महर्षि पाणिनि: 'अष्टाध्यायी' के रचयिता, विश्व के प्रथम भाषा-वैज्ञानिक और 'जाम्बवती विजयम्' के महाकवि | Maharishi Panini

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि पाणिनि: 'अष्टाध्यायी' के प्रणेता और भाषा-विज्ञान के जनक

महर्षि पाणिनि: 'अष्टाध्यायी' के रचनाकार और 'जाम्बवती विजयम्' के महाकवि

एक अत्यंत विस्तृत भाषावैज्ञानिक, गणितीय और साहित्यिक विश्लेषण: वह महामानव जिसने विश्व को 'व्याकरण' (Grammar) का पहला 'एल्गोरिदम' (Algorithm) दिया और साथ ही यह सिद्ध किया कि एक कठोर वैयाकरण भी एक अत्यंत सरस 'महाकवि' हो सकता है। (The Father of Linguistics and Classical Sanskrit)

मानव इतिहास में जब भी 'भाषा-विज्ञान' (Linguistics) की चर्चा होती है, तो उसका आरंभ ग्रीस (Greece) या रोम (Rome) से नहीं, बल्कि प्राचीन भारत से होता है। 19वीं सदी में जब यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत का अध्ययन शुरू किया, तो वे यह देखकर दंग रह गए कि भारत में ईसा से सदियों पूर्व ही एक व्यक्ति ने 'अष्टाध्यायी' (Ashtadhyayi) के रूप में भाषा का ऐसा पूर्ण, दोषरहित और गणितीय ढांचा तैयार कर दिया था, जिसकी बराबरी आज का 'सुपरकंप्यूटर' भी बमुश्किल कर पाता है। वे ऋषि थे—महर्षि पाणिनि

लेकिन पाणिनि केवल 'धातु', 'प्रत्यय' और 'उपसर्ग' के नीरस गणितज्ञ नहीं थे। भारतीय परंपरा उन्हें एक महान 'कवि' (Poet) के रूप में भी पूजती है। उनका खोया हुआ महाकाव्य 'जाम्बवती विजयम्' (Jambavati Vijayam) इस बात का प्रमाण है कि जिसने भाषा की हड्डियाँ (व्याकरण) गढ़ीं, उसी ने उस भाषा में 'रस' (काव्य) का प्राण भी फूंका।

📌 महर्षि पाणिनि: एक ऐतिहासिक एवं अकादमिक प्रोफाइल
पूरा नाम महर्षि पाणिनि (दाक्षीपुत्र - माता दाक्षी के पुत्र)
जन्म एवं काल निर्धारण आधुनिक अकादमिक मत (Indology): लगभग 500 ईसा पूर्व (BCE) से 400 ईसा पूर्व (BCE) के मध्य।
वाक्यपदीय और महाभाष्य के अनुसार, वे नंद वंश (Nanda Dynasty) के समकालीन या उससे कुछ पूर्व के थे। उनके काल में बौद्ध धर्म का उदय हो रहा था और लौकिक संस्कृत अपनी पूर्णता की ओर थी।
जन्म स्थान शलातुर ग्राम (Shalatula), गांधार प्रदेश (वर्तमान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में, सिंधु नदी के तट पर)।
महानतम कृति (व्याकरण) अष्टाध्यायी (8 अध्यायों और लगभग 3959 सूत्रों का व्याकरण ग्रंथ)। इसके पूरक: धातुपाठ, गणपाठ, उणादिसूत्र, और लिंगानुशासन।
महानतम कृति (काव्य) जाम्बवती विजयम् (इसे 'पातालविजयम्' भी कहा जाता है - यह एक संस्कृत महाकाव्य है)।
उपाधि भाषा-विज्ञान के जनक (Father of Linguistics), वैयाकरण शिरोमणि।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: गांधार के शलातुर ग्राम का गौरव

महर्षि पाणिनि का जन्म अविभाजित भारत के गांधार क्षेत्र (Gandhara) में स्थित 'शलातुर' (Shalatula) नामक ग्राम में हुआ था। उनकी माता का नाम 'दाक्षी' और पिता का नाम 'पणिन' था। (इसीलिए उन्हें 'पाणिनि' और 'दाक्षीपुत्र' कहा जाता है)।

कहा जाता है कि बचपन में वे पढ़ने में बहुत कुशाग्र नहीं थे। विद्या प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने अपना डमरू बजाया। उस डमरू से जो ध्वनियां उत्पन्न हुईं, उसी से पाणिनि को 'माहेश्वर सूत्र' प्राप्त हुए, जो उनके संपूर्ण व्याकरण का आधार बने।

3. 'माहेश्वर सूत्र' (शिव सूत्र): अष्टाध्यायी का ऑपरेटिंग सिस्टम (OS)

जिस प्रकार किसी कंप्यूटर को चलाने के लिए 'बाइनरी कोड' (0 और 1) और एक 'ऑपरेटिंग सिस्टम' की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार पाणिनि के अष्टाध्यायी का ऑपरेटिंग सिस्टम हैं—14 माहेश्वर सूत्र

१. अइउण् | २. ऋलृक् | ३. एओङ् | ४. ऐऔच् | ५. हयवरट् |
६. लण् | ७. ञमङणनम् | ८. झभञ् | ९. घढधष् | १०. जबगडदश् |
११. खफछठथचटतव् | १२. कपय् | १३. शषसर् | १४. हल् |
(यह संस्कृत वर्णमाला का सबसे वैज्ञानिक वर्गीकरण है। इसमें पहले स्वर (Vowels), फिर अंतस्थ (Semi-vowels), और अंत में व्यंजन (Consonants) उनके उच्चारण स्थान और घोष/अघोष के आधार पर रखे गए हैं।)

इन 14 सूत्रों का उपयोग पाणिनि ने 'प्रत्याहार' (Pratyahara) बनाने के लिए किया। 'प्रत्याहार' एक प्रकार का 'शॉर्टकट कोड' (Shortcut Code) है। जैसे, यदि पाणिनि को संस्कृत के सभी स्वरों (Vowels) को एक साथ बोलना है, तो वे "अ, आ, इ, ई, उ, ऊ..." नहीं लिखेंगे, वे केवल 'अच्' (Ach) कह देंगे (पहले सूत्र के 'अ' से चौथे सूत्र के 'च्' तक)। इसी कोडिंग तकनीक ने 3959 सूत्रों को अत्यंत संक्षिप्त बना दिया।

4. 'अष्टाध्यायी': 3959 सूत्रों का गणितीय चमत्कार

पाणिनि का महान ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' 8 अध्यायों में विभाजित है। प्रत्येक अध्याय में 4 'पाद' (Quarters) हैं, जिससे कुल 32 पाद बनते हैं।

सूत्र शैली: "अल्पाक्षरमसन्दिग्धम्..."

पाणिनि ने यह ग्रंथ 'सूत्र' (Aphorism) शैली में लिखा है। सूत्र की विशेषता होती है कि वह 'कम से कम अक्षरों वाला, संदेह-रहित और सारयुक्त' होना चाहिए।

पाणिनि ने शब्दों को रटने के बजाय उनके निर्माण का 'जेनरेटिव ग्रामर' (Generative Grammar) दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत का प्रत्येक शब्द एक 'धातु' (Root / Verb) से उत्पन्न हुआ है। यदि आप उस धातु में सही 'प्रत्यय' (Suffix) और 'उपसर्ग' (Prefix) जोड़ दें, तो एक नया शब्द 'जेनरेट' (Generate) हो जाएगा। यह एक केमिकल फैक्ट्री की तरह है—कच्चा माल डालिए, फॉर्मूला लगाइए और नया शुद्ध शब्द (Product) प्राप्त कीजिए।

5. पाणिनि और आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान (Backus-Naur Form)

1985 में नासा (NASA) के शोधकर्ता रिक ब्रिग्स (Rick Briggs) ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया—"Knowledge Representation in Sanskrit and Artificial Intelligence"। उन्होंने स्पष्ट किया कि कंप्यूटर को प्राकृतिक भाषा (Natural Language) समझाने के लिए जो 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) का ढांचा चाहिए, वह पाणिनि ने 2500 साल पहले ही बना दिया था।

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं (C++, Java, Python) के सिंटैक्स को परिभाषित करने के लिए Backus-Naur Form (BNF) का उपयोग किया जाता है। आधुनिक वैज्ञानिकों (जैसे जॉन बैकस और नोम चॉम्स्की) ने स्वीकार किया है कि BNF के नियम हू-ब-हू पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' के सूत्रों की तार्किक संरचना पर आधारित हैं। पाणिनि की 'अनुवृत्ति' (Anuvritti - Inheriting properties from previous rules) ऑब्जेक्ट-ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग (OOP) के 'इनहेरिटेंस' (Inheritance) के समान है।

6. 'जाम्बवती विजयम्' (पातालविजयम्): वैयाकरण का महाकाव्य

यह एक आम भ्रांति है कि वैयाकरण (Grammarians) बहुत नीरस और 'रूखे' स्वभाव के होते हैं, जिन्हें कविता या भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। महर्षि पाणिनि ने इस भ्रांति को अपने महाकाव्य 'जाम्बवती विजयम्' (Jambavati Vijayam) से तोड़ा। (इसे 'पातालविजयम्' भी कहा जाता है)।

महाकाव्य की विषयवस्तु (Theme)

दुर्भाग्य से, यह पूरा ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसके अनेक श्लोक परवर्ती कवियों (जैसे राजशेखर, क्षेमेन्द्र और सुभाषित-रत्नाकोश) के ग्रंथों में 'पाणिनि' के नाम से उद्धृत (Quoted) हैं।

इस काव्य की कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पाताल लोक जाकर 'जाम्बवान' (रामायण कालीन भालूराज) को युद्ध में पराजित करने और उनकी पुत्री 'जाम्बवती' से विवाह करने पर आधारित थी।
उपलब्ध श्लोकों से पता चलता है कि पाणिनि ने इसमें 'संध्या', 'रात्रि', और 'स्त्रियों के सौंदर्य' का अत्यंत कोमल, काव्यात्मक और अनुप्रास-युक्त वर्णन किया था, जो उनके कठोर 'सूत्रकार' रूप के बिल्कुल विपरीत है।

7. आचार्य राजशेखर की प्रशस्ति: व्याकरण और काव्य का संगम

10वीं शताब्दी के महान कवि और आलोचक राजशेखर ने अपनी 'सूक्तिमुक्तावली' में पाणिनि की वंदना करते हुए एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक लिखा है:

नमः पाणिनये तस्मै यस्मादाविरभूदिह।
आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्बवतीजयम्॥
(अर्थ: उस महर्षि पाणिनि को मेरा नमस्कार है, जिनके मुख से इस संसार में सबसे पहले 'व्याकरण' (अष्टाध्यायी) प्रकट हुआ, और उसके पश्चात 'जाम्बवती विजयम्' नामक मधुर काव्य प्रकट हुआ।)

यह श्लोक अकाट्य प्रमाण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में एक पूर्ण विद्वान वही है जो 'शास्त्र' (विज्ञान/लॉजिक) और 'काव्य' (कला/भावना) दोनों में समान रूप से पारंगत हो।

8. निष्कर्ष: विश्व की बौद्धिक संपदा के शिखर-पुरुष

महर्षि पाणिनि का अवदान केवल भारत तक सीमित नहीं है। जब 19वीं सदी में पश्चिमी विद्वान फर्डिनेंड डी सॉसर (Ferdinand de Saussure) और लियोनार्ड ब्लूमफील्ड (Leonard Bloomfield) ने आधुनिक 'स्ट्रक्चरल लिंग्विस्टिक्स' (Structural Linguistics) की नींव रखी, तो उनका मुख्य प्रेरणा-स्रोत पाणिनि का 'अष्टाध्यायी' ही था।

पाणिनि ने एक बिखरी हुई, विशाल और निरंतर बदलती हुई 'वैदिक भाषा' को पकड़ा, उसे गणितीय सूत्रों की भट्टी में तपाया, और 'लौकिक संस्कृत' (Classical Sanskrit) नामक एक ऐसा 'मानकीकृत' (Standardized) अमृत तैयार किया जो अगले 2500 वर्षों तक कभी नहीं बदला। आज भी कालिदास का श्लोक हो या इसरो (ISRO) का कोई नया मंत्र, वह तभी शुद्ध माना जाता है जब वह महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' की कसौटी पर खरा उतरता है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • अष्टाध्यायी - महर्षि पाणिनि (काशिका वृत्ति एवं महाभाष्य के साथ)।
  • सुभाषितरत्नकोश (विद्याकर) - जहाँ पाणिनि के 'जाम्बवती विजयम्' के श्लोक उद्धृत हैं।
  • Knowledge Representation in Sanskrit and Artificial Intelligence - Rick Briggs (AI Magazine, NASA).
  • The Ashtadhyayi of Panini (English Translation) - Srisa Chandra Vasu.
  • संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास - युधिष्ठिर मीमांसक।

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