Mathura Ka Tyag Aur Dwarka Nirman: Jab Bhagwan Krishna Kahlaye 'Ranchod'

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

मथुरा का त्याग और अजेय द्वारका नगरी का निर्माण: जब भगवान कहलाए 'रणछोड़'

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 50-52)

संसार में यह एक सामान्य धारणा है कि जो युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हो, वह कायर होता है। युद्धभूमि छोड़ना क्षत्रियों के लिए सबसे बड़ा अपमान माना जाता है। किंतु, जब बात साक्षात परब्रह्म परमात्मा की हो, तो उनके भागने में भी लोक-कल्याण और असीम करुणा छिपी होती है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध का यह अत्यंत रोमांचक और दार्शनिक प्रसंग हमें बताता है कि भगवान श्रीकृष्ण को मथुरा क्यों छोड़नी पड़ी और कैसे समुद्र के वक्षस्थल पर उस स्वर्णमयी, अजेय 'द्वारका नगरी' का उदय हुआ, जिसने पूरे आर्यावर्त की राजनीति और धर्म को दिशा दी।

कंस वध के पश्चात: प्रतिशोध की अग्नि

जब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने मथुरा के मल्लयुद्ध में अत्याचारी कंस का वध किया, तो तीनों लोकों में हर्ष की लहर दौड़ गई। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और मथुरा के बंदीगृह में वर्षों से तड़प रहे वसुदेव और देवकी को उनके पुत्रों ने अपने हाथों से बेड़ियां खोलकर मुक्त किया। श्रीकृष्ण ने अपने नाना उग्रसेन को मथुरा के सिंहासन पर बैठाया और यदुवंशियों को उनका खोया हुआ सम्मान लौटाया। कुछ समय के लिए मथुरा में सुख और शांति छा गई।

किंतु, यह शांति किसी आने वाले बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा थी। कंस की दो पत्नियाँ थीं— अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों मगध देश के अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर सम्राट जरासंध की पुत्रियाँ थीं। कंस की मृत्यु के पश्चात दोनों बहनें विलाप करती हुई अपने पिता जरासंध के पास मगध पहुँचीं और रो-रोकर अपने वैधव्य (विधवा होने) का कारण उन दो यदुवंशी बालकों (कृष्ण और बलराम) को बताया।

अपनी पुत्रियों के आंसू देखकर जरासंध का अहंकार और क्रोध ज्वालामुखि की तरह फट पड़ा। उसने उसी क्षण अपनी सभा में यह भयंकर प्रतिज्ञा की— "मैं इस पूरी पृथ्वी को यदुवंशियों से विहीन कर दूंगा! मैं मथुरा की ईंट से ईंट बजा दूंगा और उन दोनों ग्वालों का सिर काट कर अपनी पुत्रियों के चरणों में रख दूंगा।"

जरासंध के 17 भयंकर आक्रमण

जरासंध कोई साधारण राजा नहीं था। वह उस समय के आर्यावर्त का सबसे बड़ा चक्रवर्ती सम्राट था, जिसके अधीन सैकड़ों राजा काम करते थे। उसने तेईस (23) अक्षौहिणी सेना इकट्ठी की। (एक अक्षौहिणी सेना में 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 घुड़सवार और 109,350 पैदल सैनिक होते हैं)। जरासंध ने इस विशाल समुद्र जैसी सेना के साथ मथुरा को चारों ओर से घेर लिया।

मथुरा की प्रजा इस भयंकर सेना को देखकर भयभीत हो उठी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम जी से कहा— "हे दाऊ भैया! देखिए, पृथ्वी का भार उतारने का हमारा उद्देश्य कैसे अपने आप हमारे सामने आ गया है। जरासंध अपने साथ पृथ्वी के समस्त क्रूर और पापी राजाओं की सेना लेकर आया है। हम इस सेना का तो संहार करेंगे, किंतु जरासंध को जीवित छोड़ देंगे, ताकि वह बार-बार नई सेनाएं लाए और हम पृथ्वी को पापियों से मुक्त करते रहें।"

॥ श्लोक ॥
इत्युक्त्वा तौ रथावारुह्य वृतौ त्रैलोक्यसुन्दरौ ।
निजघ्नतुर्बलं सर्वं मागधस्य परन्तपौ ॥
(श्रीमद्भागवत 10.50.22)
अर्थ: ऐसा विचार करके तीनों लोकों में सबसे सुंदर, शत्रुओं को संताप देने वाले वे दोनों भाई (कृष्ण और बलराम) स्वर्ग से आए हुए दिव्य रथों पर सवार होकर युद्धभूमि में उतरे। उन्होंने देखते ही देखते मगधराज जरासंध की उस पूरी तेईस अक्षौहिणी सेना का विनाश कर दिया।

बलराम जी ने जरासंध को अपने पास की डोरियों से बांध लिया और उसे मारना चाहा, किंतु श्रीकृष्ण ने उन्हें रोक दिया। भगवान ने जरासंध को अपमानित करके छोड़ दिया। जरासंध लज्जित होकर तपस्या करने वन में जाने लगा, लेकिन उसके मित्रों ने उसे भड़काया।

परिणामस्वरूप, जरासंध ने एक या दो बार नहीं, बल्कि लगातार 17 बार तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण किया। और हर बार श्रीकृष्ण और बलराम जी ने उसकी पूरी सेना को गाजर-मूली की तरह काट डाला और जरासंध को जीवित वापस भेज दिया। इस प्रकार भगवान ने बिना कहीं गए ही पृथ्वी का करोड़ों असुरों का भार हल्का कर दिया।

18वाँ आक्रमण और कालयवन का संकट

जब जरासंध 18वीं बार मथुरा पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था, तब मथुरा पर एक और भयानक संकट आ खड़ा हुआ। गार्ग्य मुनि के पुत्र कालयवन ने भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया था कि कोई भी यादव उसे युद्ध में परास्त न कर सके। नारद जी की प्रेरणा से, कालयवन तीन करोड़ म्लेच्छों (बर्बर सैनिकों) की भयंकर सेना लेकर उसी समय मथुरा के द्वार पर आ डटा, जब जरासंध भी आक्रमण करने वाला था।

अब मथुरा दो पाटों के बीच में फँस गई थी। एक ओर कालयवन की तीन करोड़ सेना और दूसरी ओर जरासंध की तेईस अक्षौहिणी सेना। भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया:

"यदि मैं और दाऊ भैया कालयवन से युद्ध करने में उलझ गए, तो जरासंध मथुरा में प्रवेश करके मेरे निहत्थे यदुवंशियों और प्रजा को गाजर-मूली की तरह काट डालेगा। राजा का पहला धर्म अपनी प्रजा की रक्षा करना है, अपने अहंकार की तुष्टि के लिए युद्ध लड़ना नहीं। मुझे अपनी प्रजा के लिए एक ऐसा सुरक्षित स्थान खोजना होगा, जहाँ कोई शत्रु न पहुँच सके।"

अजेय 'द्वारका नगरी' का निर्माण

यदुवंशियों को इस दोहरे संकट से बचाने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण ने रातों-रात देवशिल्पी विश्वकर्मा का स्मरण किया। विश्वकर्मा जी तुरंत हाथ जोड़े उपस्थित हुए। भगवान ने उन्हें आदेश दिया कि "हे देवशिल्पी! समुद्र के भीतर एक ऐसी नगरी का निर्माण करो, जो इतनी दुर्गम और सुरक्षित हो कि देवता भी उस पर आक्रमण न कर सकें।"

॥ श्लोक ॥
इति संमन्त्र्य भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम् ।
अन्तःसमुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचीकरत् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.50.50)
अर्थ: इस प्रकार विचार करके भगवान श्रीकृष्ण ने समुद्र के भीतर बारह योजन (लगभग 96 मील) के विस्तार वाला एक अत्यंत विशाल और अजेय नगर (दुर्ग) बनवाया, जो पूरी तरह से अद्भुत, आश्चर्यजनक और सभी प्रकार के ऐश्वर्यों से परिपूर्ण था।

विश्वकर्मा जी के अनुरोध पर, समुद्र देव ने 12 योजन भूमि पीछे हटकर भगवान को प्रदान की। वहाँ एक ऐसी अलौकिक नगरी बसाई गई जिसकी कल्पना भी मृत्युलोक में संभव नहीं थी। इसके वास्तुशिल्प का वर्णन करते हुए भागवत महापुराण कहता है कि द्वारका की सड़कें चौड़ी और स्फटिक मणियों से जड़ी हुई थीं। वहाँ के महलों की दीवारें शुद्ध स्वर्ण और रत्नों की बनी थीं।

देवताओं ने भगवान को उनके ऐश्वर्य के अनुरूप भेंटें दीं। देवराज इंद्र ने अपनी सुधर्मा नाम की राजसभा वहाँ स्थापित कर दी, जिसमें बैठने वाले मनुष्य को कभी भूख, प्यास या बुढ़ापा नहीं सताता था। वरुण देव ने श्वेत रंग के ऐसे दिव्य घोड़े दिए जो मन की गति से चलते थे। कुबेर ने अपनी अष्ट निधियां (संपत्ति) भगवान की सेवा में रख दीं। चारों ओर पारिजात के वृक्ष इस नगरी को अपनी सुगंध से महका रहे थे। यह थी 'द्वारका', जिसे 'कुशस्थली' भी कहा गया।

योगमाया का चमत्कार और रणछोड़ भगवान

नगरी तो बन गई, लेकिन तीन करोड़ कालयवन की सेना से घिरी मथुरा से यदुवंशियों को वहाँ कैसे ले जाया जाए? यहाँ भगवान ने अपनी 'योगमाया' को आदेश दिया। रात्रि के अंधकार में, जब सभी मथुरावासी गहरी नींद में सो रहे थे, योगमाया ने उन्हें उनके पलंगों सहित रातों-रात उठाकर द्वारका के स्वर्ण महलों में पहुंचा दिया। जब सुबह यदुवंशी जागे, तो उन्होंने स्वयं को मथुरा की गलियों के बजाय समुद्र के बीच बनी स्वर्णमयी नगरी द्वारका में पाया। यह भगवान की करुणा का चरमोत्कर्ष था।

प्रजा को सुरक्षित कर लेने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण मथुरा के मुख्य द्वार से निहत्थे, बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के पैदल ही बाहर निकले। उनके गले में वैजयंती माला थी और मुख पर मंद-मंद मुस्कान। उन्हें इस प्रकार निहत्थे भागते देख, कालयवन उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ा। उसने पीछे से ताने मारे— "अरे यदुवंशी! युद्ध के मैदान से इस तरह कायरों की भांति भागना तुम्हारे लिए कलंक है! रुक जाओ!"

भगवान श्रीकृष्ण को कोई फर्क नहीं पड़ा कि दुनिया उन्हें 'रणछोड़' (युद्ध का मैदान छोड़कर भागने वाला) कहेगी। भगवान को अपने यश या नाम की चिंता नहीं होती, उन्हें केवल अपने भक्तों की चिंता होती है। यदि प्रजा की रक्षा के लिए भागना भी पड़े, तो भगवान उस कलंक को भी अपने माथे का चंदन बना लेते हैं। इसी घटना के बाद से भगवान का एक अत्यंत प्रिय नाम 'रणछोड़ राय' पड़ा। गुजरात के डाकोर में आज भी भगवान की 'रणछोड़ जी' के रूप में भव्य पूजा होती है।

कालयवन का अंत: राजा मुचुकुन्द की गुफा

भगवान भागते-भागते एक बहुत गहरी और अंधकारमयी गुफा में प्रवेश कर गए। कालयवन भी उनके पीछे-पीछे गुफा में घुस गया। गुफा के भीतर एक व्यक्ति सोया हुआ था। कालयवन ने सोचा कि कृष्ण डर कर यहाँ सो गए हैं। उसने क्रोध में आकर उस सोये हुए व्यक्ति को ज़ोर से एक लात मारी।

वह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि इक्ष्वाकु वंश के परम प्रतापी राजा मुचुकुन्द थे। उन्होंने प्राचीन काल में देवासुर संग्राम में देवताओं की ओर से राक्षसों से युद्ध किया था और थक कर सो गए थे। इंद्र ने उन्हें वरदान दिया था कि "जो भी व्यक्ति तुम्हारी नींद तोड़ेगा, तुम जैसे ही आंखें खोलकर उसे देखोगे, वह उसी क्षण जलकर भस्म हो जाएगा।"

लात लगते ही राजा मुचुकुन्द की नींद टूट गई। जैसे ही उन्होंने आंखें खोलकर क्रोध से कालयवन की ओर देखा, उनके नेत्रों से निकली अग्नि से कालयवन पल भर में जलकर राख का ढेर हो गया। इस प्रकार भगवान ने अपने हाथों से शस्त्र उठाए बिना ही उस अजेय कालयवन का अंत कर दिया।

कालयवन के भस्म होने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण ने राजा मुचुकुन्द को अपने चतुर्भुज नारायण रूप में दर्शन दिए। राजा मुचुकुन्द ने भगवान की अद्भुत स्तुति की और उनके आदेश से बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) जाकर तपस्या की और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुए।

कथा का आध्यात्मिक रहस्य

मथुरा से द्वारका तक की यह यात्रा केवल स्थान का परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह भगवान के जीवन के एक नए अध्याय का आरंभ था। मथुरा में भगवान ने कंस का वध करके 'धर्म की स्थापना' की, लेकिन द्वारका में उन्होंने 'धर्म के विस्तार' और 'आदर्श गृहस्थ' की भूमिका निभाई। जरासंध के बार-बार आक्रमण यह दर्शाते हैं कि संसार में बुराई बार-बार सिर उठाती है, लेकिन ईश्वर की शक्ति अंततः उसे समाप्त कर ही देती है।

भगवान श्रीकृष्ण का 'रणछोड़' कहलाना हमें यह महान शिक्षा देता है कि सच्चा वीर वह नहीं जो झूठे अहंकार में आकर अपनों की जान खतरे में डाल दे, बल्कि सच्चा वीर वह है जो समय, परिस्थिति और अपनों की भलाई को देखते हुए उचित निर्णय ले, चाहे उसके लिए उसे कोई भी कलंक क्यों न सहना पड़े।

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