महाकवि गुणाढ्य: 'बृहत्कथा' के प्रणेता और भारतीय कथा-साहित्य के पितामह
एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, साहित्यिक और भाषावैज्ञानिक विश्लेषण: वह महाकवि जिसने अपना 'अहंकार' त्यागकर एक 'लुप्तप्राय भाषा' (पैशाची) में रक्त से सात लाख श्लोकों का ऐसा महाकाव्य लिखा, जो पूरे विश्व के कथा-साहित्य (Fairy Tales) का मूल स्रोत बन गया।
- 1. प्रस्तावना: भारतीय साहित्य का 'तीसरा महाकाव्य'
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: सातवाहन साम्राज्य का स्वर्ण युग
- 3. 'बृहत्कथा' की उत्पत्ति की अद्भुत किंवदंती: प्रतिज्ञा और वनवास
- 4. 'पैशाची प्राकृत': एक रहस्यमयी लुप्त भाषा का विज्ञान
- 5. रक्त से लिखा महाकाव्य और अग्नि को समर्पण
- 6. बृहत्कथा का स्वरूप: विद्याधरों की मायावी दुनिया
- 7. बृहत्कथा के परवर्ती संस्कृत रूपांतरण (कथासरित्सागर)
- 8. निष्कर्ष: लोक-चेतना का अमर दस्तावेज़
भारतीय साहित्य में महर्षि वाल्मीकि (रामायण) और महर्षि वेदव्यास (महाभारत) को जो स्थान प्राप्त है, महाकवि गुणाढ्य (Gunadhya) उसी त्रिमूर्ति के तीसरे स्तंभ हैं। महान संस्कृत कवि दण्डी ने अपने ग्रंथ 'काव्यादर्श' में स्पष्ट रूप से 'बृहत्कथा' की तुलना रामायण और महाभारत से की है।
गुणाढ्य की 'बृहत्कथा' (Brihatkatha - The Great Narrative) केवल एक पुस्तक नहीं थी, बल्कि यह लोक-कथाओं, जादू, परियों, साहसिक यात्राओं और प्रेम-कथाओं का एक ऐसा अथाह सागर थी, जिससे बाद में 'पंचतंत्र', 'हितोपदेश', 'अरेबियन नाइट्स' (अलिफ लैला) और 'सिंदबाद जहाजी' जैसी विश्वप्रसिद्ध कहानियों ने जन्म लिया। यद्यपि आज मूल बृहत्कथा लुप्त हो चुकी है, फिर भी इसके संस्कृत रूपांतरण विश्व साहित्य की सबसे बड़ी निधि हैं।
| पूरा नाम | महाकवि गुणाढ्य (Mahakavi Gunadhya) |
| जन्म एवं काल निर्धारण |
ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व (1st Century BCE) से प्रथम शताब्दी ईस्वी (1st Century CE) के मध्य। वे सातवाहन वंश के प्रसिद्ध राजा 'शालिवाहन' (जिन्हें राजा 'हाल' भी कहा जाता है) के दरबार में मंत्री और राजकवि थे। राजा हाल का समय प्रथम शताब्दी ईस्वी माना जाता है। |
| जन्म स्थान | प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान पैठण, महाराष्ट्र - जो सातवाहन साम्राज्य की राजधानी थी)। कुछ मतों के अनुसार उज्जैन या मथुरा। |
| महानतम कृति | बृहत्कथा (Brihatkatha) - सात लाख श्लोकों का महाकाव्य (जिसमें से केवल एक लाख श्लोक बचे थे)। |
| कृति की भाषा | पैशाची प्राकृत (Paishachi Prakrit) - विंध्य पर्वतों के आदिवासियों और पिशाचों की लोकभाषा। |
| साहित्यिक प्रभाव | कथासरित्सागर, बृहत्कथामंजरी, और संपूर्ण एशियाई कथा-साहित्य का मूल आधार। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: सातवाहन साम्राज्य का स्वर्ण युग
महाकवि गुणाढ्य का जीवन दक्षिण भारत के शक्तिशाली सातवाहन साम्राज्य (Satavahana Dynasty) से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (पैठण) थी। उस समय वहाँ के राजा 'शालिवाहन' (जिन्हें राजा हाल भी माना जाता है) शासन करते थे।
आधुनिक इतिहासकारों (जैसे ए.बी. कीथ और विंटरनिट्ज़) के अनुसार, चूँकि राजा हाल (जिन्होंने स्वयं 'गाथा सप्तशती' लिखी थी) का काल प्रथम शताब्दी ईस्वी है, अतः गुणाढ्य का काल भी पूर्ण निश्चितता के साथ इसी समय का माना जाता है। वे राजा के अत्यंत विद्वान और सम्मानित मंत्री थे, जिन्हें संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं का गहरा ज्ञान था।
3. 'बृहत्कथा' की उत्पत्ति की अद्भुत किंवदंती: प्रतिज्ञा और वनवास
'बृहत्कथा' के लिखे जाने के पीछे एक अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक किंवदंती है, जिसका वर्णन सोमदेव ने 'कथासरित्सागर' में किया है:
एक बार राजा शालिवाहन अपनी रानियों के साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे। राजा को संस्कृत का ज्ञान नहीं था। रानी ने संस्कृत में कहा "मोदकैः तडय माम्" (मुझे जल-बिंदुओं से मत मारो / मा उदकैः)। राजा ने अज्ञानतावश 'मोदक' का अर्थ 'लड्डू' समझ लिया और पानी में लड्डू मंगवा लिए। रानी ने राजा की मूर्खता पर उनका उपहास किया।
लज्जित राजा ने अपने दरबारियों से पूछा कि वे कितने समय में संस्कृत सीख सकते हैं। गुणाढ्य ने कहा कि वे राजा को छह वर्ष में संस्कृत सिखा देंगे। लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी विद्वान शर्ववर्मा (जिन्होंने कातंत्र व्याकरण लिखा) ने चुनौती दी कि वे राजा को मात्र छह महीने में संस्कृत सिखा देंगे।
गुणाढ्य ने प्रतिज्ञा की: "यदि शर्ववर्मा सफल हुए, तो मैं संस्कृत, प्राकृत और अपनी मातृभाषा तीनों का जीवन भर के लिए त्याग कर दूँगा।" शर्ववर्मा सफल हो गए, और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार गुणाढ्य ने सभ्य समाज और सभ्य भाषाओं का त्याग कर दिया।
4. 'पैशाची प्राकृत': एक रहस्यमयी लुप्त भाषा का विज्ञान
प्रतिज्ञाबद्ध गुणाढ्य राजधानी छोड़कर विंध्य के घने जंगलों में चले गए। चूँकि वे संस्कृत या प्राकृत (शौरसेनी/महाराष्ट्री) नहीं बोल सकते थे, इसलिए उन्होंने जंगल में रहने वाले आदिवासियों, भूतों और पिशाचों की भाषा सीखी, जिसे 'पैशाची प्राकृत' (Paishachi Prakrit) कहा जाता था।
भाषा-विज्ञान (Linguistics) की दृष्टि से पैशाची भारत के उत्तर-पश्चिम (कश्मीर, गांधार) या विंध्य क्षेत्र की एक अत्यंत प्राचीन प्राकृत थी। इसमें 'द' का 'त', 'न' का 'ण' और 'ल' का 'ल' हो जाता था (जैसे 'दामोदर' को 'तामोतर' कहना)। यह एक 'लोक-भाषा' थी जिसे सभ्य समाज हेय दृष्टि से देखता था। गुणाढ्य ने इसी आदिम भाषा को अपनाकर उसमें विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य लिख दिया।
5. रक्त से लिखा महाकाव्य और अग्नि को समर्पण
जंगल में स्याही उपलब्ध न होने के कारण, कहा जाता है कि गुणाढ्य ने पेड़ की छाल (भूर्जपत्र) पर अपने ही रक्त (खून) से 'बृहत्कथा' लिखी। इसमें सात लाख श्लोक (कथाएं) थे।
जब यह महाकाव्य पूरा हुआ, तो उन्होंने अपने शिष्यों के माध्यम से इसे राजा शालिवाहन के पास भिजवाया। लेकिन राजा ने यह कहकर इसे अस्वीकार कर दिया कि "यह पिशाचों की जंगली भाषा में लिखा गया है और इसमें खून की दुर्गंध आती है।"
अत्यंत आहत होकर गुणाढ्य जंगल में एक पहाड़ी पर गए। उन्होंने आग जलाई और जंगल के पशु-पक्षियों को वह कथा पढ़कर सुनाने लगे। जैसे-जैसे वे एक पन्ना पढ़ते, उसे अग्नि में स्वाहा कर देते। उनकी कथा इतनी मार्मिक थी कि शेर, हिरण और पक्षी भी रोने लगे। जब राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे भागकर जंगल पहुंचे, तब तक सात लाख श्लोकों में से छह लाख श्लोक जलकर भस्म हो चुके थे। राजा केवल शेष बचे एक लाख श्लोकों को ही बचा पाए। यही बचा हुआ अंश 'बृहत्कथा' कहलाया।
6. बृहत्कथा का स्वरूप: विद्याधरों की मायावी दुनिया
बृहत्कथा का मूल विषय राजा उदयन (वत्स देश के राजा) के पुत्र 'नरवाहनदत्त' का चरित्र था।
रामायण जहाँ मर्यादा और धर्म की बात करती है, महाभारत जहाँ राजनीति और युद्ध की बात करता है, वहीं 'बृहत्कथा' मनोरंजन, जादू (Magic), उड़ने वाले रथों (Flying machines), विद्याधरों (Supernatural beings), यक्षों और प्रेम-रोमांस की बात करती है। इसमें 'स्वप्नवासवदत्तम्' के राजा उदयन और वासवदत्ता की अमर प्रेम कथा का विस्तार था। यह एक प्रकार का प्राचीन 'Science Fiction' और 'Fantasy' साहित्य था जिसने आम जनता के मनोविज्ञान पर गहरा प्रभाव डाला।
7. बृहत्कथा के परवर्ती संस्कृत रूपांतरण (कथासरित्सागर)
मूल 'पैशाची बृहत्कथा' आज पूरी तरह से लुप्त (Lost) है। लेकिन इसका प्रभाव इतना व्यापक था कि परवर्ती संस्कृत कवियों ने उस एक लाख श्लोकों वाली कथा को संस्कृत में अनूदित कर दिया। आज हमारे पास इसके तीन मुख्य संस्कृत रूपांतरण उपलब्ध हैं:
- बृहत्कथा-श्लोकसंग्रह: इसे बुद्धस्वामी (लगभग 5वीं शताब्दी) ने नेपाल क्षेत्र में लिखा। यह मूल बृहत्कथा के सबसे करीब माना जाता है।
- बृहत्कथामंजरी: इसे 11वीं शताब्दी में कश्मीर के महान क्षेमेन्द्र ने लिखा।
- कथासरित्सागर (Ocean of the Streams of Stories): यह सबसे प्रसिद्ध है। इसे 11वीं शताब्दी में कवि सोमदेव ने कश्मीर के राजा अनंत की रानी सूर्यमती का मन बहलाने के लिए लिखा था। इसमें 24,000 श्लोक और सैकड़ों कहानियां हैं। बेताल पच्चीसी (Vikram-Betal) और पंचतंत्र की कहानियां भी इसी के अंतर्गत आती हैं।
8. निष्कर्ष: लोक-चेतना का अमर दस्तावेज़
महाकवि गुणाढ्य की महानता इस बात में नहीं है कि उन्होंने राजा का विरोध किया, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने संस्कृत के 'अभिजात्य' (Elitism) को चुनौती दी। जब ज्ञान केवल संस्कृत जानने वाले ब्राह्मणों और राजाओं तक सीमित था, गुणाढ्य ने 'जनता की भाषा' (पैशाची) में साहित्य रचकर साहित्य का लोकतंत्रीकरण (Democratization of Literature) कर दिया।
वे दुनिया के पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने यह समझा कि मानव मस्तिष्क को उपदेश (Sermons) से ज़्यादा 'कहानियां' (Stories) पसंद आती हैं। गुणाढ्य की जलाई हुई उस अग्नि से जो कहानियों की चिंगारियां उड़ीं, वे आज भी विश्व के हर बच्चे की दादी-नानी की कहानियों में जीवित हैं। गुणाढ्य सही मायनों में भारतीय लोक-कथाओं के 'अदृश्य सम्राट' हैं।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- कथासरित्सागर - सोमदेव भट्ट (चौखम्बा प्रकाशन - हिंदी अनुवाद)।
- बृहत्कथामंजरी - क्षेमेन्द्र।
- A History of Indian Literature (Vol 3) - Maurice Winternitz (गुणाढ्य और कथा-साहित्य का उद्भव)।
- काव्यादर्श - दण्डी (बृहत्कथा की प्रामाणिकता)।
