Rukmini Krishna Samvad: Pranaya Kalah Aur Haasya Vinod Katha

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

रुक्मिणी जी के साथ हास्य-विनोद (प्रणय-कलह): प्रेम की अलौकिक परीक्षा और वेदान्त

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 60)

संसार में दांपत्य जीवन (पति-पत्नी का संबंध) हास्य, परिहास और नोंकझोंक के बिना अधूरा माना जाता है। किंतु जब साक्षात जगतपति भगवान श्रीकृष्ण और जगतजननी रुक्मिणी (लक्ष्मी जी) एकांत में परिहास (मजाक) करते हैं, तो उस विनोद में भी उपनिषदों का सर्वोच्च ज्ञान और असीम प्रेम छिपा होता है। श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग 'प्रणय-कलह' (प्रेम का झगड़ा) के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी सबसे प्रिय पटरानी रुक्मिणी जी के प्रेम की गहराई नापने के लिए ऐसे व्यंग्य-बाण छोड़े, जिन्हें सुनकर रुक्मिणी जी मूर्छित हो गईं। किंतु जब उन्होंने होश में आकर भगवान को उत्तर दिया, तो वह उत्तर भारतीय दर्शन का एक अनमोल रत्न बन गया।

1. रुक्मिणी जी के महल का दिव्य एकांत

द्वारका में महारानी रुक्मिणी जी का महल अत्यंत भव्य था। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी पटरानी रुक्मिणी जी के शयनकक्ष में पधारे। वह कक्ष मोतियों की झालरों, कल्पवृक्ष के फूलों और दिव्य सुगंधियों से महक रहा था। भगवान एक अत्यंत सुंदर और कोमल शय्या पर विश्राम कर रहे थे।

रुक्मिणी जी भगवान की सेवा में तत्पर थीं। उन्होंने अपनी सखियों के हाथ से चंवर (पंखा) ले लिया और स्वयं अपने कोमल हाथों से त्रिभुवनपति स्वामी को हवा करने लगीं। रुक्मिणी जी के रूप और सौंदर्य की कोई सीमा नहीं थी। उनके नूपुरों (पायलों) की रुनझुन और उनके मुखमंडल का तेज उस कक्ष को प्रकाशित कर रहा था। भगवान अपनी अर्धांगिनी को इतने प्रेम और निष्ठा से सेवा करते देख अत्यंत प्रसन्न हुए। अचानक, भगवान के मन में अपनी परम शांत और गंभीर पत्नी से हास्य-विनोद (मजाक) करने की इच्छा जागृत हुई।

2. भगवान श्रीकृष्ण के व्यंग्य-बाण (हास्य-विनोद)

भगवान श्रीकृष्ण ने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए महारानी रुक्मिणी की ओर देखा और अत्यंत गंभीर स्वर में कहा— "हे राजकुमारी! तुम तो विदर्भ देश के महान राजा भीष्मक की पुत्री हो। जब तुम्हारे विवाह का समय आया था, तब शिशुपाल, जरासंध, और शाल्व जैसे महान, बलशाली और ऐश्वर्यवान राजा तुम्हें प्राप्त करना चाहते थे। तुम्हारा भाई रुक्मी भी यही चाहता था।"

भगवान ने आगे कहा— "हे कल्याणी! तुमने उन महान और वैभवशाली राजाओं को छोड़कर मुझ जैसे व्यक्ति को क्यों चुन लिया? मैं तो उनके डर से मथुरा छोड़कर समुद्र के भीतर एक किला बनाकर छिपकर बैठा हूँ। तुमने मुझमें ऐसा क्या देखा?"

॥ भगवान का परिहास ॥
निष्किञ्चना वयं शश्वन्निष्किञ्चनजनप्रियाः ।
तस्मात् प्रायेण न त्वाढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे ॥
(श्रीमद्भागवत 10.60.14)
अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं— "हे सुंदरी! हम तो 'निष्किंचन' (गरीब/जिनके पास कुछ नहीं) हैं और जो निष्किंचन होते हैं, वे ही हमें प्रिय हैं। इसलिए जो लोग धनवान, रूपवान और बलवान होते हैं, वे प्रायः मेरी भक्ति नहीं करते। मुझ जैसे निर्धन का तुमने वरण क्यों किया?"

भगवान यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा— "भिक्षुकों और तपस्वियों को तो मेरा आचरण पसंद आता है, लेकिन राजाओं को नहीं। विवाह तो समान कुल, समान धन और समान रूप वालों में होना चाहिए। तुमने मुझे बिना सोचे-समझे, शायद नासमझी में अपना पति मान लिया है। हे सुंदरी! यदि तुम चाहो तो अब भी कोई भूल नहीं हुई है, तुम अपने योग्य किसी क्षत्रिय राजकुमार का वरण कर सकती हो। मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ।"

3. रुक्मिणी जी की मूर्छा और भगवान की व्याकुलता

भगवान तो केवल परिहास (मजाक) कर रहे थे, ताकि वे अपनी प्रियतमा के क्रोधित होने पर भृकुटियों के तनने का सौंदर्य देख सकें। लेकिन रुक्मिणी जी, जो साक्षात प्रेम की मूर्ति थीं, वे इस परिहास को समझ नहीं पाईं। उनके लिए 'श्रीकृष्ण' से अलग होने की कल्पना ही मृत्यु के समान थी।

भगवान के ये कठोर वचन सुनकर रुक्मिणी जी का हृदय फटने लगा। उनकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उनके हाथों से रत्नों जड़ित चंवर छूटकर गिर पड़ा। उनका शरीर कांपने लगा और देखते ही देखते वे एक कटे हुए केले के पेड़ की भांति बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ीं। उनकी यह दशा देखकर कि 'मेरे स्वामी मुझे छोड़ने की बात कर रहे हैं', उनके प्राण कंठ में आ गए।

भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि उनका मजाक इतना भारी पड़ गया है, तो वे तुरंत अपने पलंग से कूद पड़े। करुणासागर भगवान ने अपनी चार भुजाओं से रुक्मिणी जी को धरती से उठाया, उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। उन्होंने अपने पीतांबर से रुक्मिणी जी का मुख पोंछा, उनके बाल संवारे और उन्हें प्रेम से सहलाते हुए सांत्वना देने लगे।

भगवान ने कहा— "हे प्रिये! हे विदर्भनंदिनी! तुम तो व्यर्थ ही घबरा गईं। मैं तो केवल तुम्हारे साथ मजाक कर रहा था। मैं जानता हूँ कि तुम मुझसे कितना प्रेम करती हो। मैं तो बस तुम्हारा प्रेम में रुठा हुआ मुख और तिरछी नजरें देखना चाहता था। गृहस्थ आश्रम में अपनी पत्नी के साथ इस प्रकार का परिहास ही तो सबसे बड़ा सुख है।"

4. रुक्मिणी जी का गूढ़ और दार्शनिक उत्तर

भगवान श्रीकृष्ण के स्पर्श और प्रेम-भरे वचनों से रुक्मिणी जी को धीरे-धीरे होश आया। जब उन्होंने समझा कि भगवान केवल मजाक कर रहे थे, तो उनके प्राणों में प्राण आए। अब रुक्मिणी जी ने भगवान के उस मजाक (व्यंग्य) का जो उत्तर दिया, वह श्रीमद्भागवत का एक अमूल्य दर्शन बन गया। रुक्मिणी जी ने भगवान के हर व्यंग्य का अर्थ पलट दिया।

रुक्मिणी जी ने मुस्कुराते हुए कहा— "हे कमलनयन! आपने जो कुछ भी कहा है, वह अक्षरशः सत्य है।"

॥ रुक्मिणी जी की स्तुति ॥
सत्यं भवानाह इदमच्युताखिल-
लोकात्मजिद् राजभिरन्ययूथपैः ।
मह्यं तवात्मास्पददृष्टये नभो
विभ्रट् क्व पङ्घक्व च वै परः पुमान् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.60.34)
अर्थ: रुक्मिणी जी कहती हैं— "हे अच्युत! आपने सत्य ही कहा है कि मेरा और आपका कोई जोड़ नहीं है। आप साक्षात परमेश्वर (परः पुमान्) हैं, जो अपने स्व-महिमा रूपी आकाश में विराजमान हैं। और मैं प्रकृति-जन्य एक तुच्छ स्त्री हूँ। कहाँ आप साक्षात नारायण, और कहाँ मैं!"

रुक्मिणी जी ने भगवान के व्यंग्यों का दार्शनिक खंडन इस प्रकार किया:

  • भयभीत और समुद्र में छिपना: आपने कहा कि आप राजाओं से डरकर समुद्र में छिप गए हैं। यह सत्य है! आप तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) के कोलाहल से डरकर, मनुष्य के हृदय रूपी गहरे समुद्र में छिपकर निवास करते हैं, जहाँ साधारण राजा (अहंकारी जीव) नहीं पहुँच सकते।
  • निष्किंचन (गरीब): आपने कहा कि आप निष्किंचन हैं और निर्धनों को प्रिय हैं। हे प्रभु! आपसे बढ़कर 'अकिंचन' (जिसके पास भौतिक वस्तुएं न हों) कौन होगा, क्योंकि सारा विश्व ही आप में है, तो आपके पास बाहर से क्या होगा? और जो महापुरुष संसार की हर वस्तु का त्याग कर देते हैं (निष्किंचन हो जाते हैं), वे केवल आपको ही अपना धन मानते हैं।
  • समानता (Matching): आपने कहा कि विवाह समान गुण वालों में होना चाहिए। सत्य कहा प्रभु! शिशुपाल, जरासंध आदि राजा तो मृत्यु के अधीन हैं, वे स्त्री, पुत्र और धन के दास हैं। मेरा विवाह उनसे कैसे हो सकता था? मैं 'प्रकृति' हूँ और आप 'पुरुषोत्तम' हैं। केवल हम दोनों ही एक-दूसरे के समान और योग्य हैं।
5. प्रेम की अलौकिक विजय

महारानी रुक्मिणी के इन बुद्धिमत्तापूर्ण, वेद-सम्मत और अनन्य प्रेम से भरे वचनों को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने देखा कि उनकी पटरानी केवल रूप में ही लक्ष्मी नहीं है, बल्कि ज्ञान और भक्ति में भी सर्वोच्च शिखर पर विराजमान है।

भगवान ने रुक्मिणी जी को आशीर्वाद देते हुए कहा— "हे प्रिये! मैं तुम्हारे इस अनन्य प्रेम और निश्छल भक्ति से पूरी तरह बंध गया हूँ। तुमने मेरे उस कठोर परिहास को जिस प्रकार सत्य और भक्ति के सांचे में ढालकर उत्तर दिया है, उससे सिद्ध होता है कि तुम मेरी सबसे श्रेष्ठ अर्धांगिनी हो। तुम्हारी यह पतिभक्ति और ज्ञान युगों-युगों तक संसार के लिए एक आदर्श रहेगा।"

कथा का संदेश

यह 'प्रणय-कलह' केवल एक साधारण पति-पत्नी का मजाक नहीं था। भगवान श्रीकृष्ण यह दिखाना चाहते थे कि संसार के भौतिक राजा चाहे कितने भी ऐश्वर्यशाली क्यों न हों, एक शुद्ध भक्त (रुक्मिणी) की दृष्टि में वे सब मृत्यु के अधीन और तुच्छ हैं। भगवान की भक्ति और उनका सान्निध्य ही जीव का एकमात्र सत्य और संपत्ति है। साथ ही, यह प्रसंग यह भी सिखाता है कि गृहस्थ जीवन में प्रेम, परिहास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान कैसे होना चाहिए।

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