महर्षि पतंजलि: 'महाभाष्य' के प्रणेता, 'महानन्द काव्य' के रचयिता और व्याकरण के सर्वोच्च मुनि | Maharishi Patanjali

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि पतंजलि: 'महाभाष्य' और 'महानन्द काव्य' के रचयिता

महर्षि पतंजलि: 'महाभाष्य' के प्रणेता, 'महानन्द काव्य' के रचयिता और व्याकरण के सर्वोच्च मुनि

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, भाषावैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण: 'मुनित्रय' के वह अंतिम और सर्वोच्च अधिकारी, जिन्होंने न केवल पाणिनि और कात्यायन के व्याकरण की वैज्ञानिक समीक्षा की, बल्कि अपने 'महानन्द काव्य' से सिद्ध किया कि शब्दों का मर्मज्ञ ही उत्तम काव्य रच सकता है। (The Supreme Authority of Sanskrit Grammar)

भारतीय ज्ञान परंपरा में महर्षि पतंजलि का व्यक्तित्व एक विशाल वटवृक्ष के समान है। परंपरा उन्हें योगसूत्र (चित्त की शुद्धि), आयुर्वेद (शरीर की शुद्धि) और महाभाष्य (वाणी/व्याकरण की शुद्धि) तीनों का रचयिता मानकर उनकी वंदना करती है। संस्कृत व्याकरण के तीन महान आचार्यों (पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि) में वे अंतिम मुनि हैं।

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥
(अर्थ: जिन्होंने 'योग' से चित्त का, 'व्याकरण' (पद) से वाणी का, और 'आयुर्वेद' (वैद्यक) से शरीर के मल (दोष) को दूर किया, उन मुनिश्रेष्ठ पतंजलि को मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।)

जहाँ एक ओर उनके 'महाभाष्य' (Mahabhashya) ने व्याकरण को एक नीरस सूत्र-पद्धति से निकालकर उसे एक जीवंत दार्शनिक संवाद (Philosophical Dialogue) में बदल दिया, वहीं दूसरी ओर उनके द्वारा रचित 'महानन्द काव्य' (Mahananda Kavya) ने यह प्रमाणित किया कि व्याकरण का सबसे बड़ा आलोचक ही सबसे महान कवि भी हो सकता है।

📌 महर्षि पतंजलि: एक ऐतिहासिक एवं अकादमिक प्रोफाइल
पूरा नाम एवं अन्य नाम पतंजलि (अन्य नाम: गोनर्दीय, गोणिकापुत्र, फणिभृत् / शेषनाग के अवतार)
जन्म एवं काल निर्धारण ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग 150 ईसा पूर्व (150 BCE)
महाभाष्य में उल्लेख आता है: "इह पुष्यमित्रं याजयामः" (यहाँ हम पुष्यमित्र का यज्ञ करा रहे हैं)। इससे स्पष्ट प्रमाणित होता है कि वे शुंग वंश के संस्थापक सम्राट पुष्यमित्र शुंग के समकालीन और उनके पुरोहित थे।
जन्म स्थान गोनर्द (आधुनिक गोण्डा, उत्तर प्रदेश अथवा कुछ विद्वानों के अनुसार कश्मीर)। उनकी माता का नाम 'गोणिका' था।
महानतम कृति (व्याकरण) व्याकरण महाभाष्य (Vyakarana Mahabhashya) - अष्टाध्यायी और वार्तिकों की सबसे विस्तृत और प्रामाणिक व्याख्या (84 आह्निकों में)।
महानतम कृति (काव्य) महानन्द काव्य (Mahananda Kavya) - एक श्रेष्ठ संस्कृत महाकाव्य।
स्थान (परंपरा में) संस्कृत व्याकरण के 'मुनित्रय' (पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि) के तीसरे और सर्वोच्च मुनि

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: पुष्यमित्र शुंग के समकालीन

महर्षि पतंजलि का काल-निर्धारण प्राचीन भारतीय इतिहास की उन गिनी-चुनी घटनाओं में से है जो बिल्कुल अकाट्य और सर्वमान्य हैं। वे 150 ईसा पूर्व (150 BCE) के कालखंड में विद्यमान थे।

अपने ही ग्रंथ 'महाभाष्य' में वे वर्तमान काल (Present Tense) के उदाहरण देते हुए लिखते हैं: "अरुणद् यवनः साकेतम्" (यवनों/ग्रीकों ने साकेत अर्थात् अयोध्या पर आक्रमण किया है)। यह सीधा संदर्भ इंडो-ग्रीक राजा मेनांडर (Menander) के आक्रमण का है जो पुष्यमित्र शुंग के समय हुआ था। इसके अतिरिक्त उन्होंने "इह पुष्यमित्रं याजयामः" लिखकर यह सिद्ध कर दिया कि उन्होंने स्वयं राजा पुष्यमित्र शुंग का ऐतिहासिक 'अश्वमेध यज्ञ' संपन्न कराया था।

परंपरागत रूप से उन्हें आदि-शेष (शेषनाग) का अवतार माना जाता है, जो अंजलि (हाथ) से गिरे, इसलिए उनका नाम पतंजलि (पतत् + अंजलि) पड़ा।

3. 'महाभाष्य': संस्कृत व्याकरण का 'सुप्रीम कोर्ट'

पतंजलि की कीर्ति का सबसे बड़ा स्तंभ उनका 'महाभाष्य' है। यद्यपि पाणिनि ने 'अष्टाध्यायी' रची और कात्यायन ने उस पर 'वार्तिक' लिखे, लेकिन इन दोनों के बीच जो वैचारिक और व्याकरणिक टकराहट थी, उसका समाधान पतंजलि ने किया।

'यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्' का सिद्धांत

भारतीय व्याकरण का एक अटल नियम है: "यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्"। इसका अर्थ है कि मुनित्रय में जो बाद में आया है, उसका वचन पहले वाले से अधिक प्रामाणिक माना जाएगा।

अर्थात्, यदि किसी शब्द की सिद्धि को लेकर पाणिनि और कात्यायन में मतभेद हो, तो कात्यायन की बात मानी जाएगी। लेकिन यदि कात्यायन और पतंजलि में मतभेद हो, तो पतंजलि का निर्णय ही अंतिम (Final Judgment) माना जाएगा। पतंजलि ने कई स्थानों पर कात्यायन की आलोचना का खंडन करते हुए पाणिनि की रक्षा की और सिद्ध किया कि पाणिनि का सूत्र पूर्णतः वैज्ञानिक है।

4. पस्पशाह्निक (Pashpashahnika): महाभाष्य की दार्शनिक प्रस्तावना

महाभाष्य 84 'आह्निकों' (Ahnika - एक दिन में पढ़ा जाने वाला पाठ) में विभाजित है। इसका पहला आह्निक 'पस्पशाह्निक' कहलाता है। यह संपूर्ण संस्कृत साहित्य में भाषा-दर्शन (Philosophy of Language) का सबसे सुंदर और महत्वपूर्ण अध्याय है।

अथ शब्दानुशासनम्। (अब शब्दों के अनुशासन/व्याकरण का आरंभ किया जाता है।)

इसमें पतंजलि यह प्रश्न उठाते हैं कि "व्याकरण क्यों पढ़ना चाहिए?" वे इसके पांच मुख्य प्रयोजन (उद्देश्य) बताते हैं: रक्षोहागमलध्वसंदेहाः प्रयोजनम्
1. रक्षा: वेदों की रक्षा के लिए।
2. ऊह: यज्ञ में लिंग और वचन बदलने की समझ के लिए।
3. आगम: ब्राह्मण का यह निष्काम कर्तव्य है कि वह वेदों का अध्ययन करे।
4. लघु: शब्दों को आसानी (Short-cut) से सीखने के लिए।
5. असंदेह: वैदिक शब्दों में कोई संदेह न रहे, इसके लिए।

5. 'महानन्द काव्य': वैयाकरण का विलुप्त महाकाव्य

पाणिनि (जाम्बवती विजयम्) और कात्यायन (स्वर्गारोहण) की ही भांति, महर्षि पतंजलि ने भी एक महाकाव्य की रचना की थी, जिसका नाम 'महानन्द काव्य' (Mahananda Kavya) है।

व्याकरण और काव्य का अद्भुत संगम

दुर्भाग्य से 'महानन्द काव्य' की पूर्ण पांडुलिपि आज अनुपलब्ध है। किंतु परवर्ती आचार्यों, जैसे आचार्य राजशेखर और समुद्रबंध, ने इस ग्रंथ का अत्यंत सम्मान के साथ उल्लेख किया है।

इस काव्य में संभवतः 'समुद्र-मंथन' या किसी पौराणिक आख्यान का वर्णन था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि पतंजलि ने इसमें अपने ही महाभाष्य के कठिन व्याकरणिक नियमों का प्रयोग अत्यंत ललित (Sweet and poetic) भाषा में किया था। यह सिद्ध करता है कि एक श्रेष्ठ वैयाकरण जब कविता लिखता है, तो उसके शब्द-चयन में न तो व्याकरण की कोई अशुद्धि होती है और न ही भावों की कोई कमी।

6. संवाद शैली (Dialogue Style): गुरु और शिष्य का शास्त्रार्थ

पतंजलि के महाभाष्य की शैली दुनिया के किसी भी अन्य ग्रंथ से अलग है। यह कोई नीरस 'गाइड-बुक' नहीं है। यह संवाद (Conversational) शैली में लिखा गया है।

पतंजलि इसमें एक नाटक (Drama) की तरह तीन पात्रों को खड़ा करते हैं:
1. पूर्वपक्षी (आक्षेपक): जो अज्ञानी शिष्य की तरह शंका या प्रश्न उठाता है।
2. देशीय (एकदेशी): जो आधा-अधूरा उत्तर देता है।
3. सिद्धान्ती (स्वयं पतंजलि): जो अंत में सारे संशयों का निवारण कर अंतिम सत्य (Siddhanta) प्रस्तुत करते हैं।
इस प्रश्न-उत्तर शैली ने संस्कृत गद्य (Prose) को एक नई, सजीव और प्रवाहमयी दिशा प्रदान की।

7. पतंजलि का भाषा-दर्शन: 'शब्दाद्वैत' का बीजारोपण

पतंजलि ने भाषा को केवल 'संचार का माध्यम' नहीं माना। उन्होंने 'शब्द' (Word) और 'अर्थ' (Meaning) के संबंध को शाश्वत (नित्य) बताया।

उन्होंने प्रश्न किया: "शब्द क्या है? क्या यह केवल ध्वनि है?" वे उत्तर देते हैं कि ध्वनि तो केवल शब्द को प्रकट करने का माध्यम (Sphota/धवनि) है; वास्तविक शब्द मन के भीतर का वह 'अर्थ-तत्त्व' है जो श्रोता के मन में अर्थ उत्पन्न करता है। पतंजलि के इसी सूक्ष्म दर्शन को आधार बनाकर सदियों बाद भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' नामक ग्रंथ में 'शब्द-ब्रह्म' (Shabda-Brahma) का महासिद्धांत प्रतिपादित किया।

8. निष्कर्ष: 'यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्' (अंतिम मुनि की सर्वोच्चता)

महर्षि पतंजलि भारतीय ज्ञान-मंदाकिनी के वह भगीरथ हैं जिन्होंने पाणिनि और कात्यायन के ज्ञान को आम विद्वानों तक पहुँचाने के लिए उसे अत्यंत सुगम, तार्किक और रोचक बना दिया।

उनका 'महाभाष्य' केवल व्याकरण का ग्रंथ नहीं है; यह पुष्यमित्र शुंग के समय के भारत के समाज, भूगोल, राजनीति और भोजन-संस्कृति का एक जीवंत 'एनसाइक्लोपीडिया' है। और उनका 'महानन्द काव्य' यह याद दिलाता है कि प्राचीन भारत के ऋषि केवल शुष्क नियमों के निर्माता नहीं थे, बल्कि वे सौंदर्य, रस और कला के भी परम उपासक थे। पतंजलि के बिना संस्कृत भाषा की आत्मा को समझना असंभव है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • व्याकरण महाभाष्य - महर्षि पतंजलि (पस्पशाह्निक)।
  • संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास - युधिष्ठिर मीमांसक (महाभाष्य और महानन्द काव्य का विश्लेषण)।
  • India in the Time of Patanjali - B.N. Puri (ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य)।
  • वाक्यपदीय - भर्तृहरि (पतंजलि के दर्शन का विस्तार)।

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