Jarasandha Vadh Katha: 20,800 Rajaon Ki Mukti Aur Bhim Ka Parakram

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

जरासंध वध और 20,800 बंदी राजाओं की मुक्ति: धर्म की महाविजय और भीम का पराक्रम

श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध) एवं महाभारत (सभा पर्व) पर आधारित

द्वापर युग के अंतिम चरण में, जब धर्म के पांव डगमगा रहे थे, तब पृथ्वी पर कंस, शिशुपाल, दन्तवक्त्र और पौण्ड्रक जैसे अनेकों अत्याचारी राजाओं का भार बढ़ गया था। परंतु इन सबमें जो सबसे शक्तिशाली, क्रूर और अजेय माना जाता था, वह था मगध का सम्राट— जरासंध। वह केवल एक राजा नहीं था, बल्कि अधर्म का एक विशाल पर्वत था, जिसके भय से बड़े-बड़े शूरवीर भी कांपते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारने के लिए कई असुरों का वध किया, लेकिन जरासंध का वध एक विशेष योजना और रणनीति की मांग करता था। यह कथा केवल एक मल्ल-युद्ध की नहीं, बल्कि 'बाहुबल' पर 'बुद्धिबल' और 'अधर्म' पर 'धर्म' की विजय की महागाथा है, जिसके परिणामस्वरूप 20,800 निर्दोष राजाओं को नरक तुल्य कारावास से मुक्ति मिली।

1. जरासंध: जन्म का रहस्य और अजेय शक्ति

जरासंध के वध की योजना बनाने से पहले यह जानना आवश्यक है कि वह इतना शक्तिशाली और अजेय क्यों था? उसके जन्म की कथा अत्यंत विचित्र है। मगधराज बृहद्रथ की दो पत्नियां थीं, परंतु वे निःसंतान थे। ऋषि चण्डकौशिक की कृपा से उन्हें एक अभिमंत्रित आम का फल मिला। राजा ने उस फल के दो टुकड़े करके अपनी दोनों रानियों को खिला दिए।

समय आने पर दोनों रानियों ने शिशु के आधे-आधे शरीर को जन्म दिया। भयभीत होकर रानियों ने वे टुकड़े बाहर फेंक दिए। उसी समय 'जरा' नाम की एक राक्षसी वहाँ से गुजरी। उसने खेल-खेल में उन दोनों टुकड़ों को जोड़ दिया। जुड़ते ही वह बालक वज्र के समान कठोर हो गया और जोर से रोने लगा। 'जरा' राक्षसी द्वारा संधित (जोड़े जाने) के कारण उसका नाम 'जरासंध' पड़ा।

शक्ति का स्रोत: जरासंध को भगवान शिव का परम भक्त माना जाता था। उसे वरदान था कि साधारण युद्ध में उसे कोई परास्त नहीं कर सकता। उसके पास अक्षौहिणी सेनाओं का विशाल भंडार था। उसने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया था, यद्यपि हर बार श्रीकृष्ण और बलराम जी ने उसकी सेना नष्ट कर दी, फिर भी वह जीवित बच जाता था।
2. राजसूय यज्ञ में बाधा और उद्धव जी की नीति

इधर, इंद्रप्रस्थ में धर्मराज युधिष्ठिर 'राजसूय यज्ञ' करने का विचार कर रहे थे, जिससे वे चक्रवर्ती सम्राट बन सकें। परंतु देवर्षि नारद और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि जब तक मगधराज जरासंध जीवित है, तब तक राजसूय यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता।

जरासंध ने प्रतिज्ञा की थी कि वह 100 राजाओं की बलि भगवान शिव (भैरव रूप) को चढ़ाएगा। उसने 86 राजाओं को पकड़कर गिरिव्रज (मगध की राजधानी) के पहाड़ी किले में कैद कर रखा था और 14 राजाओं की तलाश में था। यदि उसे रोका नहीं गया, तो वह अनर्थ कर देगा।

समस्या यह थी कि जरासंध को सेना लेकर हराना असंभव था, क्योंकि इससे व्यर्थ में लाखों सैनिकों का रक्तपात होता। तब भगवान श्रीकृष्ण के परम ज्ञानी मंत्री और सखा, उद्धव जी ने एक अद्भुत नीति सुझाई— "शत्रु को उसी के घर में घुसकर, उसकी कमजोरी का लाभ उठाकर मारना चाहिए। जरासंध ब्राह्मणों का बहुत आदर करता है और उन्हें मुंहमांगा दान देता है। हमें इसी का लाभ उठाना चाहिए।"

3. ब्राह्मण वेश में मगध प्रवेश और भिक्षा की मांग

उद्धव जी की नीति के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन ने 'स्नातक ब्राह्मणों' का वेश धारण किया। उनके शरीरों पर भस्म रमी थी, हाथों में कुश और कमंडल थे, परंतु उनकी भुजाओं पर धनुष की प्रत्यंचा के कठोर निशान और उनकी चाल क्षत्रियों वाली थी।

तीनों वीर मगध की अभेद्य राजधानी गिरिव्रज पहुँचे। जरासंध उस समय ब्राह्मणों को दान दे रहा था। तीनों ने जाकर उससे याचना की। जरासंध उनकी कद-काठी और तेज देखकर समझ गया कि ये साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि कोई क्षत्रिय हैं। फिर भी, अपने व्रत के कारण उसने कहा— "हे विप्रवरों! आप जो मांगेंगे, मैं वह दूंगा, चाहे वह मेरा राज्य हो या मेरे प्राण।"

॥ श्रीकृष्ण की चुनौती ॥
युद्धं नो देहि राजेन्द्र द्वंद्वशो यदि मन्यसे ।
युद्धार्थिनो वयं प्राप्ता राजन् नान्येन नः प्रयोजनम् ॥
(महाभारत, सभा पर्व)
अर्थ: ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण ने कहा— "हे राजेन्द्र! यदि आप उचित समझें तो हमें 'द्वंद्व युद्ध' (कुश्ती/मल्ल-युद्ध) की भिक्षा दीजिये। हम युद्ध के प्रार्थी होकर यहाँ आए हैं, हमें अन्न-धन या किसी अन्य वस्तु का प्रयोजन नहीं है।"

यह सुनते ही जरासंध जोर से हँसा। उसने कहा— "मूर्खों! यदि तुम्हें मरना ही है, तो मैं यह भिक्षा भी देता हूँ।" भगवान श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया। जरासंध ने कृष्ण को 'ग्वाला' कहकर और अर्जुन को 'छोटा' कहकर युद्ध के अयोग्य बताया। उसने भीमसेन को अपने समान बलशाली मानकर युद्ध के लिए चुना।

4. सत्ताइस दिनों का महाभीषण मल्ल-युद्ध

मगध के अखाड़े में दो पर्वतों के टकराने के समान भीम और जरासंध का भयानक मल्ल-युद्ध (कुश्ती) आरंभ हुआ। दोनों ही अतुलनीय बलशाली थे। वे एक-दूसरे को घूंसे मारते, पटकते और सिंह जैसी गर्जना करते।

यह युद्ध एक या दो दिन नहीं, बल्कि लगातार 27 दिनों तक चलता रहा। दिन भर वे युद्ध करते और रात को जरासंध धर्मपूर्वक अपने शत्रुओं (कृष्ण, भीम, अर्जुन) का अतिथि सत्कार करता। 27वें दिन भीमसेन थकने लगे। जरासंध की शक्ति क्षीण नहीं हो रही थी। भीमसेन निराश होकर श्रीकृष्ण की ओर देखने लगे।

श्रीकृष्ण का संकेत (जन्म का रहस्य): भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि जरासंध 'जरा' राक्षसी द्वारा जोड़ा गया है, इसलिए उसे साधारण प्रहारों से नहीं मारा जा सकता। उसे मारने का एक ही उपाय है— उसके शरीर को बीच से फाड़कर अलग कर देना।

भीमसेन को संकेत देने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण ने जमीन से एक तिनका (या वृक्ष की एक पत्ती) उठाई और जरासंध के सामने ही उसे बीच से चीरकर दो टुकड़े कर दिए और उन टुकड़ों को विपरीत दिशाओं में फेंक दिया।

5. जरासंध का वध और अहंकार का अंत

वायुपुत्र भीमसेन भगवान का संकेत समझ गए। उनमें नए उत्साह और बल का संचार हुआ। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति बटोरकर जरासंध को जमीन पर पटक दिया। भीमसेन ने जरासंध का एक पैर अपने पैर के नीचे दबाया और दूसरा पैर अपने हाथों से पकड़ लिया।

जैसे कोई मदमस्त हाथी पेड़ की शाखा को चीर डालता है, वैसे ही भीमसेन ने भयानक गर्जना करते हुए जरासंध के शरीर को बीचोंबीच से चीरकर दो टुकड़े कर दिए। भीम ने समझदारी दिखाते हुए (कृष्ण के संकेत अनुसार) जरासंध के दायें हिस्से को बाईं ओर और बाएं हिस्से को दाईं ओर फेंक दिया, ताकि 'जरा' राक्षसी की विद्या से वे टुकड़े फिर से जुड़ न सकें।

इस प्रकार, पृथ्वी के सबसे बड़े आततायी जरासंध का अंत हुआ। मगध की जनता ने हर्षध्वनि की और देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की।

6. 20,800 बंदी राजाओं की करुण पुकार और मुक्ति

जरासंध के वध के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन गिरिव्रज के उस भयानक पहाड़ी कारागार की ओर बढ़े, जहाँ जरासंध ने राजाओं को कैद कर रखा था। भागवत के अनुसार उन राजाओं की संख्या 20,800 थी (महाभारत में 86 का उल्लेख है, यह कल्प भेद हो सकता है)।

जब भगवान ने कारागार का द्वार खोला, तो भीतर का दृश्य अत्यंत हृदयविदारक था। वे राजा, जो कभी महलों में रहते थे, अब धूल-धूसरित, जटाधारी, हड्डियों के ढांचे मात्र रह गए थे। भूख-प्यास और भय ने उनकी राजसी कांति छीन ली थी।

जैसे ही उन राजाओं ने सामने साक्षात परब्रह्म श्रीकृष्ण को देखा, उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वे लड़खड़ाते हुए आए और भगवान के चरणों में गिर पड़े। उनकी आँखों से अविरल आंसुओं की धारा बहने लगी। उन्होंने गद्गद कंठ से भगवान की स्तुति की:

॥ बंदी राजाओं की स्तुति ॥
नमस्ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराव्यय ।
प्रपन्नान् पाहि नः कृष्ण निर्विण्णा न्घोरसंसृतेः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.73.8)
अर्थ: राजाओं ने प्रार्थना की— "हे देवाधिदेव! हे शरणागतों के दुःख हरने वाले अविनाशी प्रभु! आपको हमारा नमस्कार है। हे कृष्ण! हम इस घोर संसार-चक्र और जरासंध के भय से उबकर आपकी शरण में आए हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये, हमारा उद्धार कीजिये।"

करुणावरुणालय भगवान श्रीकृष्ण ने उन सभी राजाओं को उठाया और सांत्वना दी। भगवान ने तत्काल उन्हें मुक्त किया। उन्होंने जरासंध के पुत्र सहदेव को बुलाकर मगध के सिंहासन पर बैठाया और उसे आदेश दिया कि इन सभी राजाओं का यथोचित सत्कार करके, नए वस्त्र-आभूषण देकर ससम्मान इनके राज्यों में भेजा जाए।

कथा का सार: दीनबन्धु श्रीकृष्ण

यह लीला सिद्ध करती है कि भगवान श्रीकृष्ण केवल अर्जुन जैसे महारथियों के ही सखा नहीं हैं, बल्कि वे उन असहायों और दीनों के भी रक्षक हैं जिनका संसार में कोई नहीं होता। जरासंध का वध बाहुबल की विजय थी, और राजाओं की मुक्ति भगवान की असीम करुणा की विजय थी। जिन राजाओं का अहंकार कारागार के अंधेरे में गल चुका था, उन्हें भगवान ने अपनी भक्ति का दिव्य प्रकाश प्रदान किया।

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