व्याध (शिकारी) का बाण और भगवान श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन: एक अलौकिक प्रस्थान
श्रीमद्भागवत महापुराण: एकादश स्कंध (अध्याय 30 और 31)
जब प्रभास तीर्थ के तट पर यदुवंश का सर्वनाश हो गया और दाऊ भैया (बलराम जी) ने समुद्र तट पर योग-समाधि लेकर अपने मूल 'शेषनाग' स्वरूप में पाताल लोक को प्रस्थान किया, तब भगवान श्रीकृष्ण अकेले रह गए। पृथ्वी का जो भार उतारने के लिए उन्होंने अवतार लिया था, वह कार्य पूर्ण हो चुका था। भगवान जानते थे कि अब इस धरा-धाम से उनके प्रस्थान का समय आ गया है। परंतु भगवान श्रीकृष्ण तो अजर, अमर और अविनाशी हैं; वे साधारण मनुष्यों की तरह मृत्यु को प्राप्त नहीं हो सकते। इसलिए उन्होंने अपने परम धाम (वैकुंठ) लौटने के लिए एक अत्यंत रहस्यमयी और अलौकिक लीला रची— 'जरा' नामक एक शिकारी के बाण की लीला। यह प्रसंग हमारी आत्मा को झकझोर देता है और सिखाता है कि जो ईश्वर सम्पूर्ण ब्रह्मांड का नियंता है, वह भी कर्मफल और संतों (ऋषियों) के वचनों का मान रखता है।
1. पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान का विश्राम
बलराम जी के परम धाम गमन के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण प्रभास तीर्थ के निकट एक अत्यंत शांत और एकांत स्थान पर गए। वहां एक विशाल और पवित्र 'अश्वत्थ' (पीपल) का वृक्ष था। भगवान उसी पीपल के वृक्ष के नीचे अत्यंत शांत भाव से बैठ गए। श्रीमद्भागवत महापुराण में वेदव्यास जी इस अलौकिक दृश्य का वर्णन इस प्रामाणिक श्लोक में करते हैं:
निषसाद धरोपस्थे तूष्णीमासाद्य पिप्पलम् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.30.27)
उस समय भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप अत्यंत मोहक था। उन्होंने अपने दिव्य चतुर्भुज रूप का दर्शन कराया। उनके शरीर की कांति नीलमणि के समान चमक रही थी। उन्होंने अत्यंत सुंदर पीले रेशमी वस्त्र (पीतांबर) धारण किए हुए थे और वक्षस्थल पर 'कौस्तुभ मणि' जगमगा रही थी। उन्होंने अपनी दाहिनी जांघ (Right Thigh) के ऊपर अपना बायाँ चरण (Left Foot) रखा हुआ था। उनका वह रक्त-कमल के समान लाल तलवा (Foot) अत्यंत कोमल और दिव्य था।
2. 'जरा' व्याध (शिकारी) और ऋषियों के श्राप का फलीभूत होना
आपको स्मरण होगा कि पिण्डारक तीर्थ में ऋषियों ने यदुवंशियों को श्राप दिया था कि साम्ब के पेट से एक 'लोहे का मूसल' उत्पन्न होगा जो कुल का नाश करेगा। उस मूसल को घिसकर समुद्र में फेंक दिया गया था, परंतु उसका एक छोटा सा लोहे का तिकोना टुकड़ा (बाणाग्र) बच गया था जिसे एक मछली ने निगल लिया था। एक मछुआरे ने उस मछली को पकड़ा और वह लोहे का टुकड़ा 'जरा' नामक एक व्याध (शिकारी / बहेलिए) को मिल गया। उस शिकारी ने उस लोहे के टुकड़े को अपने बाण (तीर) के आगे लगा लिया था।
घूमता-घूमता वही 'जरा' शिकारी प्रभास तीर्थ के उसी जंगल में आ पहुँचा, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे। दूर से उस शिकारी को घनी झाड़ियों के बीच भगवान श्रीकृष्ण का बायाँ चरण (Left Foot) दिखाई दिया। उस कोमल और लाल तलवे को देखकर शिकारी को भ्रम हुआ कि वहाँ झाड़ियों में कोई 'हिरण' (मृग) बैठा है और यह उसका कान या मुख है।
3. शिकारी का पश्चात्ताप और भगवान की असीम करुणा
जब जरा शिकारी शिकार को पकड़ने के लिए दौड़कर पास आया, तो उसने जो देखा, उससे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वहां कोई हिरण नहीं था, बल्कि त्रिलोकीनाथ साक्षात भगवान श्रीकृष्ण चतुर्भुज रूप में विराजमान थे और उनके चरण में उसी का बाण लगा था।
वह भय और अपराध-बोध से कांप उठा। उसने अपना सिर भगवान के चरणों में पटक दिया और रोते हुए क्षमा मांगने लगा— "हे प्रभो! मैं एक अत्यंत पापी और नीच शिकारी हूँ। मैंने अज्ञानतावश यह भयंकर महापाप कर दिया है। हे मधुसूदन! आप मुझे इसी क्षण भस्म कर दीजिए, मैं जीने योग्य नहीं हूँ।"
परंतु जो भगवान अपने शत्रुओं को भी मोक्ष दे देते हैं, वे इस अनजाने में हुए अपराध पर क्रोध कैसे कर सकते थे? भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उस शिकारी को उठाया और अत्यंत करुणा से कहा:
याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.30.39)
भगवान की आज्ञा पाते ही आकाश से एक दिव्य विमान उतरा और वह जरा शिकारी, भगवान की परिक्रमा करके, उसी विमान में बैठकर सशरीर स्वर्ग को चला गया।
4. सारथी दारुक का आना और अंतिम संदेश
उसी समय भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त और सारथी 'दारुक' भगवान को खोजते हुए वहां आ पहुँचे। भगवान को इस अवस्था में देखकर वे रथ से कूद पड़े और भगवान के चरणों में गिरकर रोने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण ने दारुक को सांत्वना दी और अपना अंतिम संदेश देते हुए कहा— "दारुक! तुम तुरंत द्वारका जाओ। वहाँ जाकर महाराज उग्रसेन, वसुदेव जी और अन्य लोगों से कहो कि पूरा यदुवंश समाप्त हो गया है। मेरे बिना द्वारका अब सुरक्षित नहीं है। शीघ्र ही समुद्र पूरे द्वारका नगर को अपने जल में डुबो देगा। तुम सभी लोग अर्जुन के साथ इन्द्रप्रस्थ (हस्तिनापुर) चले जाना और अपने धर्म का पालन करना।"
भगवान की यह अंतिम आज्ञा सुनकर दारुक भारी मन से द्वारका की ओर चले गए।
5. भगवान श्रीकृष्ण का सशरीर स्वधाम गमन (Ascension to Vaikuntha)
अब भगवान श्रीकृष्ण के इस धराधाम से प्रस्थान का समय आ गया था। आकाश मार्ग में ब्रह्मा, शिव, इंद्र, पार्वती, सभी देवता, ऋषि, गंधर्व और विद्याधर भगवान के परम धाम गमन का अलौकिक दर्शन करने के लिए एकत्रित हो गए। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और दिव्य नगाड़े बजने लगे।
यहाँ श्रीमद्भागवत महापुराण एक अत्यंत गूढ़ दार्शनिक रहस्य खोलता है। साधारण योगी या मनुष्य जब देह त्यागते हैं, तो उनका भौतिक शरीर धरती पर ही रह जाता है (जिसे जलाया या दफनाया जाता है)। परंतु भगवान श्रीकृष्ण का शरीर 'भौतिक' (मांस और मज्जा का) नहीं था, वह 'सच्चिदानंद' (चेतन) था। इसलिए भगवान ने अपने उस दिव्य शरीर को अग्नि में भस्म नहीं किया, बल्कि वे उसी दिव्य शरीर के साथ वैकुंठ पधारे। वेदव्यास जी इस परम सत्य को इस प्रामाणिक श्लोक से सिद्ध करते हैं:
योगधारणयाग्नेय्या नादहत् त्रिजगद्गुरुः ॥
(श्रीमद्भागवत 11.31.6)
आकाश में खड़े देवता भी यह नहीं देख पाए कि भगवान किस मार्ग से वैकुंठ चले गए! जिस प्रकार आकाश में चमकती हुई बिजली कहाँ से आती है और कहाँ अदृश्य हो जाती है, यह कोई नहीं जान पाता, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण अपनी योगमाया से सबके देखते-देखते अपने दिव्य रूप में अपने शाश्वत गोलोक (वैकुंठ धाम) में प्रविष्ट हो गए। उनके जाते ही इस पृथ्वी पर 'कलियुग' (Kaliyuga) का आरंभ हो गया।
कथा का आध्यात्मिक और दार्शनिक सार
व्याध के बाण की यह लीला कोई साधारण मृत्यु नहीं है; यह एक परम ईश्वरीय नाटक है। भगवान ने बाण खाने की लीला इसलिए रची ताकि ऋषियों (ब्राह्मणों) का श्राप सत्य हो सके। जो भगवान त्रिशूल और वज्र से नहीं कटते, वे एक साधारण लोहे के टुकड़े से कैसे मर सकते हैं? यह सब केवल उनकी लीला थी ताकि वे अपने मानव-अवतार का पर्दा गिरा सकें।
भगवान का शरीर अविनाशी है, इसीलिए उन्होंने उसे अग्नि में भस्म नहीं किया। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के जन्म और कर्म दिव्य हैं (जन्म कर्म च मे दिव्यम्)। जो इस रहस्य को जान लेता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त होकर सीधे भगवान के परम धाम को प्राप्त करता है।

