महर्षि कात्यायन (वररुचि): 'वार्तिक' के प्रणेता और 'स्वर्गारोहण' के महाकवि
एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, भाषावैज्ञानिक और साहित्यिक विश्लेषण: संस्कृत व्याकरण के 'मुनित्रय' (पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि) के वह मध्य-स्तंभ, जिन्होंने न केवल बदलती हुई भाषा को व्याकरण के नए सांचे में ढाला, बल्कि अपनी लेखनी से एक अमर महाकाव्य का भी सृजन किया। (The Grammarian Poet of Ancient India)
- 1. प्रस्तावना: भाषा के विकास का सजग प्रहरी
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: मौर्य काल के समकालीन ऋषि
- 3. कात्यायन और वररुचि: नाम का ऐतिहासिक रहस्य
- 4. 'वार्तिक' क्या है? पाणिनीय व्याकरण का परिष्कार
- 5. कात्यायन की वैज्ञानिक पद्धति: उक्तानुक्त की चिंता
- 6. 'लोक-व्यवहार': भाषा एक बहती नदी है
- 7. 'स्वर्गारोहण' काव्य: वैयाकरण की काव्यात्मक उड़ान
- 8. अन्य कृतियां: श्रौतसूत्र और वाजसनेयी प्रातिशाख्य
- 9. निष्कर्ष: भारतीय विद्या के सेतु-निर्माता
संस्कृत व्याकरण की महान परंपरा तीन मुनियों (मुनित्रय) पर टिकी है—महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और महर्षि पतंजलि। यदि पाणिनि ने संस्कृत भाषा का 'संविधान' (Constitution) लिखा, तो कात्यायन ने उस संविधान में 'संशोधन' (Amendments) किए, और पतंजलि ने उन दोनों की विस्तृत 'व्याख्या' (Supreme Court Judgment) की।
कात्यायन (जिन्हें साहित्य जगत में वररुचि के नाम से भी जाना जाता है) की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने भाषा को एक 'जड़' (Static) वस्तु मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने देखा कि पाणिनि के बाद 150-200 वर्षों में संस्कृत भाषा बदल गई है, नए शब्द आ गए हैं और कुछ पुराने शब्द लुप्त हो गए हैं। इस भाषाई विकास (Linguistic Evolution) को स्वीकार करते हुए उन्होंने अष्टाध्यायी पर 'वार्तिक' (Varttika) लिखे। साथ ही, वे एक उच्च कोटि के कवि भी थे, जिनका महाकाव्य 'स्वर्गारोहण' (Svargarohana) प्राचीन साहित्य का एक अद्भुत रत्न था।
| पूरा नाम एवं गोत्र | कात्यायन (यह उनका 'गोत्र' नाम है)। साहित्यिक परंपरा में इनका मूल नाम 'वररुचि' माना जाता है। |
| जन्म एवं काल निर्धारण |
ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (3rd Century BCE)। वे महर्षि पाणिनि (ल. 500 ई.पू.) के बाद और महर्षि पतंजलि (ल. 150 ई.पू.) से पूर्व हुए। कथासरित्सागर जैसी किंवदंतियों के अनुसार वे नंद वंश (मौर्य साम्राज्य से ठीक पूर्व) के समकालीन थे। |
| जन्म स्थान / क्षेत्र | कुछ परंपराओं के अनुसार दक्षिण भारत (दाक्षिणात्य), जबकि अन्य उन्हें कौशाम्बी (उत्तर भारत) से जोड़ते हैं। पतंजलि ने उन्हें 'दाक्षिणात्य' कहा है। |
| महानतम कृति (व्याकरण) | वार्तिक (Varttika) - अष्टाध्यायी के सूत्रों पर आलोचनात्मक और पूरक टिप्पणियां (लगभग 4,000 वार्तिक)। |
| महानतम कृति (काव्य) | स्वर्गारोहण (Svargarohana) - एक संस्कृत महाकाव्य (वर्तमान में लुप्त, किंतु परवर्ती काव्यों में इसके श्लोक उद्धृत हैं)। |
| स्थान (परंपरा में) | व्याकरण के 'मुनित्रय' (The triad of sages) के द्वितीय मुनि। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: मौर्य काल के समकालीन ऋषि
महर्षि कात्यायन का ऐतिहासिक काल निर्धारण भारतीय इतिहास की एक रोचक पहेली है। महर्षि पतंजलि (जिन्होंने पुष्यमित्र शुंग का अश्वमेध यज्ञ कराया था—150 ईसा पूर्व) अपने 'महाभाष्य' में कात्यायन के वार्तिकों की विस्तृत समीक्षा करते हैं। चूँकि पतंजलि के समय तक कात्यायन के वार्तिकों पर कई अन्य विद्वान भी चर्चा कर चुके थे, इसलिए आधुनिक इतिहासकारों (जैसे वासुदेव शरण अग्रवाल और आर.जी. भंडारकर) ने कात्यायन का काल 300 ईसा पूर्व (3rd Century BCE) के आसपास, अर्थात् मौर्य साम्राज्य के उदय के आस-पास निर्धारित किया है।
सोमदेव के प्रसिद्ध ग्रंथ 'कथासरित्सागर' में एक किंवदंती है कि 'वररुचि कात्यायन' पाटलिपुत्र के राजा नंद के दरबार में मंत्री थे और वे महर्षि पाणिनि के समकालीन या प्रतिद्वंद्वी थे। यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टि से पाणिनि और कात्यायन के बीच कम से कम 150-200 वर्षों का अंतर है, लेकिन यह कथा सिद्ध करती है कि कात्यायन की मेधा अत्यंत विलक्षण थी।
3. कात्यायन और वररुचि: नाम का ऐतिहासिक रहस्य
प्राचीन भारतीय साहित्य में 'कात्यायन' और 'वररुचि' नामों का प्रयोग प्रायः एक ही व्यक्ति के लिए (Synonymously) हुआ है।
विद्वानों का मत है कि 'कात्यायन' उनका गोत्र-नाम था (कत गोत्र में उत्पन्न), और 'वररुचि' उनका व्यक्तिगत नाम था। आचार्य हेमचंद्र और पुरुषोत्तमदेव जैसे परवर्ती कोशकारों (Lexicographers) ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि कात्यायन और वररुचि एक ही हैं। 'स्वर्गारोहण' काव्य के रचयिता के रूप में भी 'वररुचि' का ही नाम अधिक प्रसिद्ध हुआ। यह ठीक वैसे ही है जैसे 'कौटिल्य' को 'चाणक्य' या 'विष्णुगुप्त' कहा जाता है।
4. 'वार्तिक' क्या है? पाणिनीय व्याकरण का परिष्कार
कात्यायन की सबसे बड़ी अकादमिक उपलब्धि उनके 'वार्तिक' हैं। महर्षि पाणिनि ने 'अष्टाध्यायी' में लगभग 4,000 सूत्र लिखे थे। कात्यायन ने उन पर लगभग 4,000 से 5,000 वार्तिक (Varttikas) लिखे, जो अष्टाध्यायी के लगभग 1,500 सूत्रों की समीक्षा करते हैं।
तं ग्रन्थं वार्तिकं प्राहुर्वार्तिकज्ञा मनीषिणः॥ (अर्थ: जिस ग्रंथ में मूल रचयिता द्वारा कही गई बातों (उक्त), न कही गई बातों (अनुक्त) और गलत या अपूर्ण कही गई बातों (दुरुक्त) पर विचार किया जाता है, विद्वान उसे 'वार्तिक' कहते हैं।)
यह श्लोक कात्यायन के कार्य की सटीक परिभाषा है। पाणिनि के बाद जो नए शब्द संस्कृत में उत्पन्न हुए (अनुक्त), उनके लिए कात्यायन ने नए नियम बनाए। जहाँ पाणिनि का नियम अस्पष्ट था (दुरुक्त), वहां कात्यायन ने उसे सुधारा।
5. कात्यायन की वैज्ञानिक पद्धति: उक्तानुक्त की चिंता
कात्यायन की पद्धति दोष-दर्शन (Criticism) की नहीं थी, बल्कि पूर्णता (Completeness) की थी।
पाणिनि के काल में उत्तर-पश्चिमी (गांधार) संस्कृत का बोलबाला था। लेकिन कात्यायन के समय तक संस्कृत का विस्तार पूरे भारत (विशेषकर दक्षिण और पूर्व) में हो चुका था।
उदाहरण के लिए, कात्यायन ने अपने वार्तिकों में 'उपसंख्यान' (Addition / Supplement) शब्द का बहुत प्रयोग किया है। अर्थात्, "पाणिनि के इस नियम के साथ इन नए शब्दों को भी जोड़ लेना चाहिए।" उन्होंने यवनी (ग्रीक स्त्री) जैसे शब्दों को सिद्ध किया, जो सिकंदर के आक्रमण के बाद भारतीय शब्दकोश में नए-नए आए थे।
6. 'लोक-व्यवहार': भाषा एक बहती नदी है
कात्यायन का सबसे बड़ा दार्शनिक योगदान यह है कि उन्होंने भाषा को एक कृत्रिम (Artificial) वस्तु नहीं, बल्कि 'लोक' (Society) की संपत्ति माना।
महर्षि पतंजलि अपने महाभाष्य में कात्यायन को 'दाक्षिणात्य' (दक्षिण भारतीय) कहते हुए लिखते हैं: "प्रियतद्धिता दाक्षिणात्याः" (दक्षिण के लोगों को तद्धित प्रत्यय बहुत पसंद हैं)। कात्यायन ने व्याकरण के नियमों को 'लोक-व्यवहार' के अधीन माना। उनका मानना था कि व्याकरण का काम भाषा बनाना नहीं है, बल्कि समाज में जो भाषा बोली जा रही है, उसका केवल 'अनुशासन' (Regulation) करना है। वे एक सच्चे वर्णनात्मक भाषा-विज्ञानी (Descriptive Linguist) थे।
7. 'स्वर्गारोहण' काव्य: वैयाकरण की काव्यात्मक उड़ान
ठीक महर्षि पाणिनि की तरह (जिन्होंने 'जाम्बवती विजयम्' लिखा), कात्यायन (वररुचि) भी एक अत्यंत सरस हृदय वाले महाकवि थे। उनकी प्रसिद्ध काव्य रचना का नाम 'स्वर्गारोहण' (Svargarohana - Ascent to Heaven) है।
दुर्भाग्य से, 'स्वर्गारोहण' का मूल ग्रंथ आज पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसके बहुत से श्लोक परवर्ती साहित्य और सुभाषित संग्रहों (जैसे सुभाषितरत्नकोश) में 'वररुचि' के नाम से सुरक्षित हैं।
इस महाकाव्य की कथा संभवतः महाभारत के 'स्वर्गारोहण पर्व' (पांडवों की स्वर्ग-यात्रा) पर आधारित थी।
महान आलोचक आचार्य राजशेखर ने कात्यायन की प्रशंसा में लिखा है:
"यथार्थता कथं नाम्नि मा भूद्वररुचेरिह। व्यधत्त कण्ठाभरणं यः सदारोहणं दिवः॥"
(अर्थ: वररुचि का नाम सार्थक क्यों न हो? उन्होंने 'स्वर्गारोहण' नामक ऐसा काव्य रचा जो विद्वानों के गले का आभूषण बन गया।)
वररुचि (कात्यायन) की कविता में प्रकृति-चित्रण, शृंगार और जीवन के यथार्थ का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यह सिद्ध करता है कि भारतीय परंपरा में भाषा का 'गणितज्ञ' (व्याकरण) भाषा के 'सौंदर्य' (काव्य) से कभी अछूता नहीं रहा।
8. अन्य कृतियां: श्रौतसूत्र और वाजसनेयी प्रातिशाख्य
कात्यायन केवल व्याकरण और काव्य तक सीमित नहीं थे; वैदिक कर्मकांड और स्वर-प्रक्रिया में भी उनका नाम शिखर पर है।
- वाजसनेयी प्रातिशाख्य: शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता के उच्चारण, स्वर और वर्ण-नियमों का यह सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। इसे कात्यायन की ही रचना माना जाता है।
- कात्यायन श्रौतसूत्र: वैदिक यज्ञों (जैसे सोमयाग, अग्निष्टोम) को करने की विस्तृत विधि इस कल्पसूत्र में दी गई है। यह यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रंथों का व्यावहारिक मैनुअल है।
- शुल्ब सूत्र: ज्यामिति (Geometry) और यज्ञ-वेदियों के निर्माण का गणितीय ग्रंथ 'कात्यायन शुल्ब सूत्र' भी उनकी महान मेधा का परिचायक है, जिसमें पाइथागोरस प्रमेय (Pythagorean theorem) जैसे सूत्र मौजूद हैं।
9. निष्कर्ष: भारतीय विद्या के सेतु-निर्माता
महर्षि कात्यायन (वररुचि) प्राचीन भारत के उन विरले 'पॉलीमैथ' (Polymath - बहुश्रुत विद्वान) में से थे, जिनका अधिकार व्याकरण (Science of Language), काव्य (Art of Language), और कर्मकांड (Application of Religion) तीनों पर समान रूप से था।
यदि कात्यायन न होते, तो पाणिनि का व्याकरण समय के साथ अप्रचलित (Obsolete) हो जाता, क्योंकि भाषा बदल रही थी। कात्यायन ने अपने 'वार्तिकों' के माध्यम से पाणिनीय व्याकरण को 'अपडेट' किया और उसे अमर बना दिया। बाद में महर्षि पतंजलि ने इसी 'पाणिनि-कात्यायन' के ढांचे पर अपने 'महाभाष्य' का भव्य महल खड़ा किया। कात्यायन सही अर्थों में अतीत की शुचिता और भविष्य के विकास को जोड़ने वाले ऐतिहासिक सेतु (Historical Bridge) थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- महाभाष्य - महर्षि पतंजलि (जहाँ कात्यायन के वार्तिकों की विस्तृत व्याख्या है)।
- सुभाषितरत्नकोश (विद्याकर) - जहाँ वररुचि (कात्यायन) के काव्यात्मक श्लोक उद्धृत हैं।
- संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास - युधिष्ठिर मीमांसक।
- A History of Indian Literature - Maurice Winternitz (मुनित्रय का काल निर्धारण)।
- वाजसनेयी प्रातिशाख्य एवं कात्यायन श्रौतसूत्र।
