ा रहस्य छिपा है। जो व्यक्ति दिन-रात केवल धन कमाने में लगा है और जिसने अपना 'ब्रह्म मुहूर्त' और 'ईश्वर का ध्यान' खो दिया है, उसका वह धन किसी काम का नहीं। श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि:
- आत्मानुशासन (Self-Discipline): जीवन में चाहे कितनी भी सफलता मिल जाए, सुबह जल्दी उठने (ब्रह्म मुहूर्त) और व्यायाम/ध्यान करने का नियम कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- समाज के प्रति उत्तरदायित्व (Charity): भगवान का गोदान हमें सिखाता है कि हमारी सफलता तभी सार्थक है जब हम समाज के गरीब, ज्ञानी और असमर्थ लोगों की खुले हाथों से मदद करें।
- कर्तव्य और आनंद का संतुलन (Work-Life Balance): सुधर्मा सभा में संगीत और राजनीति का एक साथ चलना यह बताता है कि काम (Profession) को बोझ नहीं, बल्कि आनंद समझकर करना चाहिए, और परिवार को पूरा समय देना चाहिए।

