भारत भूषण विद्यालंकार: वैदिक साहित्य के संपादन और प्रसार के प्रमुख स्तंभ
आर्य समाज और गुरुकुल परम्परा के वह समर्पित एवं मनीषी विद्वान, जिन्होंने जटिल वैदिक साहित्य को पुस्तकालयों की अलमारियों से निकालकर, प्रामाणिक संपादन और सरल भाषानुवाद के माध्यम से जन-सामान्य के हाथों तक पहुँचाने का ऐतिहासिक भगीरथ प्रयास किया।
- 1. प्रस्तावना: वैदिक पुनर्जागरण और 'संपादन' की महती आवश्यकता
- 2. गुरुकुलीय संस्कार: 'विद्यालंकार' उपाधि और स्वामी श्रद्धानन्द की प्रेरणा
- 3. वैदिक वाङ्मय का संपादन: अशुद्धियों का परिमार्जन और मानकीकरण
- 4. जटिलता से सरलता की ओर: वैदिक साहित्य का लोक-भाषीकरण
- 5. पत्रकारिता और जन-जागरण: वैदिक विचारों का प्रखर प्रसार (Prasar)
- 6. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लेखन: पाश्चात्य भ्रांतियों का खण्डन
- 7. आर्य समाज के प्रकाशन संस्थानों में योगदान
- 8. निष्कर्ष: आधुनिक वैदिक मुद्रण के मूक साधक
1. प्रस्तावना: वैदिक पुनर्जागरण और 'संपादन' की महती आवश्यकता
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा जिस 'वैदिक पुनर्जागरण' (Vedic Renaissance) का शंखनाद किया गया था, उसका सबसे बड़ा उद्देश्य वेदों को समाज के प्रत्येक वर्ग (चाहे वह स्त्री हो या शूद्र) तक पहुँचाना था। किन्तु इस महान उद्देश्य की प्राप्ति में एक बहुत बड़ी व्यावहारिक बाधा थी— 'प्रामाणिक और सुलभ मुद्रित ग्रंथों का अभाव'।
पांडुलिपियों (Manuscripts) में बिखरे पड़े वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों और स्वयं महर्षि दयानन्द के भाष्यों को एकत्र करना, उनकी प्रूफ-रीडिंग (Proof-reading) करना, अशुद्धियों को दूर करना और उन्हें आम जनता की समझ में आने वाली हिंदी में प्रस्तुत करना कोई साधारण कार्य नहीं था। इस नीरस, लेकिन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण 'संपादकीय यज्ञ' (Editorial Yagya) की आहुति बनने वाले मूर्धन्य विद्वानों में भारत भूषण विद्यालंकार का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने 'ज्ञान के सृजन' से अधिक 'ज्ञान के वितरण' (Dissemination of Knowledge) को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
| प्रसिद्ध नाम | भारत भूषण विद्यालंकार (Bharat Bhushan Vidyalankar) |
| अकादमिक उपाधि | 'विद्यालंकार' (गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च उपाधि) |
| वैचारिक परम्परा | आर्य समाज, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, आर्ष वैदिक पद्धति |
| मुख्य कार्य-क्षेत्र | वैदिक ग्रंथों का संपादन (Editing), अनुवाद, पत्रकारिता, और प्रकाशन |
| प्रमुख उद्देश्य | वैदिक साहित्य को रूढ़िवादी बंधनों से मुक्त कर आम जनमानस (Masses) तक पहुँचाना |
| संस्थागत सम्बद्धता | आर्य साहित्य मंडल, गुरुकुल के प्रकाशन विभाग एवं विभिन्न आर्य प्रतिनिधि सभाएं |
2. गुरुकुलीय संस्कार: 'विद्यालंकार' उपाधि और स्वामी श्रद्धानन्द की प्रेरणा
भारत भूषण जी के नाम के साथ जुड़ा 'विद्यालंकार' शब्द इस बात का प्रमाण है कि वे स्वामी श्रद्धानन्द जी द्वारा स्थापित 'गुरुकुल कांगड़ी' (हरिद्वार) की उस महान शिक्षा प्रणाली की उपज थे, जिसने भारत को सत्यकेतु विद्यालंकार, बुद्धदेव विद्यालंकार (मीमांसक) और जयचन्द्र विद्यालंकार जैसे रत्न दिए।
गुरुकुल के तपस्वी वातावरण में उन्होंने अष्टाध्यायी, निरुक्त, दर्शन और वेदों का सस्वर एवं अर्थ-सहित सांगोपांग अध्ययन किया। स्वामी श्रद्धानन्द जी का स्पष्ट निर्देश था कि "गुरुकुल के स्नातकों को केवल पंडित बनकर नहीं बैठना है, बल्कि उन्हें समाज में जाकर वैदिक धर्म का 'प्रचारक' और 'लेखक' बनना है।" भारत भूषण विद्यालंकार ने इसी आदेश को अपने जीवन का ध्येय वाक्य मान लिया और अपना पूरा जीवन लेखन, संपादन और वैदिक साहित्य के 'प्रसार' (Propagation) में खपा दिया।
3. वैदिक वाङ्मय का संपादन: अशुद्धियों का परिमार्जन और मानकीकरण
वैदिक संस्कृत में यदि एक 'स्वर' (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) की भी गलती हो जाए, तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। बीसवीं सदी के आरंभिक प्रेसों (Printing Presses) में संस्कृत की टाइपसेटिंग (Typesetting) अत्यंत कठिन कार्य था।
भारत भूषण विद्यालंकार ने महर्षि दयानन्द के 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' और 'सत्यार्थ प्रकाश' जैसे ग्रंथों के विभिन्न संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन किया।
उन्होंने प्रेस की अशुद्धियों (Typographical errors) को दूर किया, संस्कृत के कठिन श्लोकों की सन्धि-विच्छेद कर उन्हें पाठकों के लिए सुगम बनाया, और ग्रंथों के अंत में 'शब्द-सूचियाँ' (Indices) तथा 'पारिभाषिक शब्दावली' जोड़ी। उनके द्वारा संपादित संस्करणों को आर्य समाज के विद्वत-जगत में 'मानक संस्करण' (Standard Editions) का दर्जा प्राप्त हुआ।
4. जटिलता से सरलता की ओर: वैदिक साहित्य का लोक-भाषीकरण
वेद केवल विद्वानों की बौद्धिक विलासिता का साधन न रह जाएँ, इसके लिए भारत भूषण जी ने "लोक-भाषीकरण" (Popularization in common language) का बीड़ा उठाया।
(अर्थात्: इस कल्याणकारी वेदवाणी का उपदेश मैं सभी जनों के लिए करता हूँ।)
इस वैदिक आज्ञा का पालन करते हुए, उन्होंने उपनिषदों की कथाओं, ब्राह्मण ग्रंथों के आख्यानों और वैदिक सूक्तों (जैसे शिवसंकल्प सूक्त, पुरुष सूक्त, भूमि सूक्त) को अत्यंत सरल और प्रवाहमयी हिंदी भाषा में अनूदित किया। उन्होंने 'ट्रैक्ट्स' (Tracts) और छोटी-छोटी पुस्तिकाओं (Pamphlets) का संपादन किया, जिन्हें आर्य समाज के वार्षिकोत्सवों में न्यूनतम मूल्य पर या निःशुल्क वितरित किया जाता था। इससे एक सामान्य किसान या व्यापारी भी वैदिक ज्ञान को समझने में सक्षम हो सका।
5. पत्रकारिता और जन-जागरण: वैदिक विचारों का प्रखर प्रसार (Prasar)
भारत भूषण विद्यालंकार केवल पुस्तकों के संपादक नहीं थे, बल्कि वे एक प्रखर पत्रकार (Journalist) भी थे। आर्य समाज के 'प्रसार' (Missionary work) में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण रही है।
उन्होंने आर्य समाज के मुखपत्रों और गुरुकुल से निकलने वाली शोध-पत्रिकाओं में निरंतर सम्पादकीय (Editorials) और लेख लिखे।
उनके लेखों के मुख्य विषय होते थे:
1. समाज में व्याप्त छुआछूत और जन्मना जातिवाद का वेदों के आधार पर खण्डन।
2. नारी-शिक्षा के समर्थन में वैदिक प्रमाण प्रस्तुत करना।
3. युवाओं में राष्ट्र-प्रेम और ब्रह्मचर्य के संस्कारों का बीजारोपण करना।
उनकी लेखनी में महर्षि दयानन्द का 'ओज' और एक संपादक की 'सटीकता' दोनों विद्यमान थीं।
6. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लेखन: पाश्चात्य भ्रांतियों का खण्डन
औपनिवेशिक काल (Colonial Era) में ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय संस्कृति और इतिहास को अत्यंत हीन (Inferior) और अंधविश्वासी सिद्ध करने का कुत्सित प्रयास किया था। 'विद्यालंकार' परम्परा के अन्य विद्वानों (जैसे सत्यकेतु विद्यालंकार) की भाँति, भारत भूषण जी ने भी भारतीय संस्कृति और इतिहास के पुनर्लेखन में अपना योगदान दिया।
उन्होंने वेदों के आधार पर यह सिद्ध करने वाले लेखों का संपादन किया कि प्राचीन भारत में उन्नत लोकतंत्र (सभा और समिति), उत्कृष्ट पर्यावरण-विज्ञान, और वैज्ञानिक अर्थशास्त्र विद्यमान था। उन्होंने पाश्चात्य 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (Aryan Invasion Theory) की तार्किक आलोचनाओं को हिंदी जगत के पाठकों तक पहुँचाने का कार्य किया।
7. आर्य समाज के प्रकाशन संस्थानों में योगदान
वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए एक सुदृढ़ 'इन्फ्रास्ट्रक्चर' (Infrastructure) की आवश्यकता होती है। भारत भूषण विद्यालंकार ने आर्य साहित्य मंडल, सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, और गुरुकुल के प्रकाशन विभागों को अपनी अमूल्य सेवाएँ दीं।
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वैदिक साहित्य का मुद्रण उच्च कोटि का हो, कागज़ अच्छा हो, और फोंट (Font) स्पष्ट हो ताकि पढ़ने वाले की आँखों पर ज़ोर न पड़े। एक 'संपादक' के रूप में उनका यह मौन समर्पण था जिसने लाखों पाठकों को वेदों की ओर आकर्षित किया। उनके द्वारा तैयार की गई पाण्डुलिपियों (Press Copies) पर आँख मूंदकर विश्वास किया जा सकता था।
8. निष्कर्ष: आधुनिक वैदिक मुद्रण के मूक साधक
इतिहास अक्सर मंच पर भाषण देने वाले वक्ताओं को याद रखता है, परन्तु नेपथ्य (Backstage) में बैठकर रातों की नींद त्यागकर ग्रंथों के एक-एक अक्षर को सुधारने वाले 'संपादक' को भूल जाता है।
भारत भूषण विद्यालंकार उसी नेपथ्य के महान नायक थे। यदि महर्षि दयानन्द सरस्वती और उनके परवर्ती विद्वानों के ज्ञान को 'अमृत' मान लिया जाए, तो भारत भूषण विद्यालंकार जैसे संपादकों ने उस अमृत को बाँटने के लिए 'सुंदर और स्वच्छ कलश' (Printed Books) का निर्माण किया।
"वैदिक साहित्य का प्रसार"— यह केवल एक वाक्य नहीं है, यह उनके सम्पूर्ण जीवन की तपस्या है। आज भी जब हम आर्य समाज के किसी प्रमाणित और त्रुटि-रहित ग्रन्थ का अध्ययन करते हैं, तो कहीं न कहीं उस शुद्धता के पीछे भारत भूषण विद्यालंकार जैसे निष्काम कर्मयोगियों का पसीना और उनकी 'विद्यालंकार' मेधा कार्य कर रही होती है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- आर्य समाज का इतिहास - डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार (गुरुकुल के विद्वानों के संदर्भ)।
- गुरुकुल कांगड़ी के स्नातकों का योगदान (ऐतिहासिक अभिलेख)।
- आर्य साहित्य मंडल और सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा प्रकाशित विभिन्न संपादित ग्रंथ।
- वैदिक पत्रकारिता का इतिहास एवं आर्य समाज की पत्र-पत्रिकाएं।
