सृष्टि का यह अटल नियम है कि जिस वस्तु का जन्म हुआ है, उसका अंत भी निश्चित है। भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी को पापियों के भार से मुक्त करने के लिए महाभारत का महायुद्ध करवाया था, परंतु अब स्वयं उनका अपना ही 'यदुवंश' पृथ्वी के लिए एक बड़ा भार बन गया था। यदुवंशी इतने बलवान और अजेय हो गए थे कि देवता भी उनका सामना नहीं कर सकते थे। पिण्डारक तीर्थ में ऋषियों का श्राप (मूसल का जन्म) तो केवल एक बहाना था; वास्तव में यह भगवान श्रीकृष्ण की ही इच्छा थी कि उनके परम धाम (वैकुंठ) लौटने से पूर्व, उनका यह अजेय कुल आपस में ही लड़कर समाप्त हो जाए, ताकि भविष्य में ये उद्दंड होकर पृथ्वी पर अत्याचार न करें। आइए, भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में वर्णित उस हृदयविदारक महासंहार और दाऊ भैया (बलराम जी) के अलौकिक देह-त्याग की कथा का श्रवण करें।
ऋषियों के श्राप के बाद द्वारका नगरी में अत्यंत डरावने अपशकुन होने लगे। दिन में भी उल्लू और सियारों के रोने की आवाजें आने लगीं। सूर्य के चारों ओर काले घेरे दिखाई देने लगे और आकाश से उल्कापात (तारे टूटना) होने लगा। मूर्तियों की आँखों से आँसू गिरने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण ने इन अपशकुनों को देखकर यदुवंशियों की सभा बुलाई और कहा— "हे यादवों! द्वारका में अब रहना सुरक्षित नहीं है। हमारे कुल पर ब्राह्मणों (ऋषियों) का भयंकर श्राप लगा है। हमें तुरंत द्वारका छोड़कर समुद्र के तट पर स्थित परम पवित्र 'प्रभास तीर्थ' (वर्तमान सोमनाथ के निकट) चलना चाहिए। वहां हम स्नान करेंगे, देवताओं की पूजा करेंगे और ब्राह्मणों को दान देंगे, जिससे शायद यह संकट टल जाए।"
भगवान की आज्ञा पाकर सभी यदुवंशी (स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों को शंखोद्धार तीर्थ भेजकर) अपने रथों पर सवार हुए और प्रभास क्षेत्र की ओर निकल पड़े।
प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर यदुवंशियों ने समुद्र में स्नान किया। उन्होंने ब्राह्मणों को सोने, वस्त्र, गायों और हाथियों का महादान किया। परंतु ईश्वरीय विधान को कौन टाल सकता है? दान-पुण्य करने के पश्चात, काल से प्रेरित होकर उन यदुवंशियों ने 'मैरेय' नामक एक अत्यंत मीठी और तेज मदिरा (Beverage) का पान कर लिया।
उस मदिरा को पीते ही उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। भगवान की योगमाया ने उनके विवेक पर पर्दा डाल दिया। जो भाई एक-दूसरे के लिए प्राण देते थे, वे उसी मदिरा के नशे में एक-दूसरे का मजाक उड़ाने लगे और अहंकार से भर गए। श्रीमद्भागवत में शुकदेव जी इस क्षण का वर्णन इस प्रामाणिक श्लोक से करते हैं:
कृष्णमायाविमूढैस्ते सङ्घर्षः सुमहानभूत् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.30.13)
नशे में धुत होकर सात्यकि (जिन्होंने महाभारत में पांडवों का साथ दिया था) और कृतवर्मा (जिन्होंने कौरवों का साथ दिया था) के बीच पुरानी बातों को लेकर बहस छिड़ गई। सात्यकि ने कृतवर्मा पर ताना मारा कि "तूने सोते हुए द्रौपदी के पुत्रों को मारा था, तू कायर है!" कृतवर्मा ने पलटकर जवाब दिया, "और तूने निहत्थे भूरिश्रवा का हाथ काटा था!"
बात इतनी बढ़ गई कि सात्यकि ने तलवार निकालकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। यह देखकर कृतवर्मा के समर्थक सात्यकि पर टूट पड़े। उन्हें बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और अनिरुद्ध मैदान में आ गए। क्षण भर में ही प्रभास तीर्थ का वह पवित्र तट कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में बदल गया।
बाप ने बेटे को, बेटे ने बाप को, और भाई ने भाई को मारना शुरू कर दिया। प्रद्युम्न, सात्यकि, अनिरुद्ध, अक्रूर, चारुदेष्ण—ये सभी महारथी एक-दूसरे के बाणों और तलवारों से कट-कट कर धरती पर गिरने लगे। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी उन्हें रोकने का प्रयास कर रहे थे, परंतु माया के वशीभूत होकर वे लोग श्रीकृष्ण और बलराम जी की ओर भी शस्त्र तान कर दौड़े।
लड़ते-लड़ते जब यदुवंशियों के सारे अस्त्र-शस्त्र (बाण, तलवार, गदा) टूट गए और समाप्त हो गए, तो उन्होंने समुद्र तट पर उगी हुई 'एरका' घास (एक प्रकार की तीखी घास) को उखाड़ लिया। आपको स्मरण होगा कि ऋषियों के श्राप से जो लोहे का मूसल साम्ब के पेट से निकला था, उसे घिसकर उसका चूर्ण समुद्र में फेंका गया था। उसी लोहे के चूर्ण से वह 'एरका' घास उगी थी।
जब कुछ यादव भगवान श्रीकृष्ण को मारने दौड़े, तो भगवान ने भी काल का रूप धारण कर लिया। श्रीकृष्ण ने भी उस घास को उखाड़ा और बचे हुए उद्दंड यदुवंशियों का संहार कर दिया। कुछ ही घंटों में, छप्पन करोड़ यदुवंशी कट कर उस प्रभास क्षेत्र की रेत में सदा के लिए सो गए। जिस प्रकार बाँस का जंगल आपस में रगड़ खाकर (घर्षण से) अपनी ही आग से जलकर राख हो जाता है, वैसे ही यदुवंश अपने ही क्रोध से नष्ट हो गया। वेदव्यास जी लिखते हैं:
स्पर्धाक्रोधः क्षयं निन्ये वेणुगुल्ममिवाग्निमान् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.30.23)
जब सारा यदुवंश समाप्त हो गया और प्रभास तीर्थ में हर ओर केवल शांति और मृत्यु का सन्नाटा छा गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके बड़े भाई बलराम जी समुद्र के किनारे अत्यंत शांत भाव से एक वृक्ष के नीचे बैठे हैं।
बलराम जी साक्षात शेषनाग के अवतार थे। उन्होंने देख लिया था कि अब पृथ्वी का सारा कार्य पूर्ण हो चुका है। बलराम जी ने वहीं समुद्र के तट पर पद्मासन लगाया और अपनी चेतना को परमात्मा में विलीन कर लिया। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, बलराम जी का देह-त्याग अत्यंत अलौकिक था:
तत्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि ॥
(श्रीमद्भागवत 11.30.26)
पुराणों में वर्णित है कि जैसे ही बलराम जी ने ध्यान लगाया, उनके मुख से एक अत्यंत विशाल, श्वेत (सफेद) और हजारों फनों वाला सर्प (साक्षात शेषनाग) बाहर निकला। वह दिव्य सर्प समुद्र की लहरों के बीच से होता हुआ पाताल लोक (अपने परम धाम) की ओर चला गया। समुद्र के देवता वरुण ने स्वयं आकर उनका स्वागत किया। इस प्रकार दाऊ भैया की अलौकिक लीला का विश्राम हुआ।
प्रभास तीर्थ का यह महासंहार कोई साधारण युद्ध नहीं था, यह वेदांत का सबसे बड़ा पाठ है। यह कथा हमें सिखाती है कि संसार में 'कुछ भी शाश्वत (Permanent) नहीं है'। जब भगवान स्वयं अपने सगे पुत्रों (प्रद्युम्न आदि) और अपने कुल को कर्म और श्राप के विधान से नहीं बचाते (या स्वयं नष्ट कर देते हैं), तो हम साधारण मनुष्य इस शरीर और परिवार का इतना 'मोह' क्यों करते हैं?
भगवान श्रीकृष्ण ने यह लीला इसलिए रची ताकि संसार समझ सके कि अहंकार और नशा (मदिरा) अच्छे-अच्छे ज्ञानियों और वीरों की बुद्धि हर लेता है। जो कुल अपनों से ही लड़ता है, उसका विनाश निश्चित है। दाऊ भैया का शांत भाव से देह-त्याग हमें यह सिखाता है कि जब जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाए, तो मृत्यु से घबराने के बजाय, योग और ध्यान के माध्यम से शांतिपूर्वक परमात्मा में लीन हो जाना चाहिए।

