महाकवि भट्टि: 'भट्टिकाव्य' के रचयिता और संस्कृत व्याकरण पर आधारित प्रथम 'शास्त्र-काव्य' के प्रणेता | Mahakavi Bhatti

Sooraj Krishna Shastri
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महाकवि भट्टि: 'भट्टिकाव्य' (रावणवध) और व्याकरण आधारित महाकाव्य

महाकवि भट्टि: 'भट्टिकाव्य' (रावणवध) और व्याकरण का 'शास्त्र-काव्य'

एक अत्यंत विस्तृत भाषावैज्ञानिक और साहित्यिक विश्लेषण: वह महाकवि जिसने 'रामकथा' को केवल आनंद के लिए नहीं, बल्कि महर्षि पाणिनि के क्लिष्ट व्याकरण (अष्टाध्यायी) के नियमों को छात्रों के मस्तिष्क में रटाने के लिए एक 'वैज्ञानिक-महाकाव्य' (Shastra Kavya) के रूप में रच दिया।

संस्कृत साहित्य में कवियों का उद्देश्य मुख्य रूप से पाठकों को 'रस' (आनंद) प्रदान करना होता है (जैसे कालिदास का शृंगार या भारवि का वीर रस)। लेकिन महाकवि भट्टि का उद्देश्य बिल्कुल अलग था। उन्होंने देखा कि संस्कृत व्याकरण (महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी') के नियम इतने सूखे, गणितीय और क्लिष्ट हैं कि विद्यार्थियों को उन्हें याद करने में पसीने छूट जाते हैं।

तब भट्टि ने एक शानदार 'शैक्षणिक प्रयोग' (Pedagogical Experiment) किया। उन्होंने 'रावणवध' (जिसे आज 'भट्टिकाव्य' कहा जाता है) नामक एक ऐसा महाकाव्य लिखा, जिसे पढ़ते हुए पाठक भगवान राम की वीरगाथा का आनंद भी ले और साथ ही अनजाने में पाणिनि के व्याकरण के सभी कठिन नियमों (लकार, कृदन्त, तद्धित) को उदाहरण सहित सीख भी जाए। इस शैली को 'शास्त्र-काव्य' (Shastra-Kavya - Science embedded in Poetry) कहा गया।

📌 महाकवि भट्टि: एक ऐतिहासिक एवं व्याकरणिक प्रोफाइल
पूरा नाम एवं पिता महाकवि भट्टि (पिता का नाम: श्रीधरस्वामी)। (कुछ प्राचीन टीकाकार भ्रमवश इन्हें 'नीतिशतक' वाले 'भर्तृहरि' ही मान लेते हैं, किंतु ऐतिहासिक रूप से ये दोनों अलग हैं)।
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग छठी शताब्दी का अंत या 7वीं शताब्दी का आरंभ (Late 6th - Early 7th Century CE / 500 ई. - 650 ई.)।
महाकाव्य के अंत में भट्टि ने लिखा है कि उन्होंने इस काव्य की रचना 'वल्लभी' (Valabhi - आधुनिक गुजरात) में राजा 'श्रीधरसेन' के संरक्षण में की। इतिहास में मैत्रक वंश के चार 'श्रीधरसेन' हुए हैं, जिनका शासनकाल 500 ई. से 641 ई. के बीच था।
महानतम कृति भट्टिकाव्य (मूल नाम: रावणवध) - 22 सर्गों का महाकाव्य।
काव्य की विधा शास्त्र-काव्य (Shastra-Kavya) - जहाँ कथा के आवरण में व्याकरण (Grammar) और अलंकार शास्त्र (Poetics) के नियमों को सिखाया जाता है।
महाकाव्य का विषय राम के जन्म से लेकर रावण के वध और राम के राज्याभिषेक तक की राम-कथा।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: वल्लभी के मैत्रक वंशीय राजा

महाकवि भट्टि पश्चिमी भारत (सौराष्ट्र/गुजरात) की प्राचीन विद्या-नगरी वल्लभी (Valabhi) के निवासी थे। वल्लभी उस समय बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवादी विद्या का एक विशाल केंद्र था (नालंदा के समकक्ष)।

भट्टिकाव्य के अंतिम श्लोक में वे स्वयं लिखते हैं: "काव्यमिदं विहितं मया वलभ्यां श्रीधरसेननरेन्द्रपालितायाम्।" (मैंने इस काव्य की रचना श्रीधरसेन नामक राजा द्वारा पालित 'वल्लभी' नगरी में की)। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर यह मैत्रक वंश (Maitraka Dynasty) के श्रीधरसेन द्वितीय (590–606 ई.) या श्रीधरसेन तृतीय (624 ई.) का काल था, जिससे महाकवि भट्टि का काल 7वीं शताब्दी ईस्वी का पूर्वार्ध निश्चित होता है।

3. 'भट्टिकाव्य' (रावणवध): महाकाव्य की संरचना और उद्देश्य

यद्यपि इस ग्रंथ का मूल नाम 'रावणवध' (The Slaying of Ravana) है, लेकिन इसके रचयिता के व्याकरणिक पांडित्य के कारण यह पूरे भारत में 'भट्टिकाव्य' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इसमें कुल 22 सर्ग (Cantos) और लगभग 1624 श्लोक हैं।

इसमें रामायण की कथा (राम का जन्म, सीता स्वयंवर, वनवास, सीता हरण, लंका दहन, रावण वध) ज्यों की त्यों चलती है, लेकिन इसके भीतर जो शब्दों का ढांचा बुना गया है, वह सीधे पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' के सूत्रों का क्रमबद्ध (Serial) उदाहरण है।

4. व्याकरणिक ब्लूप्रिंट: महाकाव्य के चार वैज्ञानिक 'काण्ड'

भट्टि ने अपने 22 सर्गों को चार प्रमुख 'काण्डों' (Sections) में विभाजित किया है। यह वर्गीकरण कथा के आधार पर नहीं, बल्कि 'व्याकरण के पाठों' के आधार पर है:

भट्टिकाव्य का पाठ्यक्रम (Syllabus)

1. प्रकीर्ण काण्ड (Miscellaneous Rules - सर्ग 1 से 5): इसमें राम के जन्म से सीता हरण तक की कथा है। साथ ही, इसमें पाणिनि के विविध (Miscellaneous) नियमों का उपयोग करके शब्द बनाए गए हैं।

2. अधिकार काण्ड (Leading Rules - सर्ग 6 से 9): सुग्रीव मैत्री और हनुमान के समुद्र लंघन की कथा। इसमें अष्टाध्यायी के विशेष 'अधिकार सूत्रों' (Primary syntax rules) का व्यावहारिक प्रयोग दिखाया गया है।

3. प्रसन्न काण्ड (Figures of Speech - सर्ग 10 से 13): लंका वर्णन और सीता की खोज। यह काण्ड व्याकरण का नहीं, बल्कि 'अलंकार शास्त्र' (Poetics) का है। भट्टि ने 38 प्रकार के शब्दालंकारों और अर्थालंकारों का अत्यंत 'प्रसन्न' (स्पष्ट) रूप में वर्णन किया है।

4. तिङन्त काण्ड (Conjugation of Verbs - सर्ग 14 से 22): रावण वध और अयोध्या वापसी। यह सबसे कठिन और सबसे वैज्ञानिक हिस्सा है। इसमें लकारों (Tenses & Moods) का अद्भुत प्रयोग है।

5. 'तिङन्त काण्ड': धातुओं (लकारों) का अद्भुत खेल

संस्कृत भाषा में समय (Tense) और अवस्था (Mood) को दर्शाने के लिए 10 लकार (Lakar) होते हैं (जैसे लट्, लोट्, लङ्, लिट् आदि)। भट्टि ने अपने तिङन्त काण्ड के प्रत्येक सर्ग (Canto) को एक विशिष्ट 'लकार' सिखाने के लिए समर्पित कर दिया।

उदाहरण के लिए:
- सर्ग 14: इस पूरे सर्ग में केवल 'लुङ् लकार' (अद्यतन भूतकाल / Aorist Past Tense) की क्रियाओं का उपयोग हुआ है।
- सर्ग 15: इसमें केवल 'लृट् लकार' (सामान्य भविष्य काल / Simple Future Tense) के प्रयोगों से राम-रावण युद्ध की तैयारी दिखाई गई है।

6. क्या व्याकरण ने काव्य का रस मार दिया? (भट्टि का अपना बचाव)

कई साहित्यकारों ने आलोचना की कि भट्टि ने अपनी कविता को व्याकरण के भारी-भरकम शब्दों से 'बोझिल' और नीरस बना दिया है। एक आम पाठक बिना शब्दकोश (Dictionary) या 'मल्लिनाथ की टीका' के भट्टिकाव्य का एक श्लोक भी नहीं समझ सकता।

भट्टि इस बात को भली-भांति जानते थे। इसलिए उन्होंने महाकाव्य के अंतिम सर्ग (22वें सर्ग) में डंके की चोट पर घोषणा की:

व्याख्यागम्यमिदं काव्यमुत्सवः सुधियामलम्।
हता दुर्मेधसश्चास्मिन् विद्वत्प्रियतया मया॥

दीपतुल्यः प्रबन्धोऽयं शब्दलक्षणचक्षुषाम्।
हस्तामर्श इवान्धानां भवेद् व्याकरणादृते॥
(अर्थ: मेरा यह काव्य केवल 'व्याख्या' (Commentary) के द्वारा ही समझा जा सकता है। यह बुद्धिमानों (सुधियों) के लिए एक 'उत्सव' के समान है। मैंने जानबूझकर इसे विद्वानों का प्रिय बनाने के लिए लिखा है, अतः मंदबुद्धि (दुर्मेधस) लोग इसमें हताश ही होंगे।
यह महाकाव्य उन लोगों के लिए 'दीपक' के समान है जिनके पास 'व्याकरण' रूपी आँखें हैं; लेकिन व्याकरण न जानने वालों के लिए यह वैसा ही है जैसे कोई अंधा व्यक्ति हाथ टटोलकर रास्ता खोज रहा हो।)

7. 'शास्त्र-काव्य' परंपरा का उदय और हेमचंद्र का 'द्व्याश्रय काव्य'

महाकवि भट्टि का यह दुस्साहस व्यर्थ नहीं गया। उन्होंने भारतीय साहित्य में 'शास्त्र-काव्य' (Scientific Epic) या 'द्व्याश्रय काव्य' (Dual-purpose poetry) की एक पूरी परंपरा खड़ी कर दी।

भट्टि से प्रेरित होकर ही, 12वीं शताब्दी में गुजरात के महान जैन आचार्य हेमचंद्र सूरी ने 'कुमारपालचरित' (द्व्याश्रय काव्य) लिखा। हेमचंद्र ने भी अपने राजा कुमारपाल का इतिहास सुनाते हुए अपने ही द्वारा रचे गए संस्कृत और प्राकृत व्याकरण (सिद्धहेमशब्दानुशासन) के नियमों को श्लोकों में पिरो दिया।

8. निष्कर्ष: विद्वानों के लिए 'उत्सव', अज्ञानियों के लिए 'अंधकार'

महाकवि भट्टि की प्रतिभा इस बात में नहीं है कि उन्होंने रामकथा लिखी (रामकथा तो अनगिनत कवियों ने लिखी है), बल्कि उनकी विलक्षणता इस बात में है कि उन्होंने एक ही समय में 'कवि' और 'कठोर वैयाकरण' (Grammarian) दोनों का धर्म अत्यंत सफलतापूर्वक निभाया।

आज जब कोई संस्कृत का शोधार्थी या विद्यार्थी 'भट्टिकाव्य' पढ़ता है, तो वह केवल साहित्य नहीं पढ़ रहा होता, वह एक प्रकार की 'कोड-क्रैकिंग' (Code-cracking) कर रहा होता है। वह पाणिनीय व्याकरण की प्रयोगशाला में खड़ा होता है जहाँ भट्टि शब्दों के मॉलिक्यूल (Molecules) तोड़कर दिखा रहे होते हैं कि क्रियाओं (Verbs) और प्रत्ययों (Suffixes) का जन्म कैसे होता है। भट्टि वास्तव में संस्कृत भाषा के 'इंजीनियर' थे।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • भट्टिकाव्यम् (रावणवध) - मल्लिनाथ की 'जीवातु' और जयमंगला टीका के साथ।
  • Sanskrit Poetics and Grammar - Dr. P.V. Kane.
  • A History of Indian Literature (Vol 3) - Maurice Winternitz (भट्टि का काल-निर्धारण और शास्त्र-काव्य)।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।

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