श्रीमद्भागवत महापुराण के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सम्पूर्ण ब्रह्मांड अपनी सांसें रोककर उस घटना का साक्षी बनता है। द्वापर युग में एक ऐसा ही महाप्रसंग तब आया जब भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण और देवाधिदेव महादेव शिव, युद्धभूमि में एक-दूसरे के सामने अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो गए। यह युद्ध किसी साधारण शत्रुता का परिणाम नहीं था, बल्कि यह 'भक्त-वत्सलता' (भक्त के प्रति प्रेम और कर्तव्य) की सर्वोच्च परीक्षा थी। एक ओर भगवान शिव अपने परम भक्त बाणासुर की रक्षा के लिए वचनबद्ध थे, तो दूसरी ओर भगवान श्रीकृष्ण अपने पौत्र अनिरुद्ध और अपने भक्तों के कल्याण के लिए धर्मयुद्ध पर निकले थे। आइए, इस रोंगटे खड़े कर देने वाले 'हरि-हर महासंग्राम' और उसके बाद हुए अलौकिक 'मिलन' की कथा में प्रवेश करें।
प्रह्लाद जी के वंश में, महादानी राजा बलि के यहाँ एक पुत्र हुआ जिसका नाम था— बाणासुर। बाणासुर भगवान शिव का परम भक्त था। उसकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे एक हजार भुजाएं (सहस्त्रबाहु) प्रदान की थीं और उसे यह वरदान दिया था कि वे स्वयं अपने गणों के साथ उसके नगर 'शोणितपुर' की रक्षा करेंगे।
भगवान शिव के संरक्षण और अपनी हजार भुजाओं के बल से बाणासुर अत्यंत अहंकारी हो गया था। उसने तीनों लोकों के राजाओं को जीत लिया था। उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि एक दिन वह भगवान शिव के पास कैलाश गया और बोला— "हे प्रभु! आपने मुझे ये हजार भुजाएं तो दे दीं, लेकिन इनसे लड़ने वाला मुझे कोई मिलता ही नहीं। मेरी भुजाओं में खुजली होती है। मुझे कोई मेरे योग्य प्रतिद्वंद्वी चाहिए।"
अपने भक्त की यह मूर्खतापूर्ण और अहंकारी बात सुनकर भगवान शिव को क्रोध आया, परंतु उन्होंने शांत भाव से कहा— "अरे मूर्ख! जिस दिन तेरे महल की ध्वजा टूटकर गिर जाएगी, उस दिन समझ लेना कि तेरा गर्व चूर्ण करने वाला कोई योद्धा आ गया है।"
बाणासुर की एक परम सुंदरी कन्या थी, जिसका नाम था— ऊषा। एक रात ऊषा ने स्वप्न में एक अत्यंत सुंदर और श्यामवर्ण के राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। वह राजकुमार कोई और नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र और प्रद्युम्न जी के पुत्र 'अनिरुद्ध' थे।
ऊषा की सखी 'चित्रलेखा' एक सिद्ध योगिनी थी। उसने अपनी योगमाया से यह जान लिया कि ऊषा ने स्वप्न में अनिरुद्ध को देखा है। चित्रलेखा उसी रात आकाशमार्ग से द्वारका गई और सोते हुए अनिरुद्ध को पलंग सहित उठाकर शोणितपुर ले आई। बाणासुर के अंतःपुर में अनिरुद्ध और ऊषा गंधर्व विवाह करके गुप्त रूप से रहने लगे।
कुछ समय बाद, जब बाणासुर को इस बात का पता चला कि एक यदुवंशी राजकुमार उसकी पुत्री के साथ उसके महल में छिपा है, तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। उसने अनिरुद्ध को पकड़ने के लिए अपनी सेना भेजी। अकेले अनिरुद्ध ने बाणासुर की सेना का संहार कर दिया। अंत में, बाणासुर स्वयं आया और उसने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करके अनिरुद्ध को 'नागपाश' (सांपों के बंधन) में बांधकर बंदीगृह में डाल दिया।
इधर, द्वारका में अनिरुद्ध के गायब होने से कोहराम मच गया। चार महीने बीत गए। तब देवर्षि नारद ने आकर भगवान श्रीकृष्ण को पूरी घटना बताई कि अनिरुद्ध को बाणासुर ने शोणितपुर में बंदी बना रखा है।
यह समाचार सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण, बलराम जी और प्रद्युम्न जी ने यदुवंशियों की विशाल सेना के साथ शोणितपुर पर चढ़ाई कर दी। भगवान गरुड़ पर सवार होकर बाणासुर की राजधानी पहुँचे। उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से नगर के बाहरी परकोटे और फाटकों को चूर-चूर कर दिया।
जब बाणासुर को श्रीकृष्ण के आक्रमण का पता चला, तो वह अपनी विशाल असुर सेना लेकर नगर से बाहर निकला। और तभी वह क्षण आया जिसका पूरा ब्रह्मांड भय और विस्मय के साथ इंतजार कर रहा था।
दो परम शक्तियों के बीच ऐसा भयंकर युद्ध छिड़ गया जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। जब भगवान शिव ने अपना पिनाक धनुष टंकारा, तो दिशाएं कांप उठीं। उन्होंने श्रीकृष्ण पर भयानक अस्त्र चलाए, जिनका उत्तर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने तीखे बाणों से दिया।
शिवजी ने 'ब्रह्मास्त्र' चलाया, तो श्रीकृष्ण ने भी 'ब्रह्मास्त्र' से उसे शांत किया। शिवजी ने 'वायव्यास्त्र' छोड़ा, तो श्रीकृष्ण ने 'पर्वतास्त्र' से उसे रोका। शिवजी के 'पाशुपतास्त्र' के सामने श्रीकृष्ण ने अपना 'नारायणास्त्र' खड़ा कर दिया।
इस युद्ध का सबसे रोमांचक और दार्शनिक पहलू था— 'ज्वर' (Fever) का युद्ध। भगवान शिव ने अपना सबसे भयानक 'माहेश्वर-ज्वर' (अत्यधिक ताप पैदा करने वाली शक्ति) श्रीकृष्ण की ओर छोड़ा। उससे तीनों लोक जलने लगे। इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना 'वैष्णव-ज्वर' (शीतल शक्ति) छोड़ा।
जब ये दोनों 'ज्वर' आपस में टकराए, तो शिवजी का माहेश्वर-ज्वर, वैष्णव-ज्वर के सामने टिक नहीं पाया और वह भयभीत होकर चिल्लाने लगा। अंत में, माहेश्वर-ज्वर ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण ली।
विश्वोत्पत्तिलयस्थित्यान् भासते तं नमाम्यहम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.63.26)
भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उस ज्वर को अभयदान दिया और कहा— "जाओ, आज से तुम्हें मेरे भक्तों से कोई भय नहीं होगा।" इस प्रकार, इस धर्मयुद्ध में 'हरि' की शक्ति की विजय हुई।
जब भगवान शिव युद्ध से विरत हो गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर की ओर रुख किया। बाणासुर अपनी हजार भुजाओं में पांच सौ धनुष लेकर एक साथ बाणों की वर्षा करने लगा। भगवान श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में उसके सारे धनुष काट डाले।
अंत में, भगवान ने अपना अमोघ 'सुदर्शन चक्र' चलाया। सूर्य के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र ने बाणासुर की भुजाओं को वैसे ही काटना शुरू कर दिया जैसे माली पेड़ की फालतू शाखाओं को काटता है। देखते ही देखते बाणासुर की भुजाएं कटकर गिरने लगीं और वह रक्तरंजित हो गया।
जब बाणासुर की केवल चार भुजाएं शेष रह गईं और सुदर्शन चक्र उसका सिर काटने के लिए बढ़ा, तब अपने भक्त की आसन्न मृत्यु देखकर करुणासागर भगवान शिव पुनः बीच में आ गए। लेकिन इस बार वे युद्ध करने नहीं, बल्कि प्रार्थना करने आए थे।
यही वह क्षण था जब 'हरि' और 'हर' का मिलन हुआ। भगवान शिव ने भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप को पहचानते हुए उनकी अत्यंत गूढ़ और वेदांत-परक स्तुति की:
यं पश्यन्त्यमलात्मान आकाशमिव केवलम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.63.34)
भगवान शिव की प्रार्थना सुनकर, श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र वापस बुला लिया। उन्होंने शिवजी से कहा— "हे महादेव! आपने जो कहा है, मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा। यह बाणासुर प्रह्लाद के वंश का है, और मैंने प्रह्लाद को वचन दिया था कि मैं उसके वंशजों का वध नहीं करूँगा। मैंने इसकी भुजाएं केवल इसका अहंकार तोड़ने के लिए काटी हैं।"
भगवान ने बाणासुर से कहा— "तुम्हारी ये बची हुई चार भुजाएं अजर-अमर रहेंगी। आज से तुम भगवान शिव के पार्षद (गण) बनकर निर्भय होकर विचरण करो।"
बाणासुर का अहंकार पूरी तरह नष्ट हो चुका था। उसने भगवान श्रीकृष्ण और शिवजी को साष्टांग प्रणाम किया। उसने अपनी पुत्री ऊषा और अनिरुद्ध को रथ में बैठाया और विदा किया। भगवान श्रीकृष्ण नवदम्पति को लेकर द्वारका लौटे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ।

