महाकवि भास: 'स्वप्नवासवदत्तम्' के रचयिता, 13 नाटकों के प्रणेता और संस्कृत रंगमंच के आदि-नाटककार | Mahakavi Bhasa

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि भास: 'स्वप्नवासवदत्तम्' और संस्कृत रंगमंच के आदि-शिखर

महाकवि भास: 'स्वप्नवासवदत्तम्' के रचयिता और संस्कृत रंगमंच के आदि-शिखर

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, नाटकीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: वह महाकवि जिसका नाम कालिदास भी अत्यंत आदर से लेते थे, जिसकी रचनाएँ सदियों तक रेत में दबी रहीं, और जिसकी 'अग्नि-परीक्षा' से गुजरी 13 पांडुलिपियों ने 20वीं सदी में प्रकट होकर विश्व साहित्य के इतिहास को पलट दिया। (The Father of Sanskrit Drama)

संस्कृत साहित्य में जब भी महान नाटकों की चर्चा होती है, तो लोगों के मस्तिष्क में सबसे पहला नाम कालिदास (अभिज्ञानशाकुंतलम्) और भवभूति का आता है। लेकिन स्वयं कालिदास ने अपने पहले नाटक 'मालविकाग्निमित्रम्' की प्रस्तावना में एक बहुत बड़ा रहस्य खोला था। उन्होंने लिखा था:

प्रथितयशसां भाससौमिल्लकविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य
वर्तमानकवेः कालिदासस्य कृतौ किं कृतो बहुमानः?
(अर्थ: सूत्रधार पूछता है—"चारों ओर फैले हुए यश वाले भास, सौमिल्ल और कविपुत्र जैसे महान पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं को छोड़कर, आप लोग इस वर्तमान (नए) कवि कालिदास की कृति का इतना सम्मान क्यों कर रहे हैं?")

कालिदास द्वारा अत्यंत सम्मान से लिया गया यह नाम 'भास' (Bhasa) था। विडंबना यह रही कि जिस भास को कालिदास अपना आदर्श मानते थे, उनकी रचनाएँ 12वीं शताब्दी के बाद भारत से अचानक लुप्त हो गईं। 1912 ईस्वी तक दुनिया को लगता था कि भास केवल एक मिथक हैं या उनके ग्रंथ हमेशा के लिए नष्ट हो चुके हैं।

📌 महाकवि भास: एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रोफाइल
पूरा नाम महाकवि भास (Mahakavi Bhasa)
जन्म एवं काल निर्धारण सटीक जन्म तिथि अज्ञात है।
ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग 200 ईसा पूर्व (BCE) से 200 ईस्वी (CE) के मध्य।
चूँकि कालिदास (4थी शताब्दी) ने उनका अत्यंत आदर से उल्लेख किया है, और अश्वघोष (पहली सदी) भी उनसे प्रभावित दिखते हैं, इसलिए वे कालिदास से कई सौ वर्ष पूर्व हुए थे। उनका समाज मौर्य या शुंग काल के अधिक निकट प्रतीत होता है।
ऐतिहासिक खोज टी. गणपति शास्त्री (T. Ganapati Sastri) द्वारा 1912 में केरल के त्रिवेंद्रम से उनके 13 लुप्त नाटकों की खोज।
महानतम कृति (Masterpiece) स्वप्नवासवदत्तम् (Swapnavasavadattam) - राजा उदयन और रानी वासवदत्ता की कथा।
कुल उपलब्ध नाटक 13 नाटक (जिन्हें 'भास-नाटक-चक्रम्' कहा जाता है)।
नाट्य-शैली की विशेषता मंच पर तीव्र एक्शन (मृत्यु, नींद, युद्ध), सरल संस्कृत, और नाटकों का प्रारंभ "नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः" से होना।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: कालिदास से पूर्व के महाकवि

प्राचीन भारत के अधिकांश कवियों की तरह भास का व्यक्तिगत जीवन पूर्णतः अज्ञात है। वे किस राजा के आश्रय में थे या कहाँ रहते थे, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। उनके नाटकों में 'राजसिंह' (राजसिंहः प्रशास्तु नः) का उल्लेख आता है, जिसे कुछ विद्वान पुष्यमित्र शुंग या सातवाहन राजा मानते हैं।

काल निर्धारण: भास का काल 2री सदी ईसा पूर्व से 2री सदी ईस्वी के बीच माना जाता है। इसके प्रमाण उनके नाटकों की भाषा है। भास की संस्कृत कालिदास की तरह 'पाणिनीय व्याकरण' के अत्यंत कठोर नियमों से बंधी हुई नहीं है। उसमें आर्ष-प्रयोग (Archaic forms) मिलते हैं। साथ ही, वे भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' के कुछ कठोर नियमों (जैसे मंच पर वध न दिखाना) का उल्लंघन करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि वे एक अत्यंत प्राचीन, स्वतंत्र और उन्मुक्त युग के रचनाकार थे।

3. 1912 का ऐतिहासिक चमत्कार: 'त्रिवेंद्रम नाटक चक्र' की खोज

भास का पुनर्जन्म 1912 में हुआ। यह इंडोलॉजी के इतिहास की सबसे रोमांचक घटनाओं में से एक है।

टी. गणपति शास्त्री की महान खोज

केरल (त्रिवेंद्रम) के एक छोटे से गाँव 'मनालिक्कारा' के एक मठ में, विद्वान टी. गणपति शास्त्री को मलयालम लिपि में लिखी गई ताड़पत्रों (Palm leaves) की एक पुरानी गड्डी मिली।

जब उन्होंने इसे पढ़ा, तो देखा कि इसमें 13 संस्कृत नाटक हैं। इन नाटकों में लेखक का नाम नहीं था, लेकिन उन सभी की शैली एक जैसी थी। सभी नाटक "नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः" (नांदी पाठ के बाद सूत्रधार प्रवेश करता है) से शुरू होते थे। शास्त्री जी ने जब इन नाटकों के श्लोकों का मिलान प्राचीन ग्रंथों में उद्धृत 'भास' के श्लोकों से किया, तो यह रहस्य खुला कि यह वास्तव में खोए हुए महाकवि भास का संपूर्ण साहित्य है। इसे 'Trivandrum Plays' कहा गया।

4. भास के 13 नाटकों का वर्गीकरण (The 13 Plays of Bhasa)

भास द्वारा रचित इन 13 नाटकों को उनके विषय-वस्तु के आधार पर चार भागों में बांटा जा सकता है:

  • उदयन कथा पर आधारित: स्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिज्ञायौगन्धरायणम्।
  • महाभारत पर आधारित: ऊरुभंगम्, कर्णभारम्, दूतवाक्यम्, दूतघटोत्कचम्, पञ्चरात्रम्, मध्यमव्यायोगः। (इनमें से अधिकांश एकांकी/One-Act Plays हैं)।
  • रामायण पर आधारित: प्रतिमानाटकम्, अभिषेकनाटकम्।
  • लोक-कथा/कल्पना पर आधारित: दरिद्रचारुदत्तम्, अविमारकम्। (चारुदत्त की कथा को ही बाद में शूद्रक ने 'मृच्छकटिकम्' में विस्तारित किया था)।
  • कृष्ण कथा: बालचरितम्।

5. 'स्वप्नवासवदत्तम्': विश्व साहित्य का सर्वश्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक नाटक

'स्वप्नवासवदत्तम्' (The Dream of Vasavadatta) भास की सर्वोत्कृष्ट रचना है। यह राजनीति, प्रेम, त्याग और मनोविज्ञान का एक अद्भुत मिश्रण है।

कथा और मनोवैज्ञानिक गहराई

वत्स देश का राजा उदयन अपनी पत्नी वासवदत्ता से इतना प्रेम करता है कि वह राजकाज भूल जाता है और उसका राज्य दुश्मन छीन लेते हैं। राजा का वफादार मंत्री यौगन्धरायण राज्य वापस पाने के लिए एक योजना बनाता है। वह वासवदत्ता के साथ मिलकर यह अफवाह फैला देता है कि गाँव में आग लगने से वासवदत्ता जलकर मर गई है।

राजा शोक में डूब जाता है। मंत्री, राजा का विवाह शक्तिशाली राजा दर्शक की बहन पद्मावती से करा देता है ताकि सैन्य सहायता मिल सके। वासवदत्ता 'अवंतिका' नाम बदलकर पद्मावती की ही दासी के रूप में रहती है। वह अपनी आँखों के सामने अपने पति का दूसरा विवाह देखती है, यह उसका चरम त्याग है।

स्वप्न दृश्य (The Dream Sequence): नाटक के 5वें अंक में राजा 'समुद्रगृह' में सो रहा है। वासवदत्ता चुपके से वहाँ आती है। राजा नींद में (स्वप्न में) "हा वासवदत्ते! हा वासवदत्ते!" पुकारता है। वासवदत्ता सोते हुए राजा को सहलाती है और राजा के जागने से पहले भाग जाती है। राजा को लगता है कि उसने स्वप्न देखा है। यह दृश्य विश्व साहित्य के सबसे भावुक और मनोवैज्ञानिक दृश्यों में गिना जाता है।

6. 'ऊरुभंगम्': संस्कृत का एकमात्र 'दुखांत' (Tragic) नाटक

भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' का नियम है कि संस्कृत नाटक 'सुखांत' (Happy Ending) होने चाहिए। मंच पर किसी की मृत्यु दिखाना वर्जित है। लेकिन भास एक विद्रोही रचनाकार थे।

उनका एकांकी नाटक 'ऊरुभंगम्' (The Breaking of the Thighs) इस नियम को तोड़ता है। यह महाभारत युद्ध के अंतिम दिन की कथा है जहाँ भीम द्वारा गदा से दुर्योधन की जांघ (ऊरु) तोड़ दी जाती है।
इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भास ने दुर्योधन को एक 'खलनायक' (Villain) के रूप में नहीं, बल्कि एक 'ट्रेजिक हीरो' (Tragic Hero) के रूप में प्रस्तुत किया है। मृत्यु-शैय्या पर पड़ा दुर्योधन पश्चाताप करता है, अपने अंधे माता-पिता से क्षमा मांगता है, और अपने पुत्र को कृष्ण की आज्ञा मानने का उपदेश देता है। मंच पर ही दुर्योधन की मृत्यु हो जाती है। यह शेक्सपियर (Shakespeare) की 'ट्रेजेडी' के स्तर का नाटक है।

7. भास की नाट्य-शैली: भरतमुनि के नियमों को चुनौती

भास के नाटकों को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे हम कोई आधुनिक फिल्म (Movie) देख रहे हों।

  • सरल और प्रवाहमयी संस्कृत: कालिदास या भवभूति की तरह भास के नाटकों में लंबे-लंबे समास या अलंकारों का बोझ नहीं है। उनके संवाद छोटे, तीखे और आम बोलचाल के करीब हैं।
  • मंच पर एक्शन (Action on Stage): नाट्यशास्त्र के अनुसार मंच पर सोना, युद्ध करना या मरना वर्जित था। लेकिन भास के नाटकों में मंच पर गदा-युद्ध (ऊरुभंगम्), नींद (स्वप्नवासवदत्तम्) और यहां तक कि मृत्यु भी खुले आम दिखाई जाती है।

8. राजशेखर की अग्नि-परीक्षा: "दाहकोऽभून्न पावकः"

10वीं शताब्दी के महान आलोचक राजशेखर ने भास की महानता को सिद्ध करने के लिए एक अत्यंत प्रसिद्ध और काव्यात्मक श्लोक लिखा था। उन्होंने कहा कि जब विद्वानों ने भास के नाटकों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अग्नि में डाल दिया, तो आग भी 'स्वप्नवासवदत्तम्' को जला नहीं सकी।

भासनाटकचक्रेऽपि छेकैः क्षिप्ते परीक्षितुम्।
स्वप्नवासवदत्तस्य दाहकोऽभून्न पावकः॥
(अर्थ: विद्वानों द्वारा परीक्षा के लिए भास के संपूर्ण नाटक-चक्र को जब अग्नि में फेंका गया, तब भी अग्नि 'स्वप्नवासवदत्तम्' को जलाने में असमर्थ रही।)

9. निष्कर्ष: रंगमंच के 'एक्शन-पैक्ड' डायरेक्टर

महाकवि भास प्राचीन भारत के पहले 'थियेटर डायरेक्टर' थे, जिन्हें इस बात की गहरी समझ थी कि 'दर्शक क्या देखना चाहते हैं'।

उनका 'स्वप्नवासवदत्तम्' आज भी भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के कई रंगमंचों पर सफलतापूर्वक खेला जाता है। 1912 में टी. गणपति शास्त्री द्वारा की गई खोज ने हमें केवल 13 किताबें नहीं दीं, बल्कि एक पूरे खोए हुए युग का द्वार खोल दिया। भास ने सिद्ध कर दिया कि महान नाटक केवल भारी-भरकम शब्दों से नहीं, बल्कि सच्ची मानवीय संवेदनाओं (प्रेम, त्याग, और मृत्यु के भय) से बनते हैं। वे संस्कृत साहित्य के उस आकाश के सूर्य हैं, जिनकी रोशनी से ही कालिदास जैसे चंद्र चमके।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • भास-नाटक-चक्रम् - संपादक: टी. गणपति शास्त्री (त्रिवेंद्रम संस्कृत सीरीज़, 1912)।
  • स्वप्नवासवदत्तम् (हिंदी व्याख्या सहित) - चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान।
  • मालविकाग्निमित्रम् - कालिदास (भास के ऐतिहासिक संदर्भ के लिए)।
  • Sanskrit Drama - A.B. Keith (भास की नाट्य शैली का पाश्चात्य विश्लेषण)।

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