पं. गोपीनाथ कविराज: वैदिक तंत्र और आगम विद्या के रहस्यदर्शी शोधकर्ता | Pt. Gopinath Kaviraj

Sooraj Krishna Shastri
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पं. गोपीनाथ कविराज: वैदिक तंत्र और आगम विद्या के रहस्यदर्शी शोधकर्ता

पं. गोपीनाथ कविराज: वैदिक तंत्र और आगम विद्या के रहस्यदर्शी शोधकर्ता

पद्म विभूषण से अलंकृत आधुनिक भारत के वह महानतम दार्शनिक और तपस्वी विद्वान, जिन्होंने 'तंत्र' को जादू-टोने के कलंक से मुक्त कर उसे 'चेतना के विज्ञान' (Science of Consciousness) और वेदों के व्यावहारिक स्वरूप (आगम) के रूप में वैश्विक अकादमिक पटल पर पुनर्स्थापित किया।

1. प्रस्तावना: निगम (वेद) और आगम (तंत्र) का ऐतिहासिक द्वंद्व और समन्वय

भारतीय धर्म और दर्शन के दो मूल स्रोत माने गए हैं— 'निगम' (वेद) और 'आगम' (तंत्र शास्त्र)। मध्यकाल और ब्रिटिश युग में पाश्चात्य इतिहासकारों (और कुछ रूढ़िवादी भारतीय पंडितों) ने यह भ्रम फैला दिया था कि 'तंत्र' वेदों के विरुद्ध एक अश्लील, अंधविश्वासी और काले जादू (Black Magic) की परम्परा है।

इस घोर बौद्धिक पतन के युग में महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज का उदय एक बौद्धिक सूर्य के समान हुआ। उन्होंने अपने अगाध पाण्डित्य और स्वयं की आध्यात्मिक साधना (Yogic insight) के बल पर यह सिद्ध किया कि तंत्र कोई विकृति नहीं, बल्कि वेदों का ही 'प्रायोगिक और तकनीकी' (Applied and Technical) स्वरूप है। जहाँ वेद दर्शन (Theory) है, वहाँ आगम या तंत्र उस दर्शन को शरीर और चेतना में उतारने की 'प्रयोगशाला' (Laboratory) है।

📌 पं. गोपीनाथ कविराज: एक आध्यात्मिक एवं अकादमिक प्रोफाइल
पूरा नाम महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज (Pt. Gopinath Kaviraj)
काल निर्धारण 7 सितम्बर 1887 – 12 जून 1976
कर्मभूमि एवं पद वाराणसी (काशी) - पूर्व प्रधानाचार्य, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय (संपूर्णानंद संस्कृत वि.वि.)
आध्यात्मिक गुरु परमहंस स्वामी विशुद्धानन्द जी (सूर्य विज्ञान के प्रणेता)
मुख्य शोध क्षेत्र आगम शास्त्र, तंत्र विद्या, कश्मीर शैव दर्शन, योग-विज्ञान, शाक्त-दृष्टि
प्रमुख कृतियाँ तांत्रिक वाङ्मय में शाक्त-दृष्टि, भारतीय संस्कृति और साधना, Aspects of Indian Thought
राष्ट्रीय एवं वैश्विक सम्मान पद्म विभूषण (1964), साहित्य अकादेमी पुरस्कार, महामहोपाध्याय (1934)

2. जीवन और साधना: कलकत्ता से काशी की रहस्यमयी यात्रा

गोपीनाथ कविराज का जन्म 1887 में ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) के एक संभ्रांत बंगाली परिवार में हुआ था। उच्च शिक्षा के लिए वे वाराणसी (काशी) आ गए, जहाँ उन्होंने प्रसिद्ध प्राच्य-विद्वान डॉ. आर्थर वेनिस (Arthur Venis) और डॉ. गंगानाथ झा के मार्गदर्शन में राजकीय संस्कृत महाविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।

उनकी अकादमिक प्रतिभा इतनी प्रखर थी कि उन्होंने उसी महाविद्यालय (जो आज संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय है) के पुस्तकालयाध्यक्ष (Librarian) से लेकर 'प्रधानाचार्य' (Principal) तक का पद सुशोभित किया। परन्तु कविराज जी केवल पुस्तकों के कीड़े नहीं थे। 1918 में उनका संपर्क परमहंस स्वामी विशुद्धानन्द जी से हुआ, जिन्होंने उन्हें योग-दीक्षा दी। इस घटना ने कविराज जी के जीवन को पूरी तरह बदल दिया— वे एक 'अकादमिक रिसर्चर' से 'रहस्यदर्शी योगी' (Mystic Scholar) बन गए।

3. तंत्र विद्या का परिमार्जन: भ्रांतियों का खण्डन

कविराज जी का सबसे महान ऐतिहासिक कार्य 'तंत्र' (Tantra) को उसके विकृत स्वरूप (जैसे पंच-मकार—मद्य, मांस आदि के शाब्दिक और तामसिक अर्थ) से निकालकर उसे शुद्ध आध्यात्मिक धरातल पर प्रतिष्ठित करना था।

आगमो वेद एव च (आगम वेद ही है)

उन्होंने कुलार्णव तंत्र और अन्य आगम ग्रंथों का गहरा शोध किया और बताया कि 'तनोति विपुलान् अर्थान् तत्त्वमन्त्र-समन्वितान्' अर्थात् तंत्र वह है जो ज्ञान (तत्त्व) और ऊर्जा (मंत्र) का विस्तार करे।

कविराज जी ने स्पष्ट किया कि वैदिक यज्ञों में जो 'सोमरस' और 'पशु-बलि' का आलंकारिक वर्णन है, तंत्र में भी वही 'कुण्डलिनी' के जागरण और 'पशु-प्रवृत्तियों' (Animal instincts) की बलि के रूप में मौजूद है। तंत्र कोई 'वाममार्ग' (Left-hand path of indulgence) नहीं है, बल्कि वह 'महाविद्या' है जो भोग (Worldly experience) और मोक्ष (Liberation) दोनों को एक साथ संभव बनाती है।

4. कश्मीर शैव दर्शन और 'चित्-शक्ति' का विज्ञान

वेदांत दर्शन (आदि शंकराचार्य) में 'माया' को मिथ्या (Illusion) माना गया है और संसार को एक भ्रम कहा गया है। परन्तु पं. गोपीनाथ कविराज ने कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन / Pratyabhijna) को आधुनिक जगत के सामने पुनर्स्थापित कर एक नई दार्शनिक क्रान्ति ला दी।

"स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति"
(परम-शिव अपनी ही इच्छा से, अपने ही आधार पर इस विश्व का उन्मीलन करते हैं।)

कविराज जी ने अभिनवगुप्त और क्षेमराज के ग्रंथों का सम्पादन कर स्पष्ट किया कि आगम दर्शन (Tantra) संसार को मिथ्या नहीं मानता। यह संसार भगवान शिव की 'चित्-शक्ति' (Consciousness Energy) का ही एक 'स्पंद' (Vibration) है। संसार माया नहीं, बल्कि ईश्वर का 'विमर्श' (Self-reflection) और उसकी 'क्रीड़ा' (Divine Play) है। यह दृष्टि आधुनिक 'क्वांटम भौतिकी' (Quantum Physics) के उस सिद्धांत के बहुत निकट है जो पूरे ब्रह्माण्ड को एक स्पंदित ऊर्जा (Vibrating Energy Field) मानता है।

5. नाद, बिंदु और कला: तांत्रिक ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology)

कविराज जी ने "तांत्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि" ग्रन्थ में 'श्रीविद्या' (Sri Vidya) और 'श्री यंत्र' (Sri Yantra) के वैज्ञानिक रहस्यों को खोला।

सृष्टि-प्रक्रिया का तांत्रिक मॉडल

उन्होंने बताया कि वेद का 'ओ३म्' (Om) तंत्र में 'नाद' (Sound/Vibration) और 'बिंदु' (Concentrated point of energy) के रूप में परिभाषित किया गया है।

जब शिव (शुद्ध चेतना) और शक्ति (क्रियाशील ऊर्जा) का मिलन होता है, तो 'बिंदु' में स्फोट (Big Bang) होता है, जिससे नाद (ध्वनि) और कला (पदार्थ/Matter) की उत्पत्ति होती है। यह 'षट्चक्र' (Six Chakras) और मानव शरीर की 'नाड़ियों' (Energy channels) में उसी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का सूक्ष्म रूप है।

6. 'अखंड महायोग': कविराज जी का मौलिक दार्शनिक अवदान

गोपीनाथ कविराज केवल प्राचीन ग्रंथों के टीकाकार नहीं थे; वे स्वयं एक युगद्रष्टा थे। उन्होंने महर्षि अरविन्द (Sri Aurobindo) के अतिमानस (Supramental descent) के सिद्धांत के समानांतर अपना एक स्वतंत्र योग-दर्शन प्रस्तुत किया, जिसे 'अखंड महायोग' (Akhanda Mahayoga) कहा जाता है।

  • समष्टिगत मोक्ष (Universal Liberation): पारंपरिक योग में व्यक्ति अपनी समाधि लगाकर 'व्यक्तिगत मोक्ष' प्राप्त कर लेता है और संसार के दुखों से मुक्त हो जाता है। कविराज जी ने कहा कि यह 'खंडित योग' है। जब तक संसार का एक भी प्राणी दुखी और अज्ञानी है, तब तक पूर्ण मोक्ष संभव नहीं।
  • परा-शक्ति का अवतरण: अखंड महायोग का उद्देश्य व्यक्तिगत समाधि नहीं, बल्कि 'परा-शक्ति' (Supreme Divine Energy) को भौतिक शरीर और समाज के स्तर पर 'अवतरित' (Descend) करना है, ताकि मृत्यु, रोग और अज्ञान का हमेशा के लिए नाश हो सके।

7. स्वामी विशुद्धानंद और 'सूर्य विज्ञान' (Solar Science) का प्रभाव

कविराज जी के शोध में एक अत्यंत रहस्यमयी और विज्ञान-सम्मत अध्याय 'सूर्य विज्ञान' (Surya Vigyan) का है। उनके गुरु स्वामी विशुद्धानंद (जिन्हें गंध-बाबा भी कहा जाता था) सूर्य की किरणों को विशेष 'लेंस' या यौगिक शक्ति से केंद्रित करके एक भौतिक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में (जैसे रुई को फूल में) बदल देते थे।

एक प्रकांड वैज्ञानिक मेधा वाले कविराज जी ने वर्षों तक इन यौगिक चमत्कारों का निकट से अवलोकन किया और अपनी डायरियों में इसका दस्तावेज़ीकरण किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई 'जादू' नहीं है, बल्कि यह प्राचीन सौर-विज्ञान (Solar Science) है, जहाँ यौगिक चेतना द्वारा 'परमाणुओं की संरचना' (Atomic structure) को सूर्य-रश्मियों की सहायता से पुनर्व्यवस्थित (Re-arranged) किया जाता है।

8. प्रमुख साहित्यिक अवदान एवं 'तंत्रिका वाङ्मय'

पंडित गोपीनाथ कविराज ने संस्कृत, हिंदी, बंगाली और अंग्रेजी में 70 से अधिक अमूल्य ग्रंथों की रचना और संपादन किया:

  • भारतीय संस्कृति और साधना (भाग 1 और 2): भारतीय दर्शन, तंत्र और योग का विश्वकोश।
  • तांत्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि: शाक्त दर्शन और त्रिपुर-सुंदरी विद्या की दार्शनिक मीमांसा।
  • Aspects of Indian Thought: पाश्चात्य पाठकों के लिए भारतीय दर्शन के गूढ़ रहस्यों का अंग्रेजी में स्पष्टीकरण।
  • सरस्वती भवन टेक्स्ट सीरीज़ (Saraswati Bhavan Texts): काशी में रहते हुए उन्होंने तंत्र, न्याय और वेदांत के दर्जनों दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियों का संपादन और प्रकाशन करवाया।

9. निष्कर्ष: प्राच्य-विद्या और योग-विज्ञान के अमर सेतु-निर्माता

महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज (1887–1976) की मेधा किसी एक विश्वविद्यालय या सम्प्रदाय की सीमाओं में नहीं बँध सकती। भारत सरकार द्वारा 1964 में उन्हें दिया गया 'पद्म विभूषण' (Padma Vibhushan) उनके असीम ज्ञान के समक्ष केवल एक लौकिक अभिवादन था।

उन्होंने एक ऐसे युग में 'तंत्र' और 'आगम' की वैज्ञानिकता को सिद्ध किया, जब अधिकांश शिक्षित वर्ग इसे अन्धविश्वास मानता था। उन्होंने वैदिक निगम और तांत्रिक आगम को एक ही 'दिव्य-चेतना' के दो पंख सिद्ध किया। जब भी भविष्य का विज्ञान 'पदार्थ' (Matter) और 'चेतना' (Consciousness) के मिलन-बिंदु (Quantum Mysticism) की खोज करेगा, तो उसे पं. गोपीनाथ कविराज के 'अखंड महायोग' और 'स्पंद-शास्त्र' के ग्रंथों में अपने सभी उत्तर मिल जाएंगे। वे आधुनिक भारत के सच्चे ज्ञान-योगी और तंत्र-शास्त्र के अमर पुरोधा थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • भारतीय संस्कृति और साधना (खण्ड १-२) - पं. गोपीनाथ कविराज (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना)।
  • तांत्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि - पं. गोपीनाथ कविराज।
  • Aspects of Indian Thought - Gopinath Kaviraj (University of Burdwan).
  • सूर्य विज्ञान और योग-साधना - स्वामी विशुद्धानन्द प्रसंग।
  • 'सरस्वती सुषमा' (Saraswati Sushama) - सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के शोध जर्नल।

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